कहिनी : आरो

‘भइया’ आखर ह अघ्घन ल हलोर देथे। ओखर हिरदे के तार झनझना जाथे। ये मनखे मोला का जान-सुन के चेता के गईस हे? का मैं ह चोर नो हँव। ओखर अंतस ले आरो आथे… नइ तैं ह चोर नइ अस। तैं कब ले चोर बन गए? अघ्घन कथे नई-नई मैं चोर हंव। अभी-अभी बने हंव। अ घ्घन ह ग्यारमी पढ़े रहीस। समझदार रहीस। फेर नारी परानी मन के तिरिक-तेरा अउ झगरा म अलगे हंड़िया कर डारे रहीस। एके म रहीन त ओला घर परिवार के जादा फिकिर नइ रहय। अब…

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तिलमति-चांउरमति : छत्तीसगढ़ी लोककथा-2

बाम्हन-बम्हनिन एक सहर म रहत रहिन। दोखहा पेट के कारन उनला भीख मांगे बर एती-उती जाय ल परय।। एक दिन भीख म उनला दू ठो बेल मिलिस। बेल कच्चा रहिस तौ ओला पकोए बर ओमन एक ठो ल तील म अउ दूसर ल चांउर म गड़िया देइन। दिन उपर दिन बीतत गइस अउ ओमन गड़ियाए बेल के सुरता अइसे बिसरा दिन जानौ-मानौ बेल उनला मिलेच नइं रहिस। एक दिन राजा के घोड़सार ले घोड़ा ढिला के जो छूटिस के हड़बड़ी मचगे अउ दीवान संग सिपाही मन हदबिद-हदबिद भागिन। घोड़ा हर…

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जनकवि कोदूराम ”दलित” की पुत्र वधु श्रीमती सपना निगम के नान्‍हे कहिनी

अड़हा टूरा के कहिनी हमर गाँव मा एक झन जुंवर्रा टूरा रहिस हे. मूड ला अडबड खजुवाय औ लडर-बडर गोठियावय.  ओखर मूड मा बहुत अकन ले जुंवा अउ लीख भरे राहय. एक झन मितान हा ओला बताइस – ”आज-काल जुंवा-लीख ला मारे बर नवा सेम्पू आय हे. एको बेर लगा लेते,  तोर समस्या हा हल हो जाही. बने साफ-सुथरा रहे कर भाई ! मितान हा ओला सरीर के साफ-सफाई के महत्व बताइस. जुवर्रा टूरा हा तरिया मा नहाय ला जात रहिस. ओला मितान के बात सुरता आइस.जात-जात सोचिस – आज…

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ढ़ूंढ़ी रक्सिन: छत्तीसगढ़ी लोककथा – 1

कोलिहा अउ बेंदरा दूनों मितान बदिन। जउन काम करैं दूनों सोंच-सोंच के जउन फ़ल गवैं दूनों बांट-बांट खांवैं। ढूंढ़ी रक्सिन एक दिन नदिया नहाय गिस तौ कोलिहा सो बेंदरा ह कहिस-” जा मितान! ओखर घर मा घुसर के सुघ्घर-सुघ्घर बने जिनिस ला खाबे, तेखर पाछू मंय जाहूं।” कोलिहा ढूंढ़ी रक्सिन के घर हबर के खावत-मेछरावत रहिस के थोरके बेर पाछू ढूंढ़ी रक्सिन आइस्। ओही डहार ले लगे संकरी ल देख के कहिस -” मोर मंडुरिया म कोन रे?” कुछु आवाज़ नई पाये के पाछू ढूंढ़ी रक्सिन तरिया पार जाके बइठे…

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मिट्ठू मदरसा : रविन्द्रनाथ टैगोर के कहिनी के छत्तीसगढ़ी अनुवाद

एक ठिक मिट्ठू राहय। पटभोकवा, गावय मं बने राहय। फेर बेद नई पढ़य। डांहकय, कूदय, उड़ियाय, फेर कायदा-कानहून का होथे, नई जानय। राजा कथे ‘अइसने मिट्ठू का काम के’ कोनो फायदा तो नी हे, घाटा जरूर हे। जंगल के जमें फर मन ला थोथम डारथे। ताहन राजा-मंडी म फर फरहरी के तंगी हो जाथे। मंतरी ला बलाके किहिस- ये मिट्ठू ला गियान बिदिया सिखोवव- ‘राजा के भांचा ला सिखोय-पढ़ोय के ठेका देय गीस। गुनी धियानी मन के बइसका होइस। बिचार करिन मिट्ठू म अबुजहापना काके सेती हावे। बनेच गंसियाहा भंजाय…

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बरीवाला के कहिनी : बंटवारा

‘मोर बंटवारा के कमती जमीन हे। बंटवारा में मिले घर-दुवार ह टूटत-फुटत हे। बड़े भइया सदाराम जेठासी काबर देबो। दूनों बरोबर-बरोबर बांटबो। मोर बंटवारा नीरस हे। सदाराम के बंटवारा सरस हे। बंटवारा दुवारा होना चाही। सरपंच ह कहिस कस खेदूराम, तुंहर बंटवारा होय सात आठ बरस बीतगे। ये सब बात ल बंटवारा के दिन गोठियाना रिहिस। अब पछताय का होत हे जब चिड़िया चुगगे खेत।’ तइहा के गोठ ल बइहा लेग गे।’ बंटवारा सुनके सब के जी हर कांपे बर धर ले थे। बंटवारा दु:खद पल आय। बंटवारा मं, एक…

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पलायन (कहिनी)

हमर छेत्र म बियासी होय के बाद विधाता ह रिसागे तइसे लागथे। बरसा के अगोरा म हमर आंखी पथरागे, बरस बे नई करीस। सब्बो धान-पान ह मरगे। गांव के जम्मो किसान बनिहार -भूतिहार मन रोजी-रोटी के तलास म गांव ले पलायन करगे। सब आने-आने सहर डाहर चल दिन हे। तुंहर समधी घर के मन घलो माई पीला चल दे हंवय। जगतू ह सहरिया जिनगी के दंऊड़-धूप, रात-दिन के हाय-हाय म अपन आधा जिनगी ल पहा डरिस। सहर ले ओकर मन उचटगे। तहांले अपन गांव जामटोला आ के फेर बस गे।…

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बेटी दमाद के करनी : नान्‍हे कहिनी

”बरतिया किथे कईसे गउंटिया जानत हस, हमन राउत हाथ के पानी नी पीयन तेला। हमन बड़े कबीरहा हरन। हमन नई खान तोर जेवन ल। हमन छोटे नई होवन। गउंटिया हा हाथ जोर के खड़ा होगे। फेर बराती मन टस के मस नी होईन। लगिन के बेरा हा निकलत रिहिस। दमाद बाबू बराती मन ल किथे हमन धरम के रखवारी करइया कबीरपंथी हरन। फेर कबीर के बताय रद्दा ल नी जानेन।” सहर के तीर म लगे एक ठन गाय बरहापुर रहाय। जिहां खेती किसानी ले भरपूर एक झन किसान रहाय। कतको…

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दू ठो नान्हे कहिनी

आदिमानव सुकारो के छुट्टी झटकुन हो जथे। रद्दा म खेलत-खेलत घर आथे अउ अपन बस्तर ल पठेरा म मड़हा के हडिया-कुडेड़ा ल मांजे बर बोरींग डाहर जाथे, रातकुन घर म पढ़ेबर बइठेन ताहन ओकर बबा ह पूछथे, तो गुरूजी मन का पढ़हईस गोई! त सुकारो ह लजावत कहिथे- आदिमानव के बारे म बतइसे। आदिमानव मन ह पहिली उघरा किंजरे कथे। ओतकीच बेर खेत डाहर ले मोहन आथे अउ टी.वी. ल चालू करके ताहन एक्स एम चैनल ल लगाथे त ओमे ‘कांटा लगाऽऽऽ’ कहिके अड़बड़ झन टूरी मन नाचत रथे। तेला…

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सरग सुख

मुकुल के जीव फनफनागे। अल्थी-कल्थी लेवत सोचिस, अलकरहा फांदा म फंदागेंव रे बबा। न मुनिया संग मेंछरई न दई -ददा के दुलार। ये सरग लोक घला भुगतउल हे। ओला लागिस कुछ बुता करतेंव, नांव कमातेंव, पढ़-गुन के हुसियार बनतेंव। वोहा देवदूत ला कथे- मोला लागथे, जिनगीच हर बने रिहिसे। एक झन पोठहा गौंटिया के एकलौता बेटा राहय मुकुल। दूरिहा के नत्ता-गोत्ता वाली जौंजर छोकरी घला संग मं राहय मुनिया। ओकर अपन बिरान कोनो नी राहय। तेकरे सेती गौंटिया घर पिलपोसवा रिहिस। मुकुल अऊ मुनिया संगे खेलंय, पढ़ंय लड़ंय अऊ मेछरावंय।…

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