Related posts
-
छत्तीसगढ़ के बासी: टिकेंद्र टिकरिहा
अइसे हाबय छत्तीसगढ़ के गुद गुद बासी जइसे नवा बहुरिया के मुच-मुच हांसी मया पोहाये येकर... -
पहुना: ग.सी. पल्लीवार
पहुना आगे, पहुना आगे अब्बड़ लरा जरा हो देखत होहू उनखर मन के टुकना मोटरी मोटरा... -
बसंत पंचमी: नित्यानंद पाण्डेय
आ गय बसंत पंचमी, तोर मन बड़ाई कोन करे द्वापरजुग के कुरक्षेत्र होईस एक महाभारत कौरव...
One Thought to “भाव प्रवण सरस कृति : मनुख मोल के रखवारी”
Comments are closed.

” मनुख मोल के रखवारी ” बुधराम भैया कतेक बढिया किताब लिखे हावस ग, मन प्रसन्न हो गिस । असल म मैं तोर किताब म ” कल्हण ” के नाव ल देखेंव तव मोर मन म जिज्ञासा होइस कि मैं तोर किताब ल पढवँ । कतका सुघ्घर शब्द मन के प्रयोग करे हावस , मोर छ्त्तीसगढ के किसान हर, काश्मीर के पंडित ” कल्हण ” ल जानथे आउ वोकर किताब ” राजतरंगिणी ” घलाव ल जानथे, एहर बहुत बड बात ए । छ्त्तीसगढ ल तोर ऊपर गर्व हे ग । तोर बर मैं हर अपन किताब ” चंदन कस तोर माटी हे ” के चार लाइन समर्पित करत हौं –
” आम लीम बर पीपर पहिरे छ्त्तीसगढ के सब्बो गॉव ।
नरवा – नदिया तीर म बैठे छ्त्तीसगढ के सब्बो गॉव ॥
धान कटोरा कहिथें तोला किसम किसम के होथे धान ।
संझा कन जस गीत ल गाथे छ्त्तीसगढ के सब्बो गॉव ॥