Tag: Ravi Kandra

मरनी भात

मरे मा खवाये संगी मरनी भात
ये नो हे संगी सही बात
जियत ले खवाये नहीं जिंयईया ला
मरे के बाद खवाये बरा सोहारी अउ लाडू़ भात
छट्ठी मा खवा के लाडू़ भात
बताये अपन खुषी के बात
फेर मरनी मा खवा के लाडू़ भात
का बताना चाहत हस तिहि जान ?




ये नो हे संगी सही बात
मरे मा खवाये संगी मरनी भात
मरनी घर के मन पडे़ हे अपन दुख मा
ओ मन ला खुद के खाय के नई हे सुध हा
का खाहू ओकर धर के भात ला
मानवता के कुछ तो रखो लाज ला
सोग मरो थोकिन आउ बंद करो मरनी भात ला
ये नो हे संगी सही बात ह
मरनी मा खान हम मरनी भात ला

रवि विजय कंडरा
सिर्रीखुर्द, राजिम
मो.नं.- 7440646486
ई-मेल- rav।v।jaykandra@gma।l.com

नंदागे

नंदागे
आते सुघ्घर गांव नंदागे
बर पिपर के छाव नंदागे
माया पिरित ला सब भूला के
सुनता के मोर गांव नंदागे
भउरा बाटी गुल्ली डंडा
घर घुधिया के खेल नंदागे
किसानी के दवरी नंदागे
अउ नंदागे कलारी
जान लेवा मोटर-गाडी
नंदागे बइला गाडी
आमा के अथान नंदागे
नंदागे अमली के लाटा
अंजोर करइया चिमनी नदागे
अउ नंदागे कंडिल
पाव के पन्ही नंदागे
आगे हाबे सेंडिल
देहे के अंग रक्खा नदागे
अउ नंदागे धोती
बरी के बनइया नंदागे
होगे येति ओति
किसान के खुमरी नंदागे
अउ नंदागे पगडी
घर के चुल्हा हडिया नदागे
अउ नंदागे लकडी
देख के मोला रोवसी लागे
ये का होवत हे संगी?

रवि विजय कंडरा
सिर्रीखुर्द,राजिम
मो.नं.-7440646486
ई-मेल-ravivijaykandra@gmail.com

किसानी अपन करथो

सुत उठ बडे बिहनिया
करम अपन करथो
भुइंया के लागा छुटे बर
म्हिनत मेहा करथो
खुन पसिना ले सिच के
धरती हरियर करथो
मे किसान अव संगी
किसानी अपन करथो
जग ला देथो खाए बर
मे घमण्ड चिटको नइ तो करो
नइ रहाव ऐसो अराम मे
महिनत करथो इमान ले
छल नइ हे मोर मे
नइ हे कपट




महिनत हाबे मोर धरम
भगवान नो हरो धरती के
मइनखे मे हा हरो
जानो मोर महिनत ला
बस अतनि दया करो
बासी पेज खा के जिनगी
अपन जि थो
किसान अव संगी
किसानी अपन करथो

RAVI KANDRA
रवि कन्‍द्रा

लघु कथा : ठेकवा नाव ठीक

एक ठन गांव मा ठेकवा नाव के एक-हजयन मइनखे रहाये, ओला अपन ठेकवा नाव बने नइ लागे ता हो हा नाव खोजे बर निकल जथे। ता हो हा एक ठन गांव मा जाथे उही मेरन एक-हजयन माइलोगिन गोबर बिनत रथे ता ओला ओकर नाव पुछथे ता ओ हा अपन नाव लक्ष्मी बाई बाताथे ता ठेकवा हा सोच थे एक-हजयन लक्ष्मी बाई रिहिस तेहा अंग्रेज मन संग लोहा ले रिहिस अउ एक-हजयन ऐ लक्ष्मी बाई ला देख ले गोबर बिनत हे।




रस्ता मे उहि कारा ओला एक -हजयन भिखारी मिलथे ता ओला ओखर नाव पुछथे ता ओहा अपन नाव दौलत बताथे ता ठेकवा कथे देख तो ऐकर नाव दौलत हे अउ ये हा भिख मांगत हे। रेगत-उचयरेगत जात रथे ता रस्ता मे मरे मइनखे ला ले गत रथे ता उही मेर के एक-हजयन मइनखे ला बुला के मरे मइनखे के नाव पुछथे ता ओ हा मरे मइनखे के नाव अमर सिंग बाताथे। ता ठेकावा हा कथे अमर सिंग असन हा मर गे ता हमर मन के का ठीकाना ददा। ठेकवा कथे लक्ष्मी बाई गोबर बिने, दौलत मांगे भिख, अमर सिंग मरगे भईया ठेकवा नाव ठीक।
संगवारी हो मइनखे के नाव कुछु रहये नाव ले कुछु नइ होवये मइनखे के काम ले ओखर पहिचान होथे। संगवारी हो तुहरो मन के नाव तुमन ला बने नइ लागत होही ता ओमा निरास होये के कोनो बात नइ होये। सुरता राखे रहू मइनखे के पहिचान ओकर काम ले होथे नाव ले नही।

रवि विजय कंडरा
सिर्रीखुर्द, राजिम
मो.नं.- 7440646486
ई-मेल- rav।v।jaykandra@gma।l.com

टीपनी: संपादक के मुताबिक ‘रेगत-उचयरेगत’ के जघा म ‘रेंगत-उचय-रेंगत’ अउ ‘एक-हजयन’ के जघा म ‘एक-झन’ के प्रयोग होना चाही