भले मनखे ले जग म सुख-सांति जरूर आही

बिगडे समाज अउ राजनीति ल कउन सुधारही? अपन मं सब उलझे हें त जग सुधारे कउन आही? आधा रात के बारा बजे मोर टूरा खखुवाइस, कविता लिखत देख के मोर बर बड़-गुर्राइस। अइसने मेहनत करके कुछु दुकान ल चलाते॥ त कतका कन पइसा कमाके सुख ल पाते॥ हम गरीब के पीरा मं काबर कउन आही? हमन रोवत रइबो त कोन पीरा ल पाही? कलम-कागज ल धर के माथा ल धुनत रइथस, देस-समाज के उतार-चढ़ाव ल लिखके का पाथस। एक ठी टूटहा लूना ल जिनगी भर चलावथस। करू-करू लिखके नेता मन…

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कहिनी : हिरावन

‘हिरावन बारवीं म मेरिट म पास होईस। फेर नेमसिंग, हिरावन ल आगू नई पढ़इस। सोचिस ‘जादा पढ़े-लिखे ले मनखे अलाल हो जाथे। नउकरी त मिलना नइ हे।’ ईतवारी, हिरावन ल पढ़ाए बर नेमसिंग ल फेर किहिस। फेर नेमसिंग उहू ल नइ घेपिस उल्टा कहि दिस, ‘भंइसा के सिंग ह भंइसाच ल गरू लागथे’ गा। तोर का हे? पइसा त मोल पटाना हे।’ पूस के महीना रिहिस। जाड़ बनेच जनात रिहिस। परसू के किराना दुकान के आगू म लइका मन कागद, पैरा मन ल सकेल के, भुर्री बार के आगी तापत…

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कहिनी : लंगड़ा भिखारी के इच्छा

शहर म एक झन लंगड़ा भिखारी रहय। जम्मो मनखे मन ओला लंगड़ा भिखारी कहिके पुकारय। भिखारी ह हमेशा खुसी-खुसी के जीवन बितावय, कभू घुस्सा नई करय। भिखारी शहर के दुरिहा म एक ठन झोपड़ी म राहय। झोपड़ी ह कुड़ा-करकट के ढेर के बीच म एक ठन पेड़ के तरी रहिस हे। लंगड़ा भिखारी के झोपड़ी म खाना पकाय के टूटे-फूटे बरतन अउ एक दू ठन चिरहा कपड़ा रहय। भिखारी ह हर दिन बिहनिया नहा-धो के आठ बजे ले अपन भोजन खातिर सहर के जम्मो दरवाजा म भीख मांगे बर जाय…

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कहिनी : नोनी दुलौरिन

टूरी कहूं लछमी, त कहूं दुरगा देवी के रूप म जनम लेथे। डीह डोंगर, ससुरे-मईके दूनो कुल के मरियादा होथे। ये ह मोर अंगना के फूल-फुलवारी, मोर बेटी मोर हीरा ए। येला लिखाहूं-पढ़ाहूं बड़े साहेब बनाहूं, इही मोर डीह-डोंगर के दिया बरईया ए। खद्दर के छानी म, दूनो परानी, अपन जिनगी के सुख-दुख ल घाम छइहां के खेल सही खेलत राहय। बने-बने म समय बीतत जल्दी पहा जथे, सुख के दिन पांखी लगा के लऊहा उड़ा जथे। बर-बिहाव संग-संग गवन-पठौनी होगे। भगवान जाते सांठ चिन डरिस। उही दिन के आवत…

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आगे दिन जाड़ के

डोकरी दाई बइठे बिहना ले, गोरसी ल पोटार के झांपी ले निकार कमरा डेढ़ी, आगे दिन जाड़ के खटिया ले उठई ह, सजा कस लागत हे तरिया के पानी ह, रहि-रहि डरहुवावत हे कथरी अउ ओढ़ना ह, गाब सुहावत हे एक लोटा ल चाहा ल बबा, अकेल्ला ढरकावत हे खटिया म ढलगे नोनी देखत हे, मुहूं ल उघार के झांपी ले निकार कमरा डेढ़ी, आगे दिन जाड़ के गली खोर म जगा-जगा, बरत हे भुर्री बियारा मं जगाए हे, धान के खरही जिहा अंकलहा ह फांदे हे, मुंदरहा ले दंउरी…

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छत्तीसगढ़ी भासा बर सकारात्मक संवाद जरूरी हे

लोक म बोलचाल के भासा अपन-अपन स्थान विसेस म अलग-अलग होथे। अपन स्थानीय अउ जातीय गुन के आख्यान करथे। फेर प्रदेस अउ देस के भासा बनत खानी बेवहार म एकरूपता जरूरी हो जाथे। येला हम विविधता म एकरूपता भी कह सकत हन। बिलकुल इही बात बोलचाल के भासा अउ साहित्य के भासा अउ मानकीकरन भासा म लागू होथे। मानकीकृत छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ बर परम आवस्यकता बनगे है। ये बात ल समय के जरूरत मान के स्वीकार करना परही चाहे रोके करी के धो करी। येफर्रा छत्तीसगढ़ी भासा के मानकीकरन ल ले…

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छत्तीसगढ़ी के सरूप

‘छत्तीसगढ़ी म हिन्दी, संस्कृत अरबी, फारसी, अंगरेजी, उडिया, मराठी अउ कउन-कउन भासा मन के सब्द मन आके रच बस गिन हें। फेर ओमन अब छत्तीसगढ़ी के हो गिन हें। असल म सब्द मन के जाति, बरग, इलाका धरम अब्बड़ उदार रथे। जेकर कारन ओ मन सुछिंद एती-ओती जात-आत रथें। असली लोकतंत्र भासा म नजर आथे।’ छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ के डेढ़ करोड़ लोगन के मातृभासा, संपर्क भासाय ये अउ तीर-तखार के उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, अउ झारखण्ड के इलाका मन म तइहा ले रहत आत छत्तीसगढ़िया मन के भासा ए। छत्तीसगढी क़े संगे-संग…

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सतनाम सार हे

झन काहा तोर मोर, मतलभिया संसार हे। भज ले रे सतनाम। इहां सतनाम सार हे॥ झन बिसराव ठीहा ल, जब तक हवे सांस ह। सत के रद्दा म रेंगव, कहि गे हे घासीदास ह॥ जे देखाथे रद्दा सबला ऊंखरे जय जयकार हे। भज ले रे सतनाम… जाना हवय सबो ल इहां ले ओसरी पारी। दाई-ददा, भाई-बहिनी बेटा-बेटी अउ नारी॥ करबे कारखर बर जोरा, जिनगी दिन चार हे। भज ले रे सतनाम… सुनले संगवारी। अब तंय अइसने मिटका झन। मिले हवय मानुस तन, तंय समे ल गंवा झन॥ हिरदे मा राखे…

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छत्तीसगढ़ी गीत नंदावत हे

गीतकार, कवि सुशील यदु से खास बातचीत अंचल के जाने माने कवि व गीतकार सुशील यदु ने कहा है कि छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकगीत, लोककला को संरक्षित करने शासन स्तर पर कोई खास प्रयास नहीं हो रहे हैं। पंजाब की तर्ज छत्तीसगढ़ के लोकउत्सव में भी सिर्फ छत्तीसगढ़ के लोककला व संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम प्रमुखता से हो। बाहर के कलाकार बुलाकर अपने कलाकारों को हतोत्साहित करना उचित नहीं है। कवि सुशील यदु ने इस आशय के विचार ‘देशबन्धु’ के कला प्रतिनिधि से खास मुलाकात में व्यक्त किए। 0 वाचिक…

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छत्तीसगढ़ी के विकास यात्रा

‘छत्तीसगढ़ी के विकासयात्रा ल जाने के जरूरत हे तभे छत्तीसगढ़ी के लेखन ह समझ में आही। छत्तीसगढ़ी ल बोली के मापदण्ड के ऊपर उठाके भासा के मापदण्ड म लिखे जाना चाही। लोकभासा मन ले परिष्कृत ‘हिन्दी’ ल नागरी लिपि के वर्ण माला के सबो अक्षर संग सजा के शुध्द बनाए गीस, वइसने छत्तीसगढ़ी ल घलोक ‘नागरी’ वर्णमाला के सबो अक्षर संग शुध्द बनाए जाना चाही।’ अइसे कहे जाथे के कोनो भी भाखा ल जब प्रकाशन के मंच मिलथे, त वोमा अउ वोकर लेखन म धीरे-धीरे निखार आए लगथे। छत्तीसगढ़ी भाखा…

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