बिहार की सियासी हवा में इन दिनों एक शब्द खूब गूंज रहा है—‘कट्टा’. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी रैलियों में इसका ज़िक्र करते हुए कहते हैं, “कट्टा, क्रूरता और कुशासन ही जंगलराज की पहचान है.” लेकिन असल सवाल ये है कि आखिर ये कट्टा है क्या और बिहार की राजनीति में इसका इतना बोलबाला क्यों है? कट्टा कोई विदेशी पिस्तौल नहीं, बल्कि देसी हथियार है, जिसे गांवों में कारीगर रसोई या किराए के कमरे में तैयार कर लेते हैं. साइकिल के स्प्रिंग, पानी के पाइप या पुरानी गाड़ियों के लोहे…
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