नान्हे कहिनी : डेहरी के दिया

रमेसर ल लगते नइहे, मोर बाबू नइ हे कहिके। वोकर दमांद मन ससुर ल ददा ले बढ़के मानय। अपन गोतियार मन ला देखथे त कोनो बहू हा सास ल तंग करथे, त काकरो बहू हा ससुर ल खाय-पिए ल नी देवय। कोनो के लईका मन दाई-ददा ल माने गौने नहीं। सब परवार के मन रमेसर के परवार ल देखथे त अपन लइका मन ला कोसथें। गांव भर मा नरायन बबा हा अपन दु पुरखा ल देख डरे हे। अइसन जस आज कोनो ल नइ मिलय। पहिली के मन तो दु…

Read More

बइगा के चक्कर – नान्हे कहिनी

तैंहा बतावत हस त मोला लागथे कि तोर लइका ल मलेरिया बुखार धरे हे, अउ सुन तैं काहत हस न कि मोर माइलोगन ल भूत धर ले रिहीस हे। तब वोला भूत-ऊत नई धरे रिहिस हे वोहा ज्यादा घामे-घाम म किंजर दिस तेकरे सेती अकचकासी लाग गे रिहिस होही। कइसे सुरेश का बात आय अब्बड़ दिन म दिखे हस कोन्हों कांही होगे हे का, तोर लोग लइका मन तो बने-बने हे न, अऊ तेहा काम-बुता म घलो बहुते कम जावथस, का तोर माई लोगन के तबियत बढ़िया नइए का, फेर…

Read More

सइताहा – कहिनी

परेम के गौटिया घर अवई हा फलित होगे। चार महिना की बीते ले गौटनिन के पांव भारी होगे। दूनों परानी ल गजब खुसी होगे। मानो दुनिया के जम्मो सुख वोकर आगू मे आगे। लइका के लालन-पालन म दूनो परानी ह जम्मो बेरा ल पहा दय। सबो खेती -खार के देख-रेख ल परेम ह करय। एक दिन उदुप ले परेम ह गौंटिया घर ल छोड़के पटइल बाड़ा म रेहे ल चल दिस। वोकर मन के बात उही जाने मंगतू गजब पुछिस फेर परेम ह एक भाखा नई बकरिस।’ ब गांव म…

Read More

गांव के गुरूजी – कहिनी

”गांव के गुरूजी कहिस के छोटे-छोटे बात में सरकार के मुंह देखना ठीक नई होवय। सरकार तो हमन ल स्कूल के भवन बना के दे दे हावय। अब ये भवन के सुरक्षा अउ मरम्मत के जिम्मेदारी हमर गांव वाला मन के आय। ये स्कूल में हमर लइका मन पढ़े बर आथें। ओखर मन के सुरक्षा बर ये जरूरी हे कि हमर स्कूल के भवन मजबूत अउ साफ-सुथरा राहय। हमर ये कर्तव्य होथे कि हमन हमर स्कूल के सुरक्षा बर धियान देवन। जइसे हमन गांव वाला मन जुरमिल के गांव के…

Read More

गुदेलना – कहिनी

राधा अपन अंतस के पीरा ला कभू कोनो ल जनान नी देवय। फेर येकर कोनो नइहे कहिके लोगन जइसने पाथे वइसने ताना मारे मा कमी नी करय। राधा ह बिगर धियान दे अपन रसता आवत-जात रिथे। फेर ककरो बहकावा मा नी अईस। रसता मा कतको झन कुछु-न-कुछु कहात रिथे फेर लहुट के जुवाब कोनो ला नी दे अपने बूता म मगन रिथे। किसन के राधा हा जग मा मया बगराय के मिसाल बनिस। तेकरे सेती इंकर गुनगान ला हमन करथन। ये जग मा बिधाता हा हमन ला घलो बिगर छोटे-बड़े…

Read More

कहिनी : पिड़हा

न वा जमाना आय के बाद जुन्ना कतको चीज नंदावत जात हे। एमा सिल लोड़िहा, पिड़हा, जांता, झउंहा अउ कतको जिनिस सामिल हवय। जांता तो आज कल बिलकुले नंदा गे हे। गांव में घलो खोजबे तो मिलना मुसकिल हे। वइसने मिक्सी के आय ले पढ़े-लिखे माइ लोगन मन सिल लोड़िहा ल हिरक के नइ निहारय। पिलास्टिक के धमेला आय ले झउंहा नंदा गे अउ डाइनिंग टेबल अउ कुरसी आय के बाद पिड़हा घलो नंदाना सुरू हो गे हे। कभू सगा सोदर आय तो ऊंच आसन बर पिड़हा देना मुहावरा रिहिस।…

Read More

खेती म हावय सब सुख – कहिनी

सीताराम हर एक दिन शहर गीस घूमे बर, शहर के हालचाल जाने बर सीताराम शहर पहुंचगे। बढ़िया-बढ़िया घर-कुरिया, पांच तल्ला छै तल्ला। सब ल देखिस घूमत-घूमत सीताराम ल भूख लागिस खोजत-खोजत एक ठन बढ़िया होटल म गिस पेट भर रोटी-भात खाइस। होटल वाला ल पूछथे, कस गा भइया, के रुपया होइस? होटल वाला सेठ कइथे, तोर एक सौ पचास रुपया होइस बबा। सीताराम अकबका गीस अउ कहीस कस मालिक मैं तो अतेक कन खाय नइयों, फेर अतका पइसा कइसे होइच। होटल मालिक कईथे- देख बबा, आजकल खाए-पीए के भाव नइए।…

Read More

मितानी के गांठ – कहिनी

दाई-दाई! मेंहा काली सलमा दीदी घर रहूं। दीदी ह मोला काली रूके खातिर बड़ किलोली करत रीहीस हे। बड़े बाबू ह घलोक रूके बर मनावत रीहीसे। ममता ह अपन दाई ल चिरौरी करत कहिथे। त दाई ह कथे- तेहां मोला झिन पूछ बेटी, तोर ददा ल जाके बता। ममता ह गांव के पंच कातिक के नोनी हरे अउ सलमा ह रमजान सेठ के नोनी हरे। दूनों ननपन के सहेली आयं। दूनों के जनम ह एके दिन के अरक-फरक म होय रीहीस। जब दूनों लइका के जनम होइस त दूनों घर…

Read More

भगत के बस म भगवान – लोककथा

गजब दिन के बात आय। महानदी, पैरी अऊ सोंढूर के सुघ्घर संगम के तीर म एक ठन नानकुन गांव रिहिस हे। नदिया के तीर म बसे गांव ह निरमल पानी धार म धोवाके छलछल ले सुघ्घर दिखय। गांव के गली-खोर ह घलो गउ के गोबर म लिपाय मार दगदग ले दिखत राहय। कोन्हो मेर काकरो घर- दुवार के भुलकी ले मतलहा बसउना पानी नइ निकलय। चौंरा मन घलो बर लाम चाकर लिपाय-पोताय दिखत राहय। भरे मंझनिया लाहकत कोन्हो काकरो चांवरा, परछी म ढलंग जावय त पट ले सुघ्घर नींद पर…

Read More

हमर होरी – कहिनी

काय करबे बिधाता के आघु मा काकरो थोरे चलना हे। जिनगी के मरम ला निभाना हे। तब रोवत होय ते हासत जिये बर परही। अइसने जेकर करम हा फुटहा रिथे तेहर होस संभाले तहाने जियत भर ले मुड़ धरके रोवत राह। कतको कमा ले पईसा-कौड़ी भरे-भरे परवार के रहात ले घलो जिनगी मा कोनो न कोनो भुगता ले उबरना नी होवय। अइसने कोनजनी बिचारा अतुल। येकर भाग में काय लिखाय हावे ते। अपन दाई-ददा अउ भाई-बहिनी सबो ल अपन आघु मा गंवात देखिस फेर काय कर सकत रिहिस। वोतका ला…

Read More