Category: कुकुभ

मानसून मा : कुकुभ छंद

फिर माटी के सोंधी खुशबू,फिर झिंगुरा के मिठ बानी।
मानसून मा रद रद रद रद,बादर बरसाही पानी।

छेना लकड़ी चाउँर आटा,चउमासा बर जतनाही।
छाता खुमरी टायच पनही,रैन कोट सुरता आही।

नवा आसरा धरे किसानन,जाग बिहनहा हरषाहीं।
बीज-भात ला जाँच परख के,नाँगर बइला सम्हराहीं।

गोठ किसानी के चलही जी,टपराही परवा छानी।
मानसून मा रद रद रद रद,बादर बरसाही पानी।

मेछर्रा बत्तर कीरा मन,भुलका फूटे घर आहीं।
बोटर्रा पिंयर भिंदोल मन,पँड़वा जइसे नरियाहीं।

अहरू बिछरू के डर रहही,घर अँगना अउ बारी मा।
बूढ़ी दाई टीप खेल ही,लइका के रखवारी मा।

मच्छर बढ़ही गाँव शहर मा,बिकही बड़ मच्छर दानी।
मानसून मा रद रद रद रद,बादर बरसाही पानी।

चूरत भजिया देख बबा हर,चूल्हा तीरन घोर्राही।
लालच लहुट जही बचपन के,दुवे-चार भजिया खाही।

दिन बूड़त खा पी के जिनगी,दसना ऊपर सुसताही।
बिजली करही आँख मिचौली,छिन आही छिन मा जाही।

नदिया नरवा मन उफनाहीं,धरती रँग धरही धानी।
मानसून मा रद रद रद रद,बादर बरसाही पानी।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर”
गोरखपुर,कवर्धा
13/03/2018
मोबा-9685216602
sukhdev.singh.ahileshver31@gmail.com



योग करव जी (कुकुभ छंद)

मनखे ला सुख योग ह देथे,पहिली सुख जेन कहाथे ।
योग करे तन बनय निरोगी,धरे रोग हा हट जाथे।।1

सुत उठ के जी रोज बिहनियाँ,पेट रहय गा जब खाली ।
दंड पेल अउ दँउड़ लगाके, हाँस हाँस ठोंकव ताली ।।2

रोज करव जी योगासन ला,चित्त शांत मन थिर होही ।
हिरदे हा पावन हो जाही,तन सुग्घर मंदिर होही।।3

नारी नर सब लइका छउवा, बन जावव योगिन योगी ।
धन माया के सुख हा मिलही,नइ रइही तन मन रोगी।।4

जात पाँत के बात कहाँ हे, काबर होबो झगरा जी।
इरखा के सब टंटा टोरे, योग करव सब सँघरा जी।।5

जेन सुभीता आसन होवय,वो आसन मा बइठे जी।
ध्यान रहय बस नस नाड़ी हा,चिंता मा झन अइठे जी।।6

बिन तनाव के योग करे मा, तुरते असर जनाथे गा ।
आधा घंटा समे निकालव, मन चंगा हो जाथे गा ।।7

अनुलोम करव सुग्घर भाई, साँस नाक ले ले लेके ।
कुंभक रेचक श्वांसा रोंके, अउ विलोम श्वांसा फेके ।।8

प्राणायाम भ्रस्तिका हावय, बुद्धि बढ़ाथे सँगवारी ।
अग्निसार के महिमा गावँव, भूँख जगाथे जी भारी ।।9

हे कपालभाती उपयोगी, अबड़े जी असर बताथे ।
एलर्जी नइ होवन देवय, ए कतको रोग भगाथे ।।10

कान मूँद के करव भ्रामरी, भौंरा जइसे गुंजारौ ।
माथा पीरा दूर भगाही, सात पइत बस कर डारौ ।।11

ओम जपव उद्गीत करव जी, बने शीतली कर लेहौ ।
रोज रोज आदत मा ढालव, आड़ परन जी झन देहौ ।।12

चोवा राम “बादल”
हथबंद (छग)