छत्तीसगढ़ी राजभासा कामकाज के भासा कब बनही

छत्तीसगढ़ी ला राजभासा के दरजा तो मिलगे फेर अब तक ले कामकाज के भासा नई बन पाय हे। कामकाज के भासा बनाए बर छत्तीसगढ़ भर बिदवान मन चिंता फिकर करत हें। आखिर छत्तीसगढ़ी कामकाज के भासा कइसे बनय।
छत्तीसगढ़ी राजभासा कामकाज के भासा कब बनहीछत्तीसगढ़िया मन के छत्तीसगढ़ राज के सपना ल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ह पूरा करिस। छत्तीसगढ़ ल छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी अउ डॉ. रमन सिंह ह हरियइस। छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाए के श्रेय मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ल जाथे। छत्तीसगढ़ी ल राजभासा के दरजा तो मिलगे फेर अब तक ले कामकाज के भासा नई बन पाय हे। कामकाज के भासा बनाए बर छत्तीसगढ़ भर बिदवान मन चिंता फिकर करत हें। आखिर छत्तीसगढ़ी कामकाज के भासा कइसे बनय।
बिलासपुर ले 12 साल से छपत छत्तीसगढ़ी त्रैमासिक पत्रिका के 51वां अंक ‘लोकाक्षर’ (लोकाक्छर) मिलिस। लोकाक्छर के संपादक नंदकिशोर तिवारी ह राज भासा ल कामकाज के भासा बर अपन बिचार एदइसन करे हे सब ले बडे बात भासा के पेट संग जुड़ना होथे। पेट ल पोसे बर उद्यम चाही। कोनो भी उद्यम छत्तीसगढ़ी भासा संग नई जुरै। जब छत्तीसगढ़ी ल राजभासा मान लिए गै हे तौ प्रदेश के जम्मो व्यावसायिक परीक्छा, राज्य सेवा आयोग के परीक्छा प्राथमिक सिक्छा के माध्यम छत्तीसगढ़ी भासा बनै अउ राजकाज छत्तीसगढ़ी म होवै तो छत्तीसगढ़ी भासा मन के विकास घलो होही। लोकाक्छर के 50वां अंक के लोकारपन के संग ‘छत्तीसगढ़ी भासा परिवार के भासा: विसय अउ साझेदारी’ बिसय म सगोष्ठी घलो होइस। कार्यक्रम के माई पंहुना छत्तीसगढ़ राजभासा आयोग के अध्यक्छ पं. श्यामलाल चतुर्वेदी ह किहिस-अब छत्तीसगढ़ी ह धार धर लिए हे। वोकर विकास अब कोनो के रोके नई रूकै। अपन संस्मरण ल सुनात उन कहिन के एक पइत मैं प्रयाग गे रेहेंव। उहां सुमित्रा नंदन पंत केहे रहिन के हिन्दी भासा म अड़बड़ कन नवा-नवा सब्द देखेम आ गे हे। जम्मो ल आवन दौ। जउन सब्द म प्रान सक्ति होही तउन भासा म ठहर जही। कार्यक्रम के अध्यक्छ डॉ. चितरंजन कर, सेवा निवृत्त अध्यक्छ भासा विज्ञान विभाग, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर ह अपन संस्मरण सुनावत कहिन-मैं रांची विश्वविद्यालय परीक्छा ले बर गे रेहेंव। मैं देखेंव के उहां के भासा ‘नागपुरी’ म स्वतंत्र विभाग हे। नागपुरी पढ़े अउ पढ़ाय जाथे। छत्तीसगढ़ म येकर अभाव ह खलथे। हम जानथन के चार कोस म पानी बदले। आठ कोस म बानी। ठीक वइसने छत्तीसगढ़ी के हे। बोले के वोकर रूप ह बदलथे। फेर आत्मा ह एकेच हे। हमर बोलचाल, छत्तीसगढ़ी के रूप, रचना अउ प्रवृत्ति अलग-अलग हो के भी एक भासा परिवार के उन सहोदरा ये। नंदकिशोर तिवारी छत्तीसगढ़ी के मुताबिक-कवर्धा, कांकेरी, खैरागढ़ी, गोरो, गौरिया, डँगचगहा, देवरिया (देवार), धमदी, नाँदगारी, पारधी, बहेलिया, बिलासपुरी, बैगानी रतनपुरी, रायपुरी, सिकारी, कमारी, खल्टाही, पनकी, मराठी, नागवंसी, पंडो, सदरी, सरगुजिहा, कलंग, कलेजिया, चमारी, बिंझवारी, भूलिया, लुरिया, अड़कुरी, चंदारी, जोगी, धाकड़, बस्तरी (बस्तरिया), भिरगानी, मेहरी (मुहारी), हलबा, भतरी अउ गोड़ी ह छत्तीसगढ़ी भासा परिवार के सदस्य आय।
छत्तीसगढ़ी भासा के असली सवाल सोझ-सोझ बात (छत्तीसगढ़ी लोकाक्षार, अंक 51, पेज 76) म दिनेश चौहान लिखे-कोनो भी भासा के सबले खास पहिचान ओकर वर्णमाला आय। बियाकरन तो 125 बछर पहिली बन गेहे अइसे बड़का बिदवान मन के कहना हे। फेर उही बिद्वान मन वर्नमाला म भ्रमित हें, जान पड़थे। अइसन काबर हे? वर्नमाला तो बियाकरन देखे हवं ओमा देवनागरी लिपि के ङ ञ ण ष श क्ष त्र ज्ञ अउ ऋ अक्छर सामिल नई हे। इही पाय के जब छत्तीसगढ़ी के एक रूपता के बात होथे तव छत्तीसगढ़ी के अधिकृत वर्णमाला के बात घला होना चाही। ये बिसय म भासाविद् मन ल अपन विचार ल सार्वजनिक करना चाही।
सब्द के परयोग म एकरूपता आना चाही। वइसने बात ल डॉ. चितरंजन कर घला ह ‘मड़ई’ 20 दिसम्बर 2010 के अंक म करे हवै- के व्यक्ति वाचक नाव अउ परिभासिक सब्द ल जस के तस लिखे जाय। दिनेश चौहान कहिथें के उन ल मैं पूछना चाहत हंव के भासा, सुध्दि, सब्द, सच्छम कारन आदि लिखे के कारन का ए? इही न के छत्तीसगढ़ी म श ष क्ष ण के उच्चारन नई होय। तिही पाय के जुन्ना विद्वान मन ये वर्न मन ल वर्णमाला म सामिल नई करिन अउ छत्तीसगढ़ी वर्नमाला म ये वर्न मन हइच नई हे। तौ, शंकर, सुरेश लिखना कइसे संभव होही। इहां तक के छत्तीसगढ़ी के जम्मो बोली मन म घला ये वर्न मन गैर हाजिर हें। तौ ये वर्न मन ला जब मन लगिस सामिल कर लौ अउ जब मन लगिस छंटिया दव। ये नीति ल ठीक नई केहे जा सकय। हां, यदि सब बिद्वान मन हिन्दी के वर्णमाला बर बिना बदलाव के एक मत होज य तब बात दुसर रइही। तब अइसन म सब्द के दोहरा परयोग ले बांचे ल परही। जइसे-भासा, राजभासा, सब्द, सिक्छा, कक्छा, परीक्छा पाठसाला, छेत्र, सच्छम, कारन आदि लिखे के का जरूरत रहि जाही? ताहन व्यक्ति वाचक नाव अउ पारिभासिक सब्द ल जस के तस लिखे के तर्क घलो सहीं हो जही। जइसे बोले जाथे वइसे लिखे नइ जाय अउ जइसे लिखे जाथे वइसे बोले नइ जाय अउ जइसे लिखे जाथे वइसे लिखे नई जाय। वइसनेच लिखे भी जाथे। ये हा छत्तीसगढ़ी के घलो पहचान आय। अइसने छत्तीसगढ़ी म उच्चारन भेद घलो ओकर पहिचान आय। छत्तीसगढ़ी म हिन्दी के तुलना म मात्रा कभू दीर्घ तौ कभू लघु हो जथे। यहू कोती ध्यान देना जरूरी हे- जइसे 1. राष्ट्रपति ह राष्ट्रपति, ऋषि ह रिसी, मुनि ह मुनी, साधु ह साधू, हरि ह हरी, विष्णु ह बिस्नू, लिपि ह लिपी आदि हो जथे। 2. मूर्ति ह मुरती, मालूम ह मालुम, शीतला ह सितला, दीदी ह दिदी, रघु ह रघू, नीति ह नीती हो जथे।
सब ले पहिली सवाल हे के पहिली छत्तीसगढ़ी के अधिकृत वर्नमाला तय करे जाय अउ प्रायमरी इस्कूल म ओकर विधिवत् पढ़ाई कक्छा पहिली ले चालू करे जाय। तब सही मायने म छत्तीसगढ़ी के भलई होही। अइसन नई होय ले छत्तीसगढ़ी ह साहित्यकार के भासा तो बन सकथे फेर वोहा जन-जन के प्रयोग के भासा नई बन सकय। जन- जन के भासा बनाय बर छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर (लोकाक्छर) ह लेखक मन सो निवेदन करथे। छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर बर हमन छत्तीसगढ़ी लेखन म एकरूपता, मितव्ययिता अउ तार्किकता लाय बर कुछ एक मानक निर्धारित करे हन जउन ए तरा हे-
1. ‘छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर’ म निम्नलिखित वरन मन के उपयोग होही-
स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ
व्यंजन-
क ख ग घ
च छ ज झ
ट ठ ड ढ ड़ ढ़
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व
स ह
अनुस्वार- -ं
अनुनासिक- -ॅ -ँ
छत्तीसगढ़ी के बोलचाल (उच्चारण) म श ष ज्ञ क्ष त्र ऋ बरन के उपयोग नई होवय, ते पाय के इन बरन मन के छुट्टी। श ष बर ‘स’ (यथा शेष-सेस)
ज्ञ बर ग्य (यथा- ज्ञान,ग्यान) ए बर अइ (यथा अइसन), त्र बर त्र (यथा नेत्र बर नेत्र) ऋ बर रि (यथा ऋतु बर रितु) के प्रयोग ह वैग्यानिक प्रयोग आय।
2. (अ) विभक्ति मन के अक्छर मन ला अलग-अलग लिखे जाय जइसे- राम हर, खुर्सी म, तोर करा, मोर करा, तोर मेर।
(ब) सर्वनाम मन के विभक्ति मन ला मिला के लिखे जाय जइसे-वोह, ऊँकर, हमर ले।
(स) जउन सर्वनाम के अंत म ‘ही’ अउ ‘ई’ होय।
ऊंकर विभक्ति मन ल अलग-अलग लिखे जाय जइसे- तुँहीच ल उॅहीच ल।
(द) पूर्ण कालिक क्रिया मन के ‘के’ ल अलग-अलग लिखे जाय जइसे -खा के, आ के, जा के।
3. संयुक्त क्रिया मन के दूनो भाग ल अलग-अलग लिखे जाय जइसे आ गइस, चले गिस, जा ही, हो सकिस, आ गै, गंवा गै, आवत रहिस।
4. ला, मा परसर्ग मन ला अलग-अलग लिखे जाय जइसे- लइका, ला, घर मा,
5. गंवइहा, भइया, गइया, अइसन, ओइसन ही स्वीकारे जाही, न कि ”गवैंहा, भैयाभइयागय्या एसनयेसन वोइसनवैसन।”
6. ला, मा, उवा-उवा परिसर्ग अलग लिखे जाय जइसे- ‘मो ला, लइका ला, घर मा।’
7. ‘ मैं, तै’ ही स्वीकारे जाही न कि मेंमंयतंय
8. ‘अउ’ (औ अऊ नहीं) इही तरा ‘नइ’ मान्य हो ही ‘नई’ नहीं।
9. गै रिहिस, खाए रिहिस मान्य हो ही न ‘गे रिहिस’, ‘खाय रिहिस’ नहीं।
10. ‘जाथौं, खाथौं, लिखथौं’ माने जाही। ‘जावथौंजाथवं’ नहीं।
11. ‘खाहौं, जाहौं’ माने जाही। खाहू खाहां, खइहौ नहीं।
12. ‘जातिस’ ठीक हे जतिस नहीं।
13. ‘जाबो, खाबो’ मान्य ‘जाबो, खाबोन’ अमान्य।
14. ‘जान दे, खान दे, आन दे’ मान्य, ‘जावन दे, आवन दे’ अमान्य।
15. ‘करा, मे,’ के प्रयोग मान्य, जइसे ‘तोर करा एक ठन काय रहिस’ या ‘तोर मोर एक ठन काम रहिस’, ‘तोर करामेर’ के जघा ‘तोर से’ अमान्य होही।
16. ‘एकर, ओकर, काकर, जेकर,’ मन मान्य होहीं, ‘एखर, ओखर, काखर, जेखर’ अमान्य हो ही।
17 अनुस्वार (-ं) अउ अनुनासिक (-ँ) के प्रयोग करे जाय जइसे-
अनुस्वार अनुनासिक
अंग ऍंगना
चंदा चँदैनी
रंग रँगना
छत्तीसगढ़ी साहित्य के लेखक मन करा बिनती हवय के उन अपन लेखन म उपरोक्त नियम के पालन करय। संपादक (छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर) संपादक सिरी नंदकिसोर तिवारी जी एक डाहर एकरूपता के बात करथें दूसर डाहर खुदे पालन नइ करयं। जब छत्तीसगढ़ी वर्नमाला म ‘क्ष’ ह नइ हे त त्रैमासिक पत्रिका के नाव छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर काबर लिखे जात हे। लोकाक्षर ल लोकाक्छर काबर नहीं।
छत्तीसगढ़ी राज बासा ल काम काज के भासा बनाए बर छत्तीसगढ़ी राजभासा आयोग, छत्तीसगढ़ सासन डहर ले दुरुग म मुकुंद कौसल के संयोजन म गोस्ठी रखे गे रिहिसे जेकर बिसय रिहिस- हमर छत्तीसगढ़ी जनभासा ले राजभासा तक। मोला अइसे लागथे राजभासा ल काम काज के भासा बनाय बर जादा अड़चन नइहे जे दिन भासा वैग्यानिक अउ सरकार ह चाही ओ दिन छत्तीसगढ़ी ह काम काज के भास बन जाही। परिचर्चा के माई पहुना डॉ. परदेसीराम वर्मा ह छत्तीसगढ़ी राज भासा ल काम काज के भासा बनाए बर जोर दिस। परिचर्चा के सियानी करत पं. दानेस्वर सर्मा बतइस की महात्मा गांधीजी ह केहे रीहिसे कि अपन राज के काम काज ह जनपदीय भासा म होना चाही। छत्तीसगढ़ी राजभासा ल कामकाज के भासा बनाए बर अउ भासा के एकरूपता बर एसो के छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन म घलो चिंतन होईस।

दुरगा परसाद पारकर
केंवट कुंदरा
प्लाट-3, सड़क-11, आशीष नगर (पश्चिम)
भिलाई छ.ग.