तीन कोरी एक आगर बरिस पहिली हमर देस के संविधान ला लागू करत खानी जउन किरिया हम अउ हमर जम्मो भारत के मनखे मन खाये रहेन वो किरिया हा कतका सुफल होए हे तउन ला आज के दिन बिचार करे के बात हे। वो समे अउ हमर गणतंत्र के अभी के हाल ला सोंचे बिना झंडा फहरई अउ गणतंत्र दिवस अमर रहे के नारा लगई अबिरथा हे। हमर देस के चकाचक बिकास ला देखके इतरई के संगें संग अभी के हालत बर सोंच-बिचार करना भी जरूरी हे। सहर के बड़का-बड़का…
Read MoreYear: 2011
पुरखा के थाथी
पुरखा के थाथी म तुंहर, अंचरा में गठिया के रखो मर जाहू का ले जाहू गोठिया-बतिया के रखो देखा न ददा तोर झोरा ल काय-काय खाऊ धरे हस भग जा मोर मेर कुछु नइए काबर पाछू मोर परे हस टमड़-टमड देखत हावंव, लइका बर लेहस का तो जेन चीज गड़े हे ओंटा-कोंटा करा, ठऊर ठिकाना बता दे बबा सुध तोर झन हरा जावय, सपना ले उठके जगा दे देबे तैं निशानी तेला, कभू नई बिगाड़ौं कथों घर के धारन तैं मोर हावस, मुड़ी म पाछू सियानी होही दे के उमर…
Read Moreकिसान मन के अन्नदान परब छेरछेरा पुन्नी
किसान उपजाए धान ले मिंजके कोठार म रास बनाके अन्नपूरना ”लक्ष्मी देवी” के रूप म नरियर अउ हूम-धूप ले पूजा करथे ओखर बाद कोठी म भंडारन करे खातिर ले जाथे। स्कंद पुरान म दान के महत्ता दरसाय गे हवय, ओखर मुताबिक कमाय धन के दसवां भाग दान करना आदमी के करतब है। ये ही सब ल आधार मानके छत्तीसगढ़ी समाज के पूरा सदस्य मन सकभर निभाय के उदीम म लगे रहिथे। येही दानशीलता के सबसे बड़े परब अउ निसानी के रूप में अन्नदान पर्व छेरछेरा तिहार छत्तीसगढ़ म देखे बर…
Read Moreछत्तीसगढ़ी तिहार : छेरछेरा पुन्नी
एक समे कोसलपति राजा कल्याण साय दिल्ली के महाराजा के राज म रहिके राज-पाठ, राजनीत अउ लड़ई के सिक्छा पाये बर आठ बरिस ले रहिन,ओखर बाद सरयू नदी तिर ले बाम्हन महराज मन के टोली ल संग लेके छत्तीसगढ़ के तइहा के राजधानी रतनपुर पहुंचिन। कोसल के परजा आठ बरिस म अपन राजा ला आवत सुनके अड़बड़ खुस होगे, परजा मन राजा ला परघाये बर गाड़ी-घोड़ा, पैइदल रतनपुर कोती दौउड़ चलिन। राज के जम्मो 36गढ़ के राजा मन कोसलपति के सुवागत म रतनपुर पहुच गए। छत्तीसगढ़ के जम्मो राजा – परजा, कल्याण साय के जय-जयकार करत महल के दुवारे म सकला के नाचे गाए लगिन।…
Read Moreआथे गोरसी के सुरता
पागा बांधे बुढ़गा बबापहिरे पछहत्ती चिथरा कुरता।पियत चोंगी तापे खनीयाआथे गोरसी के सुरता॥नंदागे गोरसी नंदागे चोंगी,मन होगे बिमार तन होगे रोगीबदल गे दुनिया बदल गे बारबदल गे बखरी बदल गे खार।नंदागे जाड़ ठंडानंदागे तपई बरई भुर्रीनंदागे झिटी बिनय काड़ी।नंदागे भइंसा बैला गाडी॥अब्बड़ दूर चल दीस गांवबिसरागे हमर आजा पुरखानइए चिमनी दीया के दिनआथे गोरसी के सुरता।धरे बइठे भिंसरहा बबातापत गोरसी बियारा धानसुरता आथे बिसरे गोठहोगे अब अंधयारी रात॥सुखागे नंदिया नरवाटूटगे पियार परवा।बिसरागे पुरवा के बिहावआगे सरकारी मड़वा॥पानी के दिन बादर भागेजाड़ के दिन गर्मी लागेजरोटा मेमरी ल भेड़ी खागेगोरसी के…
Read Moreगोरसी
अघन पूस के जाड़ तन ल कंपाथे। गोरसी के आंच ह तभे सुहाथे॥ हवा ह डोलय सुरूर-सुरूर। पतई पाना कांपय फुरूर-फुरूर॥ रुस-रुस लागय पातर गुलाबी घाम। जूड़ पानी छुए ले, कनकनावत हे चाम॥ लईका, सियान, जवान सबो मन भाथे। गोरसी के आंच ह तभे सुहाथे॥ गरीब बर नइए बने ओढ़ना- बिछाना। दांत किटकिटाये गा, नइए ठिकाना॥ छेना, भूंसा धरके, गोरसी ल धुक दे। फूंकनी म थोरिक के फूंक दे॥ येखरे भरोसा सुग्घर नींद आथे। गोरसी के आंच ह तभे सुहाथे॥ पताल भांटा येखर पलपला में उसन ले। गरम-गरम चहा इही…
Read Moreलड़की खोजत भंदई टूट जाय
गांव मन म पहिली मोटर गाड़ी, फटफटी नई रहिस। साइकिल घलो इक्का-दुक्का घर राहय। बिहाव के दिन आय त ये गांव ले वो गांव पता करत रेंगते घुमंय। जउन जिहां जाय बर काहे जिहें चल देंवय। येती-ओती पता करत अतेक घुमंय त नवा पहिने भंदई के धुर्रा बिगड़ जाय। भंदई टूट जय, गथना छर्री-दर्री हो जय। पहिली अउ अब, सबो जात, समाज म लड़का के बिहाव करे बर लड़की खोजइ म कइ किसम के बेरा आय गे हे। 50-55 साल पहिली घलो समाज म बिहाव लइक लड़की कमती राहे। लड़का…
Read Moreकहिनी : ईरखा अउ घंमड के फल
– भगवान कृष्ण मंझनिया के आराम करत राहय। घमण्ड से चूर दुरयोधन भगवान के मुड़सरिया कोती बइठ के कृष्ण के नींद खुले के इंतजार करे लगथे। ओतके बेर अर्जुन घलो मदद के नाम से पहुंचथे। ओला देख के दुरयोधन के मन में भय समा जाथे के अर्जुन तो कृष्ण के फुफेरा भाई ए अउ ओखर झुकाव घलो पाण्डव कोती हे। दुरयोधन के जनम-जनम के सकलाय इरखा उबले लगथे।– अइसे कोन भारतवासी हो ही जेला रामायन अउ महाभारत के किस्सा बने नई लगत हो ही। ये दूनों ग्रंथ हरेक भारतवासी के…
Read Moreआरूग चोला पहिरावय 10 जन
धर्म के नांव म हमर मन ऊपर अन्य प्रदेश के संस्कृति ल खपले के लगातार प्रयास चलत हे। जेकर सेती हमर भूल संस्कृति के उपेक्षा करे जाथे या फेर वोकर ऊपर कोनो आने किस्सा कहिनी गढ़ के वोकर रूप ल बिगाड़ दिए जाथे। जब कभू संस्कृति के बात होथे त लोगन सिरिफ नाचा-गम्मत, खेल-कूद या फिर जे मन ल सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत मंच आदि म प्रस्तुत करे जा सकथे, वोकरे मन के चरचा करथें। मोला लागथे के ये हर संस्कृति के मानक रूप नोहय। येला हम कला के अंतर्गत…
Read Moreनान्हे कहिनी : डोकरा-डोकरी के झगरा
डोकरा-डोकरी के झगरागांव म एक ठन घर में डोकरा-डोकरी रहय। एखर मन के लोग-लइका नई रहिस। डोकरा-डोकरी अतका काम-बुता करय के जवान मनखे मन नई कर सकंय। अपन खेत-खार ल अपनेच मन बोवय अपनेच मन निंदय-कोंड़य। बुता-काम ले थोर-बहुत ठलहा होवय त छांव म थोर-बहुत संगवारी मन करा गोठ-बात करे के मन होथे। एक दिन डोकरा हर बुता-काम ले आइस घर म बढ़िया खा के निकलिस बर छांव मेर। जिंहा एक घुमक्कड़ टुरा मन बइठे रहयं। उही मेर रमेश (धोनी) नाम के लपरहा पुच-पुचहा टुरा तको बइठे रहय। अब येती…
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