पुस्तक समीक्छा विट्ठलराम साहू जी के बियंग संग्रह ‘नीम चघे करेला’ गुदगुदी पइदा करथे। विट्ठल जी के अपन भूमिका म लिखे हावय के अपन घर के गोठ, समाज के ऊंच-नीच, अनियाव, रूढ़िवादी विचार, अड़हापन ल सुरता करके ये किताब ल लिखेगे हावय। सही आय। जम्मो लेख मन घर अउ तीर तार के आय। अधिकतर लेख मन अपन गोसइन ऊपर लिखे गे हावय। हांसी-बियंग के बात अपन परिवार अउ जीवन संगवारी संग करे जाथे तभे अच्छा हे। दूसर संग करे ले हांसी बियंग ह विवाद पइदा कर सकथे।बियंग म समाज के,…
Read MoreYear: 2010
आज जरूरत हे सत के
कोनो भी चीज के जब अति होथे त ओह फुट जाथे। कर्मकांड, पाखंड के अति ह, जनम दिस सत ल। येला बगराय बर, सतबर जागरिति लाय बर कबीर ह अलख जगइस। उही कड़ी म निर्गुण ब्रह्म के सुग्घर ममहाती हवा के झोंका अइस। ये हवा ल पठोवत रहिन गुरु घासीदास सत्यनाम या फेर सतनाम के रद्दा। ये सब जाति के मनखे समागे। कहिथे न, पानी बरसथे त नान-नान जगह-जगह के पानी के धार ह नदिया म समा जथे। इहू ह अइसने रहिस हे। हर जाति धरम के मनखे ऐला समावत…
Read Moreरामेश्वर वैष्णव के कबिता आडियो
(राजनीतिज्ञो ने जो पशुता के क्षेत्र मे उन्नति की है उससे सारे पशु आतंकित है) पिछू पिछू जाथे तेला छटारा पेलाथे गा आघू म जो जाथे तेला ढूसे ला कुदाथे गा पूछी टांग के कूदय मोर लाल बछवा मोर लालू बछवा जब जब वो बुजा हा गेरुआ ले छुटे हे तब तब कखरो गा मुड कान फुटे हे हाथ गोड ना सही तभो ले दांत टुटे हे डोकरा अउ छोकरा ला खूदय, पूछी टांग के कूदय मोर लाल बछवा चिंग चडाग ले अस फलांग ले कूदय, मोर ….. खोरवा लहुट…
Read Moreमाटी बन्दना – बंधु राजेश्वर राव खरे
(इस कविता का हिन्दी अनुवाद आरंभ में देखें) माटी के हमर घर-कुरिया माटी हमर खेती-खार हे जय हो महतारी माटी महतारी तोला हमर जय जोहार हे। माटी मं सबके उपजन-बाढन माटी मं जिनगानी माटी जनम-करम के संगी माटी हावय अनपानी माटी सबके तन-मन के सिंगार हे। माटी के बनथे नंदिया बईला माटी के जांता-पोरा माटी के गनपति अउ दुरगा माटी के गौरी-गौरा छत्तीसगढ मं बारों महिना माटी के तिहार हे। माटी के बनथे कुडेरा-तउला दुहना-ठेकवा-कनौजी लाली करसी, खपरा, हंडिया परई-दीया-कलौरी इन जम्मों के गढइया भईया कुम्हार हे! जय हो महतारी…
Read Moreबसंत म बिरह – छत्तीसगढी कविता आडियो
संगी मन बर बसंत के बेरा मा एक अडबड सुन्दर छत्तीसगढी आडियो इहा लगावत हावव, सुनव अउ बासंती बयार म झुमव. पसन्द आवय त टिपिया के असीस देवव. ये कबिता के हिन्दी भावानुवाद मोर हिन्दी ब्लाग आरंभ ले पढ सकत हव. जानि डारेव रे कोयली तोर काय चाल हे पहिली तैं फुदुक फुदुक कूदे डारा डारा नेवता नेवते अमरइया जा के झारा झारा अमुआ के रुख फेर सबला तैं बलाये भवरा के मोहरी संग गीत गुंनगुनाये फेर मोला नै पुछेस काय हाल हे जानि डारेव रे कोयली तोर काय चाल…
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