कईसन राज ये कका

कईसन राज ये कका ये का होवत हे, ठुड़गा ह हासत हे अऊ हरियर मन रोवत हे। माते मतवना पियत हे दारू, सरकार खोलत हे जगा जगा दूकान तको दुलारू। कतको अपटही कतको मरही, फेर अंधरा मन ल नईये संसो ककरो समारू। अभिचे सुने हौव झोला छाप मन ल तको तंगावत हे, नई पढ़े लिखे ये तेकरो करा दवई बटवावत हे। गाँव म जाहू पता चलही,झोला छाप के उपकार ह, पुछहूँ जनता ल तभे तो बताही अंधरा सरकार ल। अपने अपन नियम कानून लादत हे, मरत हे तेला अऊ मारत…

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पुस्तक समीक्षा : अंतस म माता मिनी

छत्तीसगढ म जतका महान विभूति अवतरित होईन ओमा मिनी माता के प्रमुख स्थान हवय। माता मिनी न केवल कुशल राजनेता रहिन बल्कि बहुत बडे समाज सुधारक, गुरूमाता अउ दूरदृष्टा भी रहिन। एक विभूति के भीतर अतका अकन सद्गुण के समावेश ये बात के परिचायक हवय कि माता मिनी छत्तीसगढ म परिवर्तन लाये खातिर अवतरित होय रहिन। आज जब हम मिनी माता के जीवन उपर कुछ पढना चाहथन त उँकर उपर लिखे गे साहित्य के कमी के कारण अध्ययन से वंचित रहि जाथन। गौरतरिहा जी के ये किताब सार्थक पहल हवय।…

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किताब कोठी : अंतस म माता मिनी

अंतस म माता मिनी छत्तीसगढी राज भासा आयोग के आर्थिक सहयोग ले परकाशित प्रकाशक वैभव प्रकाशन अमीनपारा चौक, पुरानी बस्ती रायपुर ( छत्तीसगढ) दूरभाष : 0771-4038958, मो. 94253-58748 ISBN-81-89244-27-2 आवरण सज्जा : कन्हैया प्रथम संस्करण : 2016 मूल्य : 100.00 रुपये कॉपी राइट : लेखकाधीन अंतस म माता मिनी ( जीवनी) “दु:ख हरनी सुख बंटोइया, आरूग मया छलकैया बनी मंदरस, फरी अंतस, मरजादा धन बतइया माथ म चंदन, चंदा बरन, सेत बसन चिन्हारी नाव व धराये मिनीमाता, छत्तीसगढ के महतारी” अनिल जाँगडे ग्राम- कुकुरदी, पो-जिला बलौदा बाजार-भाटापारा (छ.ग. )पिन 493332 मो.…

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गरमी बाढ़त हे

दिनों दिन गरमी बाढ़त, पसीना चुचवावत हे। कतको पानी पीबे तबले, टोंटा ह सुखावत हे। कुलर पंखा काम नइ करत, गरम हावा आवत हे। तात तात देंहे लागत, पसीना में नहावत हे । घेरी बेरी नोनी बाबू, कुलर में पानी डारत हे । चिरई चिरगुन भूख पियास में, मुँहू ल फारत हे। नल में पानी आवत नइहे, बोर मन अटावत हे। तरिया नदिया सुक्खा होगे, कुंवा मन पटावत हे। कतको जगा पानी ह, फोकट के बोहावत हे। झन करो दुरुपयोग संगी, माटी ह गोहरावत हे। – महेन्द्र देवांगन “माटी” गोपीबंद…

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कविता : अब भइगे !

अब भइगे बंदुक ल छोड दव बस्तर के माटी ल झंन रंगव महतारी के कोरा सुना होगे आॅखी ले आंसु बोहवत हे छोटे बहिनी राखी ल थारी म सजाये हे नान नान लईका मन रस्दा देखत हें नावा बोहासिन के मांग ह सुना होगे पडोसी के बबा गुनत हे अपन नाती देख रोअत हे तुमन ल लाज निलागे मुरख हव निचट कोनो अपन भाई ल छुप के मारथे का काबर उदिम मचाये हव बस्तर के माटी ल काबर बदनामी म डारे हव अब भइगे बंदुक ल छोड दव बस्तर के…

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चलो मंदिर जाबो

चलो मंदिर जाबो भैया मोर, दाई के पूजा करबो । चलो मंदिर जाबो बहिनी मोर, माता के सेवा करबो। चंपा चमेली के फूल गुंथके , माता ल पहिनाबोन । आनी बानी फूल लानके, आसन ओकर सजाबोन। जोत जलाके सुघ्घर, आरती सबझन गाबो । चलो मंदिर जाबो भैया मोर, दाई के पूजा करबो । सोला सिंगार करके, माता हर मुसकाथे । भगत के मान रखे खातिर, सुंदर रुप देखाथे । चैत के महिना आगे, झूला ओकर सजाबो । चलो मंदिर जाबो बहिनी मोर, माता के सेवा करबो । बघवा के सवारी…

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असमिया धुन मा छत्तीसगढ़िया राग, छत्तीसगढ़ मा होइस पहुना संवाद

आवा दे बेटी फागुन तिहार … मारबो बोकरा करबो शिकार …… हे वोति कोन सेन रे मुना महुआ रे ………..। धुन असमिया हे … फेर बोल छत्तीसगढ़ी। अइसनेहे साझा संस्कृति ले रचे बसे हे लाखन परदेसी छत्तीसगढ़िया मन के जिनगी। वो छत्तीसगढ़िया मन के जिनगी जेन डेढ़ सौ बछर पहली असम राज खाय-कमाय बर गइन अउ उंहे के वोखे रहिगे। छत्तीसगढ़िया परदेसिया होगे … असमिया होगे। आज असम के भीतरी 20 लाख परदेसिया छत्तीसगढ़िया रहिथे। फेर डेढ सौ बछर बाद भी, असमिया रंग मा रंगे के बाद भी ये परदेसिया…

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असम के छत्तीसगढ़ वंशी मन के गीत

सुवा गीत ददरिया (लेजा लानि देबे नोनी छेना म आगी, ले जा लानि देबे) असम म रहवइया छत्‍तीसगढ़ वंशी मन अभी रइपुर आए हें तउने समय ये वीडियो रिकार्ड करे गए हे। ए संबंध म जादा जानकारी आप इंहां ले पढ़ सकत हव।

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ना बन बाचत हे ना भुइयां, जल के घलोक हे छिनइयां

छत्तीसगढ़ हा पूरा देस मा एक ठिन अइसे राज हरय जिहां तीन जिनिस के कभु कमी नइ रहे हे। ये तीन जिनिस हरय बन, भुइयां अउ पानी। छत्तीसगढ़ मा जेन कोति भी जाहु, उत्ती ले लेके बुढ़ती अउ रक्क्छहु ले लेके भंडार कोति। सबो दिसा मा भरपुर बन, भुइयां अउ पानी मिलही। अउ इही बन बन-भुइयां मा भरे हे लोहा, टीना, कोयला के भंडार। इही भंडार जइसे छत्तीसगढ़ वाला मन बर पाप सरी होगे। काबर कि ये जिनिस के भंडार होय के बाद भी बन-भुइयां अउ पानी के बीच रहइयां…

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भाई दीदी असम के

हमर गुरतुर गोठ छत्तीसगढ़ी के बोलाईया मनखे हमर राज्य ले बाहिर घला रहिथें। ए प्रवासी छत्तीसगढ़िया, या फेर छतीसगढ़ वंशी मन मे सबले जुन्ना प्रवासी मन असम म रहिथें। अइसे कहे जाथे के इहाँ ले मनखे मन के असम जाए के सुरुआत आज ले करीबन डेढ़ सौ साल पहिली होये रिहिसे जब अकाल दुकाल के सेती जिये खाये बर हमर भाई बहिनी मन चाय के बगइचा मन म बूता करे बर गीन। ओ बेरा म उंखर मन के तदात कतका रिहिस होही तेला कहब तो मुस्कुल हे फेर आज ओ…

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