विकास के कीमत तो चुकाय ल परही

ये तथ्य ल सबो जानथे के धरती के इतिहास कतक पुराना हे। अउ अभी तक के ज्ञात इतिहास में धरती कतका परिवर्तन झेल चुके हे। जउन भी परिवर्तन होय हे फटाक ले नी हो गे हे। ओ परिवर्तन में हजारों-लाखों साल लगे हे। केहे के मतलब परिवर्तन बहुत धीरे-धीरे होथे। अभी कुछ दसक ले हमर धरती म परिवर्तन होये के शुरुआत हो गे हे। मोर इसारा धरती के तापमान बाढ़े म कोती हे। हमला सोचना हे हमर धरती के तापमान में बढ़ोतरी काबर होवत हे? का ए हमर विकास के…

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नदिया के पीरा

जल, जल माने पानी, ह प्राकृतिक संसाधन म सब ले ऊपर आय। येखर बीना परानी जगत के कल्पना घला नइ करे जा सके। नंदिया ह मानव ताल आदिकाल ले महतारी असन दुलार करथे। कोनों भी क्षेत्र के बाढ़े अऊ विकास करे म नंदिया के अड़बड़ महातमा हे। ऐखरे सेती नंदिया ल देस के जीवन रेखा घला किथे। नंदिया ह आदिकाल ले बिना कोनो छलकपट के सबो बर बोहावत हे। नंदिया तीर ह पवितर अऊ भुइया ह उपजाऊ हो जथे। नंदिया तीर के गांव के रहइया मन बड़हर हो जथे। ‘भृगु…

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हवा हमर बैरी बनगे

ऐ दाई ते हरह सुने हस का वो? काय रे? ऐती वोती चारों कोती, ‘स्वाइन फ्लू’ है बगरत हावय काय फूल रे? बने तो हे रे! फूल बगरत हावय त चारो कोती बने ममहाही वइसने आजकल पढ़े लिखे मन घलो कचरा ल जम्मो डाहर फेंक देथे अउ हमन अनपढ़ होके घलो घुरूवाच म डारथन। नहीं दाई, फूल नहीं वो ‘स्वाइन फ्लू’ एक ठन वाइरस हावय तेन ह सब झन ला अपन बस मा करत हावय, अउ मारत हावय। आदमी-औरत मन एक दूसर ल अपन बस मा करथे तेला सुने रेहेंव…

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अपन घर के देवता ल मनइबो

जैतखाम ल सतनाम धरम के अनुयायी आस्था के चिन्हा मानथे अऊ येकर पूजा पाठ करत रथे। खाम के ऊपर मं सादा झंडा लगाय जाथे। इही ल शांति के प्रतीक माने गेहे। छग संत महात्मा, महापुरुष मन के भूमि हरे। पांव-पांव मं देवी-देवता के जुन्ना सुरता, स्मारक, पथरा मं पारे चिन्हा अऊ कथा कहिनी मन अपन डाहर तीर लाथे। सुनबे त रोम-रोम गमक उठथे। कथे भारत भुंइया दुनिया के सरग आय। येला आरूग बनाय के घातेच मेहनत करिन इहां के महापुरुष मन। जेन ह सुनता के रद्दा देखा के अमर होगे।…

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कहिनी – ऊलांडबाटी खेले के जुगाड़

जहां टूरा हर राजनीति म पांव धरही तहां बइठे के, सूते के, ऊलांडबाटी खेले के, सबके जुगाड़ जम जाही। दसवीं पढ़े हे कहिके कोन्हो ला झन बताबे। तहां बिधान सभा अऊ लोकसभा के रस्ता घलो खुल जाही। मोर गुड्डू हर दसमी किलास मा दू बछर फैल का हो गीस, ओकर अनदेखनहा गुरूजी मन ओला डेनिया के इस्कूल ले निकाल दिन। में केहेंव-‘कस गुरूजी हो! अरे लइका हर अपन नेंव मजबूत करना चाहत हे त तुमन काबर ओकर संकल्प के बध करत हव? लइका हर एक किलास मा जतके जादा गियान…

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आम आदमी

आम आदमी के का औकात हे ओखर बर मंहगाई हे गरीबी, रोग-राई हे दु:ख के दुनिया हे झुग्गी, अऊ कुरिया हे खैराती अस्पताल हे न दवई, न डॉक्टर, खस्ता हाल हे राशन दुकान हे न कोनो समान हे इसकुल हे लईका के भीड़ कोरी खईरखा के नईए गुरुजी पढ़ई नइ हाय हे शुरूजी थाना म, दफ्तर म नेता के घर म रेल म, मोटर म गांव म, सहर म भीड़ बड़ भारी हे बड़ लाचारी हे मंत्री ह आय हे सड़क ह छेकाय हे दरिद्री अऊ भूख, पियास टूटत हे…

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गोल्लर ल गरुवा सम्मान

जबले अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ल शांति के नोबल पुरस्कार मिले हे, तबले जम्मो किसम के मान-सम्मान अउ पुरस्कार ल चना- फूटेना बरोबर बांटे के रिवाज हमारे इहां चलगे हे। अइसे बात घलोक नइ हे के पहिली अइसन नइ होवत रिहीसे। पहिली घलोक अइसन होवत रिहीसे। जेन मनखे ल अपन सम्मान करवाना होवय वोहा कोनो अइसन किसम के आयोजक ल एकर ठेका दे देवय, जेन ह पचीस-पचास आदमी ल जोर-सकेल के एकाद झन झोला छाप नेता किसम के आदमी ल अतिथि बना के बला लेवय। माईक अउ साल-नारियर के…

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हांसत हे सोनहा धान के बाली ह

पींवरा लुगरा पहिरे धरती हांसत हे, सोनहा धान के बाली ह। पींवरा पींवरा खेतखार दिखत हे, कुलकत हे अन्नपूर्णा महरानी ह॥ गांव-गांव म मात गे हे धान लुअई, खेतखार म मनखे गजगजावत हे। सुकालु, दुकालू, बुधियारिन, मन्टोरा संगी जहुरिया संग धान लुए बर जांवत हे॥ का लइका का सियान? मात गे हे जवानी ह। हांसत हे…। धान लुअइया मन के रेन लगे हे, कोन्हों गांवखार कोन्हों रेगहा खार म जावत हे। कोन्हों गाड़ा कोन्हों टे्रक्टर में धान के बीड़ा ल लानत हे॥ खरही रचागे कोठार म, मुचमुचावत हे लछमीरानी ह।…

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भईसा गाड़ा के चलान

संगवारी हो चलान सबद सुन के कतकोन मनखे मन के जीव हर कांपे लागथे। फेर वाह रे, आर.टी.ओ. ऑफिस (रोगहा टेसिहा ऑफिस) तोर तो न शुरु, न अन्त हे, तोर महिमा बड़ अनन्त हे। नानपन ले बडक़ापन अऊ सरी उम्मर मोटर, फटफटी चलावत आत हन, फेर कोनहो टिरेफिक के सादा झबरू टामी मन, आज ले एको घव हमला नई भूके हे। उनला झोरफा चऊक, रेलवे फाटक अऊ सिविक सेंटर के चउपाटी मा देखते भार, एकंगू भाग जथन, साला मन के छईहां घलो धुर्र छईहां होथय। न संगी बने, न मतंगी…

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मिर्चा भजिया खाये हे पेट गडगडाये हे

बस मे कब ले ठाढे हँव बइठे बर जघा दे दे ले दे खुसर पाये हँव निकले बर जघा दे दे भीड मे चपकाये हँव सांस भर हवा दे दे मैं हर सांस लेवत हँव तैं कतक धकेलत हस भीड मे चपकाये हँव सांस भर हवा दे दे छेरी पठरु कर डारे मनखे ला अस भर डारे लइका भले तै झन दे सीट ला सगा दे दे समधी के सुआ मिर्चा भजिया खाये हे पेट गडगडाये हे टुरा के भरोसा का, दउड के दवा दे दे रामेश्वर वैष्णव (हिन्दी अनुवाद…

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