परेम : कहानी

साकुर चैनल ल एति-तेति पेले असन करके बिकास पीठ म ओरमाये अपन बेग ल नहकाइस। बैंक भीतर पांव रखते साठ, अहा! कतका सुघ्घर गमकत, ममहावत ठंढा! जइसे आगि म जरे ल घीव म नहवा दिस। भाटा फूल रंग के पुट्टी अउ गाजरी रंग के पट्टी नयनसुख देवत रहिस। बिकास दूनों बाजू, एरी-डेरी, नजर दौडाइस।खास पहिचान के कोनों नइ रहिन। सब दूर के रिस्तेदार, डहरचलती पहिचान के,जेखर संग फटफटी म बइठे अइसने राम रमौआ हो जात रहिस। बिकास हाथ उठा के, हिलाके एकात झन ल हाय-हलो, राम-राम करिस।बैंक खचाखच भरे रहिस,…

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तेजनाथ के रचना

बड़ उथल-पुथल हे मन म, आखिर का पायेंव जीवन म? जंगल गेयेंव घर,परिवार छोड़ के, घेर लिस ‘तियागे के अहम’ उंहा भी बन म। देह के बंधन ले मुक्ति बर देह मिले, कहिथें, अउ पूरा जिनगीए सिरागे देह के जतन म। अमका होही, ढमका होही, कहिथें, फलाने दिन,दिसा,फलाने लगन… म। बड़ दिक्कत हे, दुख हे दुनों हाल म, लइका हे अउ नइहे तभो आंगन म। कमा -कमा के मर गेंव मैं, दूसर मरगे सिरिफ जलन म। ये जीवन-वो जीवन,सरग-नरक, पाप-पुन…, महिं जस मथागे जिनगी,उलझन म। थक गेंव सांति अउ खुसी…

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जब ले बिहाव के लगन होगे

संगी, जब ले बिहाव के लगन होगे बदल गे जिंनगी,मन मगन होगे। सात भांवर, सात बचन, सात जनम के बंधन होगे। एक गाड़ी के दू चक्का जस, दू तन एक मन होगे। सांटी के खुनुर- खुनुर, अहा! सरग जस आंगन होगे। भसम होगे छल-कपट सब, बंधना पबरित अगन होगे। नाहक गे तन्हाई के पतझड़, जिंनगी तो अब चमन होगे। समे गुजरगे तेन गुजर गे भले अइसने, अब ले एक-दूसर के जीवन होगे। मोर जीवन साथी सबले सुघ्घर, देखके ये भाव, सब ल जलन होगे। एक ले भले दू कहिथें, दूनों…

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मैं जनम के बासी खावत हौं

नवजवान,तैं चल, मैं पीछु-पीछु आवत हौं, कइसे चलना हे, बतावत हौं। ताते-तात के झन करबे जिद कभू, मैं जनम के बासी खावत हौं। तोर खांध म बइठार ले मोर अनुभव ल बस , मैं अतके चाहत हौं। दूर नहीं मैं तोर से , मोर संगवारी, पुस्तक म, घटना म, समे म,सुरतावत हौं। पानी के धार बरोबर होथे जवानी, सधगे त साधन बनगे, चेतावत हौं। बइठे रहिबे त पछुआ जाबे खुद से, सोंच ले, समझ ले, मैं बड़ पछतावत हौं। फूटे फोटका जस फेर नइ मिलै समै दुबारा, समै म सवार…

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कीरा – मकोरा

कीरा – मकोरा, पसु-पक्छी, पेड़- पउधा … देखथन नानम जोनि ल, अउ सोंचथन, अबिरथा हे उंखरो जीवन, खाये के सुख न जिये के, सोंचे – समझे के सक्ति न भगवान के भक्ति। का काम के हे ग अइसनों जिनगी? बेकार हे, बोझ हे। अउ उमन देखत होहीं जब हम ल, सोंचत होहीं- कीरा – मकोरा ले गेये बीते हे जिनगी मनखे के। खाए के सुख न जीये के, सोंचे के सक्ति न समझे के। हाय- हाय, खाली हाय -हाय संझा ले बिहिनिया तक, बिहिनिया ले सांझ तक। लदे रहिथे भय,भूख,भाव…

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छत्तीसगढ़ी गीत-ग़ज़ल-छंद-कविता

होगे होरी तिहार होगे – होगे होरी के, तिहार गा। कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा। करु बोली मा,अउ केरवस रचगे। होरी के रंग हा, टोंटा मा फँसगे। दू गारी के जघा, देय अब चार गा। कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा। टेंड़गा रेंगइया हा,अउ टेंड़गा होगे। ददा – दाई ,नँगते दुख भोगे। अभो देखते वो , मुहूँ फार गा। कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा। पउवा पियइया हा,अध्धी गटक दिस। कुकरी खवइया हा,बोकरा पटक दिस। टोंटा के कोटा गय , जादा बाढ़ गा। कखरो बदलिस न,आदत ब्यवहार गा। घर मा खुसर के,बरा-भजिया…

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इस्कूल : छत्‍तीसगढ़ी कहानी

राज-छत्तीसगढ़, जिला-कवरधा, गांव- माताटोला, निवासी- गियारा बारा अक सौ, इस्कूल- सरकारी पराइमरी, कच्छा- पांचमी तक,  गुरुजी-तीन, कुरिया- चार। बरामदा -पहिली दूसरी के, तीसरी चौथी बर एक कुरिया, एक कुरिया- पांचमी के,अउ एक गुरुजीमन बर। कच्छा- पांचमी, लइकन- तीस, बत्तीस। गुरुजी- गनित बिसय के, होमवर्क जाँचत रहिस। “सब झन अपन होमवर्क करके आये हव?” सब झन डाहर ल देखत गुरुजी पूछिस।  “यस्स सर!” सब लइकन हाथ उठाइन। “हंss, त चलव अपन- अपन कापी देखाव।” अउ गुरुजी भिड़गे जाँच करे म। गुरुजी, अइसने कभू- कभू घर बर काम जोंग देये करै अउ…

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तेजनाथ के गजल

छोटे छोटे खड़ म तो , दुनिया बट जाही , अउ छोटे छोटे करम ले संगी , दुनिया सज जाही । “अकेल्ला मैं का कर सकथौ” झन सोंच, तोर मुस्कुराये ले सबके खुसी बढ़ जाही । दुख दरिदरी , परसानी पहाड़ जस हे भले, फेर किरचा किरचा म संगी ,पहाड़ टर जाही | तैं नहीं त कोन ,तहीं बता तोर घर के सजईया ? देखा हिजगी म दुनिया , दुख दरिदरी ले अउ पट जाही । खुद ल समझ ले अउ दुसरो ल समझ ले, सुख समरिद्धि ले मनखे मनखे…

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धंधा

सिक्छा आज दुकानदारी होगे हे, दुकानदारी का? ठेकादारी, ठेकादारी के नीलामी। ‘मोला सहे नहिं जात रहिस अनदेखी भूरि बरत रहि।’ हमर किसान के कोनो नइहे भाई। पइसा वाले के आजो पइसा हे। उंखरे सासन हे, रकस-रकस कमइया किसान, मजदूर ल आजो जानवर, गंवार समझे जाथे। साल भर म पूजा करे जाथे गाय गरूवा के देवारी के दिन ओइसने पांच साल म पूछ लेथे एक बेर, तहां ले फुरसद।

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कहिनी : साहस एकता अउ संकल्प

कोनो कहिदिस, ‘गदहा’ अउ हम ‘गदहा’ बन जाबो? नहिं न? त फेर का सोचना, डरना। अतका बात याद रखव दुनिया म चाहे कतको बुराई राहय, बुरा होवय, मनखे ल अपन अच्छाई नई छोड़ना चाही। जीत अउ जय एक दिन अच्छाईच्च के होथे। त करना हे माने करना हे। बस, होगे? जगमग-जगमग उजियारा म, जिनगी के जम्मो आनंद, खुसी, जम्मो, उत्साह-जोस भरईया, मईया के नवरात्रि। दु:खी, डण्डी सबके दु:ख-भूख भाग जाथे। फेर वो गांव म घोर अंधियारी, सन्नाटा। कारन-दू बछर पहिली, एहि नवराति के तइयारी म बइठक म, झगरा मातगे राहय,…

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