कहिनी – जिनगी के खातिर

बाबा तेहा लीम बीजा ल काबर सकेले हस गा। काय करबे येला? येला न रे जगो त सौ म पच्चीस-तीस ठन ह पेड़ बनही रे! चल जल्दी बबा, तोला खाय बर देखथे, चल बेटा आवथवं। दाई बबा ह लीम बीजा सकेलथे। आघू कीहिस हे, डोकरा लाज नइए का रे लीम बीजा ल काय अपन मुड़ म थोपही। झन बटकर रांध, लोग मन काय कही ओतेक बड़ आदमी ह लीम बीजा बीनथे। कही, आवन दे तोर बाप ल बतावत हंव। ये डोकरा हा हमर मन के नाक ल कटवाही अउ कांही…

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सरग सुख : कहिनी

मुकुल के जीव फनफनागे। अल्थी-कल्थी लेवत सोचिस, अलकरहा फांदा म फंदागेंव रे बबा। न मुनिया संग मेंछरई न दई -ददा के दुलार। ये सरग लोक घला भुगतउल हे। ओला लागिस कुछ बुता करतेंव, नांव कमातेंव, पढ़-गुन के हुसियार बनतेंव। वोहा देवदूत ला कथे- मोला लागथे, जिनगीच हर बने रिहिसे। एक झन पोठहा गौंटिया के एकलौता बेटा राहय मुकुल। दूरिहा के नत्ता-गोत्ता वाली जौंजर छोकरी घला संग मं राहय मुनिया। ओकर अपन बिरान कोनो नी राहय। तेकरे सेती गौंटिया घर पिलपोसवा रिहिस। मुकुल अऊ मुनिया संगे खेलंय, पढ़ंय लड़ंय अऊ मेछरावंय।…

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नंदिनी केहेस त मोर गांव देमार – कहिनी

आज दुखवा बबा के कुछ आरो नइ मिलत हे। बबा ल कुछु हो तो नई गे! आजेच ओखरघर के मोहाटी के कई बच्छर जुन्ना पीपर पेड़ हर जर समेत उखड़ गे हे। कहुं बबा ह उही मा चपका के… छी…छी… ये कहा मेहा अण्ड-बण्ड सोंचत हंव। बबा ल कुछु नई होवय अबहीन तो वो हा कई बच्छर अऊ जीही। अइसन सोंच के मेहा अपन आप ल धीर तर धरा डरेंव फेर मन के बेचइनी ल दूर नई कर सकेंव। मोर गोड़ अपने-अपन बबा के घर जाय बर उठगे। दुखवा बबा…

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नान्हे कहिनी : सिरिफ एक पेड़

बड़ उदास राहय सुकालू अउ दुकालू। घर- कुरिया, खेत-खार भांय-भांय लगय। कतको खातिन, कमातिन, पातिन, फेर मनछोट, अधूरा-अधूरा। आंधी म टूटे गिरे लिपटिस कस बगीचा लगय परिवार। ददा तो राहय फेर, दाई तो होथे दाई, कोनो नई पा सकंय ओखर गहराई। दाई तो छाता होथे, अउ ददा पितर पाख के महीना चलत राहय। नवमीं के पितर अवइया राहय ऊंखर दाई-ददा ल जीयत राखेबर, ओखर खुशी शांति बर, भागवत कहवाये राहंय। मंदिर बनवाए राहय। फेर दूनो भाई के मन ल शांति नई मिलिस। ऊंखर मन म घेरी-बेरी खटकय के दाई बर…

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कहिनी : चटकन

‘ओ खाली परिया जमीन म न मंदिर बनाए जाय न मस्जिद बनाए जाय। ओमा एक अइसे आसरम बनाए जाए जेमा बेसहारा डोकरा, डोकरी, बइहा कस किंजरइया मनखे, अनाथ लोग लइका राहय। संग म गांव के अइसे मनखे जेखर गुंजाइस के लइक ठउर-ठिकाना नइ हे तउने मन ए आसरम म रहि सकंय। हिन्दू भाई अउ मुसलमान भाई आप मन मंदिर अउ मस्जिद बनवाए बर जउन चंदा सकेले हव तेला आसरम बनवाए बर लगा दव।’ सड़क तीर मा पीपर खाल्हे खाली परिया में जब बनही ते बजरंग बलीच के मंदिर बनही। ए…

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कहिनी : दूध भात

डोकरा काहत रिहिस दूध भात खाहूं कहिके। उही पाय के लोटा ल धर के दूध मांगे बर आए हंव। होही ते दे देतेस? अतका म बिसवन्तीन किहिस- काला बतांव डोकरी। मेहा तो ए रोगही बिलई के मारे मर गेंव। ते नइ पतियाबे, मंझनिया बेरा अंधियारी के बेंस ला लगाए बर भूला गेंव अऊ नाहे बर चल देंव। आवत ले बिलई ह जम्मो कसेली भर दूध ला पी डरिस। नदिया के तीर मां नानकून गांव- ‘जामगांव’। जामगांव के बड़े गंउटिया बेलास ह संझउती बेरा अंगना म बिछे खटिया मां बइठे रिहिस…

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नान्‍हे कहिनी : रोजी

करे के इच्छा नई हे त छोड़व महराज! एहि साल भर पूरा करे के किरपा करव। भागवत घर हर बछर सत्यनारायण कथा अउ शंकर पूजा होवय। दू तीन पीढ़ी ले चलत रहिस हे। बड़ सुग्घर लगय, गांव भर के मनखे आवै, कथा सुने ल, परसाद झोकेल। भागवत के मन अउ अंगना दूनो भर जाय। फेर जम्मो आनंद मजा, किचकिच हो जय, महराज के भाव बियाना म। बबा जमाना म खाये बर खपरा न पीये बर पानी रहिस तेन दिन एहि गंवई के सहारा, रहिस हे, जीनगी के गुजारा इंहे ले…

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कहिनी : सिद्धू चोर

सब झन एती ओती माल-टाल टमरत राहंय। सिध्दू गोमहा कस ठाढ़े रिहिस। एती ओती झांकिस त देखथे चुल्हा म तसमई चूरत राहय। उही मेर कोठी म पीठ टेकाय डोकरी अउंघात राहय। सिध्दू गीस, अउ माली म तसमई हेर के खाय धर लीस। थोरिक बेरा म डोकरी ल जमहासी आईस। मुहुं फार के आऽऽऽ करके हथौरी ला मुंहु मेर लेगिस। सिध्दू ओरखिस डोकरी दाई इसारा करत हे मुहुं म तसमई डार। एक साहर राहय जी, साहर के ओप्पार गांव गोहड़ा राहय जी। कोरई ढेखरा अऊ खदर मसर टेकनी झिपारी के घर…

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नान्हे कहिनी : झन फूंटय घर

खाये पीये के मामला म, माई लोगिन मन म मनमुटाव होय के संभावना रहिथे। तेखरे सेति, ददा ह घर के जम्मो कामकाज ल हम दूनो भाई म बांट देये हे, अउ तीज तिहार म, परब म, रोटी, पीठा, खई खजेनी ल अपन हाथ म राखे हे। सब ला बरोबर बांटय ताकी झन फूटय घर, झन होवय मनमुटाव, दरार। तिलक आत-जात राहय संतू के घर। अइसे तो संतू के कुछ रिस्तेदार नई लगे तिलक, फेर जिहां परेम, तिहां का नेम, का जरूरत कोनो रिस्ता के। परेम तो खुद सबले बड़े अउ…

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कहिनी : उपास

गांव म एक झन बिमरहा मनखे रहय। रोज के पेट पीरा म बिचारा कुछ काम-बुता करे नई सकय। भात खावय तहां ले बाहिर कोती जावय। थोरकिन हफरहा बानी तको रहीस। एक दीन के बात आय। परस हर भात खाके लोटा म पानी धरके चुपे-चाप बाहिर जाय बर निकलत रहीस ततके बेरा कईलान महराज घूमत-घामत आत रहिस। परस ल देख डारिस अउ कहे लागिस… कस जी परस, तैं चुपेचाप अभी कइसे निकलत हावस। तोला खेत खार के संसो नइए का? परस हर कईलान महराज के गोठ ल सुनके कइथे, मोर दु:ख…

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