वृत्तांत- (7) अपन धरती अपन आगाश : भुवनदास कोशरिया

Kosariyaभीड ओसरी पारी खरकत गिस ।सब अपन अपन घर जाय लगिस ।सफुरा ह गाडी म चढीच। घासी घलो गाडी म बइठ के बइला ल खेदे लग गे ।आगू आगू अंजोरी मंडल अउ संगे संगे गोल्लर नंदीराज घलो जावत हे ।घांघडा बइला के आवाज गली गली म खन खनावत हे ।खेलई, कूदई म बिधून लइका मन घलो खेलई ल छोड के गाडी के पाछू पाछू आवत हे। घरेच तीर म ,घांघडा बाजे के आरो ल पाके ,चाऊर निमारत सफुरा के दाई संतरा ह, कोन आगे दाई ? कहिके, सिंग दरवाजा म निकल के देखथे। दूआरीच म ,बइला गाडी ह ,खडा होइच अउ देखे बर पारा भर के मनखे मन सकलाय हे ।अंजोरी ह, अपन घर के नौकर मन ल ,गाडी बइला ल ढीले बर कहिथे ।अउ गाडी से हिरण ल, चार झन मिल के, चिंगी चांगा उठा के घर के आंगना म लेगथे ।दू झन नौकर ल ,येकर देख रेख बर लगा देथे ।दाई संतरा अउ दादी पुनिया ह ,अपन बेटी दमांद ल देख के अइ ! हमर बेटी आगे दाई कहिके अब्बड खुश हो जथे । बेटी ल ,गाडी से उतारे बर सास ,बहू दूनो तिर म आ गे।कोनो मोटरा गठरी त कोनो ओकर हाथ ल थेभा के गाडी से उतारत हे। घासी अउ सफुरा उतरते ही दाई अउ दादी पुनिया के टपा टप पांव छू छू के भजत हे।आनंद राहौ, खुशी राहौ ,आशिश देवत पुनिया ह, सफुरा के ,ओकर दूनो बांही ल ,धर के उठा लेथे अउ अपन दूनो हथेरी ल ,ओकर दूनो गाल म ,जोर के चटाक चटाक मुंह ओधा के चुमा लेथे। काबाभर पोटार के अपन छाती म लगाथे ।अउ फेर भेंट लागथे …… मोला……..का…. बर बिसरा …… गेयच …..बेटी ….ओ ।मोर बिना तोर नींद ह नइ परत रीहिस बेटी ……ओ । मोला किस्सा सुनाय ल काहच ……. बेटी ओ ।मोर संगे म नहावच बेटी ….. संगे म खावच ओ……. ।मोर संगे संग म घुमच बेटी ओ…….. ऐं …….हें …. हें….. हें….. । ससन भर गा ,गा के रो ,रो के भेट लागिस तभे पुनिया दादी के हिरदे ह जुडाइस ,चुप होइस ,शांत होइस। देखइया मन घलो रो डरिस , आंसु म तरबतर होगे रीहिस । कतनो अभी ल सुसकत हे , नाक कान पोछत हे ।तब तक पूरा माहौल गमगीन होगे रीहिस । सब चुप चाप होगे रीहिस। एक ठो पत्ता ह ,नइ खरकत रीहिस। सूजी ह ,गिरतीच ,तहू ह सुना जतीच।
हाथ ,पाव पखरवाय बर, बेटी ल ,गोड धोना मेर लेगिस । परछी म ,रखे बाजवट म ,चादर बिछावत, आव बेटी आव ,येमा बइठ कहिके, पुनिया ह बइठइस, अउ ओकरे संग घसेल के बइठ गिस।
अंजोरी मंडल के घर म, हाथी बुलकाउ सिंग दरवाजा हे। चौफेर परछी ,बीच म गाडा भर के पयेर मिंजउ अंगना हे ।बेटी दमांद आये हे ,कहिके बाटा परोसी परिवार मन घलो जुरियाय हे । सब अंगना म, चर चर ल बइठे हे ।अउ सुनत हे ,बेटी दमांद के आवत खानी होय घटना ल। सबके सब सन्न हो जथे ।कहे लगथे बेटी हो तुमन ककरो नइ बिगाडे रेहेव। कोई अच्छा करम जरूर करे होहू, तभे तुमन सही सलामत आ गे हव ,बघुवा के मुंह ल बांच के ।
दादी पुनिया ह ,सब ल कहिथे …..मोर बेटी ह बिहंचे ल निकले हे, भूखे प्यासे होही । बेटी बेटा हो ,अब जावव तुमन ,सब अपन अपन घर जावव । बहू संतरा ,जेवन ह बनगे ओ ?जल्दी जल्दी बनाव बेटी हो कहिके ,रंधनी घर म जा के देखथे …. संतरा ह, कांसा के लोटा म पानी लेके, आवत हे ।सब ल पानी देवत कहिथे … चलौ, चलौ जेवन जेय बर बइठौ । अंजोरी मंडल ह बेटी दमांद ल हाथ मुंह पखारे भर बोलथे ।उंकर बइठे बर भूइंया म चादर के आसन बिछाथे अउ थारी मढाय बर कठवा के कुंदवा पिढवा रखथे ।दाई संतरा ल, थारी म दारभात निकालत देख के सफुरा ह, परोसे बर संग देये बर चल देथे । अउ कहिथे ले दाई महुं ह परोसन लागत हव कहिके ….. सफुरा ह थारी मन ल,ले जा जा के देवत हे ।बेटी दमांद आय हे, भाटा मुरई साग बने हे। बेटी ल मसलहा अच्छा लागही ,कहिके करेला बना डरिस । करेला कही करू लागही त ?कहिके संतरा ह, आलू गोभी के साग बना डरिच ।अउ मने मन म सोच थे । अम्मट खाय के बेटी के मन होही त? कहिके भइस के खाटी दही म बफउरी डार के डुबकी कडी बना डरिस ।अब सब बर कांसा के थारी म ,दुबराज चांउर के भात, राहेर दार म ,ठोमहा भर गाय के घी डाल के दीच ।अलग अलग माली म, साग अउ कटोरी म आमा अमली के अथान ल दीच ।पुनिया ह सफुरा ल आव ,संगे संग जेबो कहिके, अपने संगे म बइठाइस ।बेटी के मया ये, अउ नदिया बारी के साग भाजी ये। छकत्त ल खवाहूं कहिके ,किसिम किसिम के साग रांध डरिस ।सच कहिबे ,ते बिकट दिन म ,अइस बेटी के मया म संतरा ह, उबुक चुबुक होगे रहिस ।का ? का ?रांधौं । का ? का ? खवावौं। कहिके ओकर सुद्धबुद्ध ह हजा गे रिहिस।एक फर अउ लेले,बेटी एक फर अउ लेले कहिके कभु करेला ल दै ,तो कभु फूलगोभी, अउ काहय, बने खा बेटी ,बने खा,भूख लागे होही। ओरसानी पोरसानी दे दे के खवावत हे ।
सफुरा ,आज अपन दादी संग म सोय हे ।टुरबुर ,टुरबुर गुठियावत हे, बच्छर भर के दुख सुख ल सुनावत हे।नींद ह को जनी कहाँ गंवागे? पडत नइये।कतना सोइच,? कतना नइ सोइच ,? पहाती रथिया फेर टुरबुरावत हे। अब्बड दिन म मिले हे, बड मयारू नतनीन बूढनीन ये ।नइ सिरावै इंकर गोठ ह। दादी पुनिया के रोज के काम राहय ,भिनसरहा ल उठ जाय अउ योग ध्यान म जरूर बइठै। खेती खार,किसानी बारी,गाय गरूआ, लोग लइका,अपन गांव,पारा मुहल्ला, अगल बगल के गांव अउ आठ गंवा के घलो दुख सुख के सरेखा करै। सिरपुर ह महानदी के पार म बसे हे। नदिया के बडे बडे कछार हे। उही म सब अपन अपन गांव तीर म, नदिया बारी लगाय हे ।रार के रार भाटा, मिरची ,करेला ,बरबट्टी, रमकेलिया , गोभी ,नवलगोल, पताल, अउ कलिंदर ,केकडी घलो बोवाय हे। अब्बड मेहनत मजदूरी के काम ये ,माटी गोटी म मिल के हांडाटोर बूता करथे , किसिम किसिम के चिभिक लगाथे तब कही रेती मा सोना उगलाथे ।इही ह , पेशवा बभनउटा के आंखी म गडगे हे।नदिया, नरवा म घलो नियत लगाय हे ।सब खेत खार ल नंगा के बडे बडे जमीदार, सूबेदार बनाय हे । मनुरीति ल थोप के इंहा ,सबके जिनगी ल नरक म भोगवाय हे । बाम्भन, ये धरती के स्वामी ये ।बाकी सब येकर सेवक ये।नारी नरक के खान ये।जीना मरना अउ इंकर सेवा, जतन करना ही, जिनगी के नाव ये । पुनिया म ज्ञान हे, जीवन जीये के विधान हे,सबे जीव एके बरोबर ,येला जन जन तक बताये के ओकर काम हे।तुम्हरो ,हमरो, ओकरो अउ सबके ये धरती म बराबर सनमान हे ।ज्ञानी बनहू, जुड के रइहू, तभे अपन हक ल लेहू ।कहिके के पुनिया ह एक संघ बनाय हे ।जेमा दस गांव के नारी मन जुडे हे ।भंडार के धनमत लोहारिन, तेलासी के सगन तेलिन, बोदा के फुलवा मरारिन , मोहान के केंवरा गहिरीन ,चिखली के सुखिया केंवटीन, जुनवानी पिंगला कलारिन ,कुरूद के बसंता नवाईन , कुटेला के मोतिम कुर्मीन ,मुहमेला के देवंतीन गोडिन ,समोंदा के बिसासा् कडरिन अउ सिरपुर के पुनिया दादी। इंकर बड जुझारू संघ हे ।भाखा परन नइ पाय सब तुरते जुरिया जथे ।जिंहे कहिबे सब उंहे सकला जथे । ये संघ के सियानी पुनिया ल ही सौपे हे । ओकर जन जन बर दया ,मया, नर , नियांव ,हक, हुंकार म ,लडाई भिडाई म ,आगू के आगे आके भीड के सबके काम करई ल ,देखके सब ओकरेच नाव म ही संघ के नाव पुन्नीमा संघ रखे हे ।
इंहा पहिली आदिवासी राजा रहिस ।सब कमावत रिहिस, धमावत रीहिस ,जिनगी ल सुख से पहावत रीहिस ।खेती अउ अपन खार रीहिस, जांगर के परसादे खुद के घर दुआर रीहिस ।जब ले ये बम्भनउटा के शासन आइस ,जिनगी ह दुश्ववार होगे ।लगान अइसना अइसना म लगाय हे जेला भरत भरत हमर जांगर घलो ह खु्वार होगे।देखना ,जनम म कर, मरण म कर ,बर म कर. बिहाव म कर, बिहाव छूटे म कर, बिहाव टूटे म कर , गौना म कर, चुडी पहनाय म कर ,चुडी फोरवाय म कर, नाव धरवाय म कर , झालर उतरवाय म कर ।नवा घर बनाबे तब कर, जूना म अउ दुआरी फोरबे तब कर ।घर ह पांच हाथ से ऊंचा मत होय । दू खोली अउ एक एक खटिया के परउ, छानी पाना पतउआ के होवय ।खपरा लगाय के नावेच झन ले।एक दिन सुखनंदन मरार ह ,पांव म पनही पहिर के गली घूम दीस, बलउवा होगे ,तेलासी के बावा जमीदार घर ससन भर पिटवाइस, साध ह भूता के सुखनंदन के ,उही पनही ल, ओकर मुडी म रखवा के घर भेजिच ।कुटेला म ओइसने परदेशी कुरमी ह, घुठवा भर धोती कुरता पहिर के गली बूलत हे, ओकरो बुलउवा होगे, वाहा पिटान पिटवाइस अउ धोती कुरता ल चीर फोर के खडेक खडे नीछवा दीच । देखाइया मन घलो चेत गे।
मुंधरहा ल बाम्भन जमीदार ह रइपुर जाय बर निकले रहिस । रस्ता म अपन घर से निकलत बहोरिक तेली ह बाम्भन ल पांय लगी महाराज बोलिस ।मुंह देखते ही बाम्भन के मन म खटकिस । खुश रहौ कहिके घलो नइ बोलिस । मुंधरहा मुंधरहा तेली के मुंह ल देख के जात हंव ।कांही अपशकुन तो नइ हो जही कहिके थोर कुन उही मेर खडा होके बिलमिस अउ सांहaस अंदर बाहिर लेवत हे ,तभो ल ये टोटका ह, ओकर मने मन म भीतरे भीतर खाये जात हे ।कांही होवय मत ,कांही होवय मत। इंहा ल उंहा गुनत गुनत जात हे। रइपुर जाथे ,त उंहा पता चलथे, कि ओकर जमीदारी ह छिनागे हे ,दूसर ल मिल गेहे । बाम्भन ल अक्खर गे । तरमरा के रहिगे । मुंधरहा मुंधरहा तेली के मुंह देखेंव ,तेह मोला नइ फुरिस कहिके ,ओकर हिरदे ह जर भूंज के ख्वार होगे। अउ येकर रिस ल तेली के उपर उतारे बर मने मन म सोच डरिस । घर लहुटते ही अपन गांव म पाल के रखे आठ दस लठमार मन ल बोलथे…..जावव रे ,ओ रस्ता म ,बसे तेली के घर कुरिया ल टोर फोर दौ, भसका दौ ,अउ ये गांव से ही खेदार दौ।नइ रइही बांस अउ नइ बाजही बासरी।बिहंचा बिहंचा तेली मुख दिखे से बांच जबो। लठमार ठंडाफटकार मन बहोरिक तेली के घर पहुंच गे अउ घर के सब ल मारिस पिटिस, घर कुरिया ल टोर फोर दीस, बेंदरा बिनास कर दीस ।बिचारा बहोरिक अपन लोग लइका संग, अपन हाथ गोड ल धर के दूसर गांव चल दीस । नानकुन खीला ल घलो नइ लेगिस । ये बाम्भन जमीदार ये, अब्बड अत्याचारी रीहीस ।कोनो ल होवय, बेरा उवत ले बूडत तक काम बूता करवा तिच ।बनी भूती नइ देतीच ।अइसने सेती मेती करवातीच। अइसना होवय पेशवा के राज म। सोच मनखे ह कइसे जियत रहिस होही ।एक एक मनखे पीछे एकेक देवता मिलके तैंतीसकोटी देवता ह घलो इंकर रक्षा नइ कर पावत रहिस। अउ अन्याय अत्याचार हद से पार होगे रहिस ।मानवता के अइसे हनन होवत रहिस ।
जब ले अंजोरी ल ग्यारहगांव के जमीदारी मिले हे। तब ले वोह सुनता के रस्ता खोल दे हे। गुलामी ल मुक्त करा दे हे ।कोनो ककरो धरे बांधे नइ हे, जे ह जोतही ,ओकर खेती। खेती अपन सेती ।अपन धरती अपन अगाश ,जे बोबे ,ओ लुबे ओमा चाहे सोना उपजाश ।अपन हाथ ,अपन मुठ ,ददा भाइया हे ,चारो खूट। समता, स्वतंत्रता ,बंधुत्व अउ न्याय ,ये सब पुनिया के बोली आय।जन जन म ये भाव जगाइस ।जब जब पेशवा के नवा कछ आदेश आइस, ये पुन्नीमा संघ ह डट के विरोध जताइस। आज नदिया बारी के सर्वे करे बर पेशवा के मुलाहिजा आवत हे। जेकर विरोध करे बर पुन्नीमा संघ अपन सदस्य अउ गांव गांव के नदिया बारी किसान ल प्रदर्शन करे बर बुलाय हे ।सबके सब सिरपुर के पुन्नीघाट म सकलावत हे। अंजोरी ह ,ये ग्यारह गाव के जमीदार ये। सबके बइठे अउ भोजन पानी के बेवस्था इही ह लगाय हे ।टपटप, टपटप घोडा के आवाज आवत हे, देखते देखत म दंग ल पहुच गे।चार ठो घोडा म पेशवा के पैरोकार आय हे । सरकार के आदमी ये, खिलावत हे, पिलावत हे, आव भगत करत हे । बेरा ठढियावत बइठका शुरू होइस ।पुन्नीमा संघ के पुनिया दादी धनमत, सगन, फुलवा, केंवरा ,सुखिया ,पिंगला, बसंता ,मोतिम, देवंतीन ,बिसासाअउ नदिया बारी के सब किसान अपन अपन बात रखे बर आय हे ।जमीदार अंजोरी ह बइठका ल ,सुचारू रूप से चलाय बर, शासन, नारी संगठन अउ सब किसान मन के स्वागत ,सत्कार के दू शब्द बोलत कहिथे ………देखव आज हमन शासन के आदेश के जन सुनवाई अउ जन हित के बात रखे बर इंहा सकलाय हन । हमन सब एक दूसर के ददा ,भइया ,दाई ,बहिनी, कका, ममा ,काकी ,मामी ,फूफा ,फूफी सहींन कई ठो सगा ,सोदर ,रिश्ता ,नाता से बंधे हंन। अइसने शासन के आदमी भी अपने बीच के आदमी ये । अउ जमीदार ह शासन अउ प्रजा के बीच के आदमी ये ,जे ह शासन के आदेश अउ प्रजा के हित ल देखत प्रजापालक के रूप म निर्णय लेथे । तो सबसे पहिली मै ह ,शासन के पैरोकार मन से निवेदन करत हंव कि ओ ह,शासन के जो आदेश हे, प्रजा के बीच रखै। शासन के अधिकारी सबके बीच खडा होथे अउ आदेश ल पड के सुनाथे।हमर शासन ह इंहा जनता से लगान वसूले के आदेश निकाले हे जेमा……..नदी के पानी ल रोके के कर ,ओमा नहाय के कर ,ओमा पानी पीये के कर , नदियाबारी म पानी पलोय के कर , माल मत्ता धोय के कर ।ये सब तुमन ल पटाय ल लगही । जन सुनवाई होवत हे, सब कटाकट बइठे हे ।एक दूसर के मुह ताकत हे ।कोई नइ बोलत ये।इही बइठका म दमांद घासी भी आय हे। कोन ह का ? का ?बोलत हे ?तेला ध्यान से सुनत हे ।अब जमीदार अंजोरी ह खडा होके बोलथे……. अभी तुमन शासन के आदेश सुने हंव ।अब पुन्नीमा संघ के सदस्य अउ सब किसान मन एक एक करके अपन अपन दुख पीडा के बयान कर सकत हव।
पुनिया दादी ह अपन संघ के जम्मो सदस्य मन ल उंकरे उंकरे क्षेत्र के पाठ पीढा दे हे।अउ अइसे अइसे सिखाय पढाय हे कि राजा के दरबार म घलो अपन दुख पीडा ल रख सकय ,हक अधिकार ल जता सकय ।हजारो साल से दबाय नारी म जान फूंक देहे ।अब इंकरो मुंह म दही नइ जमाय ये।जुबान म धार आगे हे। छूरी सहिन चलथे।बाजू म, ओ ताकत आगे हे ।मौका परथे ते दो चार घलो करथे। लाठी डंडा अउ तलवार घलो चलाथे। तभे तो सिंधिया होल्कर के लुटेरा पिंडारी मन से लड के अपन क्षेत्र के बचाव करथे ।इंकरे सुनता अउ रस्ता ल देख के पेशवा शासन घलो इंकरेच बात मानथे। जनहित के जतना इंकर मांग राहै तुरते पूरा करथे।गांव गांव म, ये मन मया पिरीत के अइसे बीज बोइस, रिश्ता नाता म जोरिस, कि कोनो ह आने नइ होइस ।सब अपनेच होइस । सखी , सहेली ,मित मितनीन ,महापरसादिन , सहनाइन, भोजली बदवाइस,मनखे ल मनखे मिलाइस अउ जात कुजात सब ल एकमइ कर दीस ।अउ इंकर मान गउन अइसे होवय लगिस, कि अपन ददा ल, भले ददा नइ काहय फेर सहीना ददा ल ददा जरूर कहे लगिस ।अइसन राहय पुनिया दादी के काम ह। जे ल देख के सब ओला पांय लग के आशिश लेवय ।
अंजोरी के बोले के आदेश पाके फुलवा मरारिन ह, खडा होके बोलथे…..मैं ह, सब्जी भाजी बो के कइसनो करके ,अपन परिवार के गुजर बसर करत हंव। अतेक अकन कर पटाबो ,त अपन लोग लइका के मुंह म ,कौरा का? डारबो ।
धनमत लोहारिन ह बोलथे…..खेती खार ल नंगा डरे, नदिया नरवा म नजर ल झन गडा साहेब ।
देवंतीन गोडिन ह कहिथे….. अइसना कर पटाबो, तब कतनो मर मर के कमाबो, तभो ल ओकर भोभना म नइ भरावत ये।सब के पेट मुंह ह लगे हे ।कोनो ह पेट ल बांध के नइ कमा सकय।
केंवरा राउताइन ह बोलथे……हमर माल मत्ता लक्ष्मी ह बिन मुंह के जीव ये ,नदिया नरवा म नइ बूडही त कहाँ पानी पी ही ?ओला कहां रोके सकबो। नदी म ही पानी पीथे अउ उहें बूडे रहिथे।
पिंगला कलारिन ह कहिथे ,,,,,जनता बर ,रहे केे घर , खाय के भोजन,पीये के पानी के बेवस्था करे के जिम्मेवारी सरकार होना चाही।
बसंता ह कहिथे….. जनता के जिनगी चलाय बर सरकार ल हर तरह के रोजगार खोलना चाही।
सगन ह कहिथेे ….. जनशिक्षा अउ जनस्वास्थ्य के काम ह सर्वाधिकार होना चाही।
अब पुनिया दादी ह खडा होइस अउ सब जन मानस ल सतनाम, सतनाम, सतनाम के तीन बार मुखोच्चारण कराइस, फेर अपन बात कहे के शुरू करिस……देखव हमन सब इंहा जतना जन हन ,सब एक दूसर के जियत मरत के साथी हन । लेकिन कोनो जानथव ? जनम के पहिली कहाँ रेहेन ?कहाँ से आयेन? कइसे रहेन ? कोनो जाने हव का? नही….।कोनो नइ जानेन।अउ मरण के बाद कहाँ जाबो? कहाँ रइबो ?अउ कइसे रहिबो?कोनो जानथव का ?नही …कोनो नइ जानन। फेर मरे के बाद सरग नरक के भय ,भरम म का बर पडबो। लेकिन जनम के बाद ,अउ मरण के पहिली, हमन कहाँ हन ? कइसे हन ? कहाँ रह सकत हन? अउ कइसे रह सकत हन ? तेला हम सब जरूर जान सकत हन।अउ अचछा अच्छा रहे के लिए कुछ कुछ कर भी सकत हन ।ये धरती म ही दुखी, दंडी ,घृणा, द्वेष से जीबो त नरक ,सुख सुविधा अउ दया मया से रहिबो त सरग बन जाही ।काबर ? नही ।त ये धरती ल ही सरग बनाय के कुछ उदीम करिन । अउ ये सब काम ह, एक दू झन के काम नोहय । समिलहा के काम ये। समिलहा के सूजी ह,एक के सांगा होथे ।एकरे सती सब मिल जुल के काम करना हे। ये काम म शासन ,जमीदार के साथ साथ हम सब के भी भागीदारी बनथे। लेकिन जमीदार इंहा के रहवासी शासक होय के नाते येकर महती जिम्मेवारी होथे।कि हर गांव म कुंआ , तालाब ,पाठशाला, अस्पताल, अनाजघर, खेती किसानी केन्द्र ,बैंक, राशन केन्द् ,हर प्रकार के लघु उद्योग केन्द्र ,अउ काम सिखाय के प्रशिक्षण केन्द्र ,पशुधन अस्पताल ,अउ नस्ल सुधार केन्द्र खोलै ।अउ स्त्रीपुरूष, जातिपाति के भेदभाव के बिना सब ल बराबर बराबर रहे के, खाय के, कमाय के ,अवसर मिलै ।
गांव म ,ये सब बनाय बर जनता से लगान लेयेच ल पडही ।ये सब जमीदार ल देखना हे। कि.जनता से पैदावरी के हिसाब से ही कर वसूले । अकाल दूकाल म कर माफ करै । चौथ सरदेशमुखी अउ गैर उत्पादित काम ल करमुक्त करे ।
मंगतू गोड ह खडा होथे अउ बोलथे……हमर बीच, ये गांव के बेटी दमांद घासी ह घलो इंहा आय हे। इहू ह ,दस गांव के माने हुए जमीदार ये ,दस कोशी म येकर नांव हे। उहू ल बोले के मौका दे जाय।
अंजोरी ह ओकरो नाव लेके बुलाथे….अउ कहिथे कि घासी ह मोर बेटी दमांद ये ।कल ही संझा इंहा आइस हे ।तो आवव लगान के जनसुनवाई के बारे म घासी के का विचार हे सुनन।घासी ह सब के जय जोहार अउ जय सतनाम कहत अपन बात शुरू करथे……आदरणीय संत जनो ! ये चराचर जीवजगत मे जितना भी जीव हे ,सब ल ,इंहा जीये बर कुछ न कुछ समय जरूर मिलथे। जेला हमन जीथन।, जियई ह काये ? अउ हमन कइसे जीयन ? जे ह सबसे बडे सवाल ये ?जेला सुलझाये बर अनेन प्रकार के धरम आइस ,सब के सब कुछ न कुछ धराइस । पोप, पीर, फकीर अउ भगवान उपजिस ,तैंतीस कोटी देवता होइस ।किसिम किसिम के देवी बनिस ।पेड परवत अउ कण कण म घलो भगवान ह पिकी फोरिस ।बांचे खोंचे म बामभन ह, ये धरती के संउहत भगवान परगट होइस ।सब धरम, अपन अपन दुकान चलाइस, भरमाइस कोनो ल उत्ती के रस्ता बताइस, कोनो ल बूडती ,कोनो ल भंडार, त कोनो ल रकसेल के बाट धराइस । अउ सब बाटे बाटे बोहाइस। कोनो पार नइ होइस।कोई हिंदू कहाइस, कोई मुस्लिम होइस, इसाई, बुद्ध ,जैन ,सिख ,पारसी बना बनाके मनखे से मनखे ल फोरवाइस । कोई एती झिकत हे ,कोई ओती झिकत हे, झिकातानी म मानवता ह, चिथाइस। कोई सरग अउ धरम युद्ध के नाव लेके अश्व मेघ घोडा छोडिस। लडिस अउ मिलाइस,नइ मिलिस तेला कत्लेआम करिस ।कोई गाजी बनगे , जेहाद छेड दीस ।जन्नत के हूर परी के लालच म धरती ल ही जहन्नुम कर दीस ।
तेकरे सती ये शासन से मोर ये दरखास्त हे ,कि अगर ये धरती म सब सुखी से राहय ,सुख शांति से जियय, मया प्रेम से मिलय ,समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व अउ न्याय के राज आवय त ,जतना धरम हे तेला प्रतिबंध लगवा दै । इंहा न कोई जात होवय, न पात होवय ,धरम होवय, न भरम होवय ,करम होवय ,न कांड होवय, ढोंग होवय, न ढकोसला होवय ,भाग होवय ,न भगवान होवय । बस इंहा एक रस्ता होवय, सहज सरल जिये के एक मारग होवय । इंहा एक न्याय होवय ,समता अउ सुनता के, स्वतंत्रता होवय, जियव अउ जीयन दव के, बंधुता होवय भाईचारा के । आदरणीय संत जनो ये जीवन ल ,सवाल ये, कहिके हल करे बर झन बइठ जाहौ।हर पल ल, जीयव ,अउ तिहार मनावौ, नाचो ,गावौ , गुनगुनावौ ,मौज म बूड जावौ। ये पल ल , ब्यर्थ म मत जान दौ ।जीवन, जियई म हे ,अउ सब ल ,जीयन देवई म हे ।ये जीवन ल अगर सच म जीये के इच्छा हे ,त जीयव अउ बांटव। जतका रस ले सकत हव, लौ ।अउ जतका रस दे सकत हव ,दौ । जतके देबे ,ओतके मिलही । प्रेम ल, दया ला ,करूणा ल , क्षमा ला, जे तोर पास हे ,उही ल बांट, सारे जहांन म, मानव म ,पशु म ,पक्षी म, सारा चराचर जीव जगत म ,दुख सुख के भागीदार हो जावौ । अउ संत जनो अगर कुछ बनना हे ,ते भले कुछ बन जा लेकिन मोला नइ सुहावाय ककरो बनना, घेंच के घांटी । तोला बनना हे , तोे बन जा ,अंधरा के आंखी, बुढापा के लाठी, अउ सहारा कर, बन के बेटा अउ नाती । “दे ,दे ,देवा दे ,नइते रस्ता बता दे ,सब ल पडथे कभु आती त कभु जाती ।” अतना कहिके जय सतनाम जय सतनाम बोलत घासी ह अपन वाणी ल थिरका देथे ।
अंजोरी ह सब ल कहिथे …..
आज हमर बीच शासक के पैरोकार ह तुंहर सब के बात ल सुन ले हे ,लिख के रख ले हे ,ओला शासक के पास पेस करे जाही । शासक ह ,आम जनता के हित म ,जरूर कुछ निर्णय लिही।अउ मोर जमीदारी म ,तो जतना तुंहर मांग हे ,सब पूरा होही ।सब जयकारा लगाय लगथे
अंजोरी ह सब ल धन्यवाद देवत कहिथे…..कि सब शांतिपूर्वक ये बइठका म आयेव, सुनेव अउ अपन, अपन बात ल रखेव येकर लिए सब ल बहुत बहुत धन्यवाद ……..

*जयसतनाम *

भुवनदास कोशरिया
भिलाईनगर
9926844537