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जस गीत – काली खप्परवाली

काली खप्परवाली आगे ,काली खप्परवाली
लप लप लप जीभ लमावत, रूप धरे विकराली

सब दानव ल मरत देख के, शुम्भ निषुम्भ गुस्सागे
चंड मुंड कहाँ हौ कहिके , जल्दी तीर म बलाए
जावव पकड़ के तुम दुर्गा ल , लावव मोर आगू म
साम दाम अउ दंड भेद से , ले आहू काबू म
सीधा सीधा नइ आही त , बाल पकड़ के खीचैं
नइच मानही तुरते ओकर , लहू बोहाहू लाली

शेर उपर बइठे हे माता , अउ मुच मुच मुसकावय
ओतके बेरा चंड मुंड हॅ , सेना लेके आवय
चंड मुंड आए देख के , माता हँ गुस्सागे
आँखी होगे लाल लाल अउ , देह सबो करियागे
घपटे बादर सहीं केस ल , खोल जमो छितरादिस
मुड़ी मुड़ी के माला पहिरे , परगट भइगे काली

काट काट के दानव ल , काली खप्पर म जलावै
काट के मुड़ी खून पियै , कतको ल कच्चा खावै
हाहाकार मचे दानव म, सब चिल्लावत भागे
दानव मन के हाल देखके , चंड मुंड खिसियागे
गुस्सा के मारे थर थर काँपत , काली कोती दउड़िस
चंड मुंड ल दउड़त आवत , देखत हावय काली

चंड मुंड अउ काली के बीच , जम के होथे लड़ाई
काँपे लागिस धरती अंबर , खून के नदी बोहाई
महा मयावी चंड मुंड , छिन म धरती अकासा
खडग चलिस जब माँ काली के, उंकर पलट गे पासा
दउँड़ा दउँड़ा के जब मारिस , काल घलो थर्रागे
चंड मुंड के सिर काट के नाचे लागिस काली

धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346

गजल : दिन कइसन अच्छा

दिन कइसन अच्छा आ गे जी।
मरहा खुरहा पोक्खा गे जी ।।
बस्ती बस्ती उजार कुंदरा
महल अटारी तना गे जी ।।
पारै हाँका हाँसौ कठल के
सिसका सिसका रोवा गे जी ।।
पीए बर सिखो के हमला
अपन सफ्फा खा गे जी।।
हमला देखावै दरपन उन
मुँह जिन्कर करिया गे जी ।।
कोन ल इहां कहिबे का तै
जम्मो अपनेच लागे जी ।।
बाते भर हे उज्जर निर्मल
तन मन मुँह बस्सागे जी ।।

धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346

छत्‍तीसगढ़ी हाईकुु संग्रह – निर्मल हाईकुु

रचना कोनो बिधा के होवय रचयिता के अपन विचार होथे। मैं चाहथौं के मोर मन के बात लोगन तीर सोझे सोझ पहुंचय। चाहे उनला बदरा लागय के पोठ। लोगन कहिथे के भूमिका लेखक के छाप हँ किताब ऊपर परथे। अइसन छापा ले कम से कम ए किताब ल बचाके राखे के उदीम करे हौं। कोनो भी रचनाकार जेन देखथे, सुनथे, अनभो करथे उही ल लिखथे। एकर मतलब मनखे के अलावा बहुत अकन जीव जिनावर अऊ परिस्थिति घलो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रचना लेखन म प्रेरित करके यथायोग्य अपन अपन योगदान दिये रहिथे।
मैं कोनो-कोनो के नाम लिखके सबे कोनो जिन्कर नाम छूट परही उन ला निरास नइ करके संसार के समस्त चर-अचर जीव रचना खातिर प्रेरक, सहयोगी
जान-मानके सादर प्रणाम करत हुए सबो के आभार मानत हौं।
आपके
धर्मेन्‍द्र निर्मल

मोर गाँव के बिहाव

नेवता हे आव चले आव
मोर गाँव के होवथे बिहाव।

घूम घूम के बादर ह गुदुम बजाथे
मेचका भिंदोल मिल दफड़ा बजाथे
रूख राई हरमुनिया कस सरसराथे
झिंगुरा मन मोहरी ल सुर म मिलाथे
टिटही मंगावथे टीमकी ल लाव।।1।।
असढ़िया हीरो होण्डा स्प्लेण्डर म चढ़थे
मटमटहा ढोड़िहा अबड़ डांस करथे
भरमाहा पीटपीटी बाई के पाछू घुमथे
घुरघुरहा मुढ़ेरी बिला ले गुनथे
चोरहा सरदंगिया डोमी खोजै दांव।।2।।
बाम्हन चिरई मन बने हे सुहासीन
अंगना परछी भर चोरबीर चोरबीर नाचीन
कौंआ चुलमाटी दंतेला बलाथे
झुरमुट ले बनकुकरी भड़ौनी गाथे
झूमै कुकरी कुकरा छोड़ौं का खांव।।3।।
रउतीन कीरा मन बैठक म गोठियाथे
परगोतिया मन हॅ अपनेच ल बलाथे
रंग रंग के कीरा सम्हर सम्हर आगे
ठउका बेर बत्तर के नाव बुझागे
जुटहा माछी मन ल मैं का बतांव।। 4।।
केकरा गाड़ी रोकै हाथ ल हलावै
चांटीमन चढ़े बर लाइन लगावै
अतलंगहा बड़े माछी चिमट के भागे
गुस्सेलहा बिच्छी हॅ देथे घुमाके
मंसा कहय सुन कहानी सुनांव।।5।।
परिया कुंवारी के तन ह हरियागे
रेटही बूढ़िया झोरी मन ह फुन्नागे
मेंड़ संग पानी ह खेलै बितांगी
टीप खेलै कोतरी अऊ डेमचुल सरांगी
पूछै मेछरिया मुसकेनी महुं आंव।।6।।
नांगर बैला मन अखाड़ा देखावै
हरदाही खेले बर चिखला बलावै
भैंसी भैंसा मन ह हरदी चुपरावथे
चमकुलिया बिजली ह फोटू उतारथे
खाना हे लाडू चलो ताली बजाव।।7।।
बारी बेला मन ह मंड़वा सजावथे
तितली फांफा मन ह लइका खेलावथे
पंड़की अऊ पंड़का पगरइत पगरइतीन
गांठे जोराये हे नइ छूटय गउकीन
सलहई मन परिया म भजिया बनांव।।8।।
जिमिकांदा ऐंठै मुद्गर निकाल के
कांदी कोला चुप झांकै उघार के
डर के मारे बेरा कती लुकागे
अब्बड़ तो तपे हे अब पसिनयागे
अंटियावय गेंगरूवा खाके पुलाव।।9।।

धर्मेन्द्र निर्मल
ग्राम व पोस्ट कुरूद भिलाई
मोबाईल नं. 9406096346



छत्तिसगढि़हा कबि कलाकार

पानी हॅ जिनगी के साक्षात स्वरूप ये। जीवन जगत बर अमृत ये। पानी हँ सुग्घर धार के रूप धरे बरोबर जघा म चुपचाप बहत चले जाथे। जिहाँ उतार-चढ़ाव, उबड़-खाबड़ होथे पानी कलबलाय लगथे। कलकलाय लगथे। माने पानी अपन दुःख पीरा, अनभो अनुमान अउ उछाह उमंग ल कलकल-कलकल के ध्वनि ले व्यक्त करथे। पानी के ये कलकल- कलकल ध्वनि हँ ओकर अविचल जीवटता, सात्विक अविरलता अऊ अनवरत प्रवाहमयता के उत्कट आकांक्षा ल प्रदर्सित करथे। ओइसने मनखे तको अपन सुख-दुख ल, अंतस के हाव भाव ल गा-गुनगुना के व्यक्त करथे। वोहँ अपन एकांत म जिनगी के पीरा अऊ उमंग ल गुनगुनाथे जेला मानव समाज संगीत कहिथे।
धान के कटोरा हमर छत्तीसगढ़ हँ गीत अऊ संगीत के अथाह-अपार सागर म उबुक-चुबुक हे। इहाँ कोनो किसम के खानी नइहे बल्कि छत्तीसगढ़ ल कहूँ कला संस्कृति अउ गीत संगीत के अगम दाहरा कहे जाही त कोनो किसम के अतिशयोक्ति नइ होही। कला अऊ संस्कृति हँ छत्तीसगढ़ के नस नस म लहू बनके दउँड़त हे। येह एकर संस्कार बन गे हे। जेन आज छत्तीसगढ़ के लोकगाथा अऊ लोकगीत बनके जन-जन म बगरे हे। सुआ, करमा, ददरिया, चंदैनी, पंडवानी, भरथरी ये सब गीत संगीत के विभिन्न रूप हरे।
ये हँ अभी के बात नोहय। कला अउ संस्कृति के धार हँ आदम जुग ले धरती म प्रवाहित होवत चले आवत हे। तभे आजो घलो दुर्गम जंगल भीतरी ले आदिवासी गीत-संगीत सुने बर मिल जथे। संगीत हँ मनखे के मन ल झूमे बर मजबूर कर देथे।
संगीत हँ मन के अतल गहराई म उतर जथे। ओला भींजो भींगो डारथे। अपन रंग म चोरो बोरो कर डारथे। तभे तो मनखे संगीत ल सुनते ही झूमे लगथे। ओकरे सेती संगीत ल साधना माने गे हे। एक समे तानसेन हँ बादर ल बरसे बर मजबूर कर दे रिहिसे। ए हँ संगीत ल साधना अउ साधक के शक्ति के रूप म प्रमाणित करथे। माने साधक, शक्ति अउ साधना के त्रिवेणी स्वरूप ही संगीत हरे।
साधना मँ शक्ति समाहित रहिथे। उही शक्ति के असर के कारण मनखे का देवता घलो झूमे लगथे। कहिथे भगवान भाव के भूखे होथे। सुरमयी संगीत म शक्ति अउ साधना के इही भाव हँ अंतर्निहित होथे।




भाव हँ जइसे देखावा तड़क भड़क ले दूर रहिथे। ओइसने संगीत ल घलो देखावा अऊ तड़क-भड़क हँ फूटे आँखी नइ सुहावय। फेर आजकल देखे बर मिलथे के संगीत के नाम म देखावा, तड़क-भड़क अऊ फूहड़ता के प्रदर्सन जादा होय लगे हे। एक समे रिहिसे जब संगीत हँ कान के रस्ता मन म उतर के तन ल झूमा देवय। अब ओइसन बात नइ रहिगे। अब संगीत के नाम म फुहड़ता बिके लगे हे। अब अइसे होगे हे कि संगीत चालू होईस अऊ अड़म-गड़म नाच कूद। संगीत बंद होइस, के भूला जा। जबकि संगीत के सार्थकता उही म हे जेला सुनके मन झूमय नाचय तन भर नहीं। असल संगीत तनमन दूनों म रच बस जाथे। अमिट छाप छोड़ जाथे। जेन हॅ बेरा कुबेरा अकेला दुकेल्ला में अंतस ले फूट परथे। जेला हम दुख या सुख के बेरा गुनगुनाए लगथन।
संगीत के नाँव म अब हवस के प्रदर्सन होय लगे हे। माने आजकाल संगीत हँ हवस के पर्यायवाची होगे हवय। पश्चिमी सभ्यता के फुहार, आधुनिकीकरण के बौछार अऊ गूगलबाबा के गुजगुजिया व्यवहार के चलते आज संगीत घलो अपन रद्दा ले भटक गे हे। एकर ऊपर कुसंस्कृति के प्रभाव परे लगे हे।
लोगन कहिथे के जमाना बदल गे हे। जमाना नइ बदले हे। सोंच बदल गे हे। हमला अपन सोंच ल बदले के जरूरत हवय। आजकाल संगीत के नाँव म सोर सुने बर मिलथे। जबकि संगीत म सोर बर थोरको जघा नइ होवय। अऊ जघा रहना भी नई चाही। सबके अपन अपन मरजाद होथे। अऊ मरजाद म रहिके कुछू चीज के मरजाद बांचथे। जइसे मरजाद मे रही के ही राम मर्यादा पुरूषोत्तम होईस।
छत्तीसगढ़ में अइसे-अइसे जोरदार अऊ असरदार गीत संगीत हे जे हँ मन म उतर जथे अऊ भींजो के चोरोबोरो कर डारथे। फेर देखे बर मिलथे के इन मन छत्तीसगढ़ के सीमा ल लांघ के अऊ दीगर प्रांत म सुने बर नइ मिलय ए हँ एक ठो गंभीर अऊ सोंचे के बूता हरे। छत्तीसगढ़ म ही कई ठो दीगर प्रांत, बोली, भाखा के गीत हँ बेधड़क घुसर के इंहाँ ऊँहा सोर मचावत हे। रंगझांझर मचावत हे। इन ल सुनके हमर गीत संगीत गँवा गे हे अइसे लगथे। जबकि ओइसन बात नइ हे। एकर पाछू हमर मानसिकता, हमर कमजोरी हँ जुवाबदार हे। एकर मतलब हमी कमजोर हवन। हम कहूँ भी जावन त अपन भाखा ल बोले बर लजाथन। अपन प्रांत के गीत संगीत ल सुनेबर सकुचाथन, दूसर बोली भाखा के गीत ल सुन के भले झूम नाच लेवन। ओतका बेरा वो बेंदरा नाच म हमला लाज नइ लागय। एकर ले इही मतलब निकलथे के हम आजकल देखावा करे लगे हवन। देखावा उही मन करथे जेमन सही बात ल नइ जानय। नइ समझय। जइसे थोथा चना बाजे घना।




अइसे नइहे के इंहा कोनो किसिम के कमी हे। कमी थोरको नइहे बल्कि ये सब हमर कमजोरी हरे। कहूँ अइसन कमी कमजोरी होतिस त सास गारी देवय ननंद मुंहू लेवय गीत म बंबई के संगे संग पूरा भारत नइ झूमतिस। टूरा नइ जानय रे नई जानय सहीं गीत के होंठ ल कोनो होटल-बार नई चुमतिस।
आज कपड़ा फेंक के नंग धडंग नचइया के देखइया, सुनैया सबो होगे हे। उन्करे मान सम्मान तको होवत हे। बहकत समाज अउ बरगलैया राज म जम्मो प्रमाण पुरूस्कार इही फूहड़ अउ लंपटमन के ओली म जावत हे। फूल अउ पान के कोनो चिनहार नइ रहिगे हे। जउन जेने डारा ल अमर पावत हे उही ल बुरच बुरचके खाए परे हे। कर्नप्रिय संगीत तइहा के बात होए लगे हे। एकर जुमेदार हमर संस्कार हे। हम ओइसने संस्कार म पलत-जीयत हन अऊ भविस ल उही संस्कार देवत तको हवन।
पीछू एक ठन अऊ जबर कारण देखे बर मिलथे के हमार संस्कृति अऊ समाज के ठेकेदार मन खुदे नई चाहय के हमर संस्कृति, गीत, संगीत देसराज के सीमा ल लांघ के अपन परचम लहरावय। उन ल सिरिफ अऊ सिरिफ पइसा चाही। जेन प्लास्टिक के कैसेट जतका बिक जाय उही असली संगीत हरे। जेन केसेट ले हम जादा से जादा पइसा रपोट सकन उही असली संगीत हरे। संस्कृति अऊ गीत संगीत के ठेकेदार बने बइठे परदेसिया मन ल छत्तीसगढ़ से कोनो मतलब नइ हे। न ही उन ल इहाँ के संस्कृति अऊ संस्कार से मतलब हे। उन तो कमाए रपोटे बर ही इहाँ डेरा डारे हावय त काबर इहाँ के संस्कृति ल आगू बढ़ाही। ओकरे सेती उन छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के नारा निकाले हे। जेन नारा म उन छत्तीसगढ़िया मन ल बाँध-छाँद के इहाँ के धन-दोगानी ल लूट सकय।
इहाँ के बयपारी मन छत्तीसगढ़ी गीत संगीत ल आगू बढ़ाही या एकर बिस्तार करही त बाहिर के कला पारखी मन इहां के कलाकार, गीत संगीत ल पूछे-परखे लग जाही। जब अइसन होही त इहाँ के कलाकार मन के पूछ परख बाहिर म बाढ़े लगही। अइसन स्थिति म इन बयपारी मन के गुलाम कोन कलाकार रहिही। बस इही सोंच हर इहां के गीत संगीत ल आगू नइ बढ़ावत हे। उन सिरिफ कमावत हे। दूहत हे।
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया नारा हँ हमर लड़ई नोहय। बल्कि हमर मंघार म जबर ठोसरा हरे। जेला मारके उन मीठलबरा मन हमन ल चुप करा सकय अऊ जतेक हो सकय कमा -लूट सकय।
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया के मतलब इहाँ के मनखे बढ़िया हे जेन दबे रहि सकथे। अपन हक बर नइ बोल सकय। इहाँ के माहौल बढ़िया हे जेमा बाहिर ले गैर कानूनी काम करके लुकाए-छिपे रहि सकथन। इहाँ प्राकृतिक सम्पदा भरपूर मात्रा म हे जेला बाहिर म बेंच के हम जादा ले जादा पइसा कमा सकथन, ए नारा के पीछू इंकर इही नीयतखोरी उजागर होथे।
ए नीयत ल अब हमला पहिचान के फरियाए बर परही। ए नारा के ठोसरा ल उलटा उंकरे मंघार म मारे बर परही। अपन हक मरजाद खातिर मुँह उचाके जुवाब देबर परही। हमला अब दब के नइ रहना हे। बल्कि आँखी ल उघार के चारो मुड़ा देखे परखे बर परही अऊ साबधान रहे बर परही। तभे हमर संस्कृति बांचही। हमर छत्तीसगढ़ बांचही। हमर भविष्य बांचही।

छत्तिसगढि़हा कबि कलाकार सुक्खा के दीया के बाती।
बरसिस बादर चुहिस चार दिन मुंह फारे ओरवाती।।

सीधवा मरगे ददा भाई म जेने जइसन पाइन जोतिन।
काम सिरागे दुख बिसरागे नीचो निमउ कस छेछरा फेकिन।।
ये बीता भर पेट के खातिर उमर पहागे छोलत छाती। …

पइसा सबले बड़े मदारी जस पा ले गा के चटुकारी।
कतको झिन बंदूके म सटक गे कोनो सुरा सुंदरी के दुवारी।।
ओगरत झिरिया ल पाट डरिन रहिगे धरे कला के थाती। ……

हरेक गांव म चार पांच झिन मिल जाही जी कबि कलाकार।
साधन संगी संगत नइहे दिन पहावथे घूमत खार।।
निकल परिस त चिन्हैया नइहे मॅंजइया मन होगे घाती। ……

चुहत पसीना घाम पियास म गोबरहिन हे जतका सुग्घर।
ओतका ओग्गर हीरवइन नइ होय पोते पावडर उपर पावडर।।
भइगे परदा म नकल उतारथे बिहिनिया सांझ पहाती। ……

– धर्मेन्द्र निर्मल
ग्राम व पोस्ट कुरूद भिलाई
मोबाईल नं. 9406096346



मोर गाँव ले गँवई गँवागे

मोर गाँव ले गँवई गँवागे
बटकी के बासी खवई गँवागे
मुड़ ले उड़ागे पागा खुमरी
पाँव ले पनही भँदई गँवागे

सुग्घर दाई बबा के कहिनी
सुनन जुरमिल भाई बहिनी
करमा सुआ खोखो फुगड़ी
लइकन के खुडवई गँवागे

खाके चीला अँगाकर फरा
जोतै नाँगर तता अरा रा
दूध कसेली खौंड़ी म चूरै
मही के लेवना लेवई गँवागे

आगे मोबाइल टीबी पसरगे
राग सुमत ल सबो बिसरगे
तीज तिहार म घर घर घुम घुम
ठेठरी खुरमी खवई गँवागे

करधन एैंठी खिनवा पहुँची
फँुदरी माहुर बोहागे गऊकी
लीखपोहना अउ ककवा ले मुड़ के
जुँवा हेरई लीख पोहई गँवागे

सगा सोदर बर लोटा म पानी
निकल जुड़ावय गुरतुर बानी
माते गुटका मंजन मंद म
पान सुपारी खवई गँवागे

गाड़ा बइला ढेलवा रचुली
गोरधन गंगाजल अउ भोजली
केंवट काँदा भक्का लाड़ू
खावत मेला मँड़ई गँवागे

धान कटोरा मोर छत्तीसगढ़
बमलाई महामाई के गढ़
तपोभूमि चंपारण सिहावा
राम के ममा गँवई सँवागे

धर्मेन्‍द्र निर्मल

व्‍यंग्‍य : बवइन के परसादे

कोनो भी बाबा के सफलता के पछीत म कोर्ह न कोई बवइन के पलौंदी जरूर होथें। मैं अपन चोरी चमारी के रचना सुना सुनाके तीर तखार के गाॅव म प्रसिध्द होगे हौं। फेर घर म जोगडा के जोगड़ा हौं। उही चिटियाहा चड्डी बनीयइन, बिन साबुन तेल के खउराहा उखराहा हाथ गोड़। चिथियाए बगरे भुरूवा भुरूवा बड़े बड़े चुंदी। गर म कुकुर के पट्टा कस ओरमे मोहनजोदड़ो युग के टेटकू मोबाइल। उहू मोबाइल के स्क्रीन टूटहा हे। उपरौनी म ओकर पछीत के ढकना टूटहा। जेला मैं रंगीन रब्बड़ में लपेट के नवा जमाना नवा फेसन के हिसाब से नवा लुक दे दिए हौ। एला भले कोनो मोर कंजूसी कहि लै फेर मै रिस्ता अउ जुबान के पक्का हौं। बवइन संग सात फेरा लेके गाॅठ बाॅधे हौ। अब ले बिना नागा, बिना कोनो सिकवा सिकायत के इमानदारी के साथ निभावत हौं। अब इमानदारी के प्रतिसत हे वोला निष्चित नइ बता सकौं। चाहे जइसे भी निभै फेर अपन होके संग नइ छोड़त हौ। वइसनेहे मोर मया लगन बंधना अउ जुराव मोबाइल संग हे। ए मोर बैसुरहा बरन रूप के देखे मोर बवइन ह कभू मोर संग घर ले बाहिर नह गिस। मैं जब भी घर ले निकलेंव बैसाखी के भरोसा निकलेंव। अउ जब तक बाहिर रेहेंव बैसाखीच् के सहारा समें गुजारेव। बैसाखी के भरोसा जिनगी बितइया मही भर नइ हौ। इहाँ तो मोर ले बढ़के कतको अनलेख अपाहिज हे। जिंकर मानसिकता अउ संस्कार हॅ मोरो ले हजार गुना गए बीते हे। अइसन स्थिति म यहा बाजारवाद के युग म गली गली ओन्टा कोन्टा म बैसाखी के दुकान बिन खोजे मिल जथे। अइसे मोर प्रसिध्दि के भरोसा बाहिर म मोर बर कतखो बैसाखी फोकट म खड़े रहिथे।




एक दिन मैं कविता पाठ करके मुरझुराए लड़खड़ावत लहुटेंव। बवइन घरके मुहाटी म अँड़ियाए डांसिंग इस्टाइल म डोलत ठाड़े राहय। मैं सटर पटर करत घुसरते रहेव। वोह बीचे म टाँग ल अँड़ा दिस। तीस मन वजनी अपन कमर कम कमरा जादा ल मटकावत कहिस – ए कवि महोदय। चाहा पीबे का ? मैं सदादिन ओकर काँव काँव ल डीजे साउण्ड म सुने टकराहा रहव। आज ओकर प्योर कोइला कस कोइली तन ले मदरस झरत मीठ तान सुनके चकरित खागेंव। कोन जनी ये चाहा पियाके का निचोना चाहत हे। मैं मुँह ल खोलके मयाके कुछ बोल गोठिया पातेंव तेकर पहिली मोर चुटइया खड़ा होगे। मोला चेतावनी देवत कहिस। देख निर्मल बाबा ! बवइन के मन म अपन बाबा बर कतको मया उमड़य फेर बरसथे तभे जब उनला कुछ मतलब रहिथे। सम्हल जा बेटा। या तो कुछु जोरदरहा माँग होही। या कुछु सच उगलवाना चाहत होही जेला तैं आज तक एकर ले दबाए चपके बइठे हस। कारण कुछु होवय कुल मिलाके आज तोर पुजई हे जान। जइसे बोकरा के बलि देहेके पहिली पूजा पचिस्टा करे जाथे। ओइसने अभी तोर उपर फूल पान के बरसा होवत हे।
मोर कान ठड़ियागे। नाक ले सैंफो सैंफो के मधुर धुन गुँजे लागिस। मैं अपन बाहिरी दिनचर्या ल तीन सौ साठ डिग्री घुमाके देखे लगेंव। फूटहा याददास्त के सीसी टीेवी म कतको फूटेज खंगालेंव। मोर भकुवाय बुध के सुरता के कैमरा म एको ठिन फूटेज नइ मिलिस। मैं मने मन गुने लगेंव। कहूँ मोर बैसाखी वाले बात ….. । तभे वोह अपन छै इंची होंठ ले अचानक अठ्ठारा इंच के इस्माइल फेंकिस। अउ कहिस – सुन ! ए काय तैं टेटकू मोबाइल ल घेंच म ओरमाए टेटका कस मुड़ी हला हला के गोठियावत रहिथस। ओकर अतका गोठ ल सुनके कैसिनो के चकरी कस भन्नाटी घूमत मोर आँखी सट ले थमगे। मैं मरमलोक अउ परमलोक के बीच भरमलोक म ओरमे हालत ढोलत फिफ्टी फिफ्टी के मीठ अमटाहा पीपरमेंट ल चुचरत रेहेव। ओकर पतिव्रत धरम के प्रभाव से आज मैं यमराज के फाँदा ले बाइज्जत बरी होगेंव। पहिली तो ससन भर साँस लेके अपन आप ल सोझियाएंव। फेर अपन मुरझुराए छाती ल तनियाके छप्पन इंच करेंव। चाहा के चुलूक भीतरे भीतर फूट के गोद गोद गोद गोद झरे लागिस। छत्तीस इंची चाइना माॅडल मुस्कान के साथ मुँह म लार अउ आँखी म प्यार भरे निवेदन करेंव के थोरिक फरिहा के गोठियाते त मैं कुछ समझ पातेंव प्राण प्रिये। वो अपन मन के गोठ प्रसारित करके हर बात ल भंगभंगले उघार के रख दिस। कहिस तै मंदहा ठेठवार के पूरति नइ हस। वोह बने असन टच स्कीन वाला मोबाईल ले डारे हावय। काली ठेठवारिन अपन मइके वाले मन संग अबड़ हाँस हाँस के गोठियावत रिहिसे। मैं फट्टे समझ गेंव के फिट्टे मुँहवाली ठेठवारिन के हाँसी हँ बवइन के खाँसी होए हे। बवइन अउ फटकारिस -एक तैं हस। जइसने तैं खसुवाहा ओइसने तोर मोबाइल।




मैं मंहगाई के तोपना म ढांकत अपन कंजूसी के रोना रोवत कहेंव – टच स्कीन वाले मोबाइल कतेक म आथे जानथस। अब मुँह मिटकाए के पारी ओकर राहय। ए बात ल बोलत अपन खाँध अउ थोथना ल जतका गिराए रहेंव ओकर ले दुगुना वोह अपन खाँध ल उचकावत पूछिस – कतेक म आ जथे ? मैं कहेंव कम से कम 5000 म आथे। वो तुरते ममता ले मायाबती होगे। कहिथे – न कलम घिसे बर न कागज रंगे बर। फोकट के चोरी चकारी के कविता मंच मंच म सुनावत रहिथस। आयोजक मन लिफाफा म का ताली भर ल भर के देवत होही। तनखा के पइसा उपराहा। सब कहां जाथे। मैं कहिते रेहेव देख भाई – मोबाइल कइसनो राहय गोठ बात तो होथे न ……….. वो अधबीच्चे म टेलर कस कैंची रेंगा के मोर बात ल चर्र…… के चीर दिस। मैं कुछु नइ देखौं जानौं। अतेक दिन ले देखतेच तो आवत हौं। न रंग के न ढंग के। तोर बाहिर भीतर सब ल समझथौ मैं। मोर मेर तै फोकटे फोकट जुच्छा हाथ ल मत हला। जभे तैं टच मोबाइल लाबे तभे मोला टच करबे। नइते आज ले तैं मोर मया के कवरेज क्षेत्र से बाहर। अउ मुँह ल तुत ले कर 360 डिगरी घूम के खड़ा होगे। नारी ले तो दुनिया हारी। मैं कोन भर्री के मुरई औ जेन जीत जहू। ओकर जिद के ठेंगा अइसे परिस के मोर बुध मोला ठेंगा देखा के रेंग दिस। जानो मानो सरकारी अस्पताल म आँखी के आॅपरेसन कराये कस मोर आगू म अंधियारी छागे।




बिहान भर बवइन मोर पेंट के जेब ले टमर टमर के सकेले 7000 रूपिया अपन अंटी ले निकाल के मोर मुॅह म मार दिस। एक मंच के तीन हजार मै पूरो के झखमारी 10000 वाला टच मोबाइल लाएव। तब जाके मोला स्क्रीन टच अउ स्कीन टच के दोहरा, तीहरा, गदगद ले फायदा मिलिस। सब ले पहिली आंखी ल मिटका मिटका के, मुंह ल पेचका पेचका के, टेड़ेग बेड़ेग खड़ा होके, बइठके, अंइठके, सुतके, उलण्डके, घोलंडके, तेकर पाछू लपटके, सपटके डपटके सेल्फी लेन। जी जुड़ालिस तभे छोड़ेन। अब मैं मोहन जोदड़ो युग के टेटकू मोबाइल वाला नइ रेहेंव। इक्कीसवी सदी के फेसबुकिया शायर होगे हौं। मै अपन नाम ’निर्बल बाबा’ के संग उपनाम “महाकवि” लिखे लगे हौं। सब बवइन के परसादे बाबा जी।

धर्मेंद्र निर्मल
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कहानी : मंतर

अहिल्या हॅं दुये चार कौंरा भात ल खाये रिहिस होही। ओतकेच बेरा परमिला झरफिर झरफिर करत आइस । ओरवाती के खालहे म बैठ गे। अहिल्या देखते साथ समझ गे। परमिला हॅ आज फेर अपन बेटा -बहू संग दू -चार बात कहा -सुनी होके आवत हे। अहिल्या परमिला के नस -नस ल टमर डारे हवय। जब कभू परमिला बेरा -कुबेरा अहिल्या घर आथे। थोथना फूले रहिथे। मुड़ी -चुंदी बही बरन छरियाये रहिथे। मार गोटारन कस बड़े -बड़े आॅखी ल नटेरत ,परेतीन बानी अपने अपन बुड़ुर- बुडुर करे लागथे त अहिल्या फट्ट ले जान डारथे के परमिला काकरो संग होवय लड़ झगड़ के आवत हे। आखिर परोसीन होथे। संग लगाती ससुरार आये हे। घर के मुहाटी जुरे हे। संगे रेगत हे। संगे संग उठत -बइठत हे । एके मुॅह म खावत हे एके कूला म हागत हे त का ओतको ल नइ समझही। जब कभू अइसन बात होथे त परमिला ल बइठे बर कहे ल नइ लागय। वोह खुदे हाथ- गोड़ ल लमा -पसार के बइठ जाथे अउ पसरा बगराके सुनाय लगथे। अपन राम कहानी ल। बिन संदर्भ बिन प्रसंग के । पूछे- पाछे के कोनो नेेंगे नइ राखय । आजो वोइसने होइस।

अहिल्या अॅंचोते -अॅचोवत गोठ के मुहतुर करिस -का साग खाए हस दीदी ?

हारन के बाजत भर के देरी रिहिस हे। भइगे ताहेन का पूछत हस। परमिला के रेलगाड़ी पोंपियावत छुकछुक करत दउड़े लगिस – अइ ….. का खवइ – पीयइ ल पूछथस बहिनी। खाये हवन तभो लाॅघन। नइ खाये हवन तभो लाॅंघन। अतका कहिके परमिला अपने अपन करू करू करे लगिस । मुड़ म हाथ ल रखके अनते कुती मुॅह ल करके अॅंइठत बइठ गे। जना मना अहिल्ये संग अनबन होगे हावय तइसे। मुड़ ल गड़ियायेे भीतरे भीतर आॅखी ल कनखियाके देख तको डारिस के अहिल्या हॅ कुछू बोलत हे के नही ।




अहिल्या के मुॅह उले के उले रही गे , अपने ह फेर हाथ ल झर्रावत केहे लागिस – हरहिंसा खाबे तेला खवइ कहिथे अउ उही हॅ अंग लागथे । हरहर – कटकट म काय सिध परही ।

अइ का होगेे परमिला आज कइसन गुसिया गे हावस वो ? गॅंुझियाये गाॅंठ परे फूचरा ल फरियावत अहिल्या हॅ पूछिस।

हालेके अहिल्या जानत हे के परमिला हॅ बिगर पूछे सबो बात ल उछरही । ओकर पेट म काॅही बातर नइ पचय। छेरी के मॅंुह त परमिला के मॅुह एके जान। तभो ले परमिला ल घलो तो अइसे लगना चाही के अहिल्या हॅ ओकर दुख-पीरा ल समझत – सरेखत हावय। अहिल्या के बात ह अभीन सिरायच नइ रिहिस हे –
काला बताबे ….एक ठन राहय तेला बतावॅव इहाॅं तो….. अइसे काहत परमिला फेर थोथना ल ओरमा दिस।

बइला ल धूरा पटकत देखके जइसे किसान के जी बमक जाथे तइसे कस परमिला के ओरमत थोथना ल देखके अहिल्या के जी हो गे रिहिस हे। फेर मन ल मारके उपरसाॅंसी लेवत कहिस – का करबे दीदी जिंहा चार ठन बरतन- भॅंड़वा मिलथे तिंहा ठिनिन -ठानन तो होबे करथे………..

परमिला बीचे म बात काटत कहिस -तभ्भो ले ,तभो ले। हमर घर तो बहुतेच हे। ………कुच्छूच बात नोहय।
हाथ ल झर्रारत आगू कहिस – ओकर जउंहर होवय नाती टूरा हॅं अपन ददा संग खाए बर बइठे रिहिसे। घेरी भेरी अपन दाइ जघा -आलू दे ! आलू दे कहिके माॅगय ।

ओकर आलू मॅंगइ ल देखके मही हॅ कहि परेंव – अइ आलू दे दे न वो कब के आलू आलू रटन धरे हे। ओकर थारी म भाॅटे -भाॅटा दिखत हे अउ मोर म आलूच- आलू ल भर दे हस। पीलखाहा निपोर हॅ मीठावत हे न काॅंही।
परमिला हाथ ल हला -हलाके आॅखी ल मटकावत तो गोठियाते रिहिस हे। अब मुॅह ल घलो दू बीता फार दिस अउ कहिस – हाय राम ! बहू के जबान ल तो देख , मोरे बर बघवा कस बरनियागे बाइ । मोही ल कहे लगिस -मैं छाॅंट छाॅंटकेे परोसत हॅंव का ? फोकटे फोकट मोर उपर लाॅंछन लगावत हस।

अब परमिला अपन औकात म आ गे। दाॅत ल पीसत , थूॅक ल छटकारत उल्टा अहिल्या ल पूछे लगिस -अब बता तैं भला ? अपन दाइ ददा ल अइसने जुवाब देवत रिहिस होही ?…… उहू टूरा के चाल ल तो देख। ओकरे आघू म अतेक बड़ बात होगे फेर एक भाखा बहू ल नइ बरजे सकिस। तैं कालेचुप राहा वो। दाई हॅ बने काहत हे। अतका तो कहि सकत रहिस हे। फेर काबर बोलय -ओला तो मोहनी- थोपनी देके मोह डारे हे राॅंडी़ कलजगरी हॅं।
…………………………. ।




आज ओकर ससुर जीयत रहितिस त का होतिस जानथस ?’’बखेड़ा खड़ा हो जातिस बखेड़ा’’ परमिला खुदे सवाल करथे अउ खुदे जुवाब देथे। अहिल्या कभू मुड़ी ल डोलावय। कभू हॅू -हॅू काहय। त कभू मुॅह ल ’’चक-चक’’ बजा देवय। जइसे जम्मो के जम्मो बिपत हॅ ओकरे मुॅड़ म आके खपला गे हे।

थोरिक थिराके परमिला के एक्सप्रेस फेर दउड़े लागिस। कहिस – मोर चलतिस त मैं एकर कदाप मुॅह नइ देखतेंव वो। कहाॅं कहाॅं के नीच घरायन म बिहा परेन। मै पचासो पइत ओकर ददा ल बरजे हौं। आरा -पारा , तीर -तखार ल बने पूछ -गौछके ,देख- परखके माॅगबे न कहिके। उहू मुड़पेलवा हॅं अपनेच मन के करिस। उहेंच जाके झपाइस। मोर एको नइ चलन दिस । अपन हॅ तो जुड़ा सितरा के बनौका ल बना लिस। मैं हॅ फाॅदा म परगेंव ।

उही होइस जेकर अनमान अहिल्या ल पहिलीच ले रहिस हे। गोठियाते -गोठियावत परमिला बोमफार के रोये लगिस। रोवत -रोवत परमिला अपन जम्मो पुरखाके सबो गुनदोस ल फलफल -फलफल बाॅच के ओसा तको डारिस। ले दे के सांत होइस तब जाके अहिल्या के जी जुड़ाइस।

अहिल्या जानथे के बात ल बतगंड़ बनाये के परमिला के आदतेच हे। तभो ले ओकर खाॅध म हाथ ल मड़ाके सहिलावत कहिथे – आजकाल के बहू मन ल का कहिबे बहिनी। कहिबे तेनो अनभल हे। नइ कहिबे तेनो अनभल ।




परमिला ल लागे लगिस के अहिल्या हॅ घलो मोर दुख म बियाकुल हे। ओकर ताव थोरिक जुड़ाय लगिस । जम्मो भड़ास निकल गे। मुड़ी ल नवाये सोचे लगिस। अहिल्या समझ गे के परमिला के नारी जुड़ा गे। अब लोहा म पानी मारे के बेरा आ गे।

कहिथे -बड़ेमन ल घुरूवा होयेच बर परथे परमिला । नान -नान बात म किटिर -काटर होवत रहिबो त परवार हॅ कइसे चलही। गलती काकर से नइ होवय। लइका हॅ जाॅंघ म हग देही त जाॅंघे ल थोरे काट के फेंक देबे। धोये पोंछे बर तो हमीच ल परही न !

अहिल्या जानथे के कहॅू मैं थोरको खसलेंव ताहेंन परमिला मोरे उपर चढ़ बैठही। परमिला ल समझाना माने तलवार के धार म रेगना आय।

बात ल साधत कहिस -कोन ल का कहिबे बहिनी ! हमरे घर हमरे दुवार । बनही त हमरे बिगड़ही त हमरे। कोनो हॅ अपन मन म काॅंही राखय। हमी ह अपन फरज ल निभा लेथन सोचके बेटा ल बेटा अउ बहू ल बेटी ले दूसर भाखा नइ काहन। लइका मन संग खेल खाके दुख पीरा ल बिसरा लेथॅन । फेर हाॅ ! गउकीन इमान से परमिला तैं पतिया चाहे झन पतिया । जेेन दिन ले मै बहू ल बेटी कहे ल धरे हॅव वो दिन ले सास -बहू के बीच के डबरा पटा गे हे। बेटी कस मया – दुलार ल पाके मोर सबिता हॅ बेटी ले जादा मोर हियाव करे लगे हे। मोला काॅंही के संसो फिकर नइहे। मै मन म सोंचे -सपनाये नइ राहव आगू – आगू ले मोर साध पूरा हो जाथे।

अतके ल सुनिस अउ परमिला कुला ल झर्रावत उठके मुसकावत चलते बनिस। जना -मना कोनो खचित बूता – काम के सुरता आगे।

अहिल्या सोचत देखते रहिगे -बोकबाय के बोकबाय ।

धर्मेन्द्र निर्मल
9406096346
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तुँहर जउँहर होवय : छत्तीसगढी हास्य-व्यंग संग्रह

छत्तीसगढी सहज हास्य और प्रखर ब्‍यंग्य की भाषा है।

काव्य मंचों पर मेरा एक एक पेटेंट डॉयलाग होता है, ‘मेरे साथ एक सुखद ट्रेजेडी ये है कि दिल की बात मैं छत्तीसगढी मे बोलता हूँ, दिमाग की बात हिन्दी में बोलता हूँ और दिल न दिमाग की यानि झूठ बोलना होता है तो अंग्रेजी में बोलता हूँ।’ हो सकता है कुछ लोगों को इसमें आत्म विज्ञापन की बू आए। मगर ऐसा नहीं है, जिसे आप मेरे श्रेष्ठता बोध की विशेषता समझ रहे हैं, दरअसल वह हर भारतीय आम आदमी की की विवशता है। भारत का आदमी मातृ भाषा में हृदय खोलता है, माध्यम की भाषा में सोचता है और विदेशी भाषा में औपचारिकता निभाता है। मेरे इस लेख की भाषा हिन्दी है तो आगे आप खुद समझदार है, हिन्दी साहित्य जगत में ब्यंग्य ने स्वयं आगे बढकर अपना स्थान बनाया है। हिन्दी के समीक्षक यह सोचते ही रह गए कि ब्यंग्य विधा है या शैली, इसका शिल्प क्या है, इसकी पहचान क्या है, इसकी स्थापना का आधार क्या है और व्यंग्य को बिना किसी अवधारणा की परवाह किए स्वयं को विधा के रूप में स्थापित कर लिया। समीक्षकों ने जैसा अत्याचार हास्य के साथ किया वैसा ब्यंग्य के साथ नहीं कर पाए क्योंकि ब्यंग्न ने उनको मौका ही नहीं दिया। ब्यंग्य ने यह अवधारणा भी ध्वस्त कर डाली कि एक असफल लेखक ही सफल समीक्षक होती है। दरअसल आजादी के बाद जो विसंगतियां पैदा हुई है उसे अभिव्यक्त करने में कोई भी साहित्यिक विधा स्वयं को सक्षम नहीं पा रही थी, जिसने भी सच लिखा वह ब्यंग्य हो गया, इसलिए कहते हैं कि ब्यंग्य विसंगतियों से पैदा होता है और हास्य विदूपताओं से हास्य दिखाई पडता है और ब्यंग्य समझ में आता है। देखते ही देखते ब्यंग्य साहित्य की मुख्य धारा में परिणीत हो गया। हिन्दी साहित्य का यह परिवर्तन समस्त भारतीय भाषाओं में परिलक्षित होने लगा। छत्तीसगढी तो सहज रूप से हास्य और ब्यंग्य की भाषा है। जन जीवन की जिन्दादिली हमे निरंतर परिपुष्ट करती रही। आजादी के आस-पास ही छत्तीसगढी में ब्यंग्य अनेक शिल्पों में व्यक्त होता रहा है परन्तु आठवें दशक में ब्यंग्य के माध्यम से हमें पहचान मिली। समाचार पत्रों के द्वारा बकायदा व्यंग्य का प्रकाशन शुरू हुआ और नवभारत दैनिक ने लगातार दस वर्षों तक ब्यंग्य सतम्भ प्रकाशित कर एक इतिहास रचा। आज ब्यंग्य बहुतायत में लिखा जा रहा है और कई ब्यंग्यकार छत्तीसगढी साहित्य में स्थापित होने की मुद्रा में है। दुर्भाग्य से छत्तीसगढी साहित्य को ईमानदार समीक्षक नहीं मिले जिसके कारण सही एवं सक्षम ब्यंग्यकार उन लोगों से पिछडु गए जो कथित समीक्षकों द्वारा उछाले गए।

ऐसे समीक्षकों में किसी नये आगंतुक को पुरोधा घोषित करने की प्रतियोगिता चल पडी है। पुस्तकों में जो भूमिका लेखन की परम्परा चली आ रही है वह आज साहित्यिक, राजनीति करने की अनिवार्य विधा बन चुकी है, सारी उठा पटक बडी-बडी डिग्रीयां लटकाए समीक्षक जो कि छोटे-छोटे लेखक ही होते है इसी कार्य के बल पर चर्चित माने जाते हैं। छत्तीसगढी लोक भाषा जो कि अभी परिनिष्ठित भी नहीं हुई है ऐसी ही साहित्यिक राजनीति का शिकार हो चुकी है कुछ लोग तो अपनी क्षेत्रीयता को थोपने के लिए तरह-तरह के कायदे कानून बनाने लग पडे हैं। सन् 1952 मे विनोबा भावे जी की अपील मानकर भारतीय लोक भाषाओं में देवनागरी लिपि अपना ली और उसी में लेखन प्रारम्भ कर दिया, इसके बावजूद कुछ विद्वान छत्तीसढी में संयुकताक्षर नहीं होता, केवल स होता है श और ष नहीं होता आदि-आदि फतवे जारी करते रहते हैं। कुछ विद्वान (2) तो नामों (संज्ञा) का भी छत्तीसगढीकरण करने के पक्षधर हैं तो कुछ ऐसे भी हैं केवल उच्चारण शैली के कारण ब्यंग्य को ‘बियंग’ कहना पसंद करते हैं। ‘दृष्टि’ को दिरिसटी और ‘प्रदेश’ को परदेस, लिखकर छत्तीसगढी भाषा को अठारवीं सदी में ले जाने का ‘यश’ मोल ले रहे हैं। ऐसे प्रयासों से छत्तीसगढी, ब्यंग्य की प्रखर भाषा होते हुए भी हास्यास्पद होती जा रही है। लोग पुरोधा बनने के चक्कर में इन तमाम हरकतों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। बिना सेंस ऑफ ह्यूमर के ब्यंग्य महज गाली – गलौज है। धर्मेन्द्र निर्मल छत्तीसगढी के युवा उत्साही ब्यंग्यकार है। एक सराहनीय बात यह है कि धर्मेन्द्र निर्मल के ब्यंग्यों में छत्तीसगढी के परिनिष्ठित स्वरूप की संभावना झलकती है, यद्यपि इनके अधिकांष लेख ब्यंग्य के बजाय ‘बतरस’ के ज्यादा करीब है, शिल्प की विविधता नहीं है और प्रहार को फोकस नहीं किया गया है, तथापि विशेषता यह है कि ये रोचक है, पठनीय है, विषयों की विविधता है और राजनीतिक प्रदूषण से मुक्त है। राजनीति को ब्यंग्य का विषय नहीं बनाना शास्वत लेखन की अनिवार्य शर्त है, वैसे भी ब्यंग्य प्रवृत्तियों पर प्रहार करता है, व्यक्तियों पर नहीं। मैं उम्मीद करता हूँ धर्मेन्द्र निर्मल अभी और निखरेंगे, बेहतर लिखेंगे एवं श्रेष्ठता की हर ऊंचाई को छूने में सफल होंगे। आमीन।

रामेश्वर वैष्णव
( गीत, गजल, ब्यंग्य )

नशा मुक्ति के गीत

1.नशा हॅ नाशी होथे
नशा हॅ नाशी होथे
सुख के फाॅसी होथे
घिसे गुड़ाखू माखुर खाए
दाँत हलाए मुँह बस्साए
बीड़ी म खाँसी आथे
गुटका खाए पिच पिच थूके
दारू पीए कुकुर अस भूँके
धन के उद्बासी होथे
चिलम तिरैया के आँखी धँसगे
जवान बेंदरा सहीन खोखसगे
जग म हाँसी होथे
ए तो सुनेव बाहिर कहानी
घुना जथे संगी जिनगानी
लइका लोग करलासी होथे
बिनती हे मोर कहना मानव
नशा छोड़े के अभी ठानव
देखव उल्लासी होथे।

2. नइ बाँचय तोर चोला रे
नइ बाँचय तोर चोला रे
नइ बाँचय तोर चोला रे
अहो नशा के मारे

बीड़ी पीयत मजा लिए जी फुर्र फुर्र
ताहेन ले पाछू बर खाँसे तै खुर्र खुर्र
घेर के बइठे हावय बलगम हँ तोला रे

चीलम ल तीरे तैं गाँजा गठ गठ के
बेंदरा कस मुँह दिखे तन तोर खोखस गे
होगेस नीचट लुड़़गू आँखी दिखे खोलखोला रे

शीशी शीशी दारू पीए होश ल गँवाए
घर होगे तीड़ी बीड़ी धन ल सिराए
देखबे केक ले दबाही केंसर तोला रे

दाँत पोण्डाथे जी मंजन अउ गुटका
पिच पिच थूके बर माखुर ल मत खा
बस्साथे मुँह तोर लाज लागै नहीं तोला रे

3.मोर बात सुनव रे
मोर बात सुनव रे
मोर बात सुनव जी
ए नशा वशा ल छोड़व
बिन मौत तुमन मत मरव

तन ल घोरय मन ल मारय
अउ धन ल सिरवावय
जिनगी म ए जहर घोरय
जग म हँसी उड़ावय
जान बूझ के ए नदानी
तुमन झन करव रे

जतका के तुम लेथव दारू
मंजन बीड़ी गुटका
उहीं पैसा के दूध दहीं घीं
अउ फल फूल ल तो खा
देख लेहू सेहत बन जाही
मोर विश्वास करव रे

धमेन्‍द्र निर्मल

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