Tag: Kanhaiya Sahu ‘Amit’

अमित के कुण्डलिया ~ 26 जनवरी

001~ तिरंगा झंड़ा
धजा तिरंगा देश के, फहर-फहर फहराय।
तीन रंग के शान ले, बैरी घलो डराय।
बैरी घलो डराय, रहय कतको अभिमानी।
देबो अपन परान, निछावर हमर जवानी।
गुनव अमित के गोठ, कभू झन आय अड़ंगा।
जनगण मन रखवार, अमर हो धजा तिरंगा।

002~ भारत
भुँइयाँ भारत हा हवय, सिरतों सरग समान।
सुमता के उगथे सुरुज, होथे नवा बिहान।
होथे नवा बिहान, फुलय सब भाखा बोली।
किसिम किसिम के जात, दिखँय जी एक्के टोली।
गुनव अमित के गोठ, कहाँ अइसन जुड़ छँइयाँ।
सबले सुग्घर देश, सरग कस भारत भुँइयाँ।

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक~भाटापारा (छत्तीसगढ़)
संपर्क~9200252055

सेहत के खजाना – शीतकाल

हमर भारत भुईयाँ के सरी धरती सरग जइसन हावय। इहां रिंगी चिंगी फुलवारी
बरोबर रिती-रिवाज,आनी बानी के जात अउ धरम,बोली-भाखा के फूल फूले हावय।
एखरे संगे संग रंग-रंग के रहन-सहन,खाना-पीना इहां सबो मा सुघराई हावय।
हमर देश के परियावरन घलाव हा देश अउ समाज के हिसाब ले गजब फभथे। इही
परियावरन के हिसाब ले देश अउ समाज हा घलो चलथे। इही परियावरन के संगे संग
देश के अर्थबेवसथा हा घलाव चलथे-फिरथे। भारत मा परियावरन हा इहां के ऋतु
अनुसार सजथे संवरथे। भारत मा एक बच्छर मा छै ऋतु होथे अउ एखरे हिसाब ले
परियावरन हा बनथे-बिगङथे। भारत मा ऋतु ला भारतीय महीना के हिसाब ले छै
भाग मा बांटे गे हावय जउन हा बसन्त,गरमी, बरसा, सरद, हेमन्त अउ सिसिर के
नांव ले जाने जाथे। हिन्दू नवा बच्छर मा चइत ले बइसाख बसंत ऋतु, जेठ ले
असाढ गरमी रितु, सावन ले भादो बरसा, कुंवार ले कातिक सरद रितु, अग्घन ले
पूस हेमंत रितु, मांघ ले फागुन सिसिर रितु के मउसम रथे। ए परकार ए छै
रितु हा एक बच्छर मा दु-दी महीना रहीथे। साल भर के छै रितु अलग-अलग अपन
असर देखाथे। सबो रितु के अपन-अपन समे घातेच महत्तम हावय। जिनगी मा संतुलन
बनाय खातिर सबो मउसम के खच्चित जरुरत होथे। कोनो भी एक झन के कमी मा भारी
गङबङी हमर परियावरन अउ जिनगी मा अमा जाही। एखरे सेती सबो रितु पारी-पारी
दु-दु महीना अपन असर देखाथे।
हमर देश के छै रितु मा तन अउ मन के सुख देवइया बङ मनभावन
मउसम हेमन्त रितु हा होथे। हेमंत रितु हा सरद रितु के बिदा होवत साठ आ
धमकथे। इही हेमन्त के बङई महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी हा अइसन करे हावय:-
*ऋतु हेमंत संग पिएउ पियाला।*
*अगहन पूस सीत सुख-काला।।*
*धनि औ पिउ महँ सीउ सोहागा।*
*दुहुँन्ह अंग एकै मिलि लागा।।*
हिन्दू गरंथ आयुरबेद के हिसाब ले हेमन्त रितु ला
सुवासथ अउ सुवाद के सुग्घर रितु कहे जाथे। हेमन्त रितु हा जङकाला ला संग
मा धर के लाथे। सरद पुन्नी के पाछू हेमंत रितु हा सुरु होथे। ए जङकाला
हा दु भाग मा बटाय रथे। हल्का-फुल्का सहतुत मनमरजी जाङ हा हेमंत रितु
कहाथे अउ बङ भारी कङकङावत जाङ हा सिसिर रितु कहाथे। हेमंत रितु सुवाद अउ
सुवासथ बनाय के मउसम आय। हेमंत रितु मा सरीर के सरी दोसमन हा सान्त होय
ला धर लेथे अउ अगनी हा ऊंच होय लगथे। एखरे सेती ए रितु हा बच्छर भर मा
सबले बढिया सुवासथ देवइया रितु होथे। ए रितु मा भरपूरहा उरजा, सरीर के
रोगपरतिरोधक सक्ती के बिकास होथे। एकरे सेती डाक्टर मन हा छुट्टी मा चल
देथें। ए रितु मा सरसो तेल के मालिस अउ कुनकुन पानी मा नहाय के जरुरत
होथे। ए मउसम मा कसरत करे ले, गुरतुर अउ अम्मट के संग नुनछुर खाये पीये
ले ए रितु मा सरीर ला बङ उरजा के संग अगनी हा बाढथे। सरद के बीते ले ए
रितु मा मउसम हा बङ मनभावन अउ सुहावन हो जाथे। जोरदरहा घाम ले
नान्हे-नान्हें कीरा-मकोरा मन के नास हो जाथे। एखर ले बेमारी अउ
रोग-मांदी के डर सिरा जाथे। सरीर सुग्घर सुवासथ हो जाथे। पेट के पाचन
सक्ती हा बाढ जाथे। ए मउसम मा सुवाद अउ सुवासथ बाढ जाथे। हेमंत रितु मा
किसिस-किसिम के साग-भाजी,फल-फलहरी,कांदा-कूसा के भरमार हो जाथे।
साग-भाजी,भाजी-पाला मन हा बङ सस्ता हो जाथे। एखर कारन हे गाँव-गवंई के
बारी- बखरी के साग-भाजी के आवक बजार मा बाढ जाथे। साग-भाजी मा गोंदली
भाजी,मेथी भाजी,चउलाई भाजी,पालक,लाल,बर्रे,चना भाजी,मुनगा भाजी,सरस़ो
भाजी,मुरईभाजी के बहार आ जाथे। मूंगफली, बिही, खीरा,गाजर, कुसियार,
छीताफर,संतरा, खोखमा,सिंघाङा अउ जिमीकांदा घलाव अब्बङ मिलथे। साग मा
बटकर, गोलेंदा भाँटा, फूलगोभी, बंधागोभी, गाँठगोभी, सेमी,
मुरई,तुमा,मखना,बटकर,बटर अउ बटरी अउ आनी-बानी के साग के बहार आथे। कँस के
खाये अउ कँस के सेहत बनाय के सबले सोनहा समे इही मउसम हा होथे।
सुरुजनरायन के सोज्झे घाम ले तन-मन मा अगनी के बढती आथे। एखरे सेती ए
मउसम मा पाचन सक्ती जोरदरहा हो जाथे। कथरी, कंबल, अलवान, अलाव,भुर्री
हेमन्त रितु के चिन्हारी हरय। एखर बिन हेमन्त रितु अधूरा होथे,सुन्ना
रथे। बुता काम के पूरा आ जाथे। धान मिंजाई हा फदगे रथे ता गहूं चना के
बोवाई घलो चलत रथे। दिनमान हा झटपट सिरा जाथे,बेरा जलदी बुङ जाथे। रतिहा
हा बङ लाम हो जाथे जउन हा लटपट पहाथे। भिमसरहा उठ के खेती-किसानी के बुता
,दउङ, कसरत-बियाम के सुग्घर पाग हा इही मउसम मा धरा जाथे।
ए हेमंत रितु मा नफा के संग थोरिक नकसानी घलाव हावय। ए
मउसम हा जतका सुख देथे ओतका दुख घलो देथे एखरे सेती ए जङकाला मा थोरिक
चेतलगहा रहे ला परथे। खवई-पियई ले जादा अपन सरीर के घलो धियान दे ला
लागथे। जुङ के दु महीना ला सावधानी ले बिताना चाही। अइसन करे ले नसकान ला
नफा मा बदले जा सकथे। जरुरत हे सिरिफ जागरुक रहे के। ए जुङ के दु महीना
मा मधुमेह जेला सुगर या फेर सक्कर के मरीज मन ला बिसेस धियान दे के जरुरत
रथे। सुगर के मरीज मन ला हिरदे अउ दिमाग मा गहरा अघात के खतरा हा जादा
बाढ जाथे। एखर संगे संग ए जङकाला मा लहू-रकत के नस हा सकला जाथे जेखर ले
रक्तचाप (बल्डप्रेसर) हा बाढ जाथे। ए जुङ के मउसम मा सबले जादा
जुङ-सरदी,खाँसी अउ बोखार हा जादा जोर मारथे। जङकाला के जुङ-सरदी मा 100
ले जादा वाइरस के संग मा रंगे होथे। एखर सेती जुङ मा बेमारी ले बांचे बर
जम्मो लइका,जवान अउ सियान मन ला सावधानी अउ जुङ ले बचाव के नंगत जरूरत
होथे। जङकाला मा जाङ ले बांचे बर
कंबल,कथरी-गोदरी,साल-सेटर,कनटोप-मोजा,मफलर-दस्ताना ज इसन जीनिस के घातेच
जरुरत रथे। जुङ हा सरीर मा मुङी,कान अउ गोङ डहर ले खुसरथे। एखरे सेती ए
अंग मन ला जङकाला मा बने तोप-ढांक के रखना चाही। गरम अंगरक्खा,गरमा-गरम
खानपान के संगे संग थोर-बहुत कसरत-बियाम रोजेच करते रहना चाही। घाम मा
बइठ के रउनिया तापे ले सरीर ला विटामिन डी घलाव मिलही। भुर्री बार के जाङ
ला भगाय के बेवसथा पोठ होना चाही। आनी-बानी के साग -भाजी जोरदरहा खाव फेर
चेतलगहा घलो खाव। ए मउसम हा सुवाद के संग सुवासथ के सुग्घर रितु हरय।
तिल,गुङ,मूंगफली अउ रेवङी के सेवन जङकाला मा भरपूर करे ले सरीर ला भीतर
ले गरमी मिलथे। ए हेमन्त रितु मा सुवाद के सुग्घर मजा हे फेर जाङ मा
थोरिक बेमारी के घलाव सजा हे। जिनगी मा अउ ए मउसम मा संतुलन बनाके बरोबर
चेतलगहा बुता के जरुरत हावय। सुवाद के फेर मा सुवासथ हा झन बिगङय एखर चेत
पहिलीच करे ला परही। चेतलग रहव अउ मउसम के जबर मजा लव।

कन्हैया साहू “अमित”
~भाटापारा (छ.ग)
संपर्क ~ 9753302055

सोच समझ के देहू वोट

अपन हिरदे के सुनव गोठ।
सोच समझ के देहू वोट।

जीत के जब आथे नेता मन,
पथरा लहुट जाथे नेता मन.
चिन्हव इँखर नियत के खोट।
सोच समझ के संगी देहू वोट।-1

चारों खूँट सवारथ के अँधियार हे.
लालच के हथियार तियार हे.
दारु-कुकरा, धोती-लुगरा,नोट।
सोच समझ के देहू वोट।-2

वोट माँगत ले नेता सिधवा हे,
मरे ल मारे बर येहा गिधवा हे.
मउका हे ठउका मारव चोट।
सोच समझ के देहू वोट।-3

बुढ़वा रेंगव. चलव जवान.
खच्चित करव तुमन मतदान.
धरम-करम नइ होवय रोज।
सुनव अपन हिरदे के गोठ।
सोच समझ के देहू वोट।-4

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक-भाटापारा (छ.ग)

देवता मन के देवारी : कारतिक पुन्नी

हमर हिन्दू धरम मा देवी-देवता के इस्थान हा सबले ऊँच हावय। देवी-देवता मन बर हमर आस्था अउ बिसवास के नाँव हरय ए तीज-तिहार, परब अउ उत्सव हा। अइसने एक ठन परब कारतिक पुन्नी हा हरय जेमा अपन देवी-देवता मन के प्रति आस्था ला देखाय के सोनहा मौका मिलथे। हमर हिन्दू धरम मा पुन्नी परब के.बड़ महत्तम हावय। हर बच्छर मा पंदरा पुन्नी होथे। ए सबो मा कारतिक पुन्नी सबले सरेस्ठ अउ शुभ माने जाथे । कारतिक पुन्नी के दिन भगवान शंकर हा तिरपुरासुर नाँव के महाभयंकर राक्छस ला मारे रहीन हे तब ले एला तिरपुरी पुरनिमा के नाँव जानथें अउ मानथें। शंकर भगवान के नाँव हा इही दिन ले तिरपुरारी के नाँव हा इही दिन ले मिलीस हे। अइसन मानियता हे के कारतिक मा शिवशंकर के दरसन करे ले सात जनम ले मनखे हा गियानी अउ धनवान होथे। इही दिन अकाश मा जब चंदा उवत रथे तभे सिवा, संभूति, संतती,पिरती, अनसुइया अउ छमा ए छै किरतिका मन के पूजा-पाठ करे ले शंकर जी हा अड़बड़ प्रसन्न होथे। इही दिन गंगा मईया मा असनांदे ले बच्छर भर के असनांद के फल मिलथे। एखरे सेती कारतिक पुरनिमा ला महा कारतिकी पूरनिमा घलाव कहे जाथे।
कारतिक पुन्नी के दिन संझा बेरा मा विष्णु भगवान के मछरी अवतार होय रहीस। ए दिन गंगा मा नहाय अउ दान देके महत्तम हावय। ए दिन नदीया मा नहा के दीया के दान दक्छिना ले दस ठन जग बरोबर फल मिलथे। ब्रम्हा, विष्णु, महेश, ऋषि अंगीरा अउ आदित्य मन हा कारतिक पुन्नी ला महापुनीत परब माने हावय। एखर सेती ए दिन गंगा असनांद करके दीया के दान दे के, हूम-जग, उपास अउ पूजा-पाठ करके विशेष महत्तम हमर धरम ग्रंथ मन मा बताय गे हावय। पूजा-अरचना , दान-दक्छिना अउ जग, हवन ला शुभ बेरा मा संपन्न करे जाय ता शुभेच शुभ होथे।
जौन प्रकार ले हमर पिरिथिवी लोक मा कारतिक अमावसिया के दिन मा देवारी के जगमग तिहार ला मनाथे, ठीक अइसने कारतिक पुन्नी के शुभ तिथि मा देवलोक मा देवी-देवता मन अब्बड़ धूमधाम ले देवारी के उत्सव ला मनाथे। एखर सेती कारतिक पुन्नी के परब ला हमन देव देवारी के नाँव ले घलाव जानथन। धरम ग्रंथ अउ पुराश के हिसाब ले असाढ़ महीना के अंजोरी पाख अकादशी के दिन ले भगवान विष्णु हा चार महीना बर योगनिद्रा मा लीन हो जाथे पताल लोक मा। भगवान विष्णु हा कारतिक महीना के अंजोरी पाख के अकादशी के दिन जागथे तेला देवउठनी अकादशी कहिथे। एखर पाँच दिन पाछू कारतिक पुन्नी के दीन सबो देवी-देवता मन खुशी ले झूम-झूम के भगवान विष्णु संग लछमी जी के आरती उतार के उच्छल मंगल के संग दीया बार के देवलोक मा देवारी मनाथे। हमर पिरिथिवी के देवारी मा भगवान विष्णु के चार महीना के नींद मा रहे के सेती लछमीजी के संग देवता मन के परतिनिधी के रुप मा श्री गणेश जी के आरती उतारे जाथे।
कारतिक पुन्नी ला दे्ता मन के त्रिदेव ब्रम्हा, विष्णु अउ महेश मन के द्वारा महापुनीत परब के संज्ञा दे हावय। ए दिन गंगा असनाँद, व्रत, उपास, अन-धन के दान, दीया के दान, हूम-जग, आरती-पूजा के विशेष महत्तम बताय गे हावय। धारमिक मानियता के हिसाब इही दिन कन्यादान करे के संतान व्रत हा पूरा हो जाथे। जौन सरद्धालु मन हा कारतिक पुन्नी ले शुरु करके जम्मों पंदरा पूरनिमा के व्रत, उपास राख के चँदा ला जल अरपन करथें। भगत मन सरद्धा अउ सक्ति के अनुसार दान-पान, शुभ कारज करथे ओखर सभो मनोकामना हा पूरा होथे। इही दिन के रतिहा मा दीया बार के, रतिहा जाग के भजन करत, पूजा-पाठ अउ अराधना करना चाही। इही दिन भगवान विष्णुजी के पूजा-पाठ के संगे संग तुलसी पूजा अउ तुलसी बिहाव करे ले घर मा सुख समरिद्धी अउ शांति के भंडार भरथे। कारतिक महीना मा तुलसी बिहाव अउ तुलसी अराधना के विशेष महत्तम हावय।
पुरान मन के कथा मा गुनबती नाँव के एक झन इस्तिरी हा मंदिर के मुहाँटी अउ अँगना मा तुलसी के सुग्घर फुलवारी ला कारतिक महीना मा लगाइस अउ तन-मन ले सेवा करीस। इही गुनबतु हा अपन आगू जनम मा सतभामा बनके श्री कृष्ण भगवान के पटरानी बनीस। एखरे सेती कारतिक पूरनिमा के दिन तुलसी पूजा अउ तुलसी बिहाव के बड़ महत्तम हावय। इही दिन तुलसी के बिरवा अउ तुलसी चौरा ला सजाय सवाँरे जाथे अउ भगवान सालिगराम के बिधि-बिधान ले पूजा-पाठ करे जाथे अउ तुलसी बिहाव के उत्सव ला सरद्धा के संग मनाय जाथे।

कन्‍हैया साहू ‘अमित’
शिक्षक, भाठापारा

तोरे अगोरा हे लछमी दाई

होगे घर के साफ सफाई,
तोरे अगोरा हे लछमी दाई।
अंगना दुवार जम्मो लिपागे,
नवा अंगरक्खा घला सिलागे।
लेवागे फटक्का अउ मिठाई,
तोरे अगोरा हे लछमी दाई।। 1

अंधियारी म होवय अंजोर,
दीया बारंव मैं ओरी ओर।
हूम-धूप अउ आरती गा के,
पईयां परत हंव मैं ह तोर,
बांटव बतासा-नरियर,लाई,
तोरे अगोरा हे लछमी दाई।। 2

तोर बिन जग अंधियार,
संग तैं त रतिहा उजियार।
तोर किरपा ह होथे जब,
अन-धन के भरय भन्डार।
सुख-दुख म तैं सदा सहाई।
तोरे अगोरा हे लछमी दाई।। 3

कलजुग के तहीं महरानी,
तोर आगू भरैं सबो पानी।
माया म तोर जग बउराय,
अप्पढ-मूरख अउ गियानी।
बिनती”अमित”, कर भलाई,
तोरे अगोरा हे लछमी दाई।। 4

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक भाटापारा (छग)
संपर्क :- 9200252055

सिंगारपुर के माँवली दाई

हमर माँवली दाई के धाम

हमर नान्हें छत्तीसगढ़ राज ला उपजे बाढ़हे अभी खूब मा खूब सोला बच्छर होवत हे फेर छत्तीसगढ़ राज के नाँव के अलख जगावत कतको साल होवत हे। हमर छत्तीसगढ़ राज के जुन्ना इतिहास हा बड़ प्रसिद्ध अउ सुग्घर हावय। ए राज के बीचो-बीच मा शिवनाथ नदिया बोहावत हावय। इही शिवनाथ नदिया के दुनो पार मा अठारा-अठारा ठन गढ़ प्राचीन समे मा ठाढ़े रहीन। एखरे सेती ए राज के नाँव छत्तीसगढ़ पड़ीच हे अइसन कहे जाथे। इही छत्तीसगढ़ मा के एकठन गढ़ हमर गवँई-गाँव सिंगारपुर (माँवली) हा घलाव आय। इही गाँव मा चार सौ बच्छर जुन्ना हमर माँवली दाई के प्रचीन मनमोहनी मयारु मूरत इस्थापित हावय।
माँवली दाई के मूरती अउ मंदिर के निरमान कब होय रहीस हे एखर बारे मा कोनो लिखे-धरे प्रमाण नइ मिलय। प्राचीन समे मा ए क्षेत्र हा मंडलागढ़ा कोटा के गोंड़ राजा मन के अधिकार मा रहीस। मराठा मन के शासनकाल मा ए क्षेत्र हा रघुजी तीसर के हक मा आइस। रघुजी तीसर हा सन् 1827 मा रायपुर के जगदेव साव ला इही क्षेत्र के गियारा ठन गवँई गाँव ला ईमान मा दीस जेमा हमर गाँव सिंगारपुर हा घलाव शामिल रहीस। ए हा तब के बात हरय जब भाटापारा क्षेत्र के कोनो गवँई गाँव के नाँव पता नइ रहीस अउ सिंगारपुर मा माँवली दाई हा बिराजे रहीस। ए बात के प्रमाण पहिली अंग्रेजी गजेटियर मा सन् 1901 मा सिंगारपुर के माँवली दाई अउ एती ओती बिराजे अउ जम्मो देवी दाई मन के बारे मा लिखे गे रहीस। एखर हिसाब ले हमर देवी दाई ला सिंगारपुर मा बिराजे चार सौ साल ले जादा समे होगे हावय। माँवली माता के मंदिर अउ मूरती के के बारे मा इस्थानीय जनश्रुति के हिसाब ले राजस्थान ले आय बंजारा जात के लोगन मन गाँव-गाँव गेरु बेचे बर सिंगारपुर आवँय अउ घुम फिर के कई महीना ले गेरु बेंचँय। गाँव के बाहिर सुनसान जघा मा अपन डेरा ला लगावँय। अपन डेरा तीर पखरा के माँवली दाई के मूरती ला बनवा के अपन सुरक्छा खातिर पूजा अर्चना करँय। मंदिर के तीरेच मा दाई के नाँव ले माँवली तरिया के घलाव निर्माण अपन निस्तारी खातिर कराइन। ए तरिया हा पखरा अउ सादा छुही के खदान ले बने हावय। ए अंचल हा आज घलाव सादा छुही अउ पखरा बर बड़ प्रसिद्ध हावय।
माँवली शब्द हा माँ अउ वली दू शब्द ले मिलके बने हावय। ए प्रकार माँ के अर्थ महतारी अउ वली के अर्थ हे संरक्छक, पालक या फेर संरक्छिका, पालन-पोसन करइया। ए प्रकार माँवली के शाब्दिक अर्थ होथे अइसन महतारी जउन हा अबोध अउ अग्यानी लइकामन के पास लन पोसन करइया माता। माँवली महतारी अइसन शक्ति के देवी के नाँव हरय जउन हा कभू अपन लइका मन मा कोनो भेदभाव नइ करय। जम्मों जन ले निच्छल ममता अउ मया करइया मममोहनी मुरतिया सिरिफ सिंगारपुर के माँवली दाई हा हरय। दाई के महिमा अउ प्रताप हा जग परसिद्ध हावय। दुनिया भर के दुखिया, थके हारे अउ सच्चा सरद्धालु मन के मन के मनौती ला माँवली दाई हा सरद्धा के हिसाब ले पूरन करथे। बच्छर मा दू बेर नवरातरी के पावन परब मा माँवली महतारी के अँगना मा भगत मन के मेला लगथे। दुरिहा-दुरिहा देश-परदेश ले इहाँ सरद्धालु आथे अउ दाई के दरसन पाथे। कोनो मन के मनौती पूरा हो ही कहीके ता कोनो मन के मनौती पूरा होगे कहीके दाई के भुवन मा जोत जवाँरा जलवाथे।
मंदिर के तीर मा दाई के नाँव मा शीतल जल ले भरपूर माँवली तरिया हावय। दाई के दरश के पहिली ए तरिया मा असनांदे के परमपरा हावय फेर आजकाल ए परमपरा हा नंदावत जावत हे। पानी छींच के काम चलावत हावँय। तरिया हा बड़ गहिरा हावय। तरिया के बीचोबीच मा सिमेंट ले बने नाँग नाथत श्रीकृष्ण के बड़का मूरती इस्थापित हे। ए तरिया ले पुरईन पान, कमल,पोखरा, खोखमा, सिंघाडा, ढेसकांदा, कुकरीकांदा अड़बड़ मिलथे। मंदिर के सरी जोत जवाँरा हा इही तरिया मा ठंडा होथे। तरिया के शीतल निरमल जल हा चमड़ी के रोग-राई मा फायदा करथे। खेती-खार के बेमार फसल बर माँवली तरिया के जल हा बड़ काट करथे अइसन ए अंचल मा जनश्रुति हे। सरद्धालु अउ पर्यटक मन बर तरिया मा पइड़ल वाले डोंगा के बेवसथा हे फेर देखरेख के कमी मा ए हा अदलहा परे हे।
प्राचीन समे ले माँवली मंदिर मा गोंड़ बईगा मन हा पुजेरी हावँय। आज घलाव इँखर आठवाँ-दसवाँ पीढ़ी हा माँवली दाई के सेवा करत आवत हावँय। आदिकाल ले मंदिर ला सँवारे बर पुजेरी मन हा बड़ मेहनत अउ तियाग करें हें। अभी दस-बारा बच्छर ले मंदिर ला ट्रस्ट के नाँव मा चेतलग मन हा मनमाने ढ़ंग ले चलात हे अउ पुजेरी के इस्थान ला शून्य कर दें हें। माँवली मंदिर के मुख्य मंदिर के संगे-संग 18-20 अलग-अलग देवी-देवता मन के मंदिर देवाला बने हावय। आने-आने जात समाज के धर्मशाला सरद्धालु मन बर बने हावय। ए धर्मशाला मन मा अपन-अपन जात के साल मा एक बेर बैठक होथे अउ समाजिक समस्या के निपटारा होथे। साल मा दू बेर नवरात मा मेला भराथे। खेल, तमाशा, दुकान, ढ़ेलवा, झूलना, नाचा-पेखन के रिंगी-चिंगी आयोजन नवरात परब मा होथे। सिंगारपुर तक पहुँचे के मुख्य दू ठन मार्ग हे। भाटापारा ले मोटर, जीप,कार,टेक्सी ले 12किलोमीटर उत्ती मा अउ निपनिया ले 6 किलोमीटर बूड़ती मा आये जाये के सुविधा हावय। माँलवी मंदिर के संगे संग माँवली तरिया के घलाव बड़ महिमा हावय जउन हा माँवली दाई के तीर मा बसे हे या फेर अइसन घलाव कहे जा सकथे के माँवली तरिया के तीर मा माँवली दाई हा बिराजे हावय। माँवली तरिया हा बड़ गहिला हावय जौन हा सादा छूही माटी के खदान ले बने हावय। माँवली दाई के अँचल मा सादा छूही के भरमार हे। ए सादा छूही ला पबरित मान के घर-दुआर, कोठी-डोली, पूजा-पाठ, जग-हवन मा प्रयोग करे जाथे। सिंगारपुर के पास-परोस के गाँव जरहागाँव, लेवई, कोटमी अउ कोदवा मा छूही माटी के खदान हे। माँवली दाई के प्रताप ले ए क्षेत्र हा सादा छूही माटी बर बड़ परसिद्ध हावय।
माँवली मंदिर मा बच्छर भर मा दू बेर नवरातरी बड़ उच्छल मंगल ले मनाय जाथे। माता के मंदिर मा जोत-जवाँरा जगमग-जगमग जलाय जाथे। सरद्धालु भगत मन हा माँवली दाई के अँगना मा अपन मन के मनौती पूरा हो ही कहीके या फेर मन के मनौती पूरा होगे कहीके जोत जवाँरा जलवाथे। नवरात मा माँवली मंदिर के तीर मा मेला-ठेला भराथे। एमा खेल-तमाशा, ढ़ेलवा-रईचुली, खाई-खजाना, नाचा-गम्मत अउ आनी-बानी के दुकान पानी सजथे। मंदिर अउ मेला के सुग्घर बेवसथा माँवली माता समिती हा करथे जउन हा दानदाता मन के सहयोग ले साज सजावट अउ जीर्णोद्धार के बूता भागीरथ बरोबर करत हावय। एखर संगे संग माँवली मेला मा दुरिहा-दुरिहा ले आये सब्बो सरद्धालु भगत मन बर माँवली माता सेवा समिति हा भण्डारा के आयोजन करथे। एमा दान-दाता मन के दान ले भण्डारा मा समिति के सदस्य मन स्वयंसेवक के रुप मा पून्य के बूता लगिहाँथ करत आवत हे। पाछू दू चार बच्छर ले छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग ले स्थानीय जनप्रतिनिधि अउ उत्साही नवयुवक मन हा माँवली महोत्सव के रिंगी-चिंगी मनोरंजक सांस्कृतिक कार्यक्रम ला घलाव सरलग करावत हावय। हमर छत्तीसगढ़ राज के चिन्हारी अउ गवाही ला अब जतने के बेरा हावय। जतन के, सकेल के, सुरक्छा करके पुरखा मन के चिन्हारी ला बचा के राखे के बेरा हावय। हमर सरकार ला अइसन जगा ला धरोहर बरोबर संभाले के जरुरत हावय अउ सुविधा दे के परयास राज सरकार ला करना चाही। अइसन गवँई-गाँव हा हमर असल गहना हरय। एला कोनो परकार ले गवाँना नइ चाही। एखर विकास अउ सुरक्छा के सरी उपाय सरकार ला हर हाल मा करना चाही।
. . ।।जय माँवली दाई।।…
जय जय हे मोर माँवली दाई, लइका हरन तोरेच नदान।
होवय हमर हिरदय निरमल, बाढ़य बुद्धि अउ गियान।
बाधा बिघन कोनो आवय झन, बिगड़य झन काँहीं बूता कोनो।
सिंगारपुर के माँवली दाई ला, करय कन्हैया हा परनाम।

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक-भाटापारा (छ.ग)
संपर्क~9753322055

डेंगू के कारण कोन

एक दिन बस्ती के मच्छर एकजघा जुरियाँइन।
भनन-भनन बड़ करीन ,बिक्कट गोठियाँइन।

कहत हें:- मनखे मन बड़ हुशियारी झाड़थें।
गलती अपन करँय अउ बिल हमर नाँव मा फाड़थें।

करके ढेराढारी, कचरा फेकथें ऐती तेती।।
रंग-रंग के बिमारी सँचरथे ओखरे सेती।

जघा जघा गंदगी के ढेरी खुदे लगात हें।
अपने करनी कर बेमारी ला बलात हें।

अपन घर के कचरा डारँय दूसर के मुँहाटी मा।
तहाँ ले झगरा माते भारी लात अउ लाठी मा।

अतका बुध नइ के सकेल कचरा ला जला दँय।
नहीं ते पालिका कचरा गाड़ी ला बला लँय।

बेरा बिता देथें चुगली चारी चटर-पटर मा।
झिल्ली अउ प्लास्टिक ला डारत हें गटर मा।

अइसन माहौल हमर बर सरग सरी सुखधाम होथे।
मनखे के करनी ले हमन ला ल बहुते अराम होथे।

खँचवा डबरा मा बोहात पानी हा जब माढ़थे।
इही मा हमर परिवार खसखस ले बने बाढ़थे।

काय करही येमा डाँक्टर, नेता, मंतरी हा।
ते कायेच करही मास्टर, पुलिस अउ संतरी हा।

सिरतों मा मनखे हा अगर सफई ला अपनाही।
मच्छर माछी कहाँ अपन ठिकना बना पाही।

सबले पहिली साफ सफाई के तो करँय काम।
फोकटिहा डेंगू बर हम ला झन करँय बदनाम।

अइसन माहौल मा हमरो एकदिन मालगुजारी होही।
झट नइ चेतहीं ता डेंगू हा एक दिन महामारी होही।

कन्हैया साहू “अमित”
भाटापारा, छत्तीसगढ़

मुसुवा के पीरा

मुसुवा कहय अपन प्रिय स्वामी गनेश ले।
कब मिलही मुक्ति प्रभू कलजुग के कलेश ले।

बारा हाल होही अब गियारा दिन के तिहार मा।
बइठाही घुरुवा कचरा नाली के तीरतार मा।

बिकट बस्साही छपके रबो मुँह नाक ला।
माटी मिलाही प्रभू हमर दूनों के धाक ला।

आनी-बानी के गाना ला डी.जे मा बजाही।
जोरदरहा अवाज सुन-सुन हमर माथा पिराही।

जवनहा लइकामन रंगे रहीं भक्ति के रंग।
पंडाल भीतरी पीही खाहीं, करहीं उतलंग।

सेवा के नाँव मा मेवा ये मन पोठ खाहीं।
नइ बाँचही तहाँ ले मोर नाम बद्दी धराहीं।

गणेश पूजा के असल महत्तम ला इन भूलात हें।
दुनिया भर के फेशन धरम-करम मा मिलात हें।

हे लम्बोदर अपन सूँड़ ला अब तो लमा।
भक्तन ला सदबुद्धि आय जुगाड़ ये जमा।

गणेश पूजा के नाँव मा ठट्ठा झन करँय खेल।
देशभक्ति अउ जनहित के खच्चित करँय मेल।

जन-जन के कल्याण होय अइसन भल काम करँय।
अपन सुवारथ बर हम दूनों ला झन बदनाम करँय।

कहे बोले मा नइ मानही ता अलकरहा डाँड़ लेबे।
करम दंड़ बर भूकंप, अकाल, सुनामी अउ बाढ़ देबे।

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक-भाटापारा(छ.ग)
संपर्क~9200252055

दोहा गजल (पर्यावरण)

रुख राई झन काटहू, रुख धरती सिंगार।
पर हितवा ये दानियाँ, देथें खुशी अपार।~1

हरहिंछा हरियर *अमित*, हिरदे होय हुलास।
बिन हरियाली फोकला, धरती बंद बजार।~2

रुखुवा फुरहुर जुड़ हवा, तन मन भरय उजास।
फुलुवा फर हर बीज हा, सेहत भरे हजार।~3

डारा पाना पेंड़ के, करथें जीव निवास।
कखरो कुरिया खोंधरा, झन तैं कभू उजार।~4

धरती सेवा ले *अमित*, सेउक बन सुखदास।
खूब खजाना हे परे, बन जा मालगुजार।~5

रुखराई के होय ले, पानी बड़ चउमास।
जंगल झाड़ी काटबो, सँचरहि अबड़ अजार।~6

सिरमिट गिट्टी रेत ले, बिक्कट होय बिकास।
पुरवाही पानी जहर, ये कइसन निस्तार।~7

घर के कचरा टार के, करदव दुरिहा नास।
गोबर खातू डार के, खेत करव गुलजार।~8

पूरा पानी हा करय, बहुँते सरी बिनास।
बस्ती के बस्ती बुड़ै, मरघट होय मजार।~9

सावचेत सेवा करन, धरती सरग बिलास।
सुग्घर सिधवा सब बनै, काबर कोन बिजार।~10

कन्हैया साहू “अमित”
-भाटापारा (छत्तीसगढ़)
संपर्क~9200252055



गीत: सुरता के सावन

घुमङे घपटे घटा घनघोर।
सुरता के सावन मारे हिलोर।।
घुमङे घपटे घटा घनघोर….

मेछरावे करिया करिया बादर,
नयना ले पिरीत छलके आगर।
होगे बइहा मन मंजूर मोर,
सुरता के सावन मारे हिलोर।।१




नरवा,नँदिया,तरिया बउराय,
मनमोहनी गिंया मोला बिसराय।
चिट्ठी,पतरी,संदेस ना सोर,
घुमङे घपटे घटा घनघोर।।२

बरसा बरसे मन बिधुन नाँचे,
बिन जँउरिहा हिरदे जेठ लागे।
लामे मन मयारूक मया डोर,
सुरता के सावन मारे हिलोर।।३

पुरवाही जुङ, डोलय पाना डारा,
पूँछव पिरोहिल ल पारा ओ पारा।
फिरँव खोजव खेत खार खोर,
घुमङे घपटे घटा घनघोर।।४
सुरता के सावन मारे हिलोर……..

कन्हैया साहू “अमित”
शिक्षक~भाटापारा
जिला~बलौदाबाजार (छ.ग.)
संपर्क~9200252055