पुनुराम साहू के रचे नाटक ‘लमसेना’ पढ़े बर मिलिस। ‘लमसेना’ के अर्थ हे ‘घरजमई’ नाटक के शीर्षक ह अलगेच लगीस। नाटक पढ़े के बाद लगीस के सिरसक एकदम ठीक हे। रामसिंग ‘लमसेना’ नाटक के परमुख चरित हे। ओकर कारन ही दयाबती अउ फुलवा बदचलन रहिथे। रामसिंग ऊपर चोरी के आरोप लगाथे। रामसिंग अपन बेटा अंजोर संग घर छोड़ देथे। दयाबती रामसिंग ला अपन मुंहबोला भाई बनाथे अउ अंजोर ला बड़ा कथे…। ओकर ममतामयी दाई बन जाथे नाटक के दुआरा लेखक जुन्ना रीति-रिवाज ऊपर परहार करथे। अउ नवा संदेस देथे। नाटक…
Read MoreYear: 2011
कहिनी : धुरंधर महाराज
कपड़ा के नांव म कनिहा म नानकुन कपड़ा लटके के रिहिस। चुंदी छरियाय रिहिस। तन बिरबिट करिया। दांत निकले। जाड़ म लुद-लुद-लुद-लुद कांपत रिहिस। बही ह टक लगाके आगी तपइया सबो झन ल देखत रिहिस कांही नइ काहत रिहिस। फेर ओखर आंखी काहत रिहिस- ‘थोर किन महूं ल आगी तापन देतेव गा।’ नाक ल सकेलत धुरंधर महाराज कथे। येला भगाओ इहां ले। बिसेलाल गउंटिया, जगनू बर तमक गे- ‘तुंहरो बुता रे बाबू! निचट आलारैसी ताय। सुकवार के दिन अतका जड़ जग चालू होना हे अउ तुमन तुंगत हव। दूबी मां…
Read Moreबम-निकलगे दम
एक झन कहिस- का बताबे सिरतोन म बहुत बुरा हाल हे। जुन्ना रेलवे पुलिया अउ करमचारी मन के लापरवाही ले वइसने जब नहीं तब जिहां नहीं तिहां बम फोरत हे, गोली चलावत हे। इंकर मारे तो कहूं आना-जाना घलो मुसकुल होगे हे। हिंसा ले सुख, खुशहाली अउ सांति लाए के उदिम अउ हिंसा ले ये नई लाय जा सकय। येला लाए बर दया-मया, भाईचारा अउ अहिंसा के रद्दा ल अपनाए ल परही। बम! जइसने बम के गोठ निकलिस रेल ह थरथरागे अउ वोकर पोटा कांपे ल धर लिस। वोला बम…
Read Moreएकलव्य
हर जुग म होवत हे जनम एकलव्य के। होवत हे परछो गउ सुभाव के कटावत हे अंगठा एकलव्य के। हर जुग म हर जुग म रूढ़ीवादी जात-पात छुआछूत भारत माता के हीरा अस पूत कहावत हे जनम-जनम अछूत। हर जुग म आज इतिहास गवाह हे एकलव्य बर द्रोनाचार के मन म का बर दुराव हे? का हे दोस? नान्हे फूल के काबर ये दुसार? दलित माता के कोख ले जनमे हे न! अतकेच के गुनाहगार का इहि ये गुनाह? होवत हे हीनमान, अइताचार संत गुनी के भारत म बरन बेवस्था…
Read Moreनान्हे कहिनी : लबारी
‘रामलाल कथे भाई मेहा दसमी पास होगेंव, ये ले मोर अंकसूची कहिके देखाय बर धरथे त देखथे पेपर ह ओकर ले गायब हो जाय रथे। वोला पेपर पढ़इया मन धरके लेग जाय रथे। रामलाल ल अड़बड़ दु:ख होथे। बिचारा के पीरा पहाड़ कस हो जथे।’ रामलाल बहुत खुश रिहिस अपन अंकसूची ल देखके वोला जतन के पेपर म तोप के अपन दुकान म लइस अपन बड़े भाई ल देखाये बर, भाई दुकान म नई राहे। अपन भाई के रद्दा जोहत-जोहत अंकसूची ल टेबुल म मड़ा दिस। ओखर भाई ह आ…
Read Moreनान्हे कहिनी : सिसटाचार
गियारह बजे के बेरा आय। मिथलेस अपन संगवारी मनसन गोठियात जात राहे, त परकास कथे-कइसे रे मिथलेस ! तेंहा अड़बड़ दिन बाद कॉलेज आय हाबस। आजकल तोर दरसन दुरलभ होगे हाबे। कहां जाथस दिखस निही। त मिथलेस कथे- बहुत बियस्त होगे हाबों यार, सबो डाहर ल देखे ल पड़थे घर डाहर घलो अड़बड़ बूता रथे। सबो झन पढ़इया लइका मन अपन-अपन किलास म जात रथे। ओतकीच बेर कॉलेज के प्रिंसपल ह आ जथे, अउ मिथलेस ल देखके कथे- ‘आप मेरे आफिस में आइए।’ मिथलेस ह कोन ल काहत हे कहिके…
Read Moreजतन बर करन दीपदान
अइसन कुछु संगी रे, जतन हम करन। हरियर-हरियर परियावरन हम करन॥ बजबजावत परदूषन ले जिनगी के रद्दा, दूरिहा जिनगानी ले, घुटन हमन करन। डार देहे बस्सई मन, ठांव-ठांव म डेरा, जउन भर दे ममहई ले, चमन हम करन। रहि नई गय आज कहूं जंगल के रउनक, मनबोधना फेर, वन, उपवन हम करन। नंगत कटत हावय इहां रूखुवा रोज-रोज, हितवा मन के बैरी के, हनन हम करन। होगे जतका होगे, उजार अउ झन होवय, अउ घलो खुशहाल हाल, वतन हम करन। दीया ल बने बार अंधियार झन घपटय करहू जतन जुरमिल,…
Read Moreमाटी के दियना
माटी के दियना, करथे अंजोर। मया बांध रे, पिरितिया डोर॥ जगमग-जगमग लागे देवारी, लीपे-पोते घर, अंगना, दुवारी खलखला के हांसे रे, सोनहा धान के बाली चला चलव जी, लुए बर संगी मोर॥ माटी के दियना… नौकर-चाकर, सौजिया, पहटिया जोरे-जोरे बइहां रेंगे, धरे-धरे झौंहा डलिया चुक-चुक ले, गांव, गली, खोर माटी के दियना… छन-छन ले घाट-घटौंदा तरिया-डबरी, नरवा-नदिया पैडगरी लागे उजास रे माटी के दियना… रामकुमार साहू मयारू गिर्रा पलारी
Read Moreकहिनी – नवा अंजोर
नोनी मैं तो आन धर के छईहां नई खुंदे रहें, बुता करई तो जानते नई रहें। फेर मोर आदमी के बीते म जीनगी के ताना नना होगे। घर चलाय बर गहना गूंठा तक बेचागे। माय मइके मैं दिन के चार दिन बने राखही तहां…। नानमुन गोठ ह हूल मारे कस लागथे। एही पाय के मैं मिस्टरी बबा अउ रउतईन दाई संग-संग रांधे करे के काम करे लागे। कोनो काम छोटे बड़े नई होवै। काम करे म का के लाज। गांव के सियान मन कहिथें- परवार के बड़े अउ छोटे ल…
Read Moreधर ले कुदारी
धर ले रे कुदारी गा किसान आज डिपरा ला रखन के डबरा पाट देबो रे । ऊंच-नीच के भेद ला मिटाएच्च बर परही चलौ चली बड़े बड़े ओदराबोन खरही झुरमिल गरीबहा मन, संगे मां हो के मगन करपा के भारा-भारा बाँट लेबो रे । चल गा पंड़ित, चल गा साहू, चल गा दिल्लीवार चल गा दाऊ, चलौ ठाकुर, चल न गा कुम्हार हरिजन मन घलो चलौ दाई – दीदी मन निकलौ भेदभाव गड़िया के पाट देबो रे । जाँगर पेरइया हम हवन गा किसान भोम्हरा अऊ भादों के हवन गा…
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