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कल्चर बदल गे

पहिली के जमाना मा साझा-परिवार रहिन। हर परिवार मा सुविधा के कमी रहिस फेर सुख के गंगा बोहावत रहिस। सियान मन के सेवा आखरी साँस तक होवत रहिस।अब कल्चर बदल गे, साझा परिवार टूट गे। सुविधा के कोनो कमी नइये, फेर सुख के नामनिशान नइये। लोगन आभासी सुख के आदी होवत हें। सियान मन वृद्धाश्रम जावत हें। जउन मन वृद्धाश्रम नइ जावत हें, उंकर घर मन वृद्धाश्रम सहीं बन गेहे। ककरो बेटा ऑस्ट्रेलिया मा, ककरो अमेरिका मा, ककरो कनाडा मा, ककरो सिंगापुर मा। अपन जिनगी के सरी सुख ला त्याग के बेटा ला उच्च शिक्षा देवइया दाई ददा मन अपन घर मा बेसहारा।




कल्चर बदल गे।अब सब झन नाम, पद अउ पइसा के पाछू भागत हें। हाई सोसायटी के दोस्त-यार मन सिद्ध पुरुष होगें। इनकर संग क्लब, पब, पार्टी मा जाना सभ्यता के पहिचान बनगे। एयरकंडीशन, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, मॉड्यूलर किचन, कीमती फर्नीचर के स्टोर रूम ला अपन घर कहात हें। जिनगी काये ? सुख काला कहिथें ? सोचे बर फुरसत नइये।

कल्चर बदल गे। रोटी-पराठा दकियानूसी खाना होगे। पिज्जा-बर्गर अनिवार्य भोजन बनगे। नान नान कपड़ा मन, सभ्यता के मापदंड होगे। रोटी बदल गे, कपड़ा बदल गे, मकान बदल गे। पहिली रोटी, कपड़ा, मकान ला मनखे के मूलभूत आवश्यकता माने जाय। अब फ़ास्ट फूड, जीन्स, क्लब मन मूलभूत आवश्यकता बन गें।
कल्चर बदल गे। दाई-ददा, भाई-बहिनी, कका-काकी, मौसा-मौसी, फूफा-फूफी, नाता-रिश्ता पराया होगे। फेसबुकिया अउ वाट्सपिया रिश्ता गहिर होगे जानो-मानो बीमार पड़े मा अस्पताल लेगे बर, कंधा देहे बर इही मन आहीं।
कल्चर बदल गे। जीये के तरीका बदल गे फेर प्रकृति अपन कल्चर ला नइ बदलिस। मनखे के देह अपन कल्चर ला नइ बदलिस। अनियमित अउ अशुद्ध खानपान अपन कल्चर नइ बदलिस। पहिली बुखार, मोतीझिरा, सर्दी, खाँसी, तपेदिक जइसे बीमारी अउ चेचक, हैजा, प्लेग जइसे महामारी के गिनती के नाम रहिन। अब कैंसर, हाइपरटेंशन, हार्ट अटैक, थैलेसेमिया, स्लिप डिस्क, जइसे अनेक बीमारी के नाम सुने मा आथे।
कल्चर बदल गे। मनखे के काया के कल्चर नइ बदलिस। चोट लगे मा आँसू आथे। खुश होय मा हाँसी आथे। जनम होवत हे। मौत घलो होवत हे। जचकी ले श्मशान तक के रद्दा वइसने के वइसने रहिगे। इहाँ कोनो विकास के काम नइ होइस। ये रद्दा गौरव-पथ या राज-पथ जइसे नइ सँवर पाइस।
कल्चर बदल गे। अकेल्ला सियान बन्द कमरा मा मर गे। बदबू फैलिस तब आस पास के रहवइया मन के शिकायत मा पुलिस आके दरवाजा ला तोड़ के, पोस्टमार्टम कराइस अउ सरकारी रीति रिवाज मा अंतिम संस्कार के बेटा मन ला सूचना भेज दिस। कुछ लायक औलाद मन विदेश ले आके सगा-सहोदर ला नेवता देके जोरदार शांति भोज के आयोजन करिन, तहाने मकान ला बेचके वापिस अपन कर्मभूमि मा चल दिन। सही मा कल्चर बदल गे।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़



कस्तूरी – छत्तीसगढ़ के हरियर चाँउर

छत्तीसगढ़ के हरियर चाँउर, होथे सबले बढ़िया
एखर बारे मा नइ जाने, सब्बो छत्तीसगढ़िया ।।

दुरुग अउर धमतरी जिला मा, एखर खेती होथे
फेर अभी कमती किसान मन, एखर बीजा बोथे।।

सन् इकहत्तर मा खोजिन अउ नाम रखिन कस्तूरी
छत्तीसगढ़ महतारी के ये, हावय हरियर चूरी।।

वैज्ञानिक मन शोध करत हें, कइसे बाढ़े खेती
कस्तूरी के फसल दिखय बस, जेती जाबो तेती।।

हर किसान ला मिलै फायदा, ज्यादा मनखे खावँय
छत्तीसगढ़ के कस्तूरी के, गुन दुनिया मा गावँय।।

ग्लुटेन एमा नइ चिटिको, रखे वजन साधारण
कैंसर के प्रतिरोधक क्षमता, क्लोरोफिल के कारण।।

फाईबर प्रोटीन सुनव जी, ये चाँउर मा भारी
जेखर कारण नइ हो पावय, लीवर के बीमारी।।

धान कटोरा छत्तीसगढ़ के, चाँउर सबले बढ़िया
कस्तूरी चाँउर के मालिक, जग मा छत्तीसगढ़िया।।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़



छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय – जनकवि कोदूराम “दलित”

(108 वाँ जयंती मा विशेष)

1717 ईस्वी मा जन्में गिरधर कविराय अपन नीतिपरक कुण्डलिया छन्द बर जाने जाथें। इंकर बाद कुण्डलिया छन्द के विधा नँदागे रहिस। हिन्दी अउ दूसर भारतीय भाखा मा ये विधा के कवि नजर मा नइ आइन।

पठान सुल्तान, जुल्फिकार खाँ, पंडित अम्बिकादत्त व्यास, बाबा सुमेर सिंह, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मन सुप्रसिद्ध कवि के दोहा के भाव मा विस्तार दे के अउ रोला जिद के ये विधा ला पुनर्स्थापित करे के कोशिश जरूर करिन।

हास्य कवि काका हाथरसी घलो कुण्डलिया जइसे दोहा अउ रोला मिलाके छै डाँड़ के बहुत अकन रचना मंच मा पढ़के प्रसिद्धि पाइन हें फेर उंकर रचना मन काका की फुलझड़ियाँ के नाम मा जाने जाथें। उंकर रचना मा कुण्डलिया असन आदि अउ अंत मा एक्के शब्द के प्रयोग नइ होइस हे। सन 2000 के बाद हिन्दी मा कुण्डलिया छन्द फेर प्रचलन मा आइस हे।

कोदूराम “दलित” जी अपन पहिली कुण्डलिया छन्द संग्रह “सियानी गोठ” (प्रकाशन वर्ष – 1967)मा अपन भूमिका मा लिखे रहिन – “ये बोली (छत्तीसगढ़ी) मा खास करके छन्द बद्ध कविता के अभाव असन हवय, इहाँ के कवि-मन ला चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करें।स्थायी छन्द लिखे डहर जासती ध्यान देवें।ये बोली पूर्वी हिन्दी कहे जाथे। येहर राष्ट्र-भाषा हिन्दी ला अड़बड़ सहयोग दे सकथे। यही सोच के महूँ हर ये बोली मा रचना करे लगे”

उंकर निधन 28 सितम्बर 1967 मा होइस, उंकर बाद छत्तीसगढ़ी मा छन्दबद्ध रचना लिखना लगभग बंद होगे। छत्तीसगढ़ी मा अब “छन्द के छ” के साधक कवि मन कुण्डलिया छन्द मा सुग्घर रचना करत हें।

छत्तीसगढ़ मा कुण्डलिया छन्द ला प्रतिष्ठित करे के श्रेय जनकवि कोदूराम “दलित” ला जाथे। इही पाय के दलित जी ला छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय माने जाथे।

जनकवि कोदूराम दलित जी छत्तीसगढ़ी के संगेसंग हिन्दी मा घलो कुण्डलिया छन्द लिखिन हें। उनकर कुण्डलिया छन्द के एक संग्रह 1967 मा सियानी-गोठ के नाम मा प्रकाशित हो चुके हे।

कोदूराम दलित जी के हिन्दी अउ छत्तीसगढ़ी ऊपर समान अधिकार रहिस। फेर छत्तीसगढ़ी कवि के रूप मा उन ला ज्यादा जाने जाथें। इनकर कविता मा कुण्डलिया छन्द के अलावा दोहा, रोला, सोरठा, उल्लाला, सार, सरसी, चौपई, चौपाई, ताटंक, कुकुभ, लावणी, श्रृंगार, पद्धरि, पद पादाकुलक, घनाक्षरी आदि छन्द के दर्शन होथे।

गिरधर कविराय अपन नीतिपरक कुण्डलिया बर प्रसिद्ध हें त कोदूराम दलित के कुण्डलिया मा नीति के अलावा भारत के नव निर्माण, सरकारी योजना, विज्ञान, हास्य-व्यंग्य, देशप्रेम, छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति जइसे अनेक रंग के दर्शन होथे।




दलित जी के नीतिपरक कुण्डलिया देखव –

(1) कतरनी अउ सूजी
काटय – छाँटय कतरनी, सूजी सीयत जाय
सहय अनादर कतरनी , सूजी आदर पाय
सूजी आदर पाय , रखय दरजी पगड़ी मां
अउर कतरनी ला चपकय वो गोड़ तरी-मां
फल पाथयँ उन वइसन, जइसन करथयँ करनी
सूजी सीयय, काटत – छाँटत जाय कतरनी.
(2) पथरा –
भाई, एक खदान के, सब्बो पथरा आयँ
कोन्हों खूँदे जायँ नित, कोन्हों पूजे जायँ
कोन्हों पूजे जायँ , देउँता बन मंदर के
खूँदे जाथयँ वोमन ,फरश बनय जे घर के
चुनो ठउर सुग्घर, मंदर के पथरा साहीं
तब तुम घलो सबर दिन पूजे जाहू भाई.

सामाजिक बुराई दूर करे बर दलित जी के संदेश –

(1) जुआ –
खेलव झन कोन्हों जुआ, करव न धन बरबाद
आय जुआ के खेलना, बहुत बड़े अपराध
बहुत बड़े अपराध, आय ये मा सब बिगड़िन
राजा नल अउ धरमराज जइसे सब्बो झिन
खो के धन फोकट जीवन भर दुख झन झेलव
सुखी रहव सब झन मन, जुआ कभू झन खेलव।।

(2) नशा –
गाँजा चरस अफीम अउ माखुर मदिरा भंग
इन्हला जे सेवन करयँ, छोड़व उनकर संग
छोड़व उनकर संग, तभे तुम रहू निरोगी
नशा बनाथे मनखे ला कँगला अउ रोगी
पियौ दूध फल मेवा खावौ ताजा ताजा
आवयँ जहर अफीम चरस मदिरा अउ गाँजा।।




दलित जी अपन प्रदेश के गरिमा अउ आहार के महिमा ये कुण्डलिया मा करिन संगेसंग छत्तीसगढ़ के पिछड़ापन के कारण तको बताइन –

(1) छत्तीसगढ़ –
छत्तिसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चाँउर-दार
हवयँ इहाँ के लोग मन, सिधवा अउर उदार
सिधवा अउर उदार, हवयँ दिन रात कमावयँ
दें दूसर ला भात, अपन मन बासी खावयँ
ठगथयँ ये बपुरा मन ला बंचक मन अड़बड़
पिछड़े हवय अतेक, इही कारण छत्तिसगढ़।।

(2) बासी –
बासी मा गुन हे गजब, एला सब झन खाव
ठठिया भर पसिया पियौ, तन ला पुष्ट बनाव
तन ला पुष्ट बनाव, जियो सौ बछर आप मन
जियत हवयँ जइसे कतको के बबा-बाप मन
दही-मही सँग खाव शान्ति आ जाही जी -मा
भरे गजब गुन हें छत्तिसगढ़ के बासी मा।।

कोदूराम दलित जी के जनम टिकरी (अर्जुन्दा) गाँव मा होय रहिस फेर उंकर करम भुइयाँ दुरुग रहिस। अइसन मा भिलाई उंकर विषय वस्तु कइसे नइ बनतिस –

(1) भिलाई –
बनिस भिलाई हिन्द के, नवा तिरथ अब एक
चरयँ गाय गरुवा तिहाँ, बस गें लोग अनेक
बस गें लोग अनेक, रोज आगी सँग खेलयँ
लोहा ढलई के दुख ला, हँस हँस के झेलयँ
रहिथयँ मिल के रूसी हिन्दी भाई भाई
हमर देश के नवा तिरथ अब बनिस भिलाई।।

साठ के दशक मा हमर देश निर्माण के प्रक्रिया ले गुजरत रहिस। ओ बेरा मा सरकारी योजना ला सफल करे के आव्हान देखव –

(1) परिवार नियोजन –
अड़बड़ बाढ़िन आदमी, भारत मा भगवान
दू ले आगर होय झन, अब ककरो सन्तान
अब ककरो सन्तान, कहूँ होही नौ-दस झन
तो करना परिही सब ला, परिवार नियोजन
ज्यादा मनखे बाढ़े ले, हो जाथय गड़बड़
पूरय नहीं अनाज, सबो दुख पाथयँ अड़बड़।।

(2) पँचसाला योजना –
पँचसाला हर योजना, होइन सफल हमार
बाँध कारखाना सड़क, बनवाइस सरकार
बनवाइस सरकार, दिहिन सहयोग सबो झन
अस्पताल बिजली घर इसकुल घलो गइन बन
देख हमार प्रगति , अचरज होइस दुनिया ला
होइन सफल हमार, योजना मन पँचसाला।।




लोकतंत्र मा वोट के महत्ता अउ चुनाव के प्रक्रिया बतावत दलित जी के कुण्डलिया –

(1) वोट –
सोना चाँदी घीव गुड़, रुपिया पैसा नोट
होथय सबसे कीमती, आप मनन के वोट
आप मनन के वोट, अधिक पाथयँ जउने मन
राज काज के अधिकारी बनथयँ तउने मन
यही पाय के उन्हला चाही अच्छा होना
परखो वोट डलइया मन, पीतल अउ सोना।।

(2) राजा –
अब जनता राजा बनिस, करय देश मा राज
अउ तमाम राजा मनन, बनगें जनता आज
बनगें जनता आज, भूप मंत्री-पद माँगे
ये पद ला पाए बर घर घर जायँ सँवागे
बनयँ सदस्य कहूँ जनता मन दया करिन तब
डारयँ कागद पेटी ले निकलय राजा अब।।

लोकतंत्र मा प्रिंट मीडिया के भारी महत्व होथे। अखबार के भूमिका बर उंकर विचार ये कुण्डलिया मा देखे जा सकथे –

(1) पेपर –
पेपर मन –मां रोज तुम, समाचार छपवाव
पत्रकार संसार ला, मारग सुघर दिखाव
मारग सुघर दिखाव, अउर जन-प्रिय हो जाओ
स्वारथ – बर पेपर-ला, झन पिस्तौल बनाओ
पेपर मन से जागृति आ जावय जन-जन मां
सुग्घर समाचार छपना चाही पेपर-मां.

5 मार्च 1910 मा जन्मे कवि दलित जी प्रगतिशील विचारधारा के रहिन अउ जन हित के सबो किसम के परिवर्तन ला स्वीकार करिन। विज्ञान के समर्थन मा उंकर कुण्डलिया देखव –

(1) विज्ञान –
आइस जुग विज्ञान के , सीखो सब विज्ञान
सुग्घर आविस्कार कर , करो जगत कल्यान
करो जगत कल्यान, असीस सबो झिन के लो
तुम्हू जियो अउ दूसर मन ला घलो जियन दो
ऋषि मन के विज्ञान , सबो ला सुखी बनाइस
सीखो सब विज्ञान, येकरे जुग अब आइस.

(2) बिजली –
तार मनन मा ताम के, बिजली रेंगत जाय
बुगुर बुगुर सुग्घर बरय, सब लट्टू मा आय
सब लट्टू मा आय, चलावय इनजन मन ला
रंग रंग के दे अँजोर ये हर सब झन ला
लेवय प्रान,लगय झटका जब येकर तन मा
बिजली रेंगत जाय, ताम के तार मनन मा।।




दलित जी कवि सम्मेलन के मंच मा हास्य अउ व्यंग्य के कवि के रूप मा विख्यात रहिन। उंकर शिष्ट हास्य के सुग्घर उदाहरण आय ये कुण्डलिया –

(1)खटारा साइकिल –
अरे खटारा साइकिल, निच्चट गए बुढ़ाय
बेचे बर ले जाव तो, कोन्हों नहीं बिसाय
कोन्हों नहीं बिसाय, खियागें सब पुरजा मन
सुधरइया मन घलो हार खागें सब्बो झन
लगिस जंग अउ उड़िस रंग, सिकुड़िस तन सारा
पुरगे मूँड़ा तोर, साइकिल अरे खटारा।।

दलित जी आडम्बर ला नइ मानत रहिन। आडम्बर ऊपर उंकर व्यंग्य देखव –

(1) ढोंगी –
ढोंगी मन माला जपयँ, लम्भा तिलक लगायँ
हरिजन ला छीययँ नहीं, चिंगरी मछरी खायँ
चिंगरी मछरी खायँ , दलित मन ला दुत्कारयँ
कुकुर बिलाई ला चूमयँ, चाटयँ पुचकारयँ
छोंड़ छाँड़ के गाँधी के सुग्घर रसदा ला
भेद भाव पनपायँ, जपयँ ढोंगी मन माला।

छत्तीसगढ़ मा बाहिर ले आये मनखे मन इहाँ के सिधवा मन के शोषण करिन हें। ये पीरा ला व्यंग्य के माध्यम ले दलित जी खूब सुग्घर लिखिन हें –

(1) फुटहा लोटा –
फुटहा लोटा ला धरव, जाओ दूसर गाँव
बेपारी बन के उहाँ, सिप्पा अपन जमाव
सिप्पा अपन जमाव, छोंड़ के जोरू जाँता
नौ ला सौ कर कर के लिक्खो रोकड़ खाता
खिचड़ी खावौ पहिनो कुछ दिन कपड़ा मोटा
बना दिही लखपतिया तुम्हला फुटहा लोटा।।

नवा भारत मा औद्योगीकरण बाढ़िस। विकास बर जरूरी घलो रहिस। फेर किसानी बूता ला छोड़ के नौकरी करे बर गाँव ला छोड़ना दलित जी के हिरदे मा पीरा ला जनम देवत रहिस। ये कुण्डलिया उंकर मन के पीरा ला बतावत हे –

(1) नौकरी –
पढ़े लिखे मनखे मनन, भइन सुस्त सुखियार
खोजे खातिर नौकरी, किंजरयँ हाथ पसार
किंजरयँ हाथ पसार, न भावय खेती बारी
करिही कोन बताव, अन्न के पैदावारी
करथयँ खेती खूब, जगत के लोग सबो झन
खोजयँ नित नौकरी, इहाँ के पढ़े लिखे मन।।

जनकवि कोदूराम दलित जी पक्का गांधीवादी विचारधारा के रहिन। अपन कविता मा नान नान जिनिस ला तको विषय वस्तु बना के ओखर महत्व ला रेखांकित करत रहिन –

(1) राख –
नष्ट करो झन राख –ला, राख काम के आय
परय खेत-मां राख हर , गजब अन्न उपजाय
गजब अन्न उपजाय, राख मां फूँको-झारो
राखे-मां कपड़ा – बरतन उज्जर कर डारो
राख चुपरथे तन –मां, साधु,संत, जोगी मन
राख दवाई आय, राख –ला नष्ट करो झन.




दलित जी के बचपन गाँव देहात के वातावरण मा बीतिस तेपाय के उंकर रचना मन मा प्रकृति के प्रेम साफ साफ झलकथे। उंकर पर्यावरण बर जागरूकता देखव –

(1) पेड़ –
भाई अब सब ठउर –मां, अइसन पेड़ लगाव
खाये खातिर फल मिलय, सुस्ताये बर छाँव
सुस्ताये बर छाँव , मिलय लकड़ी बारय बर
मिल जावय लौड़ी , दुष्टन – ला खेदारे बर
ठण्डी शुद्ध सुगंधित हवा मिलय सुखदाई
सबो ठउर – मां अइसन पेड़ लगावव भाई.

छत्तीसगढ़ी के संगेसंग दलित जी के हिन्दी मा घलो समान अधिकार रहिस। उंकर हिन्दी के कुण्डलिया –

(1) कुर्सी –
सबसे कुर्सी है अधिक, जग में तेरा मान
तुझको पाने के लिए, तरसे हर इन्सान
तरसे हर इन्सान, जिसे तू मिल जाती है
उसको चुम्बक जैसी ही तू चिपकाती है
तुझसे करते नेह, लोग अपने मतलब से
तेरा मान अधिक है कुर्सी, जग में सबसे।।

जिनगी के निस्सारता बर उंकर हिन्दी के ये कुण्डलिया छन्द एक कालजयी रचना आय –

(1) नाम –
रह जाना है नाम ही, इस दुनिया में यार
अतः सभी का कर भला, है इसमें ही सार
है इसमें ही सार, यार तू तज के स्वारथ
अमर रहेगा नाम, किया कर नित परमारथ
काया रूपी महल, एक दिन ढह जाना है
किन्तु सुनाम सदा दुनिया में रह जाना है।।

आज 5 मार्च के 118 वाँ जयंती मा जनकवि कोदूराम “दलित” जी ला नमन।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
मोबाइल – 9907174334, 8319915168
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छन्द के छ : छप्पय छन्द

बिदेसी बाबू

बिसराये ब्यौहार , पहिर अँगरेजी चोला
महतारी अउ बाप , नजर नइ आवै तोला
जाये बर परदेस , तियागे कुटुम – कबीला
बन सुविधा के दास , करे बिरथा जिनगी ला
का पाबे परदेस ले , नाता – रिस्ता जोड़ के
असली सुख इहिंचे मिलै , झन जा घर ला छोड़ के

छप्पय छन्द

डाँड़ (पद) – ६, ,चरन – १२, पहिली ४ डाँड़ रोला अउ बाद के २ डाँड़ उल्लाला होथे. माने छप्पय छन्द हर १ रोला अउ १ उल्लाला ला मिला के बनाये जाथे.

तुकांत के नियम – पहिली ४ डाँड़ रोला हे त रोला के नियम लागू होही , आखरी २ डाँड़ उल्लाला हे त उल्लाला के नियम लागू होही

हर डाँड़ मा कुल मातरा – रोला मा २४ मातरा अउ उल्लाला मा २६ या २८ मातरा

यति / बाधा – रोला अउ उल्लाला के नियम अनुसार

छप्पय छन्द के सुरु के चार डाँड़ रोला हे. (११-१३ यति वाले चार डाँड़)

बिसराये ब्यौहार , पहिर अँगरेजी चोला
महतारी अउ बाप , नजर नइ आवै तोला
जाये बर परदेस , तियागे कुटुम – कबीला
बन सुविधा के दास , करे बिरथा जिनगी ला

छप्पय छन्द के आखिरी के दू डाँड़ उल्लाला हे. (१३,१३ यति वाले दू डाँड़)

का पाबे परदेस ले , नाता – रिस्ता जोड़ के
असली सुख इहिंचे मिलै , झन जा घर ला छोड़ के

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

छन्द के छ : उल्लाला

जिनगी (उल्लाला – १३,१३ मा यति ,बिसम-सम तुकांत)

जिनगी के दिन चार जी, हँस के बने गुजार जी
दुख के हे अँधियार जी, सुख के दियना बार जी
नइ हे खेवन-हार जी , धर मन के पतवार जी
तेज नदी के धार जी, झन हिम्मत तयँ हार जी

गुरू – १ (उल्लाला – १३,१३मा यति, सम-सम तुकांत)

दुख के पाछू सुख हवे, गोठ सियानी मान ले
बिरथा नइ जाये कभू , संत गुरु के ग्यान ले
गुरू बड़े भगवान ले , हरि दरसन करवाय जी
गुरू साधना मा जरै , अउ अँजोर बगराय जी

गुरु – २ (उल्लाला – १५,१३ मा यति, सम-सम तुकांत)

तँय घुनही घन्नई बइठ झन, बुड़ो दिही मँझधार मा
गुन बिना गुरू पतवार के , कोन उतरही पार मा
सुन तीन लोक के देव मन, जपैं गुरू के नाम ला
जब पावैं आसिरवाद तब, सुरु करैं उन काम ला

उल्लाला – ये छन्द २ किसिम के होथे १३,१३ मातरा मा यति वाले अउ १५,१३ मातरा म यति वाले
डाँड़ (पद) – २, ,चरन – ४
तुकांत के नियम –
१३-१३ मातरा मा यति वाले उल्लाला मा बिसम-सम चरन मा तुकांत भी होथे अउ सम-सम चरन मा तुकांत भी होथे.
१५-१३ मातरा मा यति वाले उल्लाला मा सिरिफ सम-सम चरन मा तुकांत माने जाथे.
हर डाँड़ मा मातरा १३-१३ मातरा वाले उल्लाला मा २६ अउ १५-१३ मातरा वाले उल्लाला मा २८ मातरा
यति / बाधा – १३, १३ मातरा मा अउ १५-१३ मातरा मा
खास- उल्लाला छन्द ला उल्लाल अउ चंद्रमणि छन्द घला कहिथें. रोला छन्द के बाद उल्लाला छन्द जोड़ के छप्पय छन्द बनाये जाथे.

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

छन्द के छ : अमृत ध्वनि छन्द

जब तँय जाबे

जाबे जब तँय जगत ले , का ले जाबे साथ
संगी अइसन करम कर, जस होवै सर-माथ
जस होवै सर – माथ नवाबे, नाम कमाबे
जेती जाबे , रस बरसाबे , फूल उगाबे
झन सुस्ताबे , अलख जगाबे , मया लुटाबे
रंग जमाबे , सरग ल पाबे, जब तयँ जाबे

अमृत ध्वनि छन्द

डाँड़ (पद) – ६, ,चरन- १६ , पहिली २ डाँड़ दोहा अउ बाद के ४ डाँड़ ८-८ के मातरा मा यति वाले ३-३ चरन माने कुल २४-२४ मातरा के रहिथे फेर रोला नइ रहाय.
तुकांत के नियम – दोहा के पहिली २ डाँड़ मा दोहा के नियम अउ बाद के ४ डाँड़ मा ८-८ के मातरा मा यति वाले ३-३ चरन .
हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४
यति / बाधा – दोहा म १३,११ मा यति अउ बाद के ४ डाँड़ मा ८-८ मातरा के बाद यति.
खास – अमृत ध्वनि छन्द मा कुण्डलिया छन्द जइसे छै डाँड़ होथे. पहिली दू डाँड़ मन दोहा के होथे. दोहा के आख़िरी चरन कुण्डलिया छन्द जइसे तीसर डाँड़ के पहिली चरन बनथे. आख़िरी चार डाँड़ के हर डाँड़ मन आठ-आठ मातरा के समूह मा बँटे रहिथे. अमृत ध्वनि छन्द के पहिला सबद या सबद समूह अउ आख़िरी सबद या सबद समूह एक्के रहिथे.
अमृत ध्वनि छन्द के आखरी ४ डाँड़ ८-८ के मातरा मा यति वाले ३-३ चरन माने कुल २४-२४ मातरा के रहिथे फेर रोला नइ रहाय. अउ कुण्डलिया छन्द के आखरी डाँड़ रोला छन्द होथे.

अमृत ध्वनि छन्द के सुरु के दू डाँड़ “दोहा” हे. एमा दोहा छन्द के सबो नियम के पालन होय हे.

जाबे जब तँय जगत ले , का ले जाबे साथ
संगी अइसन करम कर, जस होवै सर-माथ

दोहा के चउथा चरन “जस होवै सर-माथ” हर अमृत ध्वनि छन्द के तीसर डाँड़ के सुरु मा आय हे. संगेसंग तीसर डाँड़ हर ८-८ मातरा के तीन चरन मा बँटे हे. इही किसिम ले बाद के तीन डाँड़ माने दोहा के बाद के चारों डाँड़ मन ८-८ मातरा के तीन-तीन चरन मा मा बँटे हे. अमृत ध्वनि छन्द “जाबे” सबद ले सुरु होय हे अउ आखिर मा घला “जाबे” सबद आय हे.

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

छन्द के छ : कुण्डलिया छन्द

चेत

हरियर रुखराई कटिस, सहर लील गिन खेत
देखत हवैं बिनास सब, कब आही जी चेत
कब आही जी चेत , हवा-पानी बिखहर हे
खातू के भरमार , खेत होवत बंजर हे
रखौ हवा-ला सुद्ध , अऊ पानी-ला फरियर
डारौ गोबर-खाद , रखौ धरती ला हरियर

कवि के काम

कविता गढ़ना काम हे, कवि के अतकी जान
जुग परिबर्तन करिस ये, बोलिन सबो सियान
बोलिन सबो सियान , इही दिखलावे दरपन
सुग्घर सुगढ़ बिचार, जगत बर कर दे अरपन
कबिता – मा भर जान, सदा हे आगू बढ़ना
गोठ अरुन के मान, मयारू कबिता गढ़ना ।।

छत्तीसगढ़ के संस्कृति

छत्तीसगढ़ के संस्कृति, एक समुन्दर जान
डबरा के भिन्दोल मन , सदा रहीं अंजान
सदा रहीं अंजान , मनेमन – मा भरमाहीं
घूमें तीनों लोक , कहाँ अइसन सुख पाहीं
ढाई आखर बाँच, अकड़ झन पोथी पढ़ के
एक समुन्दर जान, संस्कृति छत्तीसगढ़ के |

कुण्डलिया छन्द

डाँड़ (पद) – ६, ,चरन – १२, पहिली २ डाँड़ दोहा अउ बाद के ४ डाँड़ रोला होथे. माने कुण्डलिया छन्द हर १ दोहा अउ १ रोला ला मिला के बनाये जाथे.

तुकांत के नियम – दोहा के पहिली २ डाँड़ मा दोहा के नियम अउ बाद के ४ डाँड़ मा रोला के नियम के पालन होथे.

हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४ दोहा अउ रोला के नियम अनुसार.

यति / बाधा – दोहा अउ रोला के नियम अनुसार

खास– कुण्डलिया छन्द मा बहुत अकन खास बात हे. येखर सुरुवात माने दोहा वाले पहिली चरन के सुरुवात के सबद या सबद समूह या आगू-पीछू करके सबद समूह ला कुण्डलिया के आखिरी मा माने रोला के ८ वाँ चरन के आखिरी मा आना जरूरी होथे. माने कि कुण्डलिया छन्द के मुड़ी- पूँछी एक्के जइसन होना चाहिए. इही पाय के एला कुण्डलिया कहिथें. अइसे लागथे मानों कोन्हों साँप हर कुण्डली मार के बइठे हे अउ ओखर मुड़ी- पूँछी एक्के बरोबर दिखथे.

कुण्डलिया छन्द के दूसर खासियत ये हे कि दोहा के ४ था चरन हर, रोला के पहिली चरन बने.

हरियर रुखराई कटिस, सहर लील गिन खेत (दोहा के पहिली डाँड़)
देखत हवैं बिनास सब, कब आही जी चेत (दोहा के दूसर डाँड़)
कब आही जी चेत , हवा-पानी बिखहर हे (रोला के पहिली डाँड़)
खातू के भरमार , खेत होवत बंजर हे (रोला के दूसर डाँड़)
रखौ हवा-ला सुद्ध , अऊ पानी-ला फरियर (रोला के तीसर डाँड़)
डारौ गोबर-खाद , रखौ धरती ला हरियर (रोला के चउथा डाँड़)

एमा पहिली दू डाँड़ “दोहा” हे. बाद के चार डाँड़ रोला हे.
दोहा के चउथा चरन “कब आही जी चेत’ रोला के सुरुवात मा आय हे. दोहा के पहिली सबद “हरियर” रोला के आखिर मा आय हे. कुंडलिया के दोहा वाले हिस्सा मा दोहा के नियम लागू होय हे, अउ रोला वाले हिस्सा मा रोला के नियम के पालन होय हे.

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

छन्द के छ : रोला छन्द

मतवार

पछतावै मतवार , पुनस्तर होवै ढिल्ला
भुगतै घर परिवार , सँगेसँग माई-पिल्ला
पइसा खइता होय, मिलै दुख झउहा-झउहाँ
किरिया खा के आज , छोड़ दे दारू-मउहाँ

रोला छन्द

डाँड़ (पद) – ४, ,चरन – ८
तुकांत के नियम – दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा, १ बड़कू या २ नान्हें आवै.
हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४ ,
यति / बाधा – बिसम चरन मा ११ मातरा के बाद अउ सम चरन मा १३ मातरा के बाद यति सबले बढ़िया माने जाथे, रोला के डाँड़ मा १२ बड़कू घला माने गे हे ते पाय के १२ मातरा या १२ ले ज्यादा मातरा मा घला यति हो सकथे. एकर बर कोन्हों बिसेस नियम नइ हे.
खास- डाँड़ मन के आखिर मा १ बड़कू या २ नान्हें आना चाहिए

पहिली डाँड़ (पद)

पछतावै मतवार – पहिली चरन (१+१+२+२)+(१+१+२+१) = ११
पुनस्तर होवै ढिल्ला – दूसर चरन (१+२+१+१)+(२+२)+(२+२) = १३

दूसर डाँड़ (पद)

भुगतै घर परिवार- तीसर चरन (१+१+२)+(१+१)+(१+१+२+१) = ११
सँगेसँग माई-पिल्ला – चउथा चरन (१+२+१+१)+(२+२)+(२+२) = १३

बिसम चरन के आखिर मा पहिली डाँड़ मा (“वार”/ “वार”) माने बड़कू,नान्हें (२,१) अउ सम चरन के आखिर मा दूसर डाँड़ मा बड़कू आय हे.

तुकांत– दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा (ढिल्ला / पिल्ला) आय हे.

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

छन्द के छ : सोरठा छन्द

देवारी

राज करय उजियार, अँधियारी हारय सदा
मया-पिरित के बार, देवारी मा तँय दिया, ||

तरि नरि नाना गाँय , नान नान नोनी मनन,
सबके मन हरसाँय , सुआ-गीत मा नाच के ||
.
सुटुर-सुटुर दिन रेंग, जुगुर-बुगुर दियना जरिस,
आज जुआ के नेंग , जग्गू घर-मा फड़ जमिस ||

arun nigamसोरठा छन्द

डाँड़ (पद) – २, ,चरन – ४
तुकांत के नियम – बिसम-बिसम चरन मा, बड़कू,नान्हें (२,१)
हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४ , बिसम चरन मा मातरा – ११, सम चरन मा मातरा- १३
यति / बाधा – ११, १३ मातरा मा
खास- दोहा के बिल्कुल उलटा होथे सोरठा , सम चरन के सुरु मा के “जगन” मनाही.
सम चरन के आखिर मा सगन, रगन या नगन या नान्हें,बड़कू(१,२)
बिसम चरन के आखिर मा बड़कू,नान्हें (२,१)

पहिली डाँड़ (पद)

राज करय उजियार- बिसम चरन (२+१)+(१+१+१)+(१+१+२+१) = ११
अँधियारी हारय सदा- सम चरन (१+१+२+२)+(२+१+१)+(१+२) = १३

दूसर डाँड़ (पद)

मया-पिरित के बार- बिसम चरन (१+२)+(१+१+१)+(२)+(२+१) = ११
देवारी मा तँय दिया- सम चरन (२+२+२)+(२)+(१+१)+(१+२) = १३

तुकांत– बिसम चरन के आखिर मा (यार /बार) माने बड़कू,नान्हें (२,१) आय हे.

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

छन्द के छ : दोहा छन्द

बिनती

बन्दौं गनपति सरसती, माँगौं किरपा छाँव
ग्यान अकल बुध दान दौ, मँय अड़हा कवि आँव |

जुगत करौ अइसन कुछू, हे गनपति गनराज
सत् सहित मा बूड़ के , सज्जन बने समाज

रुनझुन बीना हाथ मा, बाहन हवे मँजूर
जे सुमिरै माँ सारदा, ग्यान मिलै भरपूर

लाडू मोतीचूर के , खावौ हे गनराज
सबद भाव वरदान मा, हमला देवौ आज

हे सारद हे सरसती , माँगत हौं वरदान
सबल होय छत्तीसगढ़ , भाखा पावै मान

स्वच्छ भारत अभियान

सहर गाँव मैदान – ला, चमचम ले चमकाव
गाँधी जी के सीख – ला , भइया सब अपनाव ||

लख-लख ले अँगना दिखै, चम-चम तीर-तखार
धरौ खराटा बाहरी, आवौ झारा – झार ||

भारत भर – मा चलत हवै , सफई के अभियान
जुरमिल करबो साफ हम , गली खोर खलिहान ||

आफिस रद्दा कोलकी , घर दुकान मैदान
रहैं साफ़ – सुथरा सदा, सफल होय अभियान ||

साफ – सफाई धरम हे , एमा कइसन लाज
रहै देस – मा स्वच्छता, सुग्घर स्वस्थ समाज ||

देसी-बिदेसी

मँय बासी हौं भात के, तँय मैदा के पाव
मँय गुनकारी हौं तभो, तोला मिलथे भाव |

मँय सेवैया-खीर हौं, तँय नूडल- चउमीन
मँय बनथौं परसाद रे, तोला खावैं छीन |

मँय चीला देहात के, मँय भर देथौं पेट
तँय तो खाली चाखना, अंडा के अमलेट |

मँय अंगाकर मस्त हौं, तँय पिज्जा अनमोल
अंदर बाहिर एक मँय , तँय पहिरे हस खोल |

Arun Nigamदोहा छन्द
डाँड़ (पद) – २, ,चरन – ४
तुकांत के नियम – दू-दू डाँड़ के आखिर मा माने सम-सम चरन मा, बड़कू,नान्हें (२,१)
हर डाँड़ मा कुल मातरा – २४ , बिसम चरन मा मातरा – १३, सम चरन मा मातरा- ११
यति / बाधा – १३, ११ मातरा मा , खास- बिसम चरन के सुरु मा जगन मनाही.
बिसम चरन के आखिर मा सगन, रगन या नगन या नान्हें,बड़कू(१,२)
सम चरन के आखिर मा बड़कू,नान्हें (२,१)
पहिली डाँड़ (पद)
बन्दौं गनपति सरसती- बिसम चरन (२+२)+(१+१+१+१)+(१+१+१+२) = १३
माँगौं किरपा छाँव – सम चरन (२+२)+(१+१+२)+(२+१) = ११
दूसर डाँड़ (पद)
ग्यान अकल बुध दान दौ बिसम चरन (२+१)+(१+१+१)+(१+१)+(२+१)+(२) = १३
मँय अड़हा कवि आँव- सम चरन (१+१)+(१+१+२)+(१+१)+(२+१) = ११
बिसम चरन के आखिर मा पहिली डाँड़ मा “रसती” (सगन ११२) अउ सम चरन के आखिर मा दूसर डाँड़ मा “दान दौ” (रगन २१२) आय हे.
तुकांत- दू-दू डाँड़ के आखिर मा (छाँव / आँव) माने सम-सम चरन मा, बड़कू,नान्हें (२,१)

अरुण कुमार निगम
एच.आई.जी. १ / २४
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़