डॉक्टर अउ कवि

मैं हरखराम पेंदरिया ‘देहाती’ गेयेंव डॉक्टर के पास डाक्टर मोला देख के अड़बड़ परसन्न होगे सोचिस शगुन बढ़िया दिखते हे आज रिटायर्ड हेड मास्टर आय अड़बड़ रुपया-पईसा हे येकर पास। मोला देख के डॉक्टर ह पूछिस- का तकलीफ हे तोला खास अतका सुनेंव तहां ले में ह काली मे ह एक ठक नवा कविता लिखे रेहेंव वोकर करन लगेव सत्यानाश। येला देख के घबरा गे डॉक्टर साब बोलिस- ये का करत हच मोर बाप मे तोला कविता सुनाए बर नई कहें हव तोला का बीमारी हे येला बता साफ-साफ। में…

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कहिनी : दहेज के विरोध

आज के ये दहेज प्रथा ह सुरसा रक्सिन कस मुंहुं ल उलाके हमर सइघो समाज ल लीलत हवय। ये दहेज रूपी सुरसा ले कोनो नी बांचत हे। फेर रामलाल सरपंच ह बजरंग बली कस दहेज रूपी सुरसा रक्सिन ले बांचे के उदिम करत हे। ‘खुरसी मन ल अभीन ले नी लाए हव रे निच्चट तुंगत हव’- रामलाल सरपंच ह, सामरतन बर तमकगे। सामरतन ह मुड़ी मं बोहे दरी ला भिंया म पटकिस अउ बतइस- ‘अकेल्ला महीं का करंव सरपंच?’ फुसकू घर तो गे रेहेंव दरी ल लाए बर। छट्ठी होय…

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बरी बिजौरी करत हे चिरौरी

कहां नंदागे चरौंटा भाजी अउ गुरमटिया के भात। लागय सुग्घर खोटनी भाजी, खोटनी बरी संग भात। अब तो सुरता रहिगे, रंधनी घर के सेवाद सिरागे। सि रतोन बात ताय। तइहा-तइहा के बरी-बिजौरी ल खाय बर जे जुन्ना मनखे बांचे हे ते मन तरस गे हे। डुबकी, चीला, बूंदिया, भजिया के कढी घला आज रंधनी घर ले परा गे हें। जे दू-चार झन सियनहा बांचे हे ते मन कहूं खाय के सउख कर पारही त आज के बोहो-बेटी मन चिटपोट नइ करयं अउ बपुरा सियनहा जीभ ल चांटत अपन पानी ल…

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कहिनी : साहस एकता अउ संकल्प

कोनो कहिदिस, ‘गदहा’ अउ हम ‘गदहा’ बन जाबो? नहिं न? त फेर का सोचना, डरना। अतका बात याद रखव दुनिया म चाहे कतको बुराई राहय, बुरा होवय, मनखे ल अपन अच्छाई नई छोड़ना चाही। जीत अउ जय एक दिन अच्छाईच्च के होथे। त करना हे माने करना हे। बस, होगे? जगमग-जगमग उजियारा म, जिनगी के जम्मो आनंद, खुसी, जम्मो, उत्साह-जोस भरईया, मईया के नवरात्रि। दु:खी, डण्डी सबके दु:ख-भूख भाग जाथे। फेर वो गांव म घोर अंधियारी, सन्नाटा। कारन-दू बछर पहिली, एहि नवराति के तइयारी म बइठक म, झगरा मातगे राहय,…

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साक्षरता का अकासदिया – पुस्तक समीक्छा

‘अकासदिया’ के 40वाँ अंक साक्छरता ऊपर निकले हावय। संपादक परदेसीराम वर्मा ह अपन संपादकीय म लिखे हावयं के 12 जनवरी 1990 के दुर्ग जिला म साक्छरता अभियान के जोत जले रहिस हे। जेन ह कला जत्था के माध्यम ले काम करीस। सामुदायिक विकास विभाग दूवारा ग्रामीण विकास एवं प्रौढ़ सिक्छा अउ लोक कला महोत्सव संचालक होवत रहिस हे। एखर बर परदेसीराम वर्मा जी कला जत्था लाए के काम करयं। संपादकीय के माध्यम ले छत्तीसगढ़ म प्रौढ़ शिक्षा के पूरा इतिहास के जानकारी हो जथे। कोन-कोन, कइसे-कइसे जुगत लगा के साक्छरता…

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मन के सुख

अंजली दीदी फूफू दीदी संग माटी मताए अउ गारा अमरे बर जावय। तेकर पाछू एक झन डॉक्टर इहां झाड़ू पोछा के काम करे लागीस। इहें वोला पढ़े अउ आगे बढ़े के माहौल मिलिस। ऊंहा के डॉक्टर अउ नर्स मन ले मिलत प्रोत्साहन के सेती वो ह आया, फेर नर्स अउ फेर नर्स ले डॉक्टर के पदवी तक पहुंचगे। अब नौकरी छोड़के अपन अस्पताल चलावत हे। अब वो ह माटी मताने वाली अउ झाड़ू पोछा लगइया अंजली नहीं, डॉक्टर अंजली हे। ‘भोला… ए भोला.. लेना अउ बताना अंजलि के कहिनी ल’…

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जइसे खाबे अन्न तइसे बनही मन

‘सेठ ह कहिथे- महंतजी, मे ह चोरी के बाहना बिसाय रहेंव व वोमा मोला अड़बड़ फायदा होइस तेकरे सेती में ह मंदिर म दान दे रहेंव। महंत जी वो अनाज के प्रभाव ल समझिस’ हमर खवई पिययि ह हमर मन का बनाथे- बिगाड़थे एकरे सेती हमर सास्त्र-पुरान ह खाय-पिये म पबरित रहय। अइसे बताय हे। जेन धन ले अनाज बिसाय गे हे वोकरो असर ह मनखे के मन ल परभावित करथे। वृन्दावन (उ.प्र.) के घटना आय- एक मंदिर म एक झन महात्मा रहत-रहय। एक रात के घटना आय वो ह…

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जाड़ के घाम

सुरूर-सुरूर हवा चलय, कांपय हाड़ चाम। अब्बड़ सुहाथे संगी, जाड़ के घाम॥ गोरसी के आगी ह रतिहा के हे संगी। ओढ़ना-जठना, गरीबहा बर तंगी॥ भुर्री अउ अंगेठा, अब सपना होगे भाई। लकड़ी अउ छेना बर, नई पुरय कमई॥ गरीबहा बर बदे हे, बिपत के नाम। अब्बड सुहाथे संगी, जाड़ के घाम॥ अंगाकर रोटी ल, चटनी के संग खाले। लाली चहा ल पी ले, गोठिया बता ले॥ पिड़हा म बइठ, अंगना म थोरिक। घाम ह लागय, रुस-रुस बड़ नीक॥ कुरिया अउ घर म नइए गा आराम। अब्बड़ सुहाथे संगी, जाड़ के…

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बाबागिरी

सावधान, बचके रहहू गा, साधू भेस म सैतान सिरी। चन्दन, दाढ़ी, जोगी बाना, चलावत हावयं बाबागिरी॥ बड़े-बड़े आसरम हे इंखर। चेली-चेली, कुकरम हे इंखर॥ सोना-चांदी, धन, दौलत हे। हवई जिहाज, कार दउड़त हे॥ माल-मलीदा, सान अउ सौकत, सबो मिलत हे फिरी। चन्दन, दाढ़ी, जोगी बाना, चलावत हावयं बाबगिरी॥ दिन म कीरतन, परबचन, बड़े-बड़े पंडाल। रतिहा दारू, बियर, मटन हे, झूमरत हे चंडाल॥ नाचयं आजू-बाजू सुग्घर टुरी जवान। पाप करम ल देख-देखके, अचंभा हे भगवान॥ पाप म्यूजिक म गावत हें ये वन, टू, थिरी। चन्दन, दाढ़ी, जोगी बाना, चलावत हावयं बाबगिरी॥…

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मऊंहा झरे झंउहा-झंउहा – पुस्तक समीक्छा

अनिल जांगड़े गौंतरिहा के छत्तीसगढ़ी गीत के किताब महुंआ झरे झंउहा-झंउहा पढ़े बर मिलीस। पढ़के मन ला संतुष्टि मिलिस गीत म सबो परकार के रस के सवाद हवय। छत्तीसगढ़ी महतारी के सुग्घर बरनन अइसन बिखर गे हे। ओकर परती मन पियार अउ सरध्दा से झुक गे। पहिली गीत म कवि कहत रहिन- ‘सरग बराबर ये भुईया जिंहा बसे हे संत गियानी- चरन धोवत गंगा-जमुना हे, अमरित जस हवे पानी।’ अब्बड़ पावन अउ सुग्घर बरनन हवय। अउंटत लहू चूसे पसीना म ‘दया मया के तिरिथ कुरिया नवा सुरूज गदहईया के’ कहिके…

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