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नानकिन किस्‍सा : अमर

आसरम म गुरूजी, अपन चेला मनला बतावत रहय के, सागर मनथन होइस त बहुत अकन पदारथ निकलीस। बिख ला सिवजी अपन टोंटा म, राख लीस अऊ अमरित निकलीस तेला, देवता मन म बांट दीस, उही ला पीके, देवता मन अमर हे। एक झिन निचट भोकवा चेला रिहीस वो पूछीस – एको कनिक अमरित, धरती म घला चुहीस होही गुरूजी …..?

गुरूजी किथे – निही… एको बूंद नी चुहे रिहीस जी …। चेला फेर पूछीस – तुंहर पोथी पतरा ला बने देखव, एक न एक बूंद चुहेच होही …? गुरूजी खिसियागे – अरे भोकवा, एको बूंद चुहितीस त, धरती के कन्हो ला तो मिलतीस अऊ ओला लील के उहू अमर हो जतीस। चेला फेर पूछिस – मोर एक ठिन अऊ सवाल हे गुरूजी, धरती म अमरित एको बूंद नी चुहे रहितीस त, इहां जनम धरइया राजनीति काबर नी मरे गुरूजी …? का वोहा देवता आये, जे सरग ले, अमरित पी के आहे …? कारन खोजे बर, गुरूजी सरग सिधार दीस …।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा

मुद्दा के ताबीज

केऊ बछर के तपसिया के पाछू सत्ता मिले रहय बपरा मनला। मुखिया सोंचत रहय के, कइसनों करके सत्ता म काबिज बने रहना हे। ओहा हरसमभव उपाय करे म लगे रहय। ओकर संगवारी हा देसी तरीका बतावत, एक झिन लोकतंत्र बाबा के नाव बताइस जेहा, ताबीज बांध के देवय। लोकतंत्र बाबा के ताबीज बड़ सरतियां रिहीस। जे मनखे ओकर ताबीज पहिर के, ओकर बताये नियम धरम के पालन करय तेला, ओकर वांछित फल खत्ता म मिलय।

एक दिन लोकतंत्र बाबा तिर पहुंचगे मुखिया हा। बाबा तकलीफ पूछिस। मुखिया कहिथे – तकलीफ कहींच निये बाबा। सिरीफ येके ठिन फिकर रहिथे के, अत्तेक बछर के मेहनत म सत्ता मिले हे हांथ ले झिन छूटय। बाबा किहीस – नी छूटय। उपाय कर देथन फेर, कुछ नियम हे तेला पालन करे बर परही। मुखिया कहिथे – सत्ता ला हांथ म चपक के राखे बर, हरेक नियम धरम अऊ सरत मनजूर हे बाबा। बाबा कहिथे – कोई बहुत बड़का नियम निये गा। एक ठिन ताबीज देवत हंव, येला कभ्भू झिन उतारबे चाहे कतको गरगस लागय। येला टोंटा म लटकाके राखबे अऊ जनता ला जब पाये तब, देखावत रहिबे। मुखिया कहिथे – टोंटा म लटकाना तो ठीक हे बाबा फेर, जनता ला जब पाये तब देखा के, काये करबो ? बाबा कहिथे – निचट भकला अस यार, पहिली बार मुखिया होय के सवाद चिखे हस कस लागथे। मेंहा ताबीज म कुछ अइसे मंत्र बांध के देवत हंव जेला, जतका दिन तक लटकाके देखा सके म सफल रहिबे, ततका दिन तक, दुनिया म कोई माई के लाल, तोर हाँथ ले सत्ता नी नंगा सकय।

मुखिया हा लोकतंत्र बाबा के बात समझिस निही। बाबा हा फोर के बताये लगिस। बाबा किहीस – मंदीर के मुद्दा, आरकछन के मुद्दा, करिया धन के मुद्दा, झीरम के मुद्दा, घोटाला के मुद्दा, देसी बिदेसी के मुद्दा, महंगई के मुद्दा अऊ बिकास के मुद्दा ला, ताबीज म भर के देवत हंव। येला जब तक लटकाये रहिबे तब तक, सत्ता म बने रहिबे। बीच बीच म जनता ला देखाके, आसवस्त करबे के, तुंहर समसिया के भार ला, अपन टॉंटा म लटकाके किंजरत, तुंहरे बर मरत हंव। एक बात अऊ, जे दिन मुद्दा के ताबीज ला लटकाये के बजाय, अपन होसियारी देखाबे ते दिन, बिपक्छ म बइठे बर तियार रहिबे। मुखिया समझगे। बीते समे कस, मुद्दा ताबीज बनके फेर लटकगे, को जनी अवइया कतेक बछर बर ……….. ।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा

बियंग: ये दुनिया की रस्म है, इसे मुहब्बत न समझ लेना

मेंहा सोंचव के तुलसीदास घला बिचित्र मनखे आय। उटपुटांग, “ भय बिनु होई न प्रीति “, लिख के निकलगे। कन्हो काकरो ले, डर्रा के, परेम करही गा तेमा …… ? लिखने वाला लिख दिस अऊ अमर घला होगे। मेहा बिसलेसन म लग गेंव।
सुसइटी म चऊंर बर, लइन लगे रहय। पछीना ले तरबतर मनखे मन, गरमी के मारे, तहल बितल होवत रहय। सुसइटी के सेल्समेन, खाये के बेरा होगे कहिके, सटर ला गिरावत रहय, तइसने म खक्खू भइया पहुंचगे। गिरत सटर अपने अपन उठगे, खक्खू भइया के चऊंर तऊलागे, पइसा घला नी दिस। सेल्समेन के चेहरा म, दरदीला मुसकान दिखत रहय। भइया ला सरबत घला पियइस। ओकर जाये के पाछू, दुकान के कूलर म टिप टिप ले पानी भराये के बावजूद, हावा गरम गरम फेंके लगिस। सेल्समेन के देंहे, पइसा के भरपाई हिसाबत, पछीना पछीना होगे। लइन म लगे मनखे मनले घला, बिरोध के कन्हो स्वर सुनई नी दिस बलकि, जम्मो झिन भइया ला हाथ जोर के, नमसकार तक करिन। ओकर जाये के पाछू, सेल्समेन ला, तैं बिगन लइन लगे कंन्हो ला रासन कइसे दे कहिके बखानिन ….. अऊ अइसन रासन लेगइया बर घला बुड़बुड़इन। यहू तिर, भय दिखीस, फेर पिरीत नी दिखीस।




मोर गांव के एक झिन मनखे, अतेक सुंदर लिखय के, जब ओकर रचना छ्पय, बिगन पढ़हे, ओकर संगवारी मन, बहुत सुंदर रचना, बधई हो, अइसे कहय। में सोंचेव, मोरो कभू कभार छपथे, बिया मन एको झिन कहींच नी कहय। पाछू पता चलिस के, ओकर जम्मो संगवारी मन ओकर ले डर्राथे अऊ उही डर के मारे, बहुत सुनदर रचना कहत, बधई पठो देथे। फेर मोला लागथे, येमा परेम कती तिर उपजिस होही ….. ? खैर, बात अइस गिस निपटगे।
लइका के जाति परमान पत्र बर, कतेक दिन होगे रहय, तहसील दफतर के चक्कर काटत। बाबू ते बाबू, अरदली तक ला खवा पिया डरे रहंव। एक दिन तमतमाके आपिस पहुंचेंव, बाबू साहेब ला खिसियाहूं सोंचेंव। अरदली मोला बाहिर म छेंक दिस। थोकिन बेर म एक झिन ननजतिया अइस, बिगन रोक छेंक, खुसरिस। आधा घंटा म, हाथों हाथ लइका के जाति परमान पत्र धरके निकल गिस। अरदली हा आये जाये के दुनो बेरा म नमसकार करिस, फेर थोकिन दुरिहइस तहन, फोकट राम कहिके, बखानिस। तुलसीदास जी के, भय बिनु होई न प्रीति, यहू तिर फेल होगे।




तुलसीदास के चौपाई गलत होही त, लोगन येला पढ़थेच काबर। मोर दिमाक चले लइक नी रहिगे काबर के, चुनई आगे। बड़े बड़े मइनसे मन, नान नान, चांटी फांफा चिरई चिरगुन कस मनखे मनले, अतेक परेम करे लगगे के, ओकर परेम गाड़ा म नी हमावत रहय। नानुक बइगा घर के छट्ठी, पहटिया घर के काठी, रेजा घर के बिहाव, मिसतिरी घर के कथा पूजा, बढ़ई घर के रमायन, चपरासी के लइका के जनम दिन, कोटवार घर के जवारा, कहींच नी छूटत रहय। इहां तक परेम उमड़गे रहय के, काकर घर काये होने वाला हे, जेमा जाके, परेम बांट सकन, तेकर तियारी एडवांस म होये लगगे। कोन ला काये बात के कमी हे अऊ काकर तिर काये बिपदा हे तेला दुरिहाये बर , एसी म रहवइया बपरा मन, गांव गांव, गली गली, जनगल जनगल, धूप छांव ला झेलत किंजरत रहय। ऊंकर परेम के गहरई म सागर उथला परगे। उदुपले अतेक परेम पाके, मनखे के सुकुरदुम हो जाना सुभाविक हे। इही बेरा म, तुलसीदास जी के चौपाई के अरथ मिलगे। में जान डरेंव तुलसीदास इही बेरा बर लिखे रिहीस होही। चुनई आगे, खुरसी बचाना हे या खुरसी पाना हे। खुरसी गंवाये के या खुरसी तक नी पहुंच सके के डर हा, बड़का मनखे मन के हिरदे म, अतेक परेम भर दिस के, तुलसीदास के चौपाई, अकछरसह सहीच होगे के, भय बिनु होई न प्रीति …….। छ्त्तीसागढ़िया का जानय अइसन फरेबी परेम ला। परेम देवइया अपन मतलब साध के, भेंट लागत, अपन बात कहत, धीरे से मसक दिस –
महफिल में गले मिल के, वो धीरे से कह गए।
ये दुनिया की रस्म है, इसे मुहब्बत न समझ लेना।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा



रखवारी

जनगल के परधान मनतरी हा, जनगल म परत घेरी बेरी के अकाल दुकाल के सेती बड़ फिकर करय। जे मुखिया बनय तिही हा, जनगली जानवर मन के फिकर म दुबरा जाये। एक बेर एक झिन मुखिया ला पता चलिस के, दूर देस के जनगल म, एक ठिन अइसे चीज के निरमान होये हे, जेला सिरीफ अपन तिर राखे ले, भूख गरीबी डर भय अपने अपन मेटा जथे। बड़ महंगुलिया आइटम रिहीस हे फेर, जनता के सेवा बर बिसाना घला जरूरी रिहीस। ओहा वो आइटम ला बिसाये के तै करिस। उधारी बाढ़ही करके अपन पेट काटके, बिसाये बर उदिम रच डरिस। जनगल के बिपकछी मन मुखिया उप्पर आरोप लगाये बर धर लिस। उंकर कहना रहय के, खाये बर दाना निही पादे बर भूंसा …..। का जरूरी हे अइसन चीज के, जेहा सिरीफ देखे के आय। बिपकछी मन, अवइया समे म मुखिया फेर रिपीट झिन होय कहिके, अबड़ डमफान मचइन। फेर मुखिया के इकछासकती के आगू काकरो नी चलिस। बिपकछी मन मुखिया उपर कमीसन झोंके के आरोप लगा दिन। मुखिया हा कमीसन के आरोप ले बिलकुलेच बेफिकर, ओ आइटम ला बिसा डरिस।
जनगल म एक बेर सनकट आगे। पानी नी गिरीस, दुकाल परगे। जानवर मन भूख के मारे तड़फे लगिन। चिरई चिरगुन पटापट मरे लगिन। जीव बचाये बर, महंगुलिया आइटम ला बाहिर निकाले के दिन आगे। फेर मुखिया ओला बाहिर निकालबेच नी करय। जे सनकट खातिर ओला बिसाये रहय उही सनकट आये म, ओकर उपयोग करत नी देख, बिपकछी मन जनगल के सरकारी कछेरी म नालिस कर दिस। कछेरी म बइठे जज, सफेद हाथी हा, बाढ़हत दबाव देख, सग्यान लिस अऊ जनगल के सरकार ला तलब करिस अऊ महगुलिया आइटम ला जानवर मन बर सारवजनिक करे बर किहीस। सरकार बहुत टालमटोल करिस फेर कछेरी के फटकार परिस त, ओ आइटम ला बाहिर निकाले बर, अपन मातहत मनला आदेस दिस।
केऊ दिन निकलगे। आइटम निकलबेच नी करिस। जानवर मन भूख म पटियाये लगिस। कछेरी म बइठे जज सफेद हाथी हा, पहिली बेर सहींच के सखती देखइस। महंगुलिया आइटम बाहिर अइस। ओकर नाव, राफेल हाड़ा रिहीस। येहा अइसे आइटम रिहीस, जेहा वाजिम म, जनता जानवर बर नी रिहिस बलकी, जनगल के नेता जानवर मनके पेट ला बिगन देखे भरे बर आय रिहीस। कछेरी हा राफेल हाड़ा ला देखेके इकछा परगट करिस। सरकार देखा नी सकिस सिरीफ इही बतइस के, ये हाड़ा हा सिरीफ कागज म बांचे हे। कछेरी पूछिस – कइसे ? त सरकार बतइस के, जेला येकर रखवारी बर राखे रेहेन तिही मन, येला चघलके नोच डरिन। कछेरी अवाक रहिगे अऊ पूछिस के आखिर कोन अइसे जानवर आय जेकर ले हाड़ा के रखवारी करवावत रेहेव ? जनगली सरकार बहुत मायूसी ले जवाब दिस – कुकुर ला हाड़ा के रखवारी बर नियुक्त करे रेहेन जज साहेब। उही हा पूरा हाड़ा ला ओकर लेनदेन के कागज समेत चट कर दिस। जांच चलिस। कुछ समे बाद ……. हाड़ा बोजइया कुकुर मिलगे फेर, कुकुर के मुहुं म हाड़ा चुचरे के सबूत नी मिलीस। मामला चुनई तक खूब जोर पकड़िस। चुनई सिरागे। राफेल हाड़ा बिगन दिखे कतको के भूख मिटा दिस। फायदा पवइया सबो के मुहुं अपने अपन सिलागे। जनगल के जनता जानवर मन, अपन हिस्सा के राफेल हाड़ा अगोरत मुहुं ताकत बइठे हे।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा .

अवइया चुनाव के नावा घोसना पत्र

जबले अवइया चुनाव के सुगबुगाहट होय हे तबले, राजनीतिक पारटी के करनधार मनके मन म उबुक चुबुक माते हे। घोसना पत्र हा चुनाव जिताथे, इही बात हा , सबो के मन म बइठगे रहय। चुनाव जीते बर जुन्ना घोसना पत्र सायदे कभू काम आथे तेला, जम्मो जानत रहय। तेकर सेती, नावा घोसना पत्र कइसे बनाय जाय तेकर बर, भारी मनथन चलत रहय।
एक ठिन राजनीतिक दल के परमुख हा किथे – हमर करजा माफी के छत्तीसगढ़िया माडल सबले बने हाबे, उही ला पूरा देस म लागू कर देथन, अपने अपन हमर पक्छ म वोट गिर जही। ओमन अपन घोसना पत्र म, करजा माफी ला परमुखता ले सामिल करिन।
दूसर राजनीतिक दल सोंचत रहय के, करजा माफी के काय काट हे। बिचार बिमर्स म रद्दा मिलगे। येमन तै करीन के करजा माफी तो करबेच करबो ओकर बाद जतका झिन करजा ले रइहि तेला करजा के अनुसार बोनस देबो। जे जतका जादा करजा ले रहि अऊ नी पटाही तेला ओतके जादा बोनस देबो।
तीसर हा गठबनधन वाला पारटी आय यहू मन सत्ता म आये बर कुलबुलावत छटपटावत रहय। येमन दुनों के करजा माफी यंत्र के खूब मनन अध्धयन करीन अऊ तै करीन के येकरो ले आगू जाना हे। ये मन तै करीन के सत्ता म आके हरेक मनखे ला मुफत म करजा देबो। जेला करजा नी चाही तहू ला करजा बोहाबो। फेर कोई ला करजा पटाये के कोई आवसकता निये। बलकी अवइया पांच बछर के भितर सासन खुद पूरा करजा ला पटाके जम्मो ला करजा मुक्त कर के जाही – अइसे घोसना पत्र म लिखना सुरू कर दिन।
इहां कतको बन बांदुर कस राजनीतिक पारटी जामे रहय। ओमा के कुछ मन कछेरी म घोसना पत्र जमा करत लिखे रहय के, एक बेर हमनला जितावव, न जनता ला काम करे लागे न बूता, सरकार हा जनता ला पांच बछर बइठे बइठे खवाही। जनता के खेत म धान सरकार उपजाही, ओकर बर सरकारी करमचारी नियुक्त करबो। पानी सरकार पलोही। फसल सरकार काटही अऊ बेंच के ओकर पइसा ला जनता के खाता म सरकार जमा करही। अऊ तो अऊ येकरो उप्पर बोनस देबो। जनता ला अपन अपन घर म दार भात झिन रांधे लागय तेकर बर बेवस्था सरकार करही अऊ ओकरो बर सरकारी करमचारी लगाही। अदालत म सपथ पत्र जमा करत बतावत रहय के येकर ले करोड़ो बेरोजगार मनला नौकरी मिल जही।
सिरीफ करजा माफी करइया पहिली पारटी ला, अइसन लुभावन घोसना पत्र बनत हे कहिके, भनक लगगे त, ओमन सोंच म परगे के, अइसन म कोन हमन ला कोन वोट दिही, तब ओमन अपन घोसना पत्र ला रिवाइस अऊ माडीफ़ाइड करिन। येमन अपन घोसना पत्र म लिखीन – हमन जनता ला मुफत म सिरीफ खवावन निही बलकी ऊंकर कुला घला धोबो। जनता के बिसतर घला हमर करमचारी बिछाही, घरों घर बरतन मांजही, कपड़ा घला धोही।
करजा माफी के उप्पर बोनस देवइया दूसर पारटी ला अइसन घोसना पत्र के पता चलगे त, ओमन घला अपन पारटी के बइसका बला डरिन अऊ वहू मन अपन घोसना पत्र म अमेंडमेंट करे लगिन। ओमन लिखिन – सिरीफ करजा लेवइया ला निही बलकी, जे जतका जादा सरकारी खजाना के मुफत माल के उपयोग करही अऊ जेकर उपर जतका अधिक सरकारी खरचा होही, ओमन ला ओकर हिसाब से ओतके जादा बोनस देबो।
तीसर गठबंधन पारटी वाले मनला कहां चूकना हे, ओमन तो सुंघियात रहय। यहू मन अपन घोसना पत्र के पुनरनिरमान म जुटगे अऊ यहू मन तै करके घोसना पत्र म लिख दिन के, हमर सरकार बनतेच साठ, कहूं ला करजा मांगे के कोई आवसकता निये। अपने अपन ऊंकर खाता म, उंकर जरूरत ले डबल करजा जमा हो जही अऊ जतका बेर जौन आही अऊ करजा के जतका पइसा के आवसकता महसूसही ओतके बेर, रिजर्व बैंक के कपाट खोल के ओकर पूरती कर दे जाही, रिजर्व बेंक तिर नी रइहि त ओतके बेर नोट छाप के दिही।
खरपतवार पारटी मन कहूं चुप रइहि गा। ओमन लिखीन – येमन जम्मो झिन लबारी मारत हे। अतेक के करत ले येकर मनके लीदी निकल जही। येमन अतेक घोसना ला पूरा करे बर पइसा कतिहां ले लानही। जबकी हमर तिर उपाय हे। हमन पइसा के जुगाड़ करे के जुगत जमा डरे हन‌। जतका बेर जेन ला पइसा चाही, रिजर्व बेंक तिर नी रइहि त ओहा ओतके बेर छाप के थोरहे दिही, ओला छापत ले टाइमेच लागही। पइसा अगोरत ले, बपरी जनता के समे खराब होही। तेकर सेती हरेक जिला मुखियालय म, पइसा छापे के मसीन लगाके पइसा बितरन के बेवस्था करबोन।
पहिली पारटी के घोसना पत्र हा थोकिन कमजोर परगे। ओमन फेर सकलागे अऊ जनता ला अपन घोसना पत्र म नावा लइन जोड़ के बतइन के, जनता ला करजा बर या नोट बर बेंक जाये के या छापखाना जाये के आवसकता निये। सरकार के करमचारी मन ऊंकर घर के दुवारी म पइसा धर के खड़े रहि। जतका बेर जनता चाहही, ओतके बेर ओकर हाथ म पइसा, घर के दुवारी म हाजिर मिलही ……।
दूसर पारटी वाले मन सोंचिन – अइसन म हमन हार जबो। कुछ उपाय करे जाय। ओमन जनता ला बता नी सकत रहंय के पइसा कतिहां ले आही। बिदेस म जमा करिया धन लानत लानत बुढ़हागे रहय, अभू ओकर का आस। तभे एक बिचार अइस – हरेक घर पिछू नोट छापे के मसीन दे के घोसना कर दिन, जेमा ओमन जतका बेर चाहय, घरे भितरी म पइसा के बेवस्था हो जही, घर के मुहाटी तक जाये के आवसकता घला झिन परय। ओमन जनता ला बतावत रहय के, सरकारी करमचारी के काये भरोसा ……। ओला पइसा धरा के दुवारी म खड़ा करइया मन जानत हे के सरकारी करमचारी हा बात बात म कमीसन मांगथे, ओमन तुंहर पइसा म, अपन हिस्सा अऊ प्राफिट खोजत हे। अपोसिट पारटी के जोजना ला फेल होये के भविसबानी करत, अपन तरकीब ला सिरतोन के अऊ बहुतेच बिसवासपात्र बतइन।
तीसर पक्छ के मन मुड़ी धरके बइठे रहय। ओमन येकर काट सोंचत रहय। ओमन जनता तिर प्रचारित अऊ परसारित करिन के, दुनों झिन लबारी मारत हे। येमन कुछ नी करय। फेर हम करके देखा देबो अऊ ओकरो ले बढ़िया करके देखाबो। ओमन अपन घोसना पत्र ला जारी करे के पहिली आखिरी लइन जोड़िन के, हमर सरकार बने के चौबीस घंटा के भीतर, घर पाछू निही बलकी हरेक मनखे पाछू पइसा छापे के मसीन वितरित हो जही अऊ ओमा न जी एस टी के झनझट, न अधार ले लिंक के झनझट। तुरते पइदा होवइया ला तको, पइदा होतेच साठ पइसा छापे के मसीन मिल जही।
घोसना पत्र के प्रति जनता के अतेक लालच अऊ परभाव ला देखके छुटका पारटी वाले मन काबर पिछू रइही। ओमन अपन घोसना पत्र म आखिरी लइन लिखीन – जम्मो जनता के संगे संग, न सिरीफ पइदा होवइया नवजात ला, बलकी अवइया पांच बछर तक, बिहाव लइक नोनी बाबू ला ओकर कोख ले जनमइया लइका बर, नोट छापे के मसीन एडवांस म देबो। अऊ तो अऊ ये पांच बछर म जे मनखे मर जही तेकरो ले मसीन वापिस नी मांगन, बलकी सरग या नरक तको म घला निरबाध उपयोग के छूट देबो।
भगवान कसम, नींद खुलिस, त समझ नी आवत रहय के नींद म हंव के जागत हंव अऊ जागगे हंव त, सपना आय के सहींच के बात आय। दसना ला टमरेंव त समझ अइस के सपना आय फेर सवाल ठड़ा होगे – सपना सच आय के लबारी। को जनी नींद नी खुलतिस त अऊ कतिहां तक जातिस घोसना पत्र हा। फेर सहींच म नींद खुलगे तब सच पता चलिस के, भारत माता के घेंच म बड़े जिनीस घोसना नाव के पथरा बंधाये रहय अऊ खुरसी के लालच के पानी म नेता मन ओला ढकेल दे रहय जिंहा भारत माता हा बचाओ बचाओ चिचियावत बुढ़त रहय।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा .

लोकतंत्र के आत्मकथा

न हाथ न गोड़, न मुड़ी न कान। अइसे दिखत हे, कोन जनी कब छूट जही परान। सिरिफ हिरदे धड़कत हे। गरीब के झोफड़ी म हे तेकर सेती जीयत हे। उही रद्दा म रेंगत बेरा, उदुप ले नजर परगे, बिचित्र परानी ऊप्पर। जाने के इकछा जागिरीत होगे। बिन मुहू के परानी ल गोठियावत देखेंव, सुकुरदुम होगेंव। सोंचे लागेंव, कोन होही एहा ? एकर अइसे हालत कइसे होइस , अऊ एहा कइसे जियत हे ?
तभे हांसे लागिस ओहा। अऊ केहे लागिस, तेंहा अइसे सोंचत हावस बाबू, जानो मानो मोला कभू नि देखे हस। मय अवाक रहि गेंव। अभू ले पहिली सहीच म तोला देखे नि अंव, त जानहूंच कइसे ? मोर अइसन हालत के जिम्मेदार तहूं तो अस। न चिन न पहिचान, अउ उप्पर ले मोरे उप्पर आरोप घला लगावत हे। मय उठे ल धरेंव। अरे, येहा अंधरा हे, फेर मोला कइसे चिन्हत हे ? एकर नाक कान गला कहींच नि दिखत हे, कइसे सुनत हे कइसे गोठियात हे ? समझ नि अइस।
मोर जिग्यासा बाढ़गे। उठत रेहेंव, ते बइठ गेंव। बइठ बाबू, मोला अइसन इसथीति में अमरा के तहूं खिसकना चाहथस। कतको अइन, कतको गिन फेर कन्हो ल मोर दसा उप्पर तरस नि अइस। तैं कोन अस तेला तो बता ? बतावत हंव बाबू, अधीर झिन हो। अभू ले तीन कोरी छै बछर पहिली मोर जनम होय रिहीस। जनम देवइया मन मोला जनम देके पाछू राखना नि चाहिन। जेकर डेरौठी म ओड़ा देथंव, तिही दुतकारथे। जेन मनखे ल अपन समझथंव, उहींचे ले दुतकार मिलथे।
पहिली व्यवस्थापिका के कुरिया म अपन ठिकाना बनाये के, अपन आप ल इसथापित करे के परयास करेंव। वोमन मोला कुटकुट ले मारिन पीटिन। मय रेंगे झिन सकंव कहिके, मोर गोड़ ल टोर के बइठार दिन। केऊ खेप मोर नाक इंखरे मन के सेती कटिस। जइसे तइसे उहां ले निकल के कार्यपालिका कोती परस्थान करेंव। देखते देखत मोर हाथ ल काट दीन बइरी मन , ताकी कुछू काम बूता झिन कर सकंव। बड़ निरास होगे रेहेंव। फेर आसा के किरन दिखीस न्यायपालिका कोती। उहू हथियार धरके बइठे रिहीस। जातेच साठ दिमाग ल नंगा लीस , सोंचे झिन सकय कहिके। जेल म डारे बर धरत रिहीस। बड़ मुसकिल ले परान छोड़ा के पल्ला भागेंव चउथा स्तम्भ कोत। उहू कमती खतरनाक नि रिहीस। मोर आए के अगोरा म रिहीस एमन। जइसे पहुंचेंव तइसे, देख झिन सकय, सुन झिन सकय, कहिके, आंखी अऊ कान ल काट के अपन झोला म धर लीन।
मय पूछेंव, एमन का करही तोर अंग मन ला ? जेमन मोर गोड़ ल राखे हावंय, तेमन जनता ल गुमराह करत बतावत फिरथें के देखव हमन अपन गोड़ म नि रेंगन, ओकर गोड़ अऊ ओकरे बताये रद्दा म रेंगथन। इही मन मोर नाक ल कटवा के, अपन नाक म लगवाके, अपन नाक ल ऊंच करके घूमथें। जेमन मोर हाथ ल धरे हे , तेमन कहिथें के ओकरे हाथ ले हमन जनता बर काम करत हन। मोर दिमाग लुटइया मन मोरे दिमाग ले हमर कारज चलत हे कहिके, डंका बजावत फिरथें। अऊ आखी कान लेगइया मन , जनता ल ये कहिके भरमाथे के, हम ओकरे आखी कान के हिसाब ले अपन कलम ल चलाथन।
अइसन म तोर अऊ कन्हो अंग ल लेगे बर आ जही तब ? तब ये गरीब के कुटिया म तैं कइसे सुरकछित रहि सकबे ? एमन तोला आके मार डारही तब ? हा…… हा……ह……। अभू तक हमर देस के ये चारों खम्बा के कन्हो नायक, गरीब के कुटिया के डेरौठी म अपन गोड़ ल नि मढ़ाए हे। अऊ अवइया समे म घलो नि मढ़ाये। त एकर ले सुरकछित जगा कती करा हे, तिहीं बता ? रिहीस गोठ बात मोर जिये मरे के, मय उंहे जिंदा रहि सकथंव जिंहा गरीब भुखहा मोर पेट भरय। जिहां उघरा नंगरा किसान मोर तन ढंकय। फुटपाथी मजदूर मोला अपन करा रेहे के जगा दय। अभू हांसे के पारी मोर अइस …. जेमन अपनेच बर नि कर सके, तेमन तोर का बेवस्था करहीं। खुद महामुसकिल ले जइसे तइसे अपन जिनगी ल पोहाथें, तोला काये जिंदा राखिही ? इही सचाई ल सवीकारना बहुत मुसकिल हे बाबू ….। इंकर तीर सच, अहिंसा, भाईचारा अऊ ईमान के हावा बोहावत हे। इही हावा मोला जिये बर उरजा देथे। अऊ जब तक हतियारा मन के गोड़ के धुर्रा , इंकर डेरौठी म नि परही, तब तक मोला कन्हो तकलीफ निये। मय तभू तक अराम से जिंन्दा हंव।
अब तो बता दव तूमन कोन अव ? अतका दुखड़ा सुनाये के पाछू मय सोंचेंव तैं जान गे होबे। इहां इहीच समसिया हे, जनता मोला सुरकछित जरूर राखे हे, फेर, जाने निही मय कोन आंव तेला…. । पांच बछर म जब जब मउका मिलथे त, सिरीफ एक घांव , मोर जिये के परमान देखा देतीस , त उही समे, मोर सरी अंग फेर वापीस जाम जतीस, अऊ तब मोर ताकत ले, देस के दसा घला सुधर जतीस। मिही ये देस के लोकतंत्र आंव बाबू , जे तीन कोरी छै बछर पहिली अमीर मन के कोठी म जनम धरे रेहेंव, जेला होते साठ घुरवा म फेंक दिन। मोला जिंदा रखे के, पाले के पोसे के अऊ कन्हो परकार ले सुरकछित राखे के पक्का इंतजाम गरीब, बेबस, लचार मनखे मन करत हांबय। वइसे हतियारा मन मोला जान सम्मेत मार घला देना चाहथें, फेर मोर मरे के घोसना नि चाहें। काबर मोरे नाव ले इंकर दुकान बिना कन्हो बिघन बाधा के जोरदार चलथे अभू घला। जेन घुरवा म मोला फेंकिन, वो घुरवा के दिन बहुरगे, फेर मोर कब बहुरही …… सुसके के अवाज आए लागिस। मय अभू तक गुनत हंव का वाजिम म, हमू मन घला लोकतंत्र के दुरदसा बर जिम्मेदार हन …….।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा

मोर गांव म कब आबे लोकतंत्र

अंगना दुवार लीप बोहार के डेरौठी म दिया बार के अगोरय वोहा हरेक बछर। नाती पूछय कोन ल अगोरथस दाई तेंहा। डोकरी दई बतइस ते नि जानस रे अजादी आये के बखत हमर बड़ेबड़े नेता मन केहे रिहीन के जब हमर देस अजाद हो जही त हमर देस म लोकतंत्र आही। उही ल अगोरत हंव बाबू। नाती पूछिस ओकर ले का होही दाई ? डोकरी दई किथे लोकतंत्र आही न बेटा त हमर राज होही हमर गांव के बिकास होही। मनखे मनखे में भेद नि रही। हमर गांव के गरीबी मेटा जही जेकर पेट म एक ठिन दाना निये तहू खावत खावत अघा जही। जेकर करा पहिरे बर चेंदरा निये तेहा लुगरा ओढ़ना म लदा जही। गली खोर म रथिया बितइया मनखे बर सुघ्घर सुघ्घर घर कुरिया छवा जही। कोन्हो लड़ही भिड़ही निही। जम्मो मनखे ल जिये के एके बरोबर अधिकार मिलही। एके बरोबर नियाव घला पाहीं जम्मो। गली गली म रमायन के चौपाई कुरान के आयात सबद कीरतन के गीत संगीत सुनई दिही।
नाती पूछिस वोला अगोरे बर दिया बारे के काये जरूरत हे दाई ? डोकरी दई किथे हतरे भकाड़ू कहींच नि जानस रे। इही दिया के अंजोर म लोकतंत्र ह रसता अमरही। दिया नि बारहूं त बपरा ह कइसे जानिही के कते गांव म समसिया हे कतिंहा खुसरना हे कतिहां के बिघन बाधा ल हरना हे। नाती बताये लगिस जउनला तैं अगोरत हावस न दाई तेहा तोर गांव म कभू नि आवय। डोकरी दई बिसबास ले किहीस काबर नि आही बेटा ? हमर करांतीकारी नेता मन केहे हे ते लबारी थोरेन होही। अभू के नेता मन कस ओमन लबरसट्टा नि होय बाबू । देस बर जान देवइया मनखे मन थोरेन लबारी मारही तुंहर गांव म लोकतंत्र आही कहिके। बड़ बिसवास रहय वोला। कोन्हो बछर नि छूटे डोकरी दाई हरेक छब्बीस जनवरी के लोकतंत्र ल अगोरत अपन डेरौठी म दिया बारके बइठे रतिस। ओकर नाती ओला रंग रंग के समझाये फेर वोहा गांठ बांध डरे रहय के छब्बीस जनवरी आही तहंले लोकतंत्र आही हमन राज करबोन हमर भुंइया के भाग जागही।
डोकरी दई ल फेर चुलकइस नाती हा दाई तेंहा बिसवास नि करस या। दिल्ली म उही दिन ले आगे हे लोकतंत्र ह फेर इहां आये के नाव नि लेवत हे। डोकरी दई मुहुं ला फार दिस ? दिल्ली म आगे हे उही समे ले। देखे बाबू में केहे रेहेंव न हमर करांतीकारी मन लबारी नि मारय। “ फेर इहां काबर नि हमाथे वोहा “ डोकरी दाई सोंचे लागिस। कोन्हों लोकतंत्र ल ओकर गांव म आये बर छेंकथे का ? तभे लोकतंत्र ओकर गांव कोती निहारत निये। हमर दिया के अंजोर कमती हो जथे का ? तेकर सेती ओला दिखय निही। उही दिन ले गली गली म अतका कस दिया जलाये के उदिम सुरू कर दीस के जगमग दिया के अंजोर म लोकतंत्र ला रसदा दिख जाय। अभू सुरहुत्ती कस दिया बरे लागिस चारो मुड़ा। मने मन बुड़बु‌डाय लगिस अब कइसे नि दिखही रे लोकतंत्र मोर गांव के रद्दा ह तोला। फेर नि अइस लोकतंत्र। नहाक गे वहू बछर। नाती फेर चुट ले कहि दीस लोकतंत्र अंधरा हे दाई तेंहा कतको कस दिया बार ओला काये फरक परही। दई किथे हत रे बैरी। पहिली नि बताये रहिते अंधरा हे लोकतंत्र कहिके काबर जगजग ले दिया बार के अगोरतेंन। जाथंव दिल्ली देखहूं कइसना करिया हे के गोरिया हे लोकतंत्र तेला। गांव आये बर नरियर पान सुपारी धरके मनाहूं लानत बनही त लानहूं निच मानही त डेना ल हचकार के धरहूं ईंचत लानहूं। दई चल दिस दिल्ली लंक कस टूटत। न पता जानय न ठिकाना कोन ल अउ कइसे पूछय। सुरता अइस उंखर नेता रिथे इहां उही जानत हे लोकतंत्र ल उही मिलवाही मोला। पहुंचगे नेता तिर। बड़ हांसिस नेता। नेता सोंचिस अतका दूरिहा ले आहे ममादाई एकर मांग पूरा करे लागही।“ इही लोकतंत्र हरे कहिके ” भेंट करा दीस एक झिन ले। डोकरी दाई ओकर दरसन करके बड़ खुस रिहीस। बड़ सुंदर रहय ओहा। दग दग ले सफेद सुंदर बाजर कपड़ा लत्ता पहिरे ओढ़े बइठे रहय। दाई सोंचत हे “ लोकतंत्र के आंखी निये अंधरा हे ओहा “ कहिके नाती टूरा कइसे लबारी मारिस तेला। लेकतंत्र के तीर म जाये के पहिली अपन देहें म महर महर सेंट ल गदगद ले रिको डरिस। दई सोंचत रहय ममहाहूं तंहले मोरे कोती आघू देखही तहन गोठियाहूं अऊ अपन गांव आये के नेवता दूहूं। जइसे गिस तीर म तइसे लोकतंत्र उठे लागिस दाई गोठियातेच हे वोहा दूसर डहर अपन थोथना ल टेकाये मुचुर मुचुर करत टुंग ले उठिस डोकरी दाई ल धकियावत कते कोती मसक दिस। हबरस ले उलंडगे डोकरी दाई। डोकरी दई अपन नाती के सुरता करत हे तेंहां सिरतोन केहे रेहे का रे। येहा फकत अंधराच नोहे भैरा अऊ नकटा घला आय कस लागथे। भैरा हे तभे सुनिस निही मोर एको गोठ अऊ बिन नाक के घला हे अतका कस सेंट म एको कनिक ओकर नाक म नि खुसरिस। अपन कस मुहूं करे लहुंट दिस।
वापिस लहुटतेच साठ बड़ गारी बखाना करीस डोकरी दाई। मोर अतका बछर के तपसिया भोसा गे। में जाने रहितेंव अइसने रिथे लोकतंत्र ते कभू ओकर रद्दा नि जोहतेंव। नाती बड़ हांसिस अऊ बतइस तेंहा जेकर तीर गे रेहे न दाई तेहा लोकतंत्र नोहे। अभू तें देखे कहां हस लोकतंत्र ल। वोहा कन्हो मनखे थोरे आय दाई। डोकरी दई किथे अई मेंहा मनखे हरे लोकतंत्र ह कहत रेहेंव बेटा। दाई के भरोसा फेर जागगे। मने मन गारी बखाना के सेती पछतावत रहय। अपन कलपना के लोकतंत्र ल देवता समझे अभू घला अऊ कहय मोर लोकतंत्र ल आवन दव तंहले बताहूं रे तूमन ल। मोला धकिया हस तेकर भुगतना ल भुगता के रहूं।
समे नहाक गे। डोकरी दाई निच्चट सियान होगे। बिमार परगे। “ तैं कब आबे लोकतंत्र मोर गांव म “ खटिया म पचत रहय फेर उइसनेच रटय दिन भर। पान परसाद खवा डरीन। बेटा मन किहीन राम राम बोल दाई राम राम। फेर ओकर मुहूं ले कहां निकलय राम नाम के गोठ ओकर मुहूं म फकत लोकतंत्र बसे रहय उहीच ल रटय। बुड़बुड़ावय – तैं आते मोर जान बचाते महू ल कुरसी म बइठारते मोर गांव के भाग जगाते। गीता के इसलोक सुनत डोकरी दाई खटिया म उदुप ले उठ के बइठगे। जम्मो झिन सुकुरदुम होगे दाई कइसे करथे ? जोर जोर से केहे लगिस दई – अभू तोला फुरसुत मिलिस लोकतंत्र मोर गांव म आये के। मोर जाये के पहरो म आये तें। में काला देखहूं। पहिली आते त महूं थोरकुन तोर मजा ले लेतेंव। तोर संग हांस लेतेंव गोठिया लेतेंव ददरिया गातेंव झूम लेतेंव नाच लेतेंव। मोर गांव के चिखला रद्दा म डामर के रंग चढ़ जतिस मोर लइका बालामन बर इसकूल खुल जतिस। मोर पारा म कुआं खना जतिस मोर गांव के तरिया नदिया के दिन लहुंट जतिस। मोर नाव के रासन कारड बन जतिस। मोर धान के किम्मत अऊ मोर मेहनत के इज्जत बाढ़ जतिस। मोर गांव म मंदीर बन जतिस मज्जिद के अजान सुन लेतेंव।
नाती सोंचिस दाई पगला गेहे लोकतंत्र के पाछू। जावत समे एकर भरम ल टोरना हे लोकतंत्र के असलियत ल बताना हे तभे येहा जाये के बेरा राम राम बोलही। नाती केहे लागिस तेंहा दिल्ली गे रेहे न दाई त जेन मनखे ले तोर भेंट होये रिहीस तउने लोकतंत्र आये दाई। तोर भरोसा झिन टूटे कहिके तोर करा झूठ बोलेंव। वोहा सहीच म अंधरा कनवा अऊ नकटा आये। इही लोकतंत्र के सेती तोर गांव म पक्का सड़क नाली इसकूल नि बन सकिस। भसकहा कुआं बनइया बिन सरोत के तरिया खनवइया नदिया म फुटहा भोंगरा पार बनवइया तोला मुखिया बनाके रासन कारड बना के तोला मुरूख बनइया तोर धान कस तोर मेहनत के किस्मत बिगड़इया तोर देस के सफ्फा नुकसान करइया इही लोकतंत्र आये दाई। ये लोकतंत्र गरीब बर नोहे दाई तैं फोकट ओकर अगोरा करत रेहे। जे लोकतंत्र के सपना सतनतरता सेनानी मन तोला देखाये रिहीन वोला जनम लेतेच साठ बइरी मन मुसेट के मार डरे रिहीस। ये अमीर मन के लोकतंत्र आय दाई। तभे झाड़ू कका अजादी के अतका बछर पाछू धान के कटोरा धरे दाना दाना बर लुलवावत हे। कपड़ा बिनइया चैती काकी के लइका नंगरा घूमत हे गली खोर म। दूसर बर घर बनइया खोरबाहरा रामबाड़ा के परसार म सुते बर मजबूर हे। अऊ तेंहा समझथस येहा तोर इलाज करवातिस कहिके। इही लोकतंत्र के इलाज म हमर बबा के आंखी फूटे रिहीस। तोर बेटी के कोख हरागे रिहीस। इही लोकतंत्र के सेती तोर गांव के बांधा फूट गे रिहीस कतको एक्कड़ फसल बोहागे रिहीस। अऊ ऐकरेच सेती तोर जगा भुइंया म बने बांध के मुअउजा अभू तक नि मिलीस तोला। सिरीफ ऐकरेच सेती माचिस के काड़ी चोराये के इलजाम म तोर ममा जेल गे रिहीस अऊ पूरा गांव के विकास के पइसा हजम करइया सरपंच अभू बिधायक अऊ मंत्री बन के भुकर भुकर के खावत किंजरत हे। ये लोकतंत्र तोर देस ल बेंचत हे दाई। बने करीस तोर तीर म नि ओधीस निही ते तहूं ल बेंच देतीस तहन हमन “ डोकरी दाई “ कोन ल कतेन। तेंहा ये लोकतंत्र के मोहो ल छोड़ अभू जाये के बेरा आगे राम राम बोल दाई राम राम …….। जइसे दाई ल हलइस दाई ल नि पईस। दाई के जीव कोन जनी कतेक बेर उड़ियागे। डोकरी दाई चल दिस। अइसने कतको झिन जावत जावत अमरावत हे लोकतंत्र ला। जियत जियत पाये के आसा म हमेसा धोका खावत हे। फेर दिया बार के मिले के आस म अभू तक अगोरत हे गांव हा अपन सपना अऊ कलपना के लोकतंत्र ल।
हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा

बियंग: निरदोस रहे के सजा

बहुत समे पहिली के बात आय। जमलोक बिलकुलेच खाली होगे रहय। यमदूत मन बिगन बूता काम के तनखा पावत रहय। बरम्हाजी ला पता चलिस त ओहा चित्रगुप्त उपर बहुतेच नराज होइस। चित्रगुप्त ला बरम्हाजी हा अपन चेमबर म बलाके, कमरटोर मंहंगई अऊ अकाल दुकाल के समे म, बिगन बूता के कन्हो ला तनखा देबर मना कर दिस। चित्रगुप्त किथे – पिरथी म पाप करइया मनखे कमतियागे हे तेमा यमदूत मनके काये दोस हे। येमन ला कतिहांच भेज डरंव तिहीं बता भलुक। बरम्हा किथे – अइसे होइच नी सकय, तोर हिसाब किताब म गड़बड़ी हे, मनखे मन पिरथी म जाथेच पाप करे बर …… अऊ तैं कहिथस के पापी के संखिया कमतियागे हे …….. में कइसे पतियांवव। कहूं अइसे तो निही के पाप करइया मन, तोर बिभाग के बाबू मनला घूस दे के पटा डरत हे अऊ अपन पाप ला कटवा डरत हे। चित्रगुप्त किथे – मोर बिभाग म एको करमचारी हा मनखे नोहे बरम्हाजी जेमन थोकिन पइसा के लालच म जमीर बेंच देथे। बरम्हाजी ला चित्रगुप्त उपर उइसने बिसवास नी होइस जइसे नेता हा, अपन अधिकारी अऊ सचिव उपर बिसवास नी करय। चित्रगुप्त किथे – तैं पतियावस निही त चल पिरथी लोक, असलियत अपने आप पता लग जही। बरम्हाजी किथे – एक सरत म जाहूं, मोर दौरा के सूचना कन्हो ला झिन दे, उदुपले कहूं तिर छापा मारे कस उतरबो।
चित्रगुप्त हा बरम्हाजी संग अपन बिमान म येती वोती किंजरे लगिन। चित्रगुप्त जे तिर उतरे बर कहय, बरम्हाजी हा मना कर देवय, बरम्हाजी ला लगय के, ये तिर के मनखे मन, चित्रगुप्त के करमचारी मनके सिखाये पढ़हाये होही तेकर सेती, इही तिर उतरे के जिद करत हे। एक जगा म बड़ भीड़ भड़क्का देखिस तिही मेर बिमान ला उतरवा दिस। खोर ले कुरिया तक बड़ लमभरी लइन लगे रहय। दुनो झिन लइन म लगगे। सरपंच के दफतर रिहीस ओहा अऊ उहां रासन कारड बनत रहय। गांव के भुंइया के नाप जोख बर हिसाब कितब चलत रहय। सरकार के कलयानकारी जोजना के परचार परसार अऊ पात्र मनला तुरते लाभ दे के बूता होवत रहय। जम्मो पात्र मनखे के काम बिगन कन्हो लेनदेन अऊ भेदभाव के तुरते होवत रहय। अपात्र मन अपन बूता ला पइसा म करवाये के परयास म भारी फटकार सुनिस। बरम्हाजी बिगन पाप के होवत बूता देख चुपचाप खसक दिस। थोकिन अऊ आगू बढ़िस, राज्य के राजधानी म अमर गिस। उहां पता चलिस के एक झिन प्रदेस इसतर के नेता हा अपनेच पारटी के कच्चा चिट्ठा ला जनता म उजागर कर दिस, सरकार गिरगे फेर ओहा अपन इमान ले नी डिगिस। दुनों झिन देस के राजधानी म पहुंचगे। उहां रासटीय नेता मन तिर पहुंचगे। जनता हा ये नेता मनला इमानदारी के सेती जितवाय रहय। इही गुन के सेती, येमन मनतरी तको बन जाय रहय। फेर अतेक दिन मनतरी रेहे के बावजूद, न तोप खइस, न चारा, न स्प्रेक्ट्रम चघलिस, न कोयला हबरिस। अऊ तो अऊ जे खाये के कोसिस करिस तेकर नाव बता दिस। येकर सेती सरकार के बहुतेच बदनामी होइस। दूसर बेर सत्ता बर लाले परगे। बरम्हाजी माथ धर लिस। चित्रगुप्त किथे – अतेक मुफत म मिलत माल म तको हाथ नी डारिस बिया मन। न खुद खइस न कन्हो ला खावन दिस। अइसन ला काये सजा देबो भगवान। कहींच पाप नी करे कहिके, अइसन मनला सजा दे भी देतेन भगवान, फेर येमन अपन करनी के सजा इंहींचे पागे। भगवान किथे – देखा कइसे सजा पइन अइसन मन। चित्रगुप्त हा अपन समययंत्र ला कुछ बछर बढ़हा दिस। बरम्हाजी देखिस – अतेक बछर नेतागिरी करे के बाद भी बुढ़हारी म, अइसन मनला भीख मांगे बर परत रिहीस।
बरम्हाजी किथे – वापिस चल। सरग म कोन कोन ला राखे हस तेकर जांच करहूं। सरग म पहिली वो मनखे के जांच करिस जेमन पिरथी म करमचारी रिहीस। ओकर मनके पूरा रिकाड निकालिस। कमपूटर के बटन ला जइसे चपकिस, एक झिन मनखे के नाव गांव पता अऊ ओकर सरी रिकाड आगू आगे। पहिली मनखे हा नानुक पटवारी रिहीस बपरा हा। जिनगी भर दूसर के भुंइया ला दूसर के नाव नी चघइस। नकसा खसरा बनाये बर पइसा नी मांगिस। चहा पानी पिये बर कन्हो ला नी पदोइस बलकी अपन जेब ले किसान मनला खवइस पियाइस। बरम्हाजी हा दूसर मनखे के प्रोफाइल खोलिस। ये दारी एक झिन गुरूजी के फाइल खुलगे। यहू कइसन गुरूजी रिहीस, रोज समे म इसकूल जावय, एकेक लइका ला धियान देके पढ़हावय। पास करे बर काकरो महतारी बाप ले पइसा नी मांगिस। मध्यान्ह भोजन म कभू घपला नी करिस। दूसर के फाइल खोलिस। ये इनजीनियर रिहीस। बरम्हाजी ला लगिस ये जरूर पकड़ाही। रिकाड म पता चलिस, येकर बनाये घर म नानुक खरोंच तक निये, सड़क बनइस तेहा कतको टरेफिक के बावजूद भी जस के तस चमकत हे, अतेक दिन म बांध म नानुक टोंड़का नी होइस ……. जबकि ये इनजीनियर के दूसर पारी के समे लकठियागे रिहीस। माऊस ला इसकराल करिस। एक झिन कलेकटर के फाइल खुलगे। बापरे अतेक इमानदार तो जिनगी म नी देखे रिहीस बरम्हाजी हा। काकरो काम रूकत नी रहय। येकर इमानदारी म छेत्र के नेता मन परेसान रहय। थोकिन अऊ आगू के फाइल खनगालिस त डाकटर के नाव दिखगे। वो डाकटर हा जिनगी भर अतेक अपरेसन करिस फेर, न काकरो आंखी फोरिस, न काकरो गरभासय ला जबरन निकालिस, न काकरो किडनी बेंचिस न कन्हो ला पइसा के लालच म असपताल के चक्कर कटवइस। अपन बिमारी के इलाज ला बपरा हा पइसा के अभाव म नी करवा सकिस अऊ घिंसट घिंसट के तड़प तड़प के मरिस। बहुत दरदनाक मऊत पढ़हे के बाद कमपूटर ला बंद करे बर चपके के पहिली एक झिन दरोगा के फाइल दिखगे। बड़ अजीब किसिम के दरोगा रिहीस। न अवेध सराब बनावन दिस न बेंचन। दिन रात किंजर किंजर के लूट चोरी डकैती म अतेक अनकुस लगा दिस के सरी लुटेरा मन भूख मरे बर लग गिन। चित्रगुप्त केहे लगिस – निरदोस निरपराध मनला चरपा के चरपा भूख म झिन मरे लागय कहिके, बहुत मुसकिल ले ओमन ला, सनसद बिधानसभा नगरपालिका अऊ गराम पंचइत म एडजस्ट करें हंव। बिपकछी मनला यहू म चैन नी परिस, उहों येमन ला ठीक से जियन खावन नी देवत हे भगवान। कुछ अइसन मनला मनदिर देवाला तक म एडजस्ट करे बर लाग गिस।
भगवान सोंचिस, चित्रगुप्त लबारी मारत हे। बिगन बूता करे मनखे के पेट भर जावत हे माने कहूं न कहूं तिर गड़बड़ी हे। भगवान हा चित्रगुप्त ला बिगन बताये पिरथी म फेर अमरगे। भगवान देखिस, किराना के दुकान म दुकानदार हा न तो तउल म कांटा मारत रहय, न मिलावट करत रहय न काकरो ले मनमाने किम्मत वसूलत रहय, न काकरो मजबूरी के फायदा उठावत रहय। उदयोगपति के आपिस के कुरिया म निंगगे भगवान हा। उदयोगपति हा न टेक्स के चोरी करत रहय, न लइसेंस बर गलत तरीका अपनावत रहय अऊ तो अऊ अपन कमपनी म होवत फायदा ला जादा से जादा अपन करमचारी मनला देवत रहय।
भगवान ला समझेच म नी आवत रहय के अइसे कइसे हो सकत हे के कन्हो अपराध करत नी दिखत रहय। ओला लगिस अइसन म इहां के कछेरी अदालत बंद होगे होही। रेंगत रेंगत उदुपले एक ठिन नियाय के मनदीर दिखगे। भूत बंगला ले कम नी रहय। कछेरी भितरी पहुंचगे। उहां मरे रोवइया नी दिखिस। न ओकील न मुवक्किल। नियावधीस के दफतर म एक ठिन फाइल नी दिखीस। माछी मारत अरदली चपरासी अऊ उंघावत नियावधीस मिलीस।
भगवान सोंचिस, अखबार वाले मनला पता रहिथे के कोन कोन काये काये गलत काम बूता म लगे हे, ओकरे मन तिर चल दिस। पहिली सोंचिस, सीधा पूछहूं त कोनेच बताही। एक दू झिन ला पइसा के लालच दिस। कोई कुछ नी बतइस बलकी भगवान के नाव म रिपोट लिखाये बर पुलिस ला फोन लगा दिस। भगवान झम्मले गायब होगे त बांचिस।
चार दिन तक बरम्हा के गायब होये ले सरग म हाहकार माते रहय। बरम्हाजी के खोजाखोज माते रहय तइसने म बरम्हाजी दम्म ले अपन खुरसी म बइठगे। हफरत रहय बपरा बरम्हाजी हा। चित्रगुप्त ला तिर म बलइस अऊ केहे लगिस – मनखे ला अपराधेच करे बर बनाथन अऊ बिया मन देवता कस सरीफ बनके किंजरत हे तेकर सेती हमर नरक के यातनासिविर जुच्छा परगे हे। जतेक यातनासिबिर के खाली बइठे जमदूत हे तेमन ला, मनखे बनाके पिरथी म भेजव। चित्रगुप्त सन खाके पटवा म दतगे। डोकरा पगला गेहे सोंचे लगिस। फेर बरम्हा के बात के अरथ ये आय के जे कहि दिस तेला होनाच हे। जमदूत मनला पिरथी म भेजे के पलानिंग कर डरिस। यमराज तक बात पहुंचगे। बरम्हा के बात काट सकना समभव नी रिहीस त ओहा चित्रगुप्त तिर अपन बात रखिस के, मोर जतेक दूत मन जाही तेमन ला ओतके सुख मिलना चाही जइसे हमर लोक म पावत हे। चित्रगुप्त घला बिगन सोंचे समझे हव कहि दिस।
कुछ बछर पाछू …………..। पिरथी ला सरी जमदूत मन कबजिया दरिन। पंचइत से सनसद तक, चपरासी से सचिव तक, अरदली से नियावधीस तक, हाकर से समपादक तक इही मन छागे। अऊ जे मनखे मन बहुत सरीफी झाड़त रिहीन तेमन ला आम जनता बना दिस। इही आम जनता मन, ईमानदारी अऊ सत्य बचन के करम दंड भोगत, भूख गरीबी अऊ बेकारी के सिकार होये लगिन। पूरा पिरथी म लूट अतियाचार अऊ आतंक के राज छागे। कुछ अऊ बछर बीते के पाछू, यमदूत मनके आदत ला, आम जनता के बीच के कुछ मन सीखे लागिन तब जमराज हा जमदूत मनला वापिस करे के गोहार पारिस। तब जमदूत मन वापिस जमलोक जाये बर मना कर दिन। अऊ तो अऊ जमदूत मन अपन अतेक अकन सनतान बिया डरिन के, जेती देख तेती उहीच उही मन दिखय। बरम्हाजी तक बात पहुंचगे के जमदूत मन वापिस आये ले मना करत हे तब जमदूत मनला तलब करे गिस। जमदूत मन अपन कतको अकन संगठन बना डरे रहय। इंकर परतिनिधि मंडल हा बरम्हाजी से मुलाखात म बतइस के, हमन ला वापिस नरक जाये के कन्हो आवसकता निये। नरक के यातनासिविर ला चुमुकले बंद कर दव। हमन ला जे बूता नरक म करना चाही तेला इन्हींचे करत हन। बरम्हा किथे – का करत हव तूमन। यमदूत मन किथे – टेड़गा बहुरुपिया मन ला अपन संग संघेर के, सिधवा इमानदार मनखे ला आम जनता बनाके, नरक के यातना ला इंहे भोगवावत हन। बरम्हा के गलत निरनय ला, निरदोस मनखे, जनता बनके, आज तलक भुगतत हे।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा.

बियंग : करजा के परकार

यू पी एस सी के परीकछा म भारत के अरथ बेवस्था ला लेके सवाल पूछे गिस। सवाल ये रहय के करजा के कतेक परकार होथे। जे अर्थसासतरी लइका मन बड़ पढ़ लिख के रटरुटाके गे रहय तेमन, रट्टा मारे जवाब लिखे रहय। ओमन लिखे रहय – तीन परकार के करजा होथे, पहिली अलपकालीन, दूसर मध्यकालीन अऊ तीसर दीर्घकालीन। तीनों ला बिसतार से समझाये रहय।
कुछ इनजीनियर किसिम के लइका मन लिखे रहय। करजा तीन परकार के होथे, पहिली किसानी करजा, दूसर उदयोगिक करजा, तीसर घरेलू करजा। तीनों ला उहू मन उधारन देके समझाये रहय।
कुछ अध्यातमिक किसिम के लइका मन घला इहां तक पहुंचे म कामयाब रहय। ओमन लिखे रहय – करजा तीन परकार के होथे, पहिली भगवान के करजा, दूसर मां बाप के करजा, तीसर दुनिया के करजा। यहू मन अपन बात ला सही साबित करे बर अबड़ अकन तरक बितरक दे के समझाती गोठ लिखे रहय।
मेंनेजमेंट ले जुड़े कुछ मन घला परीकछा म बइठे रिहीन। ओमन लिखे रहय। करजा सिरीफ तीन परकार के होथे। पहिली किसिम के करजा ओ आय जेला सिरीफ लेना हे पटाना निये, पटाये के जुम्मेदारी ओकर उत्तराधिकारी के आय। जइसे सरकार लेथे। जे लेथे तेला पटाये के कोई आवसकता निये, पटाये बर दूसर ला मेहनत करे बर परही। दूसर किसिम के करजा ओ आय जेला बियापारी अऊ उदयोगपति मन लेथे। येहा अइसे करजा आय जेला कभू पटानाच नी रहय। पटाये के बेर जादा दबाव अइगे त, बिदेस म सरन ले लेना हे तहन पटाये के कोई आवसकता निये। तीसर करजा ओ आये जेला उत्तम करजा के नाव दिये जाथे। येला उत्तम करजा ये सेती केहे जाथे के लेवइया ला सिरीफ लेके समे झंझट हे पटाये के झनझट निये। ये करजा ला लेना भर मुसकिल हे फेर पटाना न मुसकिल न जरूरी ………। मन चाहे तो पटा सकत हस, नी पटाबे तभो कन्हो बात निये। करजा पटाये बर चुनाव तक अगोर, कन्हो ना कन्हो तोर करजा माफ करे बर आगू आबेच करही। पहिली किसिम के करजा म, करजा लेवइया ला, करजा के सेती, जियत जियत न सरग मिलय न नरक। दूसर किसिम के करजा म पकड़ाये के पहिली, इंहे सरग मिल जथे अऊ पकड़ाये के पाछू बिदेस म सरग मिलथे। फेर तीसर किसिम के करजा म, करजा लेवइया ला सिरीफ माफी भर नी मिलय बलकी अऊ करजा लेके चार बछर कलेचुप बइठे के प्रेरना घला मिलथे। फेर ये करजा के कमी सिरीफ इही आय के, करजा लेवइया, न सरग पाय न नरक, बलकी माफी देवइया मन, जियत जियत अपन संग अपन पूरा परिवार अऊ कुनबा ला सरग के मजा देवा देथे।
परीकछा के परिनाम आगे। मेंनेजमेंट ले जुड़े जम्मो लइका मन पास होके, कलेक्टर बनगे।

हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा

बियंग: करजा माफी

करजा माफी के उमीद म, किसान मन के मन म भारी उमेंद रहय। जे दिन ले करजा माफी के घोसना होय रहय ते दिन ले, कतको झिन बियाज पुरतन, त कतको झिन मुद्दल पुरतन पइसा के, मनदीर म परसाद चढ़हा डरे रहय। दूसर कोती, करजा माफी के घोसना करइया के पछीना चुचुवावत रहय। मनतरी मन के घेरी बेरी बइठक सकलाये लगिस। किसान मन के करजा माफी बर कतेक पइसा चाही अऊ पइसा कतिहां ले आही अऊ ओकर भरपाई कइसे होही, तेकर हिसाब किताब चलत रहय।
एक मनतरी किथे – सहींच म करजा माफी के कन्हो आवसकता निये गा, येहा केवल चुनावी वादा आय, जेला पूरा करना आवस्यक नि रहय।
दूसर किथे – येला पूरा नी करबो त, आगू म बड़का चुनई म कइसे पार पाबो। अऊ ओमा पार नी पाबो त, हमर दिल्ली वाला सियान हा, अढ़ई बछर के जगा, चारे छै महीना म हकाल दिही।

तीसर मनतरी किथे – जनता ला कहि देथन के, बिलकुलेच जुच्छा खजाना मिले हे। जब हमर तिर पइसा सकला जही तब, करजा माफी करबो। जब तक कतको बछर नहाक जही, तब तक दूसर मुद्दा खड़ा हो जही, तहन जनता घला करजा माफी के बात, भुला जही।
एक झिन किथे – जनता नी भुलाये जी, भुला जतिस त हमन ला इहां पहुंचे बर पनदरा बछर नी अगोरे लागतिस। बड़ तरसा दिन बुजा मन, अब जाके अच्छा दिन नसीब होइस हे, जेला कइसनो करके बचा के राखना हे। येला खोना निये, जे केहे हन तेला पूरा करबो, तभे अवइया चुनई म, हमर उपर जनता के बिसवास बने रइहि। पनदरा बछर ले खुरसी के बिछोह अऊ सत्ता के तड़फ म बियाकुल मनखे मन, कइसनो करके करजा माफी करके, अपन साख बचाये के उदिम खोजत, रात दिन उधेड़ बुन म लगे रहय।
तभे एक झिन मनतरी ला उपाय मिलगे। ओहा किथे के – सिरीफ गरीब किसान के करजा ला माफ कर देथन। काबर के, गरीब किसान के करजा हा, गरीबेच कस हे। बहुतेच कम म निपट जबो। जनता ला भरमावत कहत घला बन जही के, गरीब के सरकार आवन हमन, पिछला सरकार कस, अमीर के सरकार नोहन, तेकर सेती अमीर गौंटिया बड़े किसान के, करजा माफ नी करत हन।
दूसर मनतरी कहिथे – अइसन म आकरोस अऊ बिरोध उपजही। हमरे बिपछ म बइठे, कतको किसान बिधायक मनके करजा माफ नी होही त, ओमन हमन ला खुरसी म बइठके जियन नी दिही।

एक मनतरी बहुतेच दिमागी रिहीस, वोहा कहिथे – हरेक वो किसान के करजा माफ करबोन जेहा सिरतोन के गरीब आय।
पहिली मनतरी किथे – उहीच ला तो महू कहत हंव, फेर बड़का किसान के हल्ला मचाये के गुंजइस बन जही, तेला कइसे समहालबो।
दिमागी मनतरी कहिथे – सब समहल जही। गरीब के परिभासा बदल देबो, जम्मो समसिया के समाधान हो जही। जे मनखे हा, यहा कनिहा टोर महंगई म, साल दर साल फसल उगाथे, तेहा गरीब थोरेन आय। साल दर साल धान गहूं दार बोवइया मन, हरेक बछर खातू कचरा पानी बर करजा लेथे अऊ फसल काटके हरेक बछर पटा घला देथे। अइसन मन सकछम किसान आय, गरीब थोरेन आय। इंकर करजा माफ करे के का आवसकता ?. रिहीस बात हमर घोसना पत्र के मुताबिक काम करे के, त मोर बात सुनव, वो जम्मो किसान के करजा माफ करे जाही, जेमन अतेक गरीब हे के, पांच बछर म सिरीफ एक बेर फसल उगाथे।
दूसर संगवारी मनतरी मन, दिमागी मनतरी जी के बात समझिन निही त, दिमागी मनतरी जी हा बात फोर के बतइस – पांच बछर म एक बेर, हमर बर जेहा बोट के फसल लगाके, हमर परदेस ला हमर कस खुसहाल बना दिस, उही जम्मो किसान के करजा माफ कर दे जाय। येमा कन्हो बिरोध नी हो सके। अऊ अवइया चुनई म हमर बर, येकर ले जादा लहलहावत बोट के फसल घला जाम जही। बात जंचगे। केबिनेट म परसताव पास होगे। बोट बोवइया जम्मो किसान के करजा माफ होय लगिस।
सुसइटी के दरवाजा म करजा माफी के बाट जोहत, धान के कटोरा धरे दाना दाना बर लुलवावत, धान गहूं राहेर तिल्ली अऊ उरिद बोवइया किसान के आंखी पथराये लगिस अऊ बोट बोवइया किसान मन धड़ाधड़ करजा माफी के परमान पत्र पाके, दूसर फसल के तियारी म लगगे।
हरिशंकर गजानंद देवांगन
छुरा