आवव संगी खेलबो सुग्हर होली, एके जगा जुरिया के करबो हँसी ठिठोली। कोनो ल लगाबो लाली कोनो ल पीला, पिरित के रंग होथे गहिर नीला। एसो के होरी म जुड़ा ले संगी, अपनेच हिरदे के पीरा ल। न ककरो घर बिरान रहय, न कोनो लईका अनाथ होवय। मया के होली पिरित के होली, इही हमर पहिचान रहय। मनखे मनखे मिलके गुलाब बनव , कोनो कतको पियय अईसने शराब बनव। ककरो बर पाँव बनन, त ककरो बर छाँव। फेक दे अध्ररा के आगी ल, जेन सुलगा के रखे हे अतेकन नाव।…
Read MoreYear: 2017
नानपन के होरी
नानपन म होरी खेले म अड़बड़ मजा आवय, खोर गली के चिखला म, जहुंरिया मन घोन्डावय। पहिली संझा होली के लकड़ी घर घर ले लावन। सियान संग पूजा करके होली हमन जलवावन। अधरतिया ले नंगारा बजाके अंडबंड गीत गावन। कभू कभू परोसी घर के, झिपारी, लकड़ी चोरावन। उठ बिहनिया बबा संगधरके होली डांड़ जावन। लकड़ी छेना नरियर डारन ऊद बत्ती जलावन। बबा पाछू करीस ताहन नरियर ल खोधियावन। फोरके नरियर खुरहोरी ल झपट-झपट के खावन। पिचकारी म पानी भरके रेंगईया ऊपर पिचकन। कनकन पानी दुसर पिचके त एती ओती बिदकन।…
Read Moreहोली हे भइ होली हे
होली हे भई होली हे , बुरा न मानों होली हे । होली के नाम सुनते साठ मन में एक उमंग अऊ खुसी छा जाथे। काबर होली के तिहार ह घर में बइठ के मनाय के नोहे। ए तिहार ह पारा मोहल्ला अऊ गांव भरके मिलके मनाय के तिहार हरे। कब मनाथे – होली के तिहार ल फागुन महीना के पुन्नी के दिन मनाय जाथे। एकर पहिली बसंत पंचमी के दिन से होली के लकड़ी सकेले के सुरु कर देथे। लइका मन ह सुक्खा लकड़ी ल धीरे धीरे करके सकेलत…
Read Moreबेटी की हत्या : संस्मरण
वाह रे निष्ठुर आदमी बेटे की चाहत में दो दो बेटियों को माँ की कोख में ही मार डाला, तीसरी जब बेटी पैदा हुई तो उस अभागिन की माँ चल बसीI पिता ने फिर दूसरी शादी रचा ली, दूसरी बीवी से एक बेटा हुआ,पिता और माँ का पूरा ध्यान उस अभागिन पलक से हट कर बेटे पर हो गया I पलक धीरे धीरे बड़े होने लगी और वो अपनों के बीच में उसे परायेपन का एहसास होने लगा,चार साल की उम्र में उसकी सौतेली माँ ने वहीं पास के सरकारी…
Read Moreबजरहा होवत हमर तीज तिहार
छत्तीसगढ़ म आठोकाल बारो महिना कोई न कोई तिहार आते रथे। चइत, बइसाख , जेठ, अषाढ़, सावन ,भादो, कुंवार, कातिक, अग्घन ,पूस ,मांग, फागुन सबो महिना हमन तीज तिहार मनाथन। हमर पुरखा मन काम काज ले फुरसुद अऊ मगन होके इरखा द्वेस ल भुलाय खातिर तिहार ल सिरजाय रहिन।मया-पीरा, सुख-दुख भुलाय बर अऊ घर-परिवार, गांव-समाज म मेल जोल नाना परकार के बाहना ओला उही मन जानय ।फेर ऊंखर बनाय तीज तिहार ल अब हमन बजरहा बना डारेन।पुरखा मन देश, काल, इस्थिति-परिस्थिति अऊ बेरा कुबेरा ल देख ताक के तिहार बनाय…
Read Moreव्यंग्य : गवंई गांव के रद्दा म बस के सफर
बस के सफर में का मजा आथे तेला तो गवंई गांव के रद्दा में जेहा बस के सफर करे होही तिही बता सकत हे। सहर वाला बस मन हा तो बस सवारी ढोवत रइथे, बस के असली मजा तो गांव के मनखेच मन हा पाथे। मेहा कई घांव मजा ले डरे हंव। कहां, काबर, काकर करा गे रेहेंव ये सब ल भुला जहूं फेर बस के मजा ल मेहा नई भुला सकंव। सबले पहिली तो मोटर स्टेन म जतका बस खड़े रइथे तेमा के सबले खटारा बस ल देख के…
Read Moreकहानी : अलहन के पीरा
गुमान ओ दिन अड़बड़ खुस रहिस जेन दिन ओखर घर लछमी बरोबर बेटी ह जनम लीस। ओकर छट्ठी ल गजबेच उछाह मंगल ले मनाईस, गांव भर ल झारा-झारा नेवता पठोइस। बरा, भजिया, सोंहारी अऊ तसमई संग जेवन कराइस।अरोस परोस के सात–आठ गांव के पटेल , मंडल, पंच, गऊंटिया,बड़े किसान ल घलाव नेवता देय रहीस।बेटी के नांव सरसती राखिस। ओला बेटी पाय के बड़ गुमान राहय। गुमान के अंगना म सरसती ह किलकारी मारत ,खेलत कूदत बाढ़े लागिस। इस्कूल जाय के लाईक होइस तब गुमान ओकर दाखिला करा दीस।नोनी इस्कूल जाय…
Read Moreबी.आर.वर्मा द्वारा रचित पुस्तक का विमोचन
कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय शिक्षा संकाय के पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर बी.आर.वर्मा द्वारा रचित पुस्तक का विमोचन दुर्ग विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एलआर वर्मा, उपप्राचार्य डॉ. एआर वर्मा, विभागाध्यक्ष संस्कृत प्रो. जानकीशरण पाण्डेय, विज्ञान निकाय अध्यक्ष डॉ. वाईआर कटरे, डॉ. सुमनलता सक्सेना तथा रचनाकार श्री वर्मा की पत्नी सावित्री वर्मा, पुत्री अर्पणा वर्मा एवं पुत्र रविशंकर वर्मा उपस्थित थे। उल्लेखनीय है कि यह किताब श्री वर्मा के निधन के पश्चात प्रकाशित हुई है। पुस्तक को सभी ने बेहद उपयोगी बताया।
Read Moreसीख : एक लोटा पानी
मोनी! तोर बबा ल एक लोटा पानी दे दे ओ। कुरिया बाहरत दाई ह अपन बारा बच्छर के बेटी ल हांक पारिस। लइका दाई के रेरी ल कान नई धरिस अऊ खोर म जाके बईठ के मोबाइल म गेम खेलत रहिगे। एती खटिया म सूते बबा घेरी बेरी चिचियावत राहय।लइका के अरदलीपन ल देख के ओकर दाई खुदे पानी लेग के दे दिस अऊ गुने लगिस, कि मोर बेटी, जौन ल अड़बड़ अकन पैसा भरके अंगरेजी इस्कूल म पढ़ावत हौ, वो एक लोटा पानी देय बर नई सीखत हे। हे…
Read Moreकहानी : फूल के जघा पउधा भेंट करव
रवि अपन संगवारी उदय संग छोकरी खोजे बर निकरथे, लहुट के गांव म अपन ददा ल जाके कोनहो छोकरी नई भइस कइके बताथे। सरकारी नौकरी करईया पढ़े-लिखे रवि हा जम्मों झन ल पढई-लिखई, रंग-रूप, चिज-बस, गवंईहा-सहरिया कइके कमी खोजिच डारे। ओखर ददा कइथे तेहा अइसने करबे त जिनगी भर डेड़वा रेहे ल परही, भगवान के छोड़ कोनहोच हा सर्व गुन वाला नई मिलय, अऊ फेर जेखर संग तेहा बिहाव करबे तेखर भीतर का गुन हमाय हे तेला कोन जानथे? जिनगी हा तोर नचाय ले नई नाचे, जिनगी म बेरा-बखत के…
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