अब मंतरी मन बर रेड सिग्नल … लाल बत्ती खतरा हे !

रेड सिग्नल वइसे खतरा के निसान माने जाथे। फेर इही खतरा के निसान कोन जनि कब ले नेता-मंतरी ले के अधिकारी मन बर रुतबा के चिन्हारी बनगे मैं तो नइ जानव आप मन जानव होहु त समझ लेहु। वइसे सच तो इही हरय के लाल सिग्नल हा खतरा के ही निसानी हरय। जनता मन ला तो नेता-मंतरी, अधिकारी मन ले खतरा रहिबे करथे। तभे तो लाल बत्ती वाला गाड़ी ले जब कान फोडू अवाज आथे सब सचेत हो जाथे। अउ वो गाड़ी मा बइठइया मन जइसे जनता ला डराय, झुझकाय…

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दारु संस्कृति म बूड़त छत्तीसगढ़

हमर छत्तीसगढ़ ह कौसिल्या दाई के मईके हरे।जौन राम ल जनमदिन जेन मरयादा पुरुसोत्तम होईन। राम कृष्ण के खेलय कूदय छत्तीसगढ़ के कोरा सुघ्घर अऊ पबरित रहीस।आज अईसे का होगे कि अईसन छत्तीसगढ़ म दारु संस्कृति ह पांव लमावत हे। छट्ठी बरही , जनमदिन ,बरसी,सगई, बर-बिहाव, नौकरी लगे,परमोसन, तीज-तिहार, मेला-मड़ई,सबो बेरा म मंद दारु अपन परभाव देखाथे। मैं एक घर छट्ठी म गय रहेंव। मंझनिया भातखाय के बेरा सबोझन ल बलाईस, छत म टाटपट्टी जठा के छत्तीसगढ़िया रेवाज म बईठारिस। पतरी बांट के बरा, सोंहारी, तसमाई, छोले पोरस दिन ,पाछू-पाछू…

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नारी सक्ती जगाना हे – दारु भटठी बंद कराना हे

बसंती ह अपन गोसइन बुधारू ल समझात रहिथे के – तेंहा रात दिन दारू के नशा में बुड़े रहिथस। लोग लइका घर दुवार के थोरको चिंता नइ करस ।अइसने में घर ह कइसे चलही ।दारू ल छोड़ नइ सकस ? बुधारू ह मजाक में कहिथे – मेंहा तो आज दारू ल छोड़ देंव वो। बसंती चिल्लाथे — कब छोड़े हस, कब छोड़े हस ? फोकट के छोड़ देंव कहिथस । बुधारू – अरे आज होटल में बइठे रेहेंव न,आधा बाटल दारू ल उही जगा छोड़ देंव । बसंती — हाँ…

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डाकघर म करावव रजिस्ट्रेशन, मोदी सरकार नौकरी देही

डाकघर म करावव रजिस्ट्रेशन, मोदी सरकार नौकरी देही राजधानी के मुख्य डाकघर सहित प्रदेश के जिला मुख्यालय मन के डाकघर अब रोजगार केन्द्र के रूप म विकसित करे जाही। ए केन्द्र मन म बेरोजगार मन के ऑनलाइन पंजीयन करे जाही। दिल्ली म औपचारिक निर्णय के बाद अब जम्‍मो राज्य मन ले प्रारंभिक जानकारी मंगाए गए हे। loading… विभागीय सूत्रों का कहना है कि इस बारे में अभी मंत्रालय स्तर पर ही निर्णय हुआ है। डाकघरों में इसके लिए सुविधाएं बढ़ाने के लिए प्रस्ताव मांगे गए हैं। रोजगार केन्द्र विकसित करने…

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पुस्तक समीक्षा : चकमक चिंगारी भरे

दोहा हिन्दी साहित्य के जुन्ना विधा आय। भक्तिकाल में कबीर, सूर, तुलसी, रसखान, रहीम आदि कवि मन दोहा के माध्यम ले जन जागरण के काम करिन। बिहारी तो सतसई लिख के अमर होगिन, बिहारी के सतसई परंपरा ल छत्तीसगढी म आगू बढाय के काम श्री बुधराम यादव जी अपन दोहा सतसई “चकमक चिंगारी भरे” म करे हवय। चार चरण अउ दू डांड म कहे जाने वाला दोहा लिखना गगरी म सगरी भरे के चुनौती भरे काम आय। दिखब म जतका सरल दिखथे लिखे म वोतके कठिन काम आय दोहा लिखना,…

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कहाँ गंवा गे सिरतोन के मनखे

एक दिन के बात आय एक ठन कुकुर पिला दिनभर हमर गाँव के रद्दा म किंजरत रीहिस अऊ ओ रद्दा म बिक्कट गाड़ी मोटर चलत रथे। पिला बड़ सुग्घर धवरी रंग के गोल मटोल दिखत रीहिस जेन देखे तिही ओखर संग खेले के जतन करे लागे। फेर कोनहो वोला रद्दा ले नई टारीन अऊ ओखर माई हा घलो कभू तिर म आये ताहन फेर आने कोती चल देवय। अईसन दिनभर होईस। फेर रतिहा के आठ बजे अलहन होगे ओ पिला ल एक ठन गाड़ी वाला हा रेत के भाग गिस।…

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मंहगाई

मंहगाई के मार से , बच न सके अब कोय, जेकर जादा लइका रही, तेला मरना होय। का अमीर अऊ का गरीब, सबके एके हाल, चक्की में पिसावत हे, सबके हाल बेहाल । दौलत खातिर लड़त हे, भाई भाई आज, घर परिवार ल दुख देके, अपन करत राज। दौलत ही सब कुछ हे, महिमा अपरंपार, कतको ग्यानी ध्यानी होही, कोनों न पावे पार। जेकर पास दौलत हे, उही करत हे राज , कुछू भी करही तब ले, ओला नइहे लाज । कतको पढ लिख के, घूमत हे बेरोजगार, जब तक…

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व्‍यंग्‍य : नावा खोज

डोकरी दई के छोटे बेटा ला परदेस मे रहत बड़ दिन होगे। चिट्ठी पतरी कमतियागे। बेटा ल बलाये खातिर, खाये, पहिरे अऊ रेहे के निये कही के सोरियावय, डोकरी दई। को जनी काये मजबूरी म फंसे रहय, बेटा नी आवय। तभे मोबाइल जुग आगे, बेटा ओकर बर, मोबाइल पठो दीस। दई पूछीस ये काबर? बेटा बतइस ‌‌- तोर खाये पिये अऊ रेहे के, सबो समसिया येकरे आगू म गोहनाये कर, समाधान हो जही। दई समझीस के अतेक काम के आय, त येला जतन के राखना चाही। फुला म मढ़हाहूं त,…

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असम में जीवंत छत्तीसगढ़

हाल ही में श्री संजीव तिवारी के वेब मैगज़ीन गुरतुर गोठ में एक लेख पढ़ा था जिसमे लोटा के चलन के विलुप्त होने की बात कही गयी थी। चिंता सही हैं क्योंकि अब लोटे का चलन पारंपरिक छत्तीसगढ़ी घरो में उस तरीके से तो कम ही हो गया है जैसा शायद यहाँ पर पहले होता रहा होगा। पर संयोग से इस लेख के पढ़ने के तुरंत बाद ही एक ऐसे इलाके में जाने मिला जहाँ लोटे की उपयोगिता वहां के छत्तीसगढ़ी समाज में देखने मिला। लगता है शायद वह भी…

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होरी हे रिंगी चिंगी : रंग मया के डारव संगी

फागुन के महिना रिंगी चिंगी रंगरेलहा अउ बेलबेलहा बरोबर हमर जिनगी मा समाथे। जिनगी के सुख्खा और कोचराय परे रंग मा होरी हा मया-पिरीत,दया-दुलार,ठोली-बोली,हाँसी-ठिठोली के सतरंगी रंग ला भरथे। बसंत रितु हा सरदी के बिदा करे बर महर-महर ममहावत-गमकत गरमी ला संगवारी बनाके फागुन के परघनी करथे। फागुन के आये ले परकीति मा चारों खूँट आनी-बानी के रिंगी-चिंगी रंग बगर जाथे। गहूँ के हरियर रंग,सरसों के पिंयर रंग,आमा मँउर के सोनहा रंग,परसा के आगी बरन लाली रंग,जवाँ,अरसी फूल अउ अँगना मा गोंदा, गुलाब,किसिम-किसिम के फूल घलो छतनार फुले फागुन के…

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