गीत

Matura Prasad Vermaमाडी भ्‍ार चिखला मा तन ला गडाए,
कारी मोटियारी टुरी रोपा लगात हे ।।
असाढ के बरसा मा तन ला भिजोए,
अवइया सावन के सपना सजात हे ।।

धान के थ्‍ारहा ला धर के मुठा मा,
आज अपन भाग ला सिरतोन सिरजात हे ।।
भूख अउ पियास हा तन ला भुला गेहे,
जागर के टुटत गउकिन कमात हे ।।

मेहनत के देवता ला आज मनाए बर,
माथ के पसिना ला एडी मा चुचवात हे ।।
सावर देह मा चिखला अउ माटी के,
सिंगार हर मोर संगी कइसन सुहात हे ।।

भिजे ओनहा ला सरी अंग मा लपेट के,
कोन जानी कोन धन ला छुपात हे ।।
सुरूर सुरूर चारो कोती चलत पुरवाई मा,
गोरी के जाड मा ओठ कपकपात हे ।।

सिरतोन कहत हंव कवि देखके वोला,
तन मा लगत हे आगी मन हा जुडात हे ।।
महादेव लागत हे जइसे आज पारवती के,
प्रेम मा मतंग हो के मदरस बरसात हे ।।

कभू खिल‍खिला के हासे करे रे ठिठोली,
कभू का सोच सोच मने मन लजात हे ।।
गीत गा के मनमोहनी हिरदे मा हुक मारे,
अउ कभू नाचे सही कनिहा डोलात हे ।।

देख के रूप गोरी के मय हो गेव पानी पानी,
देख के देखत मोला मुड ला नवात हे ।।
ताना मारे सहीं अपन संगी संगवारी मन ला,
जाने कोन भाखा काय समझात हे ।।

जतिक तउरत हौ मै हा डुब डुब मरत हावव,
प्‍यास मोर काबर आज नी सिरात हे ।।
गुरू मोर मन ला छोड आज कहां चलदे तै,
अब मोला कोनो नहीं रददा बतात हे ।।

मथुरा प्रसाद वर्मा ‘ प्रसाद’
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