पारंपरिक ददरिया

कया के पेंड माँ कया नइए ।
निरदई तोर शरीर माँ दया नइये॥

हंडिया के मारे तेलई फूट जाय।
चारी चुगली के मारे पिरित छुट जाय॥

तवा के रोटी तवा मं जरि जाय।
दुजहा ला झन देबे कुंआरी रहि जाय॥

पीपर के पाना हलर ह॒इया।
दुई डउकी के डउका कलर कइया॥

तोर मन चलती मोर मन उदास।
जल देवता मां खड़े होके मरथंव पियास॥

फूटहा रे मंदीर कलस तो नइये।
दू दिन के अवइया दरस तो नइये॥

मोर जरत करेजा कसकत तन मां।
चुर चुर के रहंव राजा अपन मन मां॥

नवा घर मां गड़ाये थुनिहा।
नेहरू बाबा के कहे मां चलथे दुनिया॥

नवा रे कैंची धरायेला सान।
सीता माई के मुंदरी ला रावन मांगे दान॥

रस्ता ला रेंगे खोर ला डंहके।
गोरी खोंचे करौंदा गली मां महके॥

चन्दा ऊवे, चंदेनी छिटके।
तोर कन्हिया ले चूंदी नागिन लटके॥

पारंपरिक छत्‍तीसगढ़ी ददरिया