बोर्रा….. अपन पुरता पोट्ठ हे। कई बच्छर के जून्ना खावत हे। थुहा अउ पपरेल के बारी भीतर चर-चर ठन बिही के पेड़…..गेदुर तलक ल चाटन नई देय। नन्दू के दाई मदनिया हर खाये- पीये के सुध नई राखय… उवत ले बुड़त कमावत रथे। नन्दू हर दाई ल डराय नहीं…। ददा बोर्रा हर आंखी गुड़ेरथे तभे नन्दू हर थोरथर भय खाथे। लइका के मया…सात धर के गोरस पियाये हे। दाई ए हर जानही मया पीरा ल, के कतका दु:ख-सुख म लइका ल अवतारे रथें। ढपकत बेरा ले कमा के फिरत मदनिया…
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मंगत रविन्द्र के कहिनी ‘अगोरा’
बोर्रा….. अपन पुरता पोट्ठ हे। कई बच्छर के जून्ना खावत हे। थुहा अउ पपरेल के बारी भीतर चर-चर ठन बिही के पेड़…..गेदुर तलक ल चाटन नई देय। नन्दू के दाई मदनिया हर खाये- पीये के सुध नई राखय… उवत ले बुड़त कमावत रथे। नन्दू हर दाई ल डराय नहीं…। ददा बोर्रा हर आंखी गुड़ेरथे तभे नन्दू हर थोरथर भय खाथे। लइका के मया…सात धर के गोरस पियाये हे। दाई ए हर जानही मया पीरा ल, के कतका दु:ख-सुख म लइका ल अवतारे रथें। ढपकत बेरा ले कमा के फिरत मदनिया…
Read Moreछत्तीसगढ़ी कहिनी किताब : गुलाब लच्छी
संगी हम आपके खातिर ‘गुरतुर गोठ’ म छत्तीसगढ के ख्यात साहित्यकार, कहानीकार श्री मंगत रविन्द्र जी के अवईया दिनन म प्रकासित होवईया कहानी संग्रह ‘गुलाब लच्छी’ के सरलग प्रकाशन करे के सोंचत हावन । इही उदीम म आज ये कहानी संग्रह के पहिली प्रस्तावना ‘दू आखर’ प्रकाशित करत हन तेखर बाद ले सरलग कुछ दिन के आड देवत ये संग्रह म प्रकाशित 18 कहनी ला प्रकासित करबोन । कहानीकार- मंगत रवीन्द्र ।। दु आखर ।। खेती पांती म मेड़पार, कोला बारी म बिंयारा, नाचा कुदा म तान तपट्टा, घर दुवार…
Read Moreछत्तीसगढ़ी कहिनी किताब : गुलाब लच्छी
संगी हम आपके खातिर ‘गुरतुर गोठ’ म छत्तीसगढ के ख्यात साहित्यकार, कहानीकार श्री मंगत रविन्द्र जी के अवईया दिनन म प्रकासित होवईया कहानी संग्रह ‘गुलाब लच्छी’ के सरलग प्रकाशन करे के सोंचत हावन । इही उदीम म आज ये कहानी संग्रह के पहिली प्रस्तावना ‘दू आखर’ प्रकाशित करत हन तेखर बाद ले सरलग कुछ दिन के आड देवत ये संग्रह म प्रकाशित 18 कहनी ला प्रकासित करबोन । कहानीकार- मंगत रवीन्द्र ।। दु आखर ।। खेती पांती म मेड़पार, कोला बारी म बिंयारा, नाचा कुदा म तान तपट्टा, घर दुवार…
Read Moreदौना (कहिनी) : मंगत रविन्द्र
मन ले नहीं दौना, पाँव ले खोरी हे |मया के बाँधे, बज्जर डोरी हे || अंधवा ला आंखी नहीं ता लाठी दिये जा सकथे. भैरा ला चिल्ला के त कोंदा ल इसारा म कहे जाथे. खोरवा लंगड़ा ल हिम्मत ले बल दिये जाथे . दौना बिचारी जनमती खोरी ये. आंखी कान तो सुरुजमुखी ये. आंखी के ओरमे करिया घटा कस चुंदी, रिगबिग ले चाँदी कस उज्जर उज्जर दाँत , सुकवा कस नाकबेंसरी, ढैंस कांदा कस कोंवर ठाठ म पिंयर सारी अरझे रहै पर बपुरी दौना एक गोड़ ले लचारी हे…
Read Moreदौना (कहिनी) : मंगत रविन्द्र
मन ले नहीं दौना, पाँव ले खोरी हे |मया के बाँधे, बज्जर डोरी हे || अंधवा ला आंखी नहीं ता लाठी दिये जा सकथे. भैरा ला चिल्ला के त कोंदा ल इसारा म कहे जाथे. खोरवा लंगड़ा ल हिम्मत ले बल दिये जाथे . दौना बिचारी जनमती खोरी ये. आंखी कान तो सुरुजमुखी ये. आंखी के ओरमे करिया घटा कस चुंदी, रिगबिग ले चाँदी कस उज्जर उज्जर दाँत , सुकवा कस नाकबेंसरी, ढैंस कांदा कस कोंवर ठाठ म पिंयर सारी अरझे रहै पर बपुरी दौना एक गोड़ ले लचारी हे…
Read Moreकहिनी : डोकरा डोकरी : शिवशंकर शुक्ल
शिवमंगल शुक्ल। हमर छत्तीसगढी भाखा के विद्वान साहित्यकार हें, इमन छत्तीसगढी के पहिली उपन्यासकार यें । इखर उपन्यास ‘दियना के अंजोर’ अउ ‘मोंगरा’ हा मेकराजाला म उपलब्ध हावय । इखर एक ठन लइका मन बर लिखे गये कहिनी किताब ‘दंमाद बाबू दुलरू’ के एक ठन कहिनी ला हम इहां प्रस्तुत करत हन । कथानक लइका मन के रहस्य परेम के कारन थोरकन चित्र बिचित्र हे कहिनी म कहिनीकार का कहना चाहत हे ये हा रहस्यबाद-छायाबाद के बिसय ये लगथे । आपो मन पढव अउ अपन बिचार हमला देवव । संजीव…
Read Moreकहिनी : डोकरा डोकरी : शिवशंकर शुक्ल
शिवमंगल शुक्ल। हमर छत्तीसगढी भाखा के विद्वान साहित्यकार हें, इमन छत्तीसगढी के पहिली उपन्यासकार यें । इखर उपन्यास ‘दियना के अंजोर’ अउ ‘मोंगरा’ हा मेकराजाला म उपलब्ध हावय । इखर एक ठन लइका मन बर लिखे गये कहिनी किताब ‘दंमाद बाबू दुलरू’ के एक ठन कहिनी ला हम इहां प्रस्तुत करत हन । कथानक लइका मन के रहस्य परेम के कारन थोरकन चित्र बिचित्र हे कहिनी म कहिनीकार का कहना चाहत हे ये हा रहस्यबाद-छायाबाद के बिसय ये लगथे । आपो मन पढव अउ अपन बिचार हमला देवव । संजीव…
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