वृत्तांत-9 मोला तो बस, येकरेच अगोरा हे

Kosariyaटूर- बुर गुठियावत हे।घासी के आंखी म नींद नइ आवा ते।काक सती ? तेला, सफुरा ह ,अपन दादी ल बतावत हे। बाहरा डोली म, होय घटना ल सुनावत हे। मछरी ह ,तो कब के मर गे हे ।अठुरिया के ह, पंदरही होगे हे।अंधियारी पाख ह पहा गे हे, अंजोरी लग गे हे ।फेर दादी ! तोर नाती दमांद ह ,अभीच ल फडफडावत हे।ओ…..! सुघ्घर मछरी के खेलई ह, तउरई ह, फडफडई ह , तडफ-तडफ के मरई ह, ओकर नजरे -नजर म झूलत हे ।अब तो मछरी ह, का ? तोरो ,हमरो अउ सबे के शरीर म जो हे, ओ ह, का ये ?
कहां से आथे ?
अउ कहां चले जाथे ?
ये बात ह , ओकर हिरदे म उठत हे । बारा गाडा लकडी के जलत धूनी कस, ओकर छाती ह धधकत हे ।मने-मन म खोजत हे, माथा ह ओकर गिंजरत हे।जे ला पाये बर धरती, समूंदर अउ अगाश , सूरूज ,चंदा अउ परकाश, जंगल , झाडी अउ परवत ,पहार ।अउ का कहिबे ? मे ह तो कउवा गे हंव । दुनिया जहांन म अपन मति ल फइलावत हे।बिचार मंथन के मथनी म मथावत हे । का जनी ?येकर खोज ह ,येला कहां-कहां ले जावत हे ? उठई-बइठई ,खवई-पियई ,सोवई-बसई येला कांहिच ह ,नइ सुहावत हे।
नान-नान मोर नोनी-बाबू हे, असासंभार किसानी बारी हे । साधू-संयासी कोनो बन जही त ? अतेक बड मोर घर के भार ल, कोन ह उठाही ?अउ हमर पहाड कस जिंनगी ह, दादी ?कइसे पहाही? हमर तो मरे बिहान हो जही।कहि …कहि के सफुरा ह फुसुक-फुसुक रोवत हे।अउ रोवत रोवत दादी ल काहत हे…..दादी जब-जब मै तोर पांव-पयलगी करंव ,त तेंह मोला आशिश देवच ,संत-ज्ञानी पति पावच ,संत-ज्ञानी पति पावच । कहि कहि के रात-दिन अंगोय राहच ,तिही उतारा ह ,तो दादी ! मोर जिंनगी म संउहत उतरगे । जइसने बोले रहेस ओइसने उतरगे । सिरतोन म तोर अकारे ह दादी रेख भर फरक नइ परय ।मोला लगथे तोर आशिशे ह दादी !मोर जिंनगी के खुवार कर दीही घर बार के बिगाड कर दीही ।
पुनिया ह ,सफुरा ल पुचकारत हे । चु…..चु…चु….चू…. कहिके मुंह ल चुमत हे, चटकारत हे, अपन छाती म सपटार के दुलारत हे….मोर सुवा बेटी !नइ, नइ ,नइ ,नइ रोवय ओ ,अइसना पढ-पढ के नइ रोवय । चुप ,हो जा ,ओ मोर मैना बेटी, चुप हो जा । तेंह…कइसे हो जबे ओ बेटी । रो…थस…. । तें….ह… …रोथस ओ, मोर पुनिया के ज्ञानी-साहसी बेटी …,,ह, रो….थस….. ओ । मत रो…… हिम्मत कर । मै तो हंव । तोर संग ससुरे ,मइके के सब के सब परवार हे ।काबर रोथस ?एक्के झन थोरे हस ओ ।तोर संग हमन सब झन हन । चुप बेटी …..चुप कहिके पुनिया ह सफुरा के मुड-हाथ ल अपन हथेरी से सलहारत हे ।पुचकारत हे ।दुलारत हे।
अउ पुनिया ह कहिथे…. ….बेटी सफुरा ! आशिष ह ककरो बिगाड नइ करय ओ । ये तो बनाय बर देये जाथे बेटी।जिंनगी ल ,सजाय संवराय बर देये जाथे । खुशियां के बहार आय बर,आशिष देये जाथे । अउ तेंह मोला दोष देथच ओ बेटी, कि कही साधू संयासी हो जही त, कहिके। लेकिन मे ह तो संत ज्ञानी पति पा,कहिके आशीश देवंव। साधू संयासी भले घर परवार छोड दीही, फेर संत ज्ञानी अइसना नइ करय ओ मोर बेटी । ये तो सब के घर परवार ल जोडे के काम करही । ऊंच ,नीच ,भेद, भाव, ढोंग ,पाखंड ल दूर करे के काम करही । तेंह चिंता मत कर ओ मोर मैना बेटी ।एक न एक दिन ये मोर आशिश ह तोर जरूर काम आही । अउ तें ह, तब,मोर सुरता करबे।ओ समे का पता मै ह जियत रइहूं के नइ रइहूं ।
अभी तो तोर जिंनगी ह का ?बेटी जब ले ये भोसला बम्भणउटा के राज ये छत्तीसगढ म आय हे ।तब ले सब आदमी के जिंनगी म, डर भय समाय हे । कब काकर खेती-खार ल छिन लिही, छटवा-छटवा बईला, भईसा ल ढील लीही। कोठी के धान-पान ल उलदवा लीही । कब ?का जिनीस बर कोन ल अपन बाडा म बुलवा लीही ?जांगर के टूटत ल बूता करवाही ।सेती मेती म बेगारी बुलाही ।कब काकर बेटी बहू के अस्मत ल लूट लिही ।तेकरे सती कतनो सुग्घर सुग्घर बेटी बहू मन जाहर महुरा खा के अपन जान ल दे देहे ..ओ मोर सुवा बेटी ।
बेटी सफुरा ! ये बम्भणउटा के राज म कोनो अंग भर बस्तर नइ पहिर सकत ये, न पेट भर अन्न खा सकत ये ।जाड, घाम अउ पानी ,बादर म बेगारी करवावत हे । कमा कमाके सब रूर गे हे ।आंखी कान चिबिर-चिबिर होगे हे ।तेल-नून बर भोंकटी पइसा नइये ।खाय-पिये बर दाना-दाना के मोहताज होगे हे।येकर बोली बतरस ह हुदेसना म हुदेसे कस लागत हे।सब ल हिन्दू हव, कहिके मनु कानून लगाय हे । बाम्भण ,छतरीय , बैस्य अउ बाकी सब शूद्र मान, इंकर सेवा म फंसाय हे । जे ह, सेवा नइ करही तेला अछूत बनाय हे। वाह रे ! बम्भणउटा इंहा जियत आदमी रीबि रीबी के हो गे हे अउ ये ह पथरा के राधा-किसन ,राम-लखन के मंदिर बनाके सबके खेती खार ल दान म चढवाय हे । धरम करम के नाव म मंदिर म ही कमिया रबिया लगवाय हे। इंकर सब के उद्धार कराइया ,सत के रस्दा बताइया कोनो तो कोनो आही ।बेटी कोनो तो आही
पुनिया ह कहिथे ….बेटी सफुरा !मोला अइसे लागत हे ,घासी के हिरदे म सदज्ञान के दीया बरे बर फूलफुलावत हे ,जेकर अंजोर से निकले किरण ल ध्यान -साधना के शक्ति से जब एकाग्र कर ली ही, तभे ओकर हिरदे म एक लुक निकलही। जेमा मया ,तृष्णा, काम, क्रोध,मद, लोभ ,अहंकार जरे लग जाही ।भर-भर ,भर-भर बारा गाडा लकडी के धुनी बराबर बरे लग जही ,धधके लग जही,फेर एक न एक दिन जूडाही, थिराही अउ एक दिन अइसे आ जही, कि सागर ह ,बूंद म समाही ।धधकत आगी ह ,एक मशाल बन जाही। जे ह हिरदे से निकल के जब हाथ म आ जही ।जेला लेके दुनिया दुनिया म जा, जा के ज्ञान के जोत जलाही। जेकर अंजोर से सारा जग ह जग-मग, जग-मग उजियारा हो जाही । सतनाम के ज्ञान ल बगराही ,सतनाम के ज्ञान ल बगराही ।
बेटी !बस मोला तो, येकरे ही अगोरा हे ।
मोला तो, येकरे ही अगोरा
कि ये ह अब,कब आही ?
ये ह अब,कब आही ?
ले बेटी, चल सो जा ।कहिके दोनो आंखी मूंद के चादर ओढ के सो जथे ।
*जयसतनाम *

भुवनदास कोशरिया
भिलाईनगर
9926844437