बादर गरजत हे


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सावन भादो के झड़ी में, बादर ह गरजत हे ।
चमकत हे बिजली, रहि रहि के बरसत हे ।
डबरा डबरी भरे हाबे , तरिया ह छलकत हे ।
बड़ पूरा हे नदियाँ ह जी , डोंगा ह मलकत हे ।
चारों कोती खेत खार , हरियर हरियर दिखत हे।
लहलहावत हे धान पान, खातू माटी छींचत हे ।
सब के मन झूमत हाबे, कोयली गाना गावत हे।
आवत हाबे राखी तिहार, भाई ल सोरियावत हे।
घेरी बेरी बहिनी मन , सुरता ल लमावत हे ।
आही हमरो भइया कहिके, मने मन मुसकावत हे।

प्रिया देवांगन “प्रियू”
पंडरिया
जिला – कवर्धा छत्तीसगढ़


3 Thoughts to “बादर गरजत हे”

  1. Anil Bhatpahari

    सुध्धर भावप्रवण बधाई हो

  2. अरुण कुमार निगम

    सुग्घर गीत सुग्घर भाव

  3. सुन्दर रचना है आप ल बधाई ।

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