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हमर देस राज म शिक्षक के महत्तम

कोनो भी देस के बिकास ह सिछक के हाथ म होथे काबर के वो ह रास्ट्र के निरमान करता होथे। वो ह देस के भबिस्य कहे जाने वाला लईकरन मन ल अपन हर गियान ल दे के पढ़ईया लईकरन मन ल ये काबिल बनाये के कोसिस करथे के वो ह देस के बिकास के खातिर कोनो भी छेत्र म सहयोगी बन सकय। हर मनखे के जीनगी म गुरू के बिसेस हमत्तम हावय। हमर देस राज म गुरू अउ सिस्य के परंपरा सनातन काल ले चले आवत हे। हर देस म कोनो बिसेस दिन सिछक दिवस के रूप म मनाये जाथे। हमरो भारत देस म आजादी के बाद के पहिली उपरास्ट्रपति अउ, पहिली रास्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकिसनन जी के जनम दिन याने 05 सितम्बर के हर बछर ओखर याद म सिछक दिवस के रूप म मनाये जाथे। डॉ राधाकिसनन एक महान सिछाबिद अउ दारसनिक रहिन। अउ सिछा से उनला बहुत लगाव रहिस।

‘‘सिछक वो नई जे ह छात्र के दिमाग म तथ्य मन ल जबरन ठूंसय, बलकि वास्तविक सिछक वो होथे जे ह छात्र ल आने वाला कल के चुनौती के लिए तैयार करथे।’’
डॉ. सर्वपल्ली राधाकिसनन

हमर देस ह सनातन काल ले आज तलक सिछा मे छेत्र म बहुत समरिध हावय अगर हमर देस भारत ल बिस्व गुरू कहे जाये त कोनो अचरज के बात नई हावय। सनातन काल ले हमर देस म गुरू के अस्थान ह भगवान ले उपर माने गे हावे। वईसे हर मनखे के पहिली गुरू वोखर मॉ-बाप ह होथे, जे ओला ये संसार म जनमाथे। येखर बाद हर मनखे के जीनगी म दूसर गुरू वो होथे जे ह जीवन म आघू बढ़े बर सिक्छा-दिक्छा देथे।

हमर देस म त्रेताजुग म भगवान बिस्नु ह सिरी राम के रूप म मनखे के अवतार म अवतरे रहिस बिस्वामित्र ल अपन गुरू बनाये रहिन। अउ ओखर आज्ञा के पालन करके अधरमी राछस मन ल मारके रिसी-मुनी, तपस्वी अउ लोगन मन के रछा करिस अउ धरम के अस्थापना करिस। अउ अपन गुरू के महत्ता अउ सनमान बनाये रखिन।

गोस्वामी तुलसीदास जी अपन रचना रामचरितमानस के बालकांड म लिखे हावय-
प्रातकाल उठिके रघुनाथा, मातु-पिता, गुरू नावहिं माथा।
आयसु मागि करहिं पुर काजा, देखि चरित हरषई मन राजा।।
गोस्वामी तुनसीदास रचित रामचरितमानस

  • जब रावन के आखिरी घरी आए रईथे त भगवान राम ह अपन भाई लछमन ल ओखर करा सिछा ले बर भेजथे काबर के राम ह जानत रईथे के रावन अधरमी जरूर हावय पर ओखर पहिली वो ह एक परकांड बिदबान हे।
  • भगवान दत्तसत्रय ह अपन जीनगी म 24 गुरू बनाये रहिस।
  • द्वापरजुग म फेर धरम के रछा अउ अधरम के नास करे बर भगवान बिस्नु ह सिरी किस्न के रूप म मनखे के अवतार म अवतरे रहिस अउ येहू जनम म ओ ह उज्जैन म रिसी संदीपनी के आसरम म रईके बिद्या अध्ययन करिन।
  • अई समय म कौरव अउ पांडव मन घलो गुरू द्रोनाचार्य जी के गुरूकुल म रई के अपन सिछा-दिछा पाईन।
  • चानक्य ह चंद्रगुप्त ल अपन सिस्य बनाके ओला मगध के एक बलसाली अउ बिदबान राजा बनाईस।
  • जैइसे महान गुरू वईसनहे महान चेला गुरू बसिस्ट केे चेला भगवान सिरी राम, गुरू संदीपनी के चेला भगवान सिरी किसन अउ गुरू द्रोनाचार्य के चेला अर्जुन, भीम युधीस्ठिर।
  • जिहां महान सिछक के नाव आथे ऊंहा महान सिस्य के घलो नाव लिये जाथे। जईसे गुरू द्रोनाचार्य के नाव आथे त सबले पहिली एकलब्य के नाव आथे जे ह गुरूदछिना म अपन जेनउनी हाथ के अंगूठा ल काट के गुरू के चरन म गुरूदछिना बर रख दिहीस।

अईसने गुरू भक्त आरूनी रहिस जे ह अपन गुरू के आज्ञा के पालन करे बर रतिहा भर खेत के मेड़ म पानी ल रोके बर पार म सुत गे।
कहे जाथे के

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुःगुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूस्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरूवे नमः।।

पर आज कल इस्कूल अउ कालेज म अउ जिंहा सिछक हावय तिहा सिछक दिवस के दिन बहुत बड़े-बड़े आयोजन करके सिछक मन के सम्मान करे जाथे, ये ह बने बात हे पर येखरो ले बने वो सिछक के सिख के पालन करना वोखर ले बड़े बात हावय। सिछक ल सबले बड़े खुसी तब होथे जब ओखर पढ़ाय लईका ह अपन जीनगी म अपन मंजिल ल पा लेथे। त सिछक के मुड़ी ह गरब ले ऊंचा हो जाथे। सिछक समाज घलो बर एक महत्वपूर्ण अस्थान रखथे। एक सिछक के बिना कोना मनखे कुछू नई ये। एक सिछक ह कोनो ल डाक्टर, कोनो ल कलेक्टर, कोनो ल पुलिस कप्तान, देस के रछा करे बर सैनिक, सिपाही कोनो ल इंजीनियर, कोनो ल राजनेता, कोनो ल बैज्ञानिक अउ एक सिछक अउ न जाने कतका परकार के अधिकारी, करमचारी, ब्यवसायी बनाथे।

हर कोनो के जीनगी म सिछा जरूरी हावय, काबर के सिछा जीनगी के अलग-अलग चरन म कई भूमिका निभाथे। ये कारन ये जरूरी हावय के हमन सिछक के महत्तम ल जानन अउ वोखर बताये रद्दा म चल के अपन मंजिल ल पा सकथन। जे भारत म भगवान राम, किष्न ह मनुष्य अवतार ले के अपन गुरू से सिछा लिहिन अउ ओखर महत्तम ल बनाये रखिन त तो हमन साधारन मनखे हन। तुलसीदास, सूरदास, कबीरदास, रहीम, रसखान, मीराबाई, अइसनहा सिस्य रहिन जे अपन गुरू के नाव ल जुग-जुग तक अमर कर दिन। कबीर दास जी ह गुरू के महिमा ल बरनन करत लिखे हावय-

गुरू गोविंद दोऊ खड, काके लागंू पांय।
बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताय।।

आज लोगन मन केवल सिछक दिवस के दिन भासन ल बस दे देथे पर सिछक ल भुला जाथे अउ ओला सम्मान देहे कस नई करय। सिछक ह देस निरमाता घलो हावय अउ बिध्वंस केे छमता घलो रखथे पर सिछक अंतरआत्मा ले बिंध्वंसक नई हो सकय काबर के ओ अपन गरिमा अउ मरयादा ल जानथे। लेकिन आज-कल लोगन मन ल नई जाने का होगे हावय के ऊंखर सोच अउ बिचार ह परकिरीति के बिपरीत हो गे हावय। आज दुनिया म सिछक केवल सिछक ही रह गे हावय। आज के समय म देखिहा त ये दिन बिहनिया ले लेके रतिहा तक सोसल मिडिया म केवल संदेसा भेज के सिछक दिवस मनाये के इतिसिरी कर दिये जाथे। जे ह ठीक बात नो हय। आज कल लईकन मन संचार माध्यम म इंटरनेट के जमाना म वोईमा अपन सिछा के बिसय म खोज करत रईथे पर ये सब एक सिछक के भावना संवेदना अउ बिचार, अनुसासन, मारगदरसन नई कर सकय कहे के मतलब ये हावय के सिछक के अस्थान कोई दूसरा नई ले सकय। हमर जीवन म सिछक के महत्तम अउ सिछक के जीनगी ल समझना आसान नई हावय लेकिन हमन ओला बने मनखे बनके उपहार देके ओखर सम्मान रख सकथन।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

आठे कन्हैया

हमर भारत देस ह देवता मन के भुइंया हे येखर कोना-कोना पुण्य भुंईया हेे। इहां पिरीथिवी लोक म जब-जब धरम के हानी होवत गईस तब-तब भगवान ह ये लोक म अवतार लिहीस। भगवान सिरी किसन जी ह अरजुन ल कुरूक्षेत्र म भागवत गीता के अध्याय 4 के स्लोक 7 अउ 8 म उपदेस देवत कईथे के-
यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। 4-7।।

परित्राणाय साधूनामं विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।। 4-8।।

येखर मायने ये हावय के भगवान किसन कईथे के जब-जब भारत म धरत के हानि हो ही। तब-तब मैय ह अपन आप ल सिरिजन करहूॅं। सज्जन मन के रक्छा करे बर, दुस्ट मन के बिनास करे बर। अउ धरम के इस्थापना करे बर मैं जुग-जुग म जनम लेथव।
आठे कन्हैया वई दिन ये जे दिन भगवान सिरी बिसनु जी किसन जी के रूप अवतार ले रहिस। भादो महिना के घोर अंधियारी पाख के आठे तिथि म घनघोर बादर मन बरसत रहिस अउ ओ दिन कंस के कारागार म भगवान किसन के रूप म किसन भगवान ह अवतरे रहिस। माता देवकी अउ बासुदेव के बेटा बनके। येखरे कारन ये दिन ल हम हिंदू मन जन्मास्टमी या आठे कन्हैया के रूप म मनवात आवथन। भगवान बिसनु के किसन के रूप अवतार लेहे के परमुख कारन रहिस अधरमी कंस के बध। भगवान किसन के अवतरे के तुरते बासुदेव जी जमुना नदी ल पार करके गोकुल म नंद बाबा- देवकी के इहां छोड़ आथे।
ये दिन पूरा भारत देस म आठे कन्हैया के तिहार ल मनाये जाथे पर मथुरा जिहां भगवान सिरी किसन जी के जनम हो रहिस तिहां आठे कन्हैया तिहार ह बिसेस रईथे। ये दिन पूरा मथुरा नगरी ल फूल माला ले सजाये रईथे। भजन कीरतन रतिहा ले के दूसर दिन तक चलत रईथे।
जिहां-जिहां भगवान सिरी किसन जी के मंदिर हवय उंहा-उंहा ये दिन मेला भरथे। अउ गांव ले लेके सहर तक म मटकी फोड़े के परतियोगिता रखे जाथे।
बरज भुइंया म अस्टमी के दूसर दिन याने भादो के अंधियारी पाख के नवमी तिथि के दिन नंद महोत्सव बड़ धूम-धाम से मनाये जाथे। ये हू दिन मटकी फोड़ परतियोगिता रखे जाथे।
किसन भगवान के वईसे कई नाव हावय पर माखनचोर, नंदकिशोर, बंसीधर, कन्हैया, मुरलीमनोहर, योगेश्वर, मोहन, राधे मन जादा बोले जाथे।
हिंदी साहित्य म किसन भगवान- हिंदी साहित्य के इतिहास घलो म भक्तिकाल म सगुन भक्ति धारा के किसन भक्ति साखा के परमुख कबि सूरदास जी रहिन इंखर अलावा रसखान अउ मीरा बाई घलो किसन भगवान के भक्त रहिन।
सूरदास जी ह भगवान किसन के परति माता यशोदा के वात्सल्यता बाललीला के एतका बिसद बरनन कर देहिस के इंखर पहिली हिंदी साहित्य म नव रस रहिस पर इंहे ले दसवां रस वात्सल्य रस अस्थापित होगे तब ले हिंदी साहित्य म दसवां रस वात्सल्य रस होगे। सूरदास जी के रचना के उदाहरन देख सकत हन-
मैंया मैं तो चंद खिलौना लैहौं।
जैहांे लोटि धरनि मैं अबहि तेरी गोद न ऐहौं।
सुरभि का पयपान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहांे,
हृै हौ पूत नंदबाबा को तैरो सुत न कहैहौं।

रसखान कबि घलो किसन भगवान के भक्त रहिन। उहू ह किसन भगवान के बाललीला म उंखर बचपना के बड़ सुघ्घर बरनन करे हावय।
धूरि भरै अति सोभित श्याम जू तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरै अंगना पग पैंजनी बाजती पीरी कछौटी।
वा कवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोठी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सौं ले गयो रोटी।

मीरा बाई के किसन भक्ति तो जग बिख्यात हावय। उहू ह पूरा जीवन किसन भक्ति म बिता दिहिस। वो ह अपन रचना म लिखथे-
पायो जी मैने नाम रतन धन पायो।
बस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो।
जनम-जनम की पंूजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो।
सम की नाव खेवहिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस गायो।

ये परकार ले देखा जाये त किसन भगवान के भक्ति घलों चहूं दिसा म होथे। जगतगुरू किसन भगवान के अवतार लेहे के दिन ह पूरा बिस्व म आनंद मंगल के संदेस देथे।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

अटल बिहारी वाजपेयी ‘‘राजनीतिज्ञ नई बलकि एक महान व्यक्तित्व रहिन’’

अटल बिहारी वाजपेयी के जनम 25 दिसम्बर बछर 1924 को ग्वालियर म एक सामान्य परिवार म होय रहिस। उंकर पिता जी के नाव कृष्ण बिहारी मिश्र रहिस। जे ह उत्तर परदेस म आगरा जनपद के प्राचीन असथान बटेश्वर के मूल निवासी रहिस। अउ मध्यपरसेद रियासत ग्वालियर म गुरूजी अउ एक कवि रहिस अउ उकर मॉं के नाम कृष्णा देवी रहिस। तीन बहिनी अउ भाई म सबसे छोटे अटल बिहारी ल उंखर दादी प्यार ले अटल्ला कई के बुलावत रहिस। काबर के अटल के पिता शिछक अउ कवि रहिस ये कारन ले अटल जी ल कविता बिरासत म मिलिस। अटल जी ह जब कछा 5 वीं म रहिस त एक प्रतियोगिता म अपन पहली भाषन दिहिस पर अटल जी अपन रटे भाषन ल बीचे म भूलागे त अटल ह कसम खाईस के कभू रटे भाषन नई दो। अटल जी जब 1939 म विक्टोरिया कालेज ग्वालियर म कछा 9 वीं म रहिस त पहली बार उंकर कविता कालेज के पत्रिका छपे रहिस। अटल जी विक्टोरिया कालेज (अब रानी लछमीबाई महाविद्यालय) ले बी.ए. करिस। येखर बाद दयानंद एंग्लो वैदिक महाविद्यालय ले राजनीति म स्नातकोत्तर करिस। बाद कानून म इसनातक करत रहिस त उंखर पिता घलो विधि में इसनातक बर अटल जी के कछा म ही दाखिला लिहिस अउ छात्रावास के एके ही कमरा म रईके पढ़ाई करत रहिस।

लोगनमन बाप-बेटा ल देखे बर आये करत रहिस, पर छात्र अटल ह कानून के पढ़ाई बीच म ही छोड़के पूरा निस्ठा से संघ के कार्य में जुट गे। अटल जी जब सन् 1942 म भारत छोड़ो आंदोलन म हिस्सा लीस अउ उनला जेल जाना पड़िस पर वो ह देस के आजादी खातिर पीछे नहीं हटिस। जब वो ह पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के संपर्क म आईस त उनला रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचार-प्रसार करे के मौका मिलीस। वा ह अपन जीवन रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक के रूप म आजीवन अविवाहित रहे के संकल्प लेके सुरू करिस अउ अंतिम समय तक संकल्प ल पूरा निस्ठा से निभाईस। रास्ट्रीय जनतांतत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के पहली परधानमंतरी रहिस जेहा गैर कांग्रेसी परधानमंतरी पद के 5 साल बिना कोनो रूकावट के पूरे करिस। वो ह कई पारटी ल जोर के सरकार बनाये रहिस, कभी कोनो पारटी ह दबाव नई डारिस। येखर से उकर अद्भुत नेतृत्व छामता के पता चलते। उनला रास्ट्रधर्म पत्रिका (हिन्दी मासिक) के सम्पादन के घलो मौका मिलीस। येखर बाद आजादी के तुरंत बाद 14 जनवरी, सन् 1948 को मकर संक्राति के पावन पर्व पर अपने आवरण पृष्ठ पर भगवान श्री कृष्ण के मुख से शंखनाद के साथ श्री अटल बिहारी वाजपेयी के संपादकत्व म पाचजन्य रास्ट्रीय हिन्दी साप्ताहिक के अवतरण स्वाधीन भारत म स्वाधीनता आन्दोलन के प्रेरक आदर्स अउ राष्ट्रीय लछय ल सुरता दिलाय के संकलप के उद्घोस रहिस। वाजपेयी जी अपन संपादकीय में लिखिस- कुरूक्षेत्र के कण-कण से पांचजन्य फिर हुंकार उठा है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अउ पं. दीनदयाल उपाध्याय के निरदेसन म राजनीति के पाठ तो पढ़िस संगे-संग पाचजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश अउ वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिका के संपादन के काम ल कुसलता के साथ करिस।

आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता बर ये कम गौरव के बात नई हे कि कोखरो व्यक्तिगत स्वामित्व अथवा औघोगिक घराना के छत्र छाया से बाहर रहकर घलो ’’पाचजन्य’’ साप्ताहिक अपन स्वरन जयंति मानाइस अउ ओ स्वर्ण जयंति बछर म वोखर पहिली संपादक भारत के परधानमंतरी पद पर आसीन रहिस वो ह रहिस अटल बिहारी वाजपेयी जी।

अटल जी ल संसद के चार दसक के अनुभव रहिस। बछर 1955 म वोहा पहली बार लोगसभा के चुनाव लड़िस पर जीत नई मिलिस, पर वोहा हार नई मानिस अउ बछर 1957 म बलरामपुर जिला गोण्डा उत्तर प्रदेश से जनसंघ के प्रत्यासी के रूप म जीत के लोकसभा पहुॅचिस। वोहा बछर 1957 से संसद सदस्य रहिस। वोहा हिन्दु, मुस्लिम के बीच बहुत लोकप्रिय रहिस। वोहा 2,4,5,6,7,10,11,12,13,14 लोकसभा बर चुने गे रहिस। ये परकार ले वोहा 10 लोकसभा चुनाओं में चुन के आये रहिस। बछर 1962 व 1986 म वोहा राज्यसभा सदस्य रहिस। वोहा चार अलग-अलग राज्य उत्तरप्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, दिल्ली ले चुने जाने वाले देश के पहली सांसद आये। अटल जी ल सरकारी सुविधा के गलत इस्तेमाल करना बिल्कुल पंसंद नई रहिस। अटल जी ल सायकिल चलाये के बहुत सौक रहिस, जब वोहा ग्वालियर से लोकसभा सदष्य रहिस त अपन लोकसभा छेत्र म सायकिल म ही चल देत रहिस। अटल जी ल सिफारिस करना या करनवाना सक्त नापसंद रहिस। वोहा अपन परिवार अउ सगे संबंधी मन ल बोले करत रहिस के आगे बढ़ना हे त अपन दम म बढ़ा।

वाजपेयी जी ह कई संस्था मन के अस्थापना घलो करे रहिस। वो ह भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य म ले एक रहिस। बछर 1951,1968-1973 तक येखर अध्यक्ष घलों रहिन। बछर 1957 ले 1977, 20 वर्ष लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहिस। 1975 म जब आपातकाल के घोषना होइस त तत्कालीन जनसंघ ल घलो संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिहिस अउ आपातकाल हटे के बाद जनसंघ के विलय जनता पार्टी में हो गे अउ केन्द्र में मोरारजी देसाई के परधानमंतरीत्व म मिलीजुले सरकार बनीस। मोरारजी देसाई सरकार म बछर 1977-1979 तक बिदेश मंतरी रहिस अउ बिदेशों म भारत के अच्छा छवि बनाईस।
अटल जी के एक ईच्छा रहिस के उनला मौका मिलतिस त कोनो बैस्बिक स्तर के सभा म अपन भासन हिन्दी म ही देतेवे। अटल जी जब विदेश मंत्री रहिस त वो अवसर बछर 1977 म आ ही गे जब वोहा संयुक्त रास्ट्र संध के समान्य सभा म अपन वक्तव्य हिन्दी म दिहिस अउ वो पहिली ऐसे भारतीय बनिस जे ह भारत के राजकीय भाषा हिन्दी ल बिश्व पटल म सुसोभित करिस। अटल जी हिन्दी के संगे-संग अंगरेजी भाषा घलो म बने पकड़ रहिस। वोहा बछर 2000 म अमेरिका म अंगरेजी भाषा म अपन वक्तव्य दिहिस जेखर ले पूरा सभा ताली ले गंूज गे।
बछर 1980 म जनता पार्टी ले असंतुष्ट होके वाजपेयी जी ह जनता पार्टी छोड़ दीहिस अउ भारतीय जनता पार्टी के अस्थापना करिस। 6 अप्रेल 1980 म बने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के जिम्मेदारी घलो वाजपेयी जी सौपे गईस। बछर 1980 के समय जब भारतीय जनता पार्टी की अस्थापना के तैयारी चलत रहिस तब समस्या आईस के पारटी के चिन्ह का होही। काबर के अटल जी ल कमल के फूल बहुत प्यारा रहिस अउ ओखर कहना रहिस के कमल कीचड़ घलो म खिल के सुंदर दिखथे येखर कारन भारतीय जनता पारटी के चिन्ह कमल के फूल रखे गईस। अटल जी ह अपन कविता म भारतीय जनता पारटी के उदय के बिषय लिखथे-
अंधेरा छटेगा ,
सूरज निकलेगा,
कमल खिलेगा।

कवि के रूप में वाजपेयी – अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होय के संगे-संग एक कवि घलो रहिस। ‘‘मेरी इंक्यावन कविताएं’’ अटल जी के परसिद्ध काव्य संग्रह हे। वाजपेयी जी ल काव्य रचना के शैली बिरासत म मिले रहिस। उंखर पिता कृष्ण बिहारी वाजपयी ग्वालियर रियासत म अपन समय के जाने-माने कवि रहिन। वो ह बरज भाखा अउ खड़ी बोली म काव्य रचना करत रहिन। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक अउ काव्यमय होय के सेतर ओकर घलो रूचि काव्य रचना रहिस। सित्तो म कोनो ह कवि हृदय कभू कविता से रिता नई रह सकय। राजनीति के संगे-संगे पूरा रूप म अउ रास्ट्र के परति उंखर वैयक्तिक संवेदनशीलता सुरू ले आखिरी तक परगट होत रहिस। ओखर संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थिति, राष्ट्रव्यापी आंदोलन, जेल-जीवन जईसे कई आयामों के परभााव अउ अनुभूति ह काव्य म हमेंसा अभिव्यक्ति पाय हावय। अटल जी के कविता ‘‘मौत से ठन गई’’ म अटल जी लिखते –
ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई
यों लगा जिंदगी से बड़ी हो गई
मौत की उमर क्या है?दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नही।
मैं ज़ी भर जीया, मैं मन से मरुॅ,
लौटकर आऊॅंगा, कूच से क्यों डरुॅ?
तू दबे पाव, चोरी छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

येखर अलावा वाजपेयी जी ह अनेक परकार के गद्य अउ कविता के रचना करिस जे ह उंकर कवि हृदय ल दिखाथे। उंखर रचना म- अमर बलिदान (लोकसभा में अटल जी के वक्तव्यों का संग्रह), कैदी कविराय की कुण्डलियां (आपात काल के दौरान लिखि कविताएं), संसद के तीन दशक, अमर आग है।, कुछ लेख कुछ भाषण, सेक्यूलर वाद, राजनीति की रपटीली राहें, बिन्दू-बिन्दू विचार, मेरी संसदीय यात्रा (चार भागों में), संसद के चार दशक (भाषणों का संग्रह), भारत की विदेश नीति के नए आयाम (विदेश मंत्री के रूप में दिए जाने वाले भाषण 1977-79),, शक्ति से शांति, क्या खोया क्या पाया परमुख हावय। गजल गायक जगजीत सिंह ह अटल जी के परसिद्ध कविता मन ल संगीतबद्ध करके एक एलबम बनाये हावय।
अटल जी ल मिले पुरूस्कार – बछर 1992 में पद्म विभूषण, 1994 मेें लोकमान्य तिलक पुरूस्कार, पं. गोविन्द वल्लभ पंत पुरूस्कार घलो ले सम्मानित किये गे हावय। पं. गोविन्द वल्लभ पंत पुरूस्कार उंहला सबसे अच्छा सांसद होय बर , बछर 1993 में कानपुर विश्वविद्यालय ह उंनला डॉक्टरेट के मानद उपाधि ले सम्मानित करिस। 2015 म देस के सबले बड़का पुरस्कार भारत रत्न भारत सरकार उनला दे हे रहिस।
परधानमंतरी के रूप म अटल जी के कार्यकाल – वाजपेयी जी ने एक बार नई तीन बार गैर कांग्रेसी सरकार बनाइस। पहिली बार 16 मई 1996 ले 1 जून 1996 तक 13 दिन, दूसर बार 19 मार्च 1998 ले 22 मई तक 13 महिना अउ फेर बछर 2004 तक तीसरा कार्यकाल पूरा 5 बछर पूरा करिन।
परधानमंतरी के रूप म अटल जी के कार्यकाल मेे महत्वपूर्ण निरनय
1. भारत ल परमानु सक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाना- अटल सरकार ह 11 व 13 मई 1998 म राजस्थान के पोखरण म 5 ठन जमीन के अंदर देस के दूसर परमानु परीक्षण बिस्फोट करके भारत ल परमानु सक्ति सम्पन्न देस घोसित कर दिहिस। ये कदम ले ओ ह भारत ल निरविवाद रूप ले बिस्व मानचित्र म एक सुदृढ़ बैस्विक सक्ति के रूप म अस्थापित कर दिहिस। ये सब येतका गोपनीय रूप ले करिस के बिकसीत जासूसी उपग्रह अउ तकनीकी ले सम्पन्न पश्चिमी दस घलो ल येखर भनक तक नई होईस। येखर बाद पश्चिमी देस मन भारत म कई परकार के पाबंदी लगा दिहिस पर वाजपेयी सरकार ह सबके दृढ़ता से सामना करत आरथिक बिकास के नवा उंचाई ल छू दिहिस। येखर ले उंकर दृढ़ इच्छा सक्ति दिखथे।
2. पाकिस्तान करा संबंध म सुधार के पहल- बछर 19 फरवरी 1990 म सदा-ए-सरहद नाव ले दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा सुरू करिस। येखर उद्घाटन करत पहिली यात्री के रूप म वाजपेयी जी ह पाकिस्तान के यातरा करके नवाज सरीफ करा मुलाकात करिस अउ आपसी संबंध म एक नवा जुग के सुरूवात करिस। संगे-संग खेल संबंध के मामला म अटल जी ह भारत अउ पाकिस्तान के बीच खेल ल बढ़ावा देहे बउ अटल जी ह कई खेलईया मन जइसे कपिल देव के संग फिलम जगत के मन ल जेमा देवानंद सामिल रहिन अपन प्रतिनिधि मण्डल के साथ पाकिस्तान ले के गईस अउ। अउ आपसी संबंध ल सुधारे के उदिम करे रहिस।
कुछ समय बाद पाकिस्तान के वो समय के सेना परमुख परवेज मुसर्रफ के सह पर पाकिस्तानी सेना अउ उग्रवादी मन कारगिल छेत्र म घुसपैठ करके भारत के कई पहाड़ी चोटी मन म कब्जा कर लिहिस। अटल सरकार ह पाकिस्तान के सीमा के उल्लंघन नई करे के अंतर्राष्ट्रीय सलाह के सम्मान करत धैर्यपूर्वक पर ठोस कार्यवाही करके भारतीय छेत्र ल छुड़वाईस। अटल जी ह बिघ्न -बाधा ले हार नई मानने वाला मन म ले एक रहिन। वो ह देस के कोनोे समस्या चाहे वो ह आंतरिक हों, चाहे राजनीतिक हों, चाहे अंतर्राष्ट्रीय हो, चाहे विदेशी मामला हो ओखर बड गंभीरता, धीरता एवं दृढ़ता पूरवक सबो ल साथ लेके हल करे के उदिम करय। उंखर कबिता ’’कदम मिलाकर चलना होगा ” कबिता ले हमन ल ये ही सीख मिलथे-
बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम लिमाकर चलना होगा।

3. परधानमंतरी ग्रामीण सड़क योजना- वाजपेयी सरकार के केन्द्रीय मंत्रीमण्डल ह ये योजना के नाव ल अटल जी के नाव से चलना चाहिस पर अटल जी ह येला परधानमंतरी ग्रामीण सड़क योजना के नाव दिस अउ वो ह 1000 ले जादा के आबादी वाला गांव मन ल बारहमासी रद्दा के माध्यम ले सहर ले अउ रास्ट्रीय राज्यमार्ग ले जोड़ के गांव ले परिवहन माध्यम से जोड़ दिहिस जेखर ले गांव के चहँुमुखी बिकास सम्भव हो सकिस जो के पाछू 50 बछर म नई हो पाये रहिस। ओखर ये योजना के कारन आज देस के हर गांव ह मेन रोंड से जुड़ गे हावय। जेखर कारन आज गांव के अपन फसल, गोरस, सब्जी-भाजी मन ल बेचे बद अउ बिमार मनखे मन के ईलाज बर तुरते सहर पहुंच जावथे।
4. स्वर्णिम चतुर्भूज योजना- भारत देश के चारों कोना ल सड़क से जोड़े बर स्वर्णिम चतुर्भूज परियोजना (गोल्डन क्चाड्रिलेट्रल प्रोजेक्ट) जेला जी.क्यू. प्रोजेक्ट के नाव ले जाने जाथे के शुरूवात करिन। जेमा दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, अउ मुंबई ल राजमार्ग से जोड़े गईस। अइसनहा माने जाथे के अटल जी के शासनकाल म भारत म जेतना रद्दा बनिस ओतना सिर्फ शेरशाह सूरी के समय म ही होय रहिस।
5. सर्व शिछा अभियान- सर्व शिक्षा अभियान के शुरूवात अटल जी के कार्यकाल के एक बड़े उपलब्धि हे। जेमा वो ह प्राथमिक अउ पूर्व माघ्यमिक म पढ़िया लईकन मन के सिछा के स्तर ऊँचा करे बर हर 5 कि.मी. के दूरिहा म प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक इसकूल खोलिस। जेखर संगे-संग गुरूजी मन के भरती घलो करे गे रहिस जेखर से देस म बेरोजगारी के समस्या के कुछ हद तक समाधान होईस हावय।

संरचनात्मक ढाँचा बर कार्यदल, साप्टवेयर विकास बर सूचना अउ प्रौघौगिकी कार्यदल, विघुतीकरण म गति लाये बर केन्द्री विघुत नियामक आयोग के गठन करिस। 100 बछर ले जादा समय ले बिवादित चले आवत कावेरी नदी जल बिवाद ल सुलझाइस। राष्ट्रीय राजमार्ग अउ हवाई अड्डा के बिकास, नवा टेलीकाम नीति अउ कोंकन रेलवे के शुरूवात करके बुनियादी संरचनात्मक ढँाचा ल मजबूत बनाईस।

6. तीन राज के गठनः- बछर 2000 में तीन राज छत्तीसगढ, झारखण्ड अउ उत्तराखण्ड बनाये के निरनय लिहिस। आज जो हमर छत्तीसगढ़ राज ह बिकास के रद्दा म आघू बढ़त हावय वो ह अटल जी के अटल निरनय के कारन ही है। वो ह भारत माता के सच्चा सपूत रहिस।

अटल जी भाजपा पारटी के वो आदरस चेहरा हे जेखर आघू सबो राजनीतिक दल घलो नतमस्तक हो जाथे। बहुत बढ़िया कवि, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, महान राजनीतिज्ञ अउ एक सफल प्रधानमंत्री के रूप म अपन पहिचान बनाने वाला अटल जी आज हमर बीच म नई हे लेकिन ओखर आदरस, सिद्धांत,सादा जीवन जीये के कला, करतब्य परायनता, ईमानदारी गोठ-बात अउ उंखर कबिता मनखेमन के मन म जिन्दा अउ प्रासंगिक हे। आज अटल जी जईसे नेता खुद भाजपा म घलो कोनो नई हावय। रानजीतिक दल भी कईथे के अटल जी जईसे कोनो नई हे। अटल जी के बारे येहू कहे जाथे के वो ह अकेल्ला ही जनाधार के बल म सत्ता चला सकत रहिस। ओखरे कारन भाजपा ह एक नहीं तीन नही अब पांचवा पईत सत्ता म हावय। भले ही पहली पईत 13 दिन, दूसरी पईत 13 माह, और तीसरी, चौथी अउ पांचवा पईत पूरे 5 वर्ष तक शासन करिस अउ करत हावय। अटल जी के अंदर एक सुंदर कवि घलो हावय, जेहा समय-समय म देस के मनखे मन के बीच उपंिस्थत हो जात रहिस। ओखर छंद म बने मिठास घलो हावय। अइसना महान व्यक्तित्व के धनी ल जे भारत देस के गौरव है, देस के असनहा अनमोल रतन ल भारत रतन से सम्मानित करे गईस ते ह गौरव के बात हावय।
अटल जी ह अपन रचना ‘‘दो अनुभूति‘‘ शीर्षक कबिता म लिखे हावय-

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी,
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी,
हार नहीं मानूॅंगा,
रार नहीं ठानूॅंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हॅू
गीत नया गाता हॅूं।

अटल जी ह बछर 2005 म ये घोषना कर दिहिस के अब सक्रिय राजनीति म नई रहव पर संगठन बर काम करत रहूं। आज अटल बिहारी वाजपेयी जी हमर बीच नई हावय लेकिन जब ओला ओ समय पता चलिस होही जब वो बिमार रहिस अउ 16 वां लोकसभा म भाजपा पूरा बहुमत के साथ देस के सत्ता अपन हाथ म ले लेहे हावय त उंखर खुसी के ठिकाना नई रहे होही। जब बछर 1984 के 8 वां लोक साभा म ओ ह जे राजनीतिक दल के बीजारोपण कर ओला अपन मेहनत, लगन, निष्ठा अउ आदरसवादिता के पानी ले सींच के 2 लोकसभा सीट, 1989 – 9 वां लोकसभा म 85 लोकसभा सीट, 1991 – 10 वां लोकसभा म 120 सीटं, 1996- 11 वां लोकसभा म 161 सीट, 1998- 12 वां लोकसभा म 182 सींट 1999-13 वां लोकसभा म 182 सींट, 2004- 14 वां लोकसभा म 138 सींट, 2009- 15 वां लोकसभा म 116 सींट, के रूप म एक छोटे-से पउधा ल सुरछित रखे रहिस, वो ह आज 2014 – 16 वां लोकसभा म 282 लोकसभा सीट अउ 17 लोकसभा 303 सीट जी के एक बिशाल वट वृक्ष के रूप म अपन गहरा जड जमा के अपन प्रतिष्ठा प्राप्त कर ले हे हे त उंखर आत्मा ह बड़ खुस होवत होही। उंखर कबिता ’’ जीवन की ढलने लगी साँझ ” म ओ ह ये जीनगी के असल मतलब ल लेहे हावय-
जीवन की ढलने लगी साँझ
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी साँझ
बदलेे है अर्थ
शब्द हुए व्यर्थ
शांति बिना खुशियां है बांझ
सपनों में मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी साँझ।

अटल जी के जीनगी के प्ररमुख तथ्य- अटल जी आजीवन अविवाहित रहिन। वो ह ओजस्वी वक्ता अउ हिंदी भाखा ले परेम करने वाला मन म लेे एक हिंदी के कबि ये। अटल जी सबसे लंबा समय तक सांसद रहिस अउ जवाहरलाल नेहरू अउ इंदिरा गांधी के बाद सबसे लंबा समय तक गैर कांग्रेसी परधानमंतरी घलो रहिस। वो ह पहिली प्रधानमंत्री रहिस जेहा गठबंधन सरकार ल न केवल स्थायित्व दिहिस बलकि सफलता पूरवक संचालित घलो करिस। देस के पहिली राष्टपति राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल जी ल अटल जी के परति बहुत लगाव रहिस। पूर्व परधानमंतरी चंद्रशेखर, अटल जी ल गुरू जी कहकर पुकारत रहिस। पूर्व परधानमंतरी डॉ.मनमोहन सिंह जी अटल जी ल भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह कईथे। लता मंगेशकर, मुकेश, मो.रफी अटल जी के पसंदीदा गायक अउ गायिका रहिस।

अटल जी के टिप्पनीः-
चाहे देस के बात होवय, चाहे क्रांतिकाारी के, चाहे अपन कबिता के होवय, चाहे नेता प्रतिपछ के होवय, चाहे परधानमंतरी के नपे-तुले अउ बेबाक टिप्पणी करे म अटल जी कभी नई चूकिस। ओखर कुछ टिप्पनी ये परकार ले हावयः-
भारत ल लेकर मोर एक दृष्टि है, अइसे भारत जो भूख, भय, निरछरता अउ अभाव से मुक्त हों।
क्रांतिकारी के साथ हमन नियाव नई करेन – देसबासी महान क्रांतिकारी मन ल भूलात हावय। आजादी के बाद अहिंसा के अतिरेक के कारन ये सब होवत हावय।
अटल जी की हर कबिता ले हमन ल आघू बढ़े के प्रेरना मिलथे अउ ओमा मानवता के दरसन होथे। उंखर कबिता ‘‘आओें फिर दिया जलाऐं’’ म ओ ह लिखथे:-
आओें फिर दिया जलाएॅं
भरी दुपहरी में अॅंधियारा,
सूरज परछाईयों से हारा,
अंतरमन का नेह निचोड़े-
बुझी हुई बाती सुलगाएं।
आओें फिर दिया जलाए।

देस के प्रतिनिधि मंडल के रूप म अटल जी की बिदेस यातारा- बाजपेयी जी कई बार देस के प्रतिनिधिमंडल के संग बिदेस मन होन वाला अंतर्राष्ट्रीय संस्था के सभा म सामिल होय बर यातरा करिन। सबसे पहिली ओ ह बछर 1965 म संसदीय सद्भावना सिष्टमंडल के साथ पूरब अफरीका के यातरा बर गे रहिस। वो ह भारत के संसदीय प्रतिनिधिमंडल के संग बछर 1967 म आस्ट्रेलिया, 1983 में यूरोपीय देस, 1987 म कनाडा घलो गे रहिस। वो ह राष्ट्रमण्डल संसदीय परिषद के सभा बर कनाडा म बछर 1996,1994, जाम्बिआ म 1980 भारतीय सिष्टमंडल के सदस्य म सामिल रहिन।
वो ह वा भारतीय प्रतिनिधिमंडल घलो म सामिल रहिन जे ह जापान म अंतर संसदीय संघ के कान्ॅफ्रेंस 1974, सिरीलंका म 1975, स्वीट्जरलैण्ड म 1984 म सामिल रहिस। वे संयुक्त राष्ट्र संघ के सभा म सामिल होने वाला भारतीय संसदीय सिस्टमंडल के नियमित सदस्य रहिस अउ 1988,1990,1991,1992,1993,1994,1996 म सामिल होईस।
वो ह मानवाधिकार आयोग सम्मेलन 1993 म जिनेवा म भारत के प्रतिनिधित्व करत भारतीय प्रतिनिधिमंडल के संग सामिल होईस अउ बाह्य कार्य स्थायी समिति म भारतीय प्रतिनिधिमंडल के रूप म गल्फ दस बहरीन, ओमान, कुवैत के घलो यातरा करिन।
एक पत्रकार, ओजस्वी वक्ता, जनकवि, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आपातकाल म मीसा बंदी, बिदेश मंत्री, मॉं भारती ल बिश्व म गौरवान्वित करने वाला, अपन भाखा हिंदी के मान रखने वाला अउ फेर एक परधाननमंत्री, भारतीय जनता पारटी के पितृ पुरूष अउ भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह के रूप सबो जगह अपन लोहा मनवाने वाला अटल जी कोनो एक दल के नेता नई हे बरन वो ह एक बैस्बिक नेता रहिन अउ आगू घलो रही। वो ह आज घलो पूरा भारत देस के लोगनमन के हिरदय म राज करथे अउ हमेसा करही। वो ह अद्वीतीय प्रतिभा के धनी रहिस। अब भले ही हमन ल उंखर भासन सुने बर नई मिलय पर उंखर लिखे कबिता अउ बोले भासन सुन के अइसे लगथे के आज भी अटल जी हमार सामने खड़े होके अपन ओजस्वी स्वर म मारगदरसन अउ प्रेरना देवत हे। युवा पीढ़ी ल उंखर जीनगी लेे प्रेरना लेना चाही। आज अटल जी हमार संग नई हे पर वो अटल सितारा जुग-जुग तक चमकत रही अउ ओखर परकास ले हमर जीनगी ल सही रद्दा अउ प्रेरना मिलत रही। ओ अटल महापुरूष ल बारम्-बार नमन।
प्रदीप कुमार राठौर “अटल“
ब्लाक कालोनी जांजगीर जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

भोजली तिहार : किसानी के निसानी

हमर छत्तीसगढ़ देस-राज म लोक संसकिरीति, लोक परब अऊ लोक गीत ह हमर जीनगी म रचे बसे हाबय। इहां हर परब के महत्तम हे। भोजली घलो ह हमर तिहार के रूप म आसथा के परतीक हावय, भोजली दाई।

भोजली ह एक लोक गीत हावय जेला सावन सुकुल पछ के पंचमी तिथि ले के राखी तिहार के दूसर दिन याने भादो के पहिली तिथि तक हमर छत्तीगढ़ राज म भोजली बोय के बाद बड़ सरद्धा भकती-भाव ले कुंवारी बेटी मन अऊ ़नवा-नेवरिया माईलोगन मन गाथे।

असल म ये समय धान के बोआई अऊ सुरूवात के निंदाई-गोड़ाई के काम ह खेत म खतम होत्ती आये रहिथे अऊ किसान के बेटी मन घर म बने बरसात अऊ बने फसल के मनोरथ मांगे के खातिर फसल के परतीकात्मक रूप म भोजली के आयोजन करथे।

सावन के दूसर पाख याने पंचमी याने नाग पंचमी के दिन गहूं या जवा ल चिखला के माटी ल लाके ओखर उपर राख ल छिंच के गांव म माता चौरा, ठाकुर देव या फेर घर के पूजा-पाठ वाले जगह म जिहां अंधियार रहय तिहां बोय जाथे अऊ हरदी पानी छिंच-छिंच के बड़े करथे। घर म कुंवारी कनिया, बेटी माई मन येखर बड़ सेवा-जतन करके पूजा करथे अऊ जइसना देवी मॉं के जसगीत नवरात्रि म गाथे वईसने भोजली बोय के बाद ओखर सेवा म सेवा गीत, सिंगार गीत जुर-मिल के गाथे।

पीयर भोजली
दोहा- ठैंया-भुईयां हमर गांव के, ठाकुर देव रखवार।
भोजली के सेवक जुरेन, झोंका हमर जोहार।।

आवा गियां जूर मिलके, भोजली जगईबो।
हां भोजली जगईबों।।
हरदी पानी छिंची-छिंची,सेवा ला बजाईबों।
ह हो देवी गंगा।।
उठा-उठा भोजली, तंु जागा होसियारा।
हो जागा होसियारा।।
सेवा करे आये हावन, झोंका अब जोहारा।
ह हो देवी गंगा।।

माईलोगन मन अपन भोजली दाई ल जल्दी-जल्दी बाढ़े बर अरज करथे अऊ कईथे-
देवी गंगा, देवी गंगा लहर तुरंगा।
हमरो भोजली देवी भीजे आठो अंगा।।
माड़ी भर जोंधरी, पोरिस कुसियार हो।
जल्दी बाढ़ौ भोजली, होवौ हुसियार।।

अंधियार जगह म बोय भोजली ह सुभाविक रूप ले पीऊरा रंग के हो जाथे। भोजली के पीऊरा होय के बाद माईलोगन मन खुसी परगट करथे अऊ भोजली दाई के रूप ल गौर बरनी अऊ सोना के गहना ले सजे बता के अपन अरा-परोस के परिस्थिति ल घलो गीत म मिलाथे।
सिंगार गीत

गये बजार, बिसाई डारे कांदा।
बिसाई डारे कांदा।।
हमरो भोजल रानी, करे असनांदा।
ह हो देवी गंगा ।।
देवी गंगा, देवी गंगा, लहर तुरंगा।
हो लहर तुरंगा।।
तुहरो लहरा भोजली, भिजे आठो अंगा।
ह हो देवी गंगा।ं।

बरसात दिन म किसान के नोनी मन जब कछु समय बर खेती-किसानी ले रिता होथे त घर म आगू के ब्यस्त दिन के पहिली ले धान ले चांऊर बनाय बर ढेंकी ले धान ल कुटथे अऊ पछिंनथे-निमारथे। जांता म राहेर, अरसी, चना, बउटरा ल पिसथे। ये काम म थोरकुन देरी हो जाथे त समय निकाल के संगी-जवरिहा मन करा मिलके भोजली दाई के सामने जाथे अऊ ओखर सामने म अपन मन के बात ल ये परकार ले कहिथे।
कुटी दारे धाने, पछिनी डारे कोड़हा।
लइके-लइका हन, भोजली झन करबे गुस्सा।।

सावन महिना के सुक्ल पछ के पंचमी तिथि से ले के सावन पून्नी याने राखी तक भोजली माता के रोज सेवा करथे अऊ ये सेवा म गाये जाने वाला पारंपरिक गीत ल ही भोजली गीत कहे जाथे। हमर छत्तीसगढ़ राज म अलग-अलग जगह अलग-अलग भोजली गीत गाये जाथे पर गाये के ढंग अऊ राग ह एकेच हावय।

सावन महिना के सुक्ल पछ के पंचमी तिथि से ले सावन पून्नी याने राखी तक भोजली के सेवा जतन करके भादो के पहिली तिथि के भोजली माता बिसरजन बर कुवांरी कनिया मन टुकनी मन लेके मुड़ी म बो के एक के पाछू एक करके गांव के तलाव म ले जाथे। जेला भोजली ठंडा करे जाथे, कईथे। ये पूरा बिसरजन यात्रा म बेटी माई मन भोजली गीत गावत जाथे अऊ संगे-संग मांदर, मंजीरा के थाप के सुघ्घर धुन ह मन म भकती के भाव अपने आप जगाये लगथे। पून्नी के दिन भोजली ठंडा करे समय साम के बेरा पूरा गांव म खुसी के अऊ भकती के माहौल बन जाथे। फेर भोजली दाई ल अच्छा फसल के मनोरथ के साथ तालाव के पानी म बिसरजन कर देथे। बेटी माइमन भोजली बिसरजन के बाद जस गीत के जईसे भोजली के बिरह गीत गाथे काबर के ये 10-12 दिन ले भोजली माता के सेवा जतन करे म वोखर से भावात्मक रूप से जुड़ाव हो जाये रईथे। भोजली के बिसरजन के बेरा थोरकन भोजली ल गांव के मनखेमन भगवान घलो म चढ़ाथे अऊ सियान मन ल येला दे के गोढ़ ल छू क आसीस लेथे। ये भोजली से छत्तीसगढ़ के बेटीमाई मन के भावात्मक संबंध हे ऐखरे कारन तो ये भोजली के दू-चार पउधा ल एक-दूसर के कान म खोंच के तीन-तीन पीढ़ी बर मितान, गिया बदथे अऊ सगा जइसे मानथे अऊ रईथे।

पर आज कल हमर ये परब मन अब केवल गांव-गांव म ही रह गे हे। सहर म तो केवल नेंग मात्र हो गे हे। संगवारी हो हमर ये सभयता अउ संसकिरीति, लोक परब, लोक गीत अउ तिहार मन ल नंदाय ले बचना हे जेखर ले हमर पहिचान हे अगर वो तिहार मन नंदा जाही त हमनके पहिचान नस्ट हो जाही।

प्रदीप कुमार राठौर ’अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा
(छत्तीसगढ़)

महान लोकनायक अउ समन्वयवादी कबि गोस्वामी तुलसीदास

हमर देस ह बैदिक काल ले आज तलक साहित्य के छेत्र म समरिध हावय चाहे वो जब हिन्दील भाखा के जननी देव बानी संसकिरीत रहय जेमा बालमिकी के रामायन होवय, चाहे बेदबियास के महाभारत, चाहे कालीदास के अभिज्ञान साकुंतलम होवय। ओखर बाद जब हिन्दीत भाखा अवतरित होईस त ओमा घलो एक से बढ़के एक साहित्यकार, कवि हावय। हिन्दीत भाखा के भीतर म घलो अवधि, बरज, खड़ी बोली,छत्तीसबढ़ी भाखा म आथे।

आचार्य रामचंद्र सुक्ल जी ह हिन्दीं साहित्य कि इतिहास ल चार काल म बांटे हावय बीरगाथाकाल जेला आदिकाल घलो कईथन, भक्तिकाल, रीतिकाल अउ आधुनिक काल। भक्तिकाल ल हिन्दीत साहित्य के स्वर्ण काल घलो कहे जाथे काबर के ये काल म सबले जादा साहित्य रचना करे गे रहिस। भक्तिकाल म दो परमुख धारा रहिस। पहिली सगुन भक्तिधारा अउ दूसर निरगुन भfक्ताधारा। सगुन भक्तिधारा के भी दो साखा रहिस राम भक्ति साखा अद किसन भक्ति साखा। राम भक्ति साखा के परमुख कबि तुलसीदास जी रहिन। अउ किसन भक्ति साखा के परमुख कबि सूरदास जी रहिन। साहित्यकार अउ कवि मन समाज घलो ल अपन रचना के माध्यम से सुधार करे के कोसिस करथे। साहित्य ह समाज के अईना होथे अउ साहित्यकार मन समाज ल अईना दिखाये के काम करथे, जेखर ले समाज म फैले बुराई अउ अंधबिसवास ह धीरे-धीरे खतम होथे।

गोस्वामी तुलसीदास जी भक्तिकाल के सगुनधारा के रामभक्ति साखा के प्रतिनिधि कवि माने जाथे। वो ह एक कवि, भक्त अउ समाज सुधारक के रूप म स्वीकार करे जाथे। वो ह हिन्दीत साहित्य के गौरव और भारतीय संसकिरिती के रछक कहे जा सकत हे। ओखर हर रचना ह भारतीय धरम अउ आस्था के परतीक बन गे हावय। तुलसीदास जी ल देस-बिदेस के आलोचक मन मुक्त कंठ ले बढ़ाई करे हावय।

कविता करके तुलसी न लसे,
कविता लसी पा तुलसी की कला। ‘हरिऔध’

जन्म अउ मरन- तुलसीदास जी जनम अउ अस्थान के बारे म लोगन मन के कई मत हावय। हिन्दीय के इतिहासकार डा. ग्रियरसन के अनुसार तुलसीदास जी के जनम बछर 1532 (संवत् 1589) म उत्तरपरदेस के बांदा जिला के राजपुर गांव म होय रहिस। वो ह सरयूपरायन बाम्हन रहिन। वोखर ददा के नाव आत्माराम दुबे अउ दाई के नाव हुलसी रहिस। तुलसीदास जी बचपना ह बहुत कठिनाई म बितीस। वोखर दाई-ददा ह वोला मूल नछत्र म जनमे के कारन तियाग दिहिस। सेस सनातज जी की किरपा ले बेद, पुरान, उपनिसद, दरसन ल खूब पढ़िस। कहे जाथे के तुलसीदास जी अपन गोसाईन बर अब्बड़ मया करत रहिस। पर जब ओखर गोसाईन ह वोखर, अपन उपर आसक्ति ल देखिस त ओला फटकारिस ते मेरा ले तुलसीदास जी जीवन दिसा ही बदल गे। ओ ह अपन जीवन ल राम के भक्ति म लगा दिस। संवत् 1680 याने बछर 1623 म इंखर देहांत हो गे।
रचनाः- नागरी परचारनी सभा कासी ह इंखर परमारिक रचना मन ल परकासित करे हावय जे ह ये परकार ले हे- रामचरित मानस, रामलला नहछु, बैराग्य संदीपनी, बरवै रामायन, पारवती मंगल, जानकी मंगल, रामाज्ञाप्रस्न, दोहावली, कवितावली, गीतावली, सिरी किस्न गीतावली, बिनय-पत्रिका, सतसई, छंदावली रमायन, कुंडलिया रमायन, राम सलाका, संकट मोचन, करखा रमायन, रोला रमायन, झूलना, छप्पय रमायन, कबित्त रमायन, कलिधरमाधरम निरूपन, हनुमान चालीसा।

‘एन साईक्लोपिडिया आॅफ रिलीजन एंड एथिक्स’ म घलो हिन्दीय साहित्य के इतिहारकार डा.ग्रियरसन ह ये पहली बारह रचना के बरनन करे हावय।
राममचिरतमानस परबंध काब्य के आदरा प्रस्तुत करथे त दूसर कोती बिनय-पत्रिका ह मुक्तक सैली म रचे गे सबसे बढ़िया गीति काब्य हे।
काब्यगत बिसेसता- तुलसीदास जी के काब्य के सबसे बड़े बिसेसता समन्वय के भावना ये। उंखर काब्य म समन्वय के बिराट चेस्टा हे। अपन समन्वयवादी नजरिया के कारन ही तुलसीदास जी लोकनायक के आसन पर आसीन हावय। तुलसीदास जी ल लोेकनायक भी कहे गे हावय।
हजारी परसाद द्विवेदी जी उंखर बारे म लिखथे के ‘‘ लोक नायक वही हो सकत हे जो समन्वय कर सके, काबर के भारतीय जनता म नाना परकार के परस्पर बिरोधी संसकिरिती, साधना, जाती, आचार निस्ठा अउ बिचार पद्वति प्रचलित हावय। बुद्व देव समन्वयवादी रहिस। गीता म समन्य् के चेस्टा हे अउ तुलसीदास जी घलो समन्वयकारी रहिन।’’
लोक संगरह के भाव तुलसीदास जी के भक्ति के परमुख अंग रहिस। जेखरकारन वोखर भक्ति किस्न भक्त कबि के जईसे एकांगी न होके सरवांगपून हे। वो ह अवधी भाखा म अपन रचना ल लिखिस।
तुलसीदास अउ रामचिरतमानस – रामचरितमानस हिन्दीत साहित्य म ही नहीं बक्ति पूरा बिस्व साहित्य म अपन महत्वपून अस्थान रखथे। ये ह एक परकार ले भारतीय जीवन के प्रतिनिधि गरंथ हे। जेला तुलसीदास जी ह संवत् 1631 म अजोध्या म लिखे रहिस। देवयोग से वो बछर रामनवमी के दिन वईसनहे ही योग बने रहिस जईसना त्रेताजुग म भगवान राम के जनम के दिल रहिस। वो दिन बिनसरहा तुलसीदास जी ह रामचरितमानस के रचना लिखे बर सुरू करिन जेहा दू बछर सात महिना अउ छब्बीस दिन म पूरा होईस। ये गरंथ के मूल आधार बाल्मिकी जी लिखे गये महाकाब्य रामायन हे। लेकिन तुलसीदास जी ह येला अपन कल्पना अउ प्रतिभा के बल म युग अनुरूप बना दिहीस। जे समय ये गरंथ लिखे गईस ओ समय देस म मुसलमान मन के सासन रहिस। fहंदू मन के मन म निरासा के भावना घर करे लग गे रहिस। तुलसीदास जी भारत के अतीतकाल, सांसकिरितिक गौरव अउ आदरस जीवन के चित्रन कर आसा अउ बिसवास के दिया जला दिहिस।
रामचरितमानस म तुलसीदास जी ह राम भगवान के समग्र रूप के चित्रन करे हावय। ये महाकाब्य के कथा सात काण्ड म बंटे हावय। बाल काण्ड से ले के उत्तर काण्ड तक भगवान राम के जीवन के सबो अंग ल बड़ सुघ्घर ढंग ले बरनन करे हावय।
रामचरितमानस म आदरस जीवन के निरबाह ही नई होवय हे बल्कि ये ह काब्य सौन्दर्य के दिरिस्टि ले घलो एक आदर्स गरंथ हावय। ये महाकाव्य के नायक भगवान बिस्नु के अवतार सिरी राम हावय। जे ह भगवान के अवतार मनखे रूप म हे। जेखर से मनखे के जीवन म आने वाला सुख-दुख के ल ग्रहन करत जाथे। चौदह बछर के बनवास, ददा के मरनी के दुख, अरधांगिनी के अपहरन के दुख, भाई लछमन के मुर्छा के दुख अउ युद्व म नरसंहार के दुख अउ आखिरी म अपन अरधांगिनी सिता से हमेसा बर बिछुड़े के दुख सबला सहन करत जाथे काबर के भगवान ह इहां पिरिथिवी लोक म भगवान नई ये वो ह एक मनखे ये।
समन्वयभाव रामचिरतमानस के सबले बड़े बिसेसता हे। तुलसीदास जी के सब्बों काब्य ल ही समन्वय के बिराट चेस्टा के संज्ञा देहे गये हावय। ये समन्वय हर जगह बियाप्त हावय। दो बिरोधी भाव के समन्वय हावय। तुलसीदास जी के समय सैव अउ बैसनव संपरदाय म ओ समय लड़ाई ह जोर पकड़ रहिस। त तुलसीदास जी रामचरितमानस म समन्वय अस्थापित करे बर बानकांड म भगवान संकर के मुख ले कहलवाईस के
जासु कथा कुम्भज रिशि गाई, भगति जासुमैं मुनिहि सुनाई।
सोई मम ईस्ट देव रघुबीरा, सेवत जाही सदा मुनी धीरा।। बालकांड 62-4

अईसनहे भगवान राम के मुख से भगवान संकर के परती कहलवाई-

1- सिव द्रोही मम भगत कहावा, सो नर सपनेहॅंु मोंहि न पावा।
संकर विमुख भगति चह मोरी, सो नारकी मूढ़ मति थोरी।। लंकाकांड दोहा-2-4

2- संकर प्रिय मम द्रोही, सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहि कलप भरि घोर नरक महुॅं बास।। लंकाकांड दोहा-3

तुलसीदास जी ह ज्ञान अउ भक्ति म घलो समन्वय करे हावय। रामचरितमानस म सब्बो रस के चित्रन हावय। येमा भाखा साहित्यिक अवधि हावय जेमा संसकिरित के पदावली के बिसेस परभाव हावय। भक्ति के पराधीनता के कारन काब्य के अंगी रस सांत रस बन गे हावय। परसंग के अनुकूल प्रसाद, ओज, माधुर्य गुन ल घलो अस्थान मिले हावय। गुन ह रस के अभिन्न अंग हावय। छंद म दोहा अउ चौपाई के घलो बिसेस परयोग तुलसीदास जी ह अपन रामचरितमानस म करे हावय। भाखा के सौन्दर्य वरधन म अलंकार अउ सब्दसक्ति के घलो सुघ्घर बरनन हे।
ये परकार ले देखा जाये त गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस समन्वयवादी रचना के पराकास्टा हावय। जेमा हर दिरिस्टि ले समन्वय हावय। अगर ये कहे जाये के रामचरितमानस हिन्दीर साहित्य के सबो बिधा के सार ह त वो ह अतिसोक्ति नई होही। काबर के पहिली तो ये रचना एक महाकाब्य ये जेमा नायक भगवान राम के पूरा जीवन के बरनन हावय जेमा नायक ह एक आदरस बेटा, भाई, राजा, मित्र, पति,सत्रु। येखर संगे-संग रामचरितमानस म दसो रस के परिपाक देखे बर मिलथे। अजोध्या काण्ड म सांत रस, बाल काण्ड म भगवान राम के संगे-संग भरत, लछमन अउ सत्रुघन बर उंखर माता कौसिलिया, कैकेई, अउ सुमित्रा के बात्सल्य म बात्सल्य रस के बिसद बरनन । राम जी के बनवास जाय के बेरा ओखर ददा-दाई के अउ परजा मन के मन के पीरा, राजा दसरथ के मरनी के सोर सुनके राम जी के मन के पीरा म, असोक बाटिका म माता सिता के भगवान राम के परति बिलाप म करून रस, सिव धनुस टुटे के बेरा भगवान परसुराम अउ लछमन के संवाद म रौद्र रस, माता सिता के पुश्प बाटिक म ओखर fसंगार के बरनन म fसंगार रस, बनवास के समय सुरपनखा के नाक काटे के बेरा म बिभत्स रस, हनुमान जी के अगास के रद्दा लंका जाये के बेरा, हनुमान जी के लंका दहन के बेरा, राम रावण युद्ध म बीर योद्धा मन के बीरता के बरनन म बीर रस, कुंभकरन के युद्ध म लड़े के बेरा ओखर सरीर के बरनन म भयानक रस, सुंदर काण्ड म हनुमान जी ह जब रावन के लंका म लंका दहन करे के पहिली जब रावन के सैनिक मन हनुमान जी के पूछी म आगी लगाये बर पूंछी म चेंदरा बांधत रईथे तेतका बेरा हनुमान जी अपन पूंछी ल अउ लंबा करत जाथे त रावन के संतरी मन ह चेंदरा लपेटत-लपेटत थक जाथे तेतका बेरा हास्य रस के सुघ्घर बरनन हावय। येखर संगे-संग अलंकार, दोहा, रोला, सोरठा, चौपाई हिन्दीड ब्याकरन के सबो चीज येमा मिलथे। रामचरितमानस ह fहंदू मन के परबित्र अउ पूजनीय गरंथ हावय जेहा हर fहंदू धरम ल मानने वाला के घर म जरूर रईथे। तभो ले जेमन ये गरंथ ल नई पूजय वोमन घलो येला हिन्दीय साहित्य के इतिहास के एक किताब के रूप म ज्ञान पराप्ति बर जरूर पढ़य। येमा हर छे के प्रबंधन कला के ज्ञान मिलथे। कहे जाथे के पढ़ईया लईकन मन परतिदिन सुंदरकांड के पाठ करथे त ओखर दिमाग ह तेज होथे। इस्कूल अउ कालेज के पाठ्यपुस्तक घलों म तुलसीदास जी के रामचरितमानस ल घलो रखे गे हावय।
हमर देस राज म क्वांर नवरात्रि के नवमीं के बाद दसमी तिथि के दिन रावन बध किये जाथे जेमा रावन अधरम के परतीम रूप म ओखर पुतला दहन करथन। येखर पहिली नव दिन दुर्गा उपासना करथन अउ रामलीला घलो संगे-संग चलथ रईथे ये राम लीला ह तुलसीदास जी के रामचरितमानस ल ही नाटक के रूप म मंचन किये जाथे। हमर छत्तीसगढ़ देस राज म कातिक महिना अउ ओखर बाद नवधा रमायन ह गांवो-गांव म होय लगथे येहू म तुलसीदास जी के रामचरितमानस के पाठ किये जाथे। कहे के मतलब ये हावय के तुलसीदास जी रामचरितमानस जईसे गरंथ ल अवधी भाखा म लिख के जेतका परसिद्धी पाईस वईसनहा हिन्दीं साहित्य का पूरा बिस्व के साहित्य के इतिहास म कोनो साहित्यकार ह नई पाय हावय। वो राम के चरित ल हर मानस के हिरदय म बसा दे हे हावय।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

नाग पंचमी के महत्तम

हमर भारत देस राज ह खेती-किसानी वाला देस हावय। याने हमर देस ह किरसी परधान देस हावय। नाग देवता ह किसान के एक परकार ले संगवारी ये, काबर के वो ह किसान के खेत-खार के रछा करथे। येखर कारन वोला छेत्रपाल कहे जाथे। छोटे-मोटे जीव जंतु अउ मुसवा ह फसल ल नुकसान करे वाला जीव हावय। ओखर नास करके नाग ह हमर खेत के रछा करथे।

सांप ह हमन ल कई परकार के संदेस घलो देथे। सांप के गुन देखे बर हमनकरा गुनग्राही अउ सुभग्राही नजर होना चाही। भगवावन दत्ता़त्रय म सुभ दिरिस्टीय रहिस उनला हर चीज म कुछ न कुछ सीख मिलीस अउ जेखर करा सीख मिलिस वोला ओ ह अपन गुरू बना लिहिस।

सांप मन घलों कोनो ल अकारन नई चाबय। वोला परेसान करे वाले मनखेमन ल ही चाबथे भले ही भूल से ही हमर गोड़ ओखर उपर रेंगत समय लग जाथे त वो ह अपन रछा बर डस देथे। सांपों घलो भगवान के बनाये ये परकिरीत के सुंदर जीव ये। वो ह बिना नुकसान पहुंचाये बिना उपद्रव करे अपन जीवन जीयत हे त ओला मारे के हमन ल कोनो अधिकार नई हावय। जब हमन ओखर परान लेहे बर करथन त ओ ह अपन रछा करे बर हमन ल डसथे त ओला दुश्ट काबर कहिबो। हमर परान लेहे वाला के के परान लेहे के का हमन कोसिस नई करन का?

नाग देवता ल ममहाई ह बहुत भाथे। जेखर कारन वो ह चंपा के रूख म या चंदन के रूख म लिपटे रईथे। केवड़ा के जंगल म घलो नाग देवता मन के वास रईथे।
कुछ जुन्नटहा नाग देवता के माथा म मणि रईथे। जे ह अमूल्य होथे। हमूमन ल अमूल्य चीच मन ल याने बने बिचार मन ल अपन माथा म रखना चाही।
सांप बिला जेजा fभंभोरा घलो कईथे म ज्यादातर एकांत जीवन जीथे। येखर कारन मुमुछु ल जनसमूह मन ल टालना चाही। ये बारे म सांप के उदाहरन दिये जाथे।
देवता अउ राछस के सागर मंथन म साधन रूप बनके वासुकि नाग ह दुरजन घलो बर परभु काज म निमित्त बने के रद्दा खोल दिहिस। दुरजन मन घलो यदि सच्चा रद्दा म आय त उहू ह सांसकिरीतिक काम म अपन बहुत बड़े योगदान दे सकत हावय।

नाग पंचमी हमर fहंदू मन के एक परमुख तिहार हावय। fहंदू पंचांग के अनुसार सावन महिना के सुकुल पछ के पंचमी के ये तिहार ल मनाये जाथे येखर काारन ये तिहार ल नागपंचमी घलो कईथन। ये दिन नाग देवता के पूजा करे जाथे अउ गोरस से नाग देवता ल अस्नान करे के बिधान हावय। ये दिन किसान मन ह अपन खेत-खार म जाके जे मेना fभंभोरा रईथे दोना म गोरस अउ लाई ल, ले जाके रख देथे।
काबर के नागपंचमी ह सावन महिना म मनाये जाथे त भगवान संकर के मंदिर म नाग देवता ल घलो पानी, गोरस से असनान कराये जाथे।
नाग देवता ह भगवान संकर के गला के हार ये। जेखर कारन भगवान संकर ल सांप घलो प्रिय हावय। भगवान सिरी राम के छोटे भाई लछमन घलो ल सेसनाग के अवतार माने गय हावय।
भगवान सिरी किसन जी घलो ह यमुना रहने वाला कालिया नाग के मरदन करे रहिस।
नाग पंचमी के दिन गांव-गांव म कुस्ती अउ पहलवानी परतीयोगिता के आयोजन घलो रखे जाथे। किसान मन अपन पसुधन गरूआ-भईसा मन ल तलाव, नदियां-नरवा म बढ़िया नउहाथे।
ये दिन अश्टनाग के पूजा करे जाथे।
वसुfकः तक्षकच्शैव कालियो मणिभद्रकः।
ऐरावतो,धृमराश्ट्रःकार्कोटकधनंजयौ।।
एतेअभयं प्रयच्छन्ति प्राणिनां प्राणजीविनम्।।
(भविश्योत्तरपुराण-32-2-7)
येखर अरथ ये हावय के वासुकि,तक्षक, कालिया,मणिभद्रक,ऐरावत,धृतराश्ट्र,कार्कोटक और धनंजय- ये मन जीव मन अभय देथे।
नाग ल देवता के रूप म स्वीकार करे म आर्य मन के हिरदय के बिसालता के दरसन होथे।
ये परकार ले देखे जाय त नाग, देवता के रूप म घलो अउ देवता मन के प्रिय के रूप म घलो अउ किसान मन के संगवारी के रूप म ये पिरथिवी लोक म वास करथ हावय। त अइसनहा जीव ल हमन ल नुसकान नई पहुंचाना चाही। जेला हमन एक कती पूजा करथन अउ ओला देखत ही मारे बर करथन ये बिलकुल गलत काम ये।

प्रदीप कुमार राठौर ‘‘अटल’’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

Nagpanchami ka mahatv

हिन्दी साहित्य के महान साहित्यकार उपन्यास सम्राट, कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद

हमर देस ह बैदिक काल ले आज तलक साहित्य के छेत्र म समरिध हावय चाहे वो जब हिन्दीर भाखा के जननी देव बानी संसकिरीत रहय जेमा बालमिकी के रामायन होवय, चाहे बेदबियास के महाभारत, चाहे कालीदास के अभिज्ञान साकुंतलम होवय। ओखर बाद जब हिन्दीं भाखा अवतरित होईस त ओमा घलो एक से बढ़के एक साहित्यकार हावय। हिन्दीं भाखा के भीतर म घलो अवधि, बरज, खड़ी बोली,छत्तीसबढ़ी भाखा मन आथे।

आचार्य रामचंद्र सुक्ल जी ह हिन्दी3 साहित्य के इतिहास ल चार काल म बांटे हावय बीरगाथाकाल जेला आदिकाल घलो कईथन, भक्तिकाल, रीतिकाल अउ आधुनिक काल। आधुनिक काल के अंतरगत प्रेमचंद्र युग आईस जेमा प्रेमचंद्र जी के रचना ल हमन पढ़थन। प्रेमचंद्र जी हिन्दीर साहित्य के परमुख साहित्यकार ये। वो ह साहित्य ल आम जनता से जोड़िस जेखर कारन उखर रचना ह साहित्य के मुंह बोलत चित्र बन गईस। साहित्य ह समाज के दरपन हो थे अउ वो दरपन प्रेमचंद्र जी ह समाज ल अपन रचना के माध्यम ले दिखाईस।

प्रेमचंद्र जी के जनम 31 जुलाई बछर 1880 म बाराणसी म लमही नाव के गांव म होय रहिस अउ 8 अक्टूबर बछर 1936 म वो ह सरगबासी होगे। उंखर असली नाव धनपतराय रहिस। सुरू-सुरू म ऊंह नवाबराय के नाव ले ऊर्दू म लिखत रहिस। पर बाद म वो ह हिन्दीर के परभाव से हिन्दीय भाखा म अपन साहित्य रचना करे लगिस। प्रेमचंद्र जी ह कुछ पत्र-पत्रिका के संपादन घलो करे रहिस। सरस्वती नाव ले अपन परकासन संस्था घलों बनाये रहिस।

पे्रमचंद्र जी परमुख रूप से कथाकार रहिन। वो ह आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी कथाकार ये। वो ह समाज के सभी वर्ग ल अपन रचना म अस्थान दीहिस। निरधन,पीड़ित अउ सरवहारा के परति उखर बिसेस सहानुभूति रहिस। वो ह सोसक समाज के अतियाचार ल घलो खुल के अपन रचना म चितरन करिस।

गांव के जीवन के चितरन म तो पे्रमचंद्र जी ह कमाल कर दे हावय। प्रेमचंद्र जी के बिसाल कहानी-साहित्य ल देखते हुए कहे जा सकत हे के उंखर कहानी म जन-साधारन के जीवन के समान्य पिरिस्थिति, मनोवृत्ति अउ समस्या के चितरन ह बहुत ही मारमिक ढंग ले होय हावय।

प्रेमचंद्र जी के रचना म उपन्यांस म – वरदान, सेवासदन, प्रेमाश्रय, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन, गोदान, मंगल सूत्र (आधा हावय)।

कहानी संग्रह- प्रेमचंद्र जी ह लगभग 300 कहानी लिखिस जे हर मानसरोवर के आठ भाग म संकलित हावय। दो बैलो की कथा, पंच परमेश्वर, आत्माराम, बड़े घर की बेटी, रानी सारंधा, शतरंज के खिलाड़ी, सुजान भगत, पूस की रात, ईदगाह, कफन, बूढ़ी काकी, जइसे कहानी मन परसिद्ध हावय।
नाटक म – कर्बला, संग्राम, प्रेम की बेदी।
निबंध संग्रह म – कुछ बिचार।

प्रेमचंद्र जी के पूरा साहित्य ह समाज सुधार अउ रास्ट्रीय भावना ले प्ररित हावय। उंखर कोनो रचना चाहे वो ह उपन्यायस होय चाहे कहानी वोखर नायक ह किसान, मजदूर अउ मध्यम वर्ग के प्रतिनिधित्व करथे। ओखर उपन्यांस गोदान के नायक होरी रहे या पूस की रात के नायक हलकू रहय। जेमा नायक ह समाज के सोसक वर्ग के परति सामना करत दिखथे। वोखर हर रचना म तत्कालीन समाज के रूढिवादी परंपरा अउ जमींदारी परथा के बिरोध दिखाई देथे।

प्रेमचंद्र जी के कहानी,उपन्यारस के धारावाहिक घलो बने रहिस जेला दूरदरसन ह परसारन करे रहिस। जेमा प्रेमचंद्र जी के रचना के नायक के रूप म पंकज कपूर ह रोल निभाय रहिस अउ बहुत ही अच्छा जचे रहिस होरी अउ हलकू के रोल म। प्रेमचंद्र जी ह अपन हर रचना ल येतका समरपित भाव ले रचय के उंखर रचना के हर पात्र ह fजंदा हो के पाठक के हिरदय म धड़के लग जाथे। इंहा तक के यदि पात्र ह ब्यथित अउ समस्या ग्रस्त हावय त पाठक घलो के आंखि ले आंसू बह जाथे।

भाखा सैली – प्रेमचंद्र जी के भाखा सरल अउ मुहावरेदार हावय। प्रेमचंद्र जी ह मुख्य रूप ले वरनात्मक, बियंग्यात्मक अउ भावात्मक सैली ल अपनाय हावय।

येखर से स्पस्ट हो जाथे के प्रेमचंद्र जी ह हिन्दीस साहित्य के सर्वश्रेश्ठ साहित्यकार ये। वो ह हिन्दीग साहित्य ल देस-बिदेस म पहिचान दिलाइस। वो ह हिन्दीर कहानी साहित्य के कल्पतरू अउ उपन्याटस साहित्य के सम्राट अउ कलम के सिपाही माने जाथे। वो ह रास्ट्र परेम, मानव कल्यान, अउ समाज सुधार के संदेस दे हे हावय। वोखर हर रचना ह मानव जीवन के कोनो न कोनो हिस्सा ल दिखाथे।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

कबीरदास कोन ? एक भक्त , समाज सुधारक या एक रहस्यवादी जन कवि

हमर देस राज म साहित्य बैदिक काल ले आज तलक समरिध हावय चाहे वो जब हिंदी भाखा के जननी देव बानी संसकिरीत रहय जेमा बालमिकी के रामायन होवय, चाहे बेदबियास के महाभारत, चाहे कालीदास के अभिज्ञान साकुंतलम होवय। ओखर बाद जब हिंदी भाखा अवतरित होईस त ओमा घलो एक से बढ़के एक साहित्यकार, कवि हावय। हिंदी भाखा के भीतर म घलो अवधि, बरज, खड़ी बोली,छत्तीसबढ़ी भाखा म आथे।
आचार्य रामचंद्र सुक्ल जी ह हिंदी साहित्य कि इतिहास ल चार काल म बांटे हावय बीरगाथाकाल जेला आदिकाल घलो कईथन, भक्तिकाल, रीतिकाल अउ आधुनिक काल। भक्तिकाल ल हिंदी साहित्य के स्वर्ण काल घलो कहे जाथे काबर के ये काल म सबले जादा साहित्य रचना करे गे रहिस। भक्तिकाल म दो परमुख धारा रहिस। पहिली सगुन भक्तिधारा अउ दूसर निरगुन भक्तिाधारा। सगुन भक्तिधारा के भी दो साखा रहिस राम भक्ति साखा अद किसन भक्ति साखा। राम भक्ति साखा के परमुख कबि तुलसीदास जी रहिन। अउ किसन भक्ति साखा के परमुख कबि सूरदास जी रहिन। वईसनहे निरगुन धारा म घलो दू ठन साखा रहिस। ज्ञाना मारगी अउ परेमासरयी। ज्ञाना मारगी के परमुख कबि रहिन कबीरदास जी अउ परेमासरयी साखा के परमुख कबि रहिन मलिक मोेहम्मद जायसी जी। साहित्यकार अउ कवि मन समाज घलो ल अपन रचना के माध्यम से सुधार करे के कोसिस करथे। साहित्य ह समाज के अईना होथे अउ साहित्यकार मन समाज ल अईना दिखाये के काम करथे, जेखर ले समाज म फैले बुराई अउ अंधबिसवास ह धीरे-धीरे खतम होथे।
कबीर दास जी भक्तिकाल के निरगुनधारा के ज्ञानमारगी साखा के प्रतिनिधि कवि माने जाथे। वो ह एक कवि, भक्त अउ समाज सुधारक के रूप म स्वीकार करे जाथे। ओकर बानी म करांती के स्वर हावय। ओहा समाज म फैइले रूढ़ी, अंधबिस्वास अउ जाती गरब के बल म दूसर ल सोसन करे के प्रवृत्ति के घोर बिरोधी रहिस।
ये परसिध कवि के जनम के बारे कोनो परमानिक परमान नई हावय। बिद्वान मन म ईंखर जनम के बारे म एक राय नई हे। कबीर जी के गुरू के नाव रामानंद रहिस। जेला कबीर दास जी स्वयं स्वीकारथे।
कासी म हम प्रकट भय, रामानंद चेताये।
कबीरदास ह अपन पूरा जीवन समाज म बियाप्त बिसमता ल दूर करे म लगा दीस। कुछ धरमांद मनखेमन कबीरदास जी बिरोधी बन गे। कबीर दास जी ल कांसी छोड़े बर मजबूर कर दिहीस। बिबस हो के कबीरदास जी ह कांसी ल छोड़ के मगहर म आके अपन निवास बनाईस अउ उहे वोहर अपन देह तियागिस।
कबीरदास जी के रचना- ये बात तो इस्पस्ट हे कि कबीरदासजी ह बिधिवत सिछा नई ले रहिस हावय। वोहा बहुसुरूत रहिस। जो कछु उपदेस अपन दोहा म कहिस वोहा अपन अनुभव के बल म कहिस। अपन निरछरता ल वोहा खुद स्वीकार करथे।़़
मसि कागद छुओ नहीं, कलम गहि न हाथ।
अपन गहन अनुभव अउ बहुसुरूत के बारे म ओखर कहना हे कि-
तू कहता कागद की लेखी,
मै कहता अंखियन देखी।

कबीरदास जी के रचना बीजक म संगरहित हावय। ये संगरह म साखी, रमैनी अउ सबद म संकलित हावय।
कबीरदास जी के काव्यगत बिसेसता- कबीरदास जी के काव्य के सबले बड़े बिसेसता तुलसीदास जी जैइसे समन्वय भावना हावय। जे समय कबीरदास जी हिंदी साहित्य म अपना रचना करे लगिस ते समय हिंदू अउ मुसलमान मन के बीच लड़ाई-झगरा चलत रहिस। इन सब ल एक करना सबले बड़े काम रहिस। जेला वोहा अच्छा ढंग ले करिस।
हिंदी के परसिध साहित्यकार डॉ. रामकुमार वर्मा ह कहे रहिस ‘‘ हिंदु अउ मुसलमान के बीच के सामपरदायिक सीमा ल तोड़ के ओ मन ल एक धारा म बहा के ले जाय के अपूर्व ताकत कबीर के काव्य म रहिस।’’
कबीरदास जी ह एक अइसे समन्वयात्मक धरम के नीव राखिस जेमा हिंदू मन के अद्वैतवाद, मुसलमान मन के एकेस्वरवाद, सिद्व मन के हठ योग, बैसनव मन के भक्ति अउ सूफी मन के परेम के पीर के परभाव रहिस। कबीरदास जी के बारे म ये बात ठीक कहे गे हे के – कबीर सारग्राही महात्मा रहिस। जहां कहू भी ओला सत्य के उपलब्धि होईस ओला ओहा गरहन करिस। ये ही कारन रहिस के वोखर बिचारधारा ह कई मत, गरंथ, संपरदाय ले परभावित रहिस।
कबीरदास जी ह उच्चकोटि के भक्त रहिस। वोकर भक्ति भावना म दिखावा नई रहिस। वो आचरण के सुद्धता अउ मन के पबित्रता बर जोर दिहिस। ओकर कहना रहिस कि भक्त ल निसकाम भाव ले अपन अराध्य के याने अपन देवता के अराधना करना चाही। कबीर दास जी ह भगवान के निरगुन रूप के उपासक रहिस। याने वोकर मानना रहिस कि भगवान के कोई रूप नई होवय। वोहा समाज म बियाप्त दिखावा, जप-तप, बरत, मूर्ति पूजा, तीरथ के खण्डन करिस। ओकर राम ह सगुन याने आकार लिये भगवान लेे अलग निराकार राम रहिस। जैसे ओकर दोहा म राम के गुनगान हे
दसरथ सुत तिहुं लोक बखाना,
राम नाम का मरम न जाना।।

कबीरदास जी के परेम के ढाई आखर राम राम ही हे। अपन अराध्य के परति अपन प्रिय के परती ये अगाध समरपन कबीरदास जी के भक्ति ल दास्य भक्ति ले घलो जोड़थे। कबीर के परेम के चरम पराकास्ठा बिरह म दिखाई देथे। बिरह म कबीर के मारमिक पुकार ब्ररह्म ल आये बर बिबस कर देथे।
अख्ड़या झाई पड़ी पंथ निहरि-निहारि,
जीभड़या छाला पड़ा नाम पुकारि-पुकारि।

कबीर दास ह अपन समय के समाज सुधारक घलो रहिस। समाज म बियाप्त उंच-नीच के भेद-भाव ल मिटाये के भरकस कोसिस करिस। वोहा उंचा कुल के अभिमान ल ब्यर्थ समझय। कबीरदास जी अपन दोहा म कईथे-
ऊॅंचे कुल क्या जनमिया, जो करनी ऊॅंच न होय।
सवरन कलस सुधा भरा, साधु निन्दै सोय।।

कबीरदास जी ह अपन दोहा म सच्चा गुरू के महिमा के बखान घलो करे हावय। ओकर कहना रहिस के गुरू ह भगवत पराप्ति के रद्दा ल बताथे। येखर कारन गुरू के अस्थान भगवान ले बड़के हावय।
गुरू गोविंद दोउ खडे़ काके लागू पाय,
बलिहारी गुरू आपनो गोविंद दियो बताय।

गुरू कुम्हार शिष कुंभ है,गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।।

कबीरदास जी बड़का रहस्यवादी कवि रहिस। ओकर रचना म रहस्यवाद ल बहुत सुंदर अस्थान मिले हावय। ओहा आत्मा के परमात्मा म मिलन म मोह-माया ल सबसे बड़े अरचन बताये हावय। मनखेमन के ऑखि ले मोह-माया के परदा हटत देरी हे तहां ले आत्मा के परमात्मा म मिलन म देरी नई हे।

जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी।
फूटा कुम्भ जल जलहिं समाना, यह तथ कथौ गियानी।।

अपन रहस्यवाद म परेम भाव के बियाकुलभाव घलो के सुंदर बरनन करे हावय।
दुल्हिन गावहु मंगलाचार,
हमारे घर आये हे राजा राम भरतार

कबीरदास जी के रहस्यवाद आत्मा के परमात्मा म मिलन के बाद आत्मा अरथात ये लौकिक सरीर के अलौकिक परम ब्ररह्म म मिलना ही रहस्यवाद हे। जेमा आत्मा बहुत दिन के तपस्या के बाद अउ कई परकार के कस्ट सहे के बाद आसा अउ इच्छा के बेदना सहे के बाद आत्मा ल परमात्मा के अनुभूति होय लगथे। त वोहा खुसी से कह उठते-
बहुत दिनन थे मैं प्रीतम पाये,
भाग बड़े घर बैठे आये।
मंगलाचार मांहि मन राखौं,
राम रसॉंयण रसना चासौं।
मंदिर माही भया उजियारा,
मैं सूती अपना पीव पियारा।

कबीरदास जी ह अपन भाव परदरसित करे बर परतीक अउ अलंकार के सहारा घलो ले हे हावय। ये अलंकार उपमा,रूपक, अतिशयोक्ति, अन्योक्ति परमुख रूप से हावय। अन्योक्ति अलंकार के एक सुंदर उदाहरण देखव-
माली आवत देख कै, कलियां करी पुकार।
फूली-फूली चुन लई, काल्ह हमारी बार।।
कबीरदास जी के उपदेस परक दोहा तो अनगितनती म हावय तभो कुछु दोहा ये परकार ले हावय-

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ,पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।

तिनका कबहु न निन्दिये, जो पायन तर होय।
कबहुॅ उड़ी ऑंखिन पड़े, पीर घनेरी होय।।

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त-हसन्त।
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।।

दुर्लभ मानुस जन्म है, देह न बारम्बार।
तरूवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरी न लागे डार।।

कबीर कहा गरबियो, काल कहे कर केस।
न जाने कहा मारिसी, कै घर कै परदेस।।

आछेे/पाछे दिन पाछे गये हरी से किया न हेत।
अब पछताये हो क्या, चिड़िया चुग गई खेत।।

झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह।
झूठे को सांचा मिले, तब ही टूटे नेह।।

कबीरदास जी के भाखा अउ सैली-
‘‘हिंदी सहित्य के हजार बछर के इतिहास म कबीर जईसे ब्यक्तित्च लेकर कोनो लेखक उत्पन्न नई होईस। महिमा म ये ब्यक्तित्व केवल एकेच परतिद्वंदी जानथे, तुलसीदास।’’ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।

कबीरदास जी ह सधारन बोल-चाल के भाखा के ही परयोग करे रहिस। वोकर पद ह गेय हावय।

‘‘कबीरदास जी के बानी के अनुकरन नई हो सकय। अनुकरन करे के सबो चेस्टा बेअरथ सिद्व हो हावय। अइ बेयक्तित्च के कारन कबीर के उक्ति ह सोरोतामन ल बलपूरवक आकिरिस्ट करथे। अइ बेयक्तित्व के आकरसन ल सहिरदय समालोचक संभाल नई पाये अउ रिझ के कबीर ल ‘कबि’ कहे म संतोस पाथे।’’
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।

कबीरदास जी के रचनामन म अनेक भाखा के सब्द मिलथे जैईसे-अरबी,फारसी, बुंदेलखडी, बरजभाखा, खड़ी बोली। येखरे कारन इकर भाखा ल ‘पंचमेल खिचड़ी’ या सधुक्कड़ी कहे जाथे।

कबीरदास जी के भाखा के बिषय म डॉं हजारी परसाद द्विवेदी जी के मत ह दरसनीय हावय-‘‘भाखा म परबल अधिकार रहिस। वोहा बानी के डिक्टेटर रहिस। जे बात ल वोहा जे रूप म परगट करना चाहिस वोला वई रूप म भाखा म कहिस।’’

ये परकार ले कह सकत हन के कबीरदास जी के कबिता लोगन मन के जिनगी के पास ले ब्यक्त होय के कारन बिसेस हावय। वोहा अपन जुग के परतिनिधि कबि ये।

प्रदीप कुमार राठौर ‘अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा (छ.ग.)

अक्ती तिहार

छत्तीसगढ़ म हर तिहार ल हमन सुघ्घर रूप ले मनाथन। तिहार ह हमर घर, परिवार, समाज अउ संसकिरिती म रचे-बसे हावय जेखर कारन येखर हमर जीनगी म अब्बडेच़ महत्तम हे। तिहार ह हमर खुसी उत्साह के परतीक हावय जेला हमन सबो झन जुर-मिर के मनाथन। तिहार से हमन ल एक नवा उरजा मिलथे जेखर ले हमन अपन जीनगी म आने वाला कई परकार के बिघन-बाधा ल पार करके आघु बढ़े के सक्ती पाथन। पर आज के आघुनिकता के अंधा दउड़ म हमन अपन तीज-तिहार परिवारदार संगी-जवरिहां के संग मिल के मनाये के बजायय अकेल्ला मनानथ या मनाये ल छोड़ देहन। हमन के मानसिक दुख अउ अवसाद के एक परमुख कारन ये घलो हावय के हमन अपन तिहार ल मिर-जुर के मनाये ल भुलागेहन।
हमर हिंदू धरम म हर तिहार ह पंचाग के अनुसार एक निश्चित तिथि म ही मनाये जाथे। एक अईसने महत्तम के तिहार हावय अक्ती। अक्ती तिहार ह हमर पंचांग के अनुसार बइसाख अंजोरी पाख के तीज के दिन पड़थे। जेला अछय तृतिया के नाव ले जाने जाथे। जेला हमन अक्ती तिहार के नाव ले जानथन। ये तिहार के परंपरा ह पाछू सैकड़ो बछर ले चलत आवथे।




जईसे नाव ले ही समझ म आ जावत हे अछय माने जेखर कभू नास नइ हो सकय वोला अछय कहे जाथे। ये तिहार ये अक्षय तृतिया याने अक्ती। अक्ती तिहार ह परकिरीति के बदलाव के संकेत घलो देथे। बसंत रितु के जाती अउ गरमी के आती के।
सास्त्रीय मानियता- सास्त्रीय मानियता के अनुसार ये दिन जे सुभ काम करे जाथे ओहा अवस्य अछय फलदायी होथे। ये हू मानियता हावय के ये दिन पितर मन के तरपन अउ पिंडदान अउ कोनो परकार के दान घलो अछय फल परदान करथे। ये दिन घर म भगवान बिसनु अउ माता लछमी के पूजा अरचना करे जाथे। जेखर से अछय फल लिलथे।
हमर हिंदू संसकिरीति म चार ठन स्वयंसिद्ध लगन होथे, जेमा नामकरन संस्कार, मुंडन संस्कार, लईकामन के मुॅंह जुठारना, बर-बिहाव, घर के उद्घाटन, गहना के खरीददारी बर कोई मुहूरत देखे के जरूर नइ पड़य।जेमा ये स्वयंसिद्व तिथि म अक्ती के दिन घलो हावय। ये दिन नामकरन संस्कार, मुंडन संस्कार, लईकामन के मुॅंह जुठारना, बर-बिहाव, घर के उद्घाटन, गहना के खरीददारी बर कोई मुहूरत लगन नइ देखे जावय।




सूर्यवंसी राजा दिलीप के बेटा भगीरथ हिमालय म तपस्या करिस ओकर पूरखा मन कपिल मुनि के सराप ले भसम हो गे रहिस माता गंगा ही ओमन के उ़द्वार कर सकत रहिस। त भगीरथ अन्न जल तियाग के तपस्या करे लगिस। कहे जाथे के आज के दिन भगीरथ के तपस्या ले परसन हो के गंगा मैया ह धरती म अवतरे रहिस।
धारमिक महत्तम- हमर चार धाम ले एक धाम बदरीनारायन के कपाट घलो अक्ती के दिन ले ही भक्तमन के दरसन बर खुलथे। बिंदाबन म बांके बिहारी मंदिर अइच दिन सिरी विग्रह के चरन दरसन होथे नइ त पूरा बछर भर ओकर ओनहा ले ढंकाय रइथे।
पउरानिक मानियता- हमन के अट्ठारह पुरान म ले एक भबिस्य पुरान के अनुसार- अक्ती के तिथि के दिन युगादि तिथि म गिनती होथे। चार युग म ले सतयुग अउ त्रेतायुग के सुरूवात घलो अक्ती के दिन ले ही होय रहिस। भगवान बिस्नु के नर-नारायन के अवतार, हयगरिव भगवान के अवतार अउ परसुराम भगवान के अवतार घलो होय रहिस। बरम्हा जी के बेटा अछय कुमार के जनम घलो अक्ती के दिन ही होय रहिस।
कौरव-पांडव के मध्य महाभारत के युद्ध घलो ये दि नही खतम हो रहिस अउ दुआपर युग के अंत हो रहिस। अइसनहा मानियता हावय के ये दिन सुरू करे गे काम अउ करे गे दान-दछिना कभू छय नइ होवय।




काबर के अक्ती तिथि ले बसंत रितु खतम होथे अउ गरमी चालू हो जाथे जेखर कारन हमर छत्तीसगढ़ देस राज म अक्ती के दिन करसी म पानी भरके करसी सहित दान करे के बाद करसी म ले पानी पिये के परंपरा चले आवत हावय जे ह अब नंदात जावत हे।
सामाजिम महत्तम-ये दिन ले सादी, बर-बिहाव होय के चालू हो जाथे। हमर देस राज म ये दिन लईकन मन पुतरा-पुतरी के बिहाव के खेल घलो खेलथे। ये परकार ले लईकन मन सामाजिक काम-बेवहार खुद सिखथे अउ आत्मसात करथे। कई जगह त लईकन मन के संगे-संग पूरा पारा मोहल्ला अउ गांव के मनखे मन लईकन मन के पुतरा-पुतरी के बिहाव के न्यौता म सामिल होथे अउ बिहाव के सबो नेंग जइसे के मड़वा, हरदी-तेल, बरात अउ आखिरी म खाना-पीना करे जाथे। येखर कारन से कहे जा सकत हे के हमर हिंदू के तिहाार अक्ती ह सामाजिक अउ सांसकिरीतिक सिछा के सुघ्घर तिहार हावय।
पारंपरिक महत्तम – ये दिन गांवभर के किसान मन ठाकुर देवता के दुआरी म जुरथे अउ अपन अपन घर ले लाये धान ल रखथे । अउ बने बिधी-बिधान से पूजा-पाठ करके अवईया बछर म धान के अच्छा फसल बर मनोकामना करथे।




ये सब परकार ले देखा जाये त अक्ती तिहार हमर हिंदू धरम एक बड़ महत्तम के तिहार ये तिहार जेमा हमनके पूरखा, सियान मन चाहे खुसी के काम हो या दुख के काम पहिली अपन भगवान के पूजा-पाठ करे के संगे-संग अपन सामाजिक रिती-रिवाज अउ सांसकिरीतिक परंपरा ल बनाये रखे बर ये तिहार ल मनाये के सुरूवात करे रहिस।
ये दारी हमर अक्ती तिहार ह अंगरेजी कलेंडर म मई के महिना म 7 तारीख दिन मंगलवार के पडत हावय। हमन ल अपन तीज-तिहार ल बड़ सुघ्घर रूप से खुसी के साथ मनाना चाही।

प्रदीप कुमार राठौर ’अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा
(छत्तीसगढ़)




सिवनी (नैला) के चैत नवरातरी के संतोषी मेला

छत्तीसगढ़ म मेला ह हमर समाज संसकिरिती म रचे-बसे हावय जेखर कारन येखर हमर जीनगी म अब्बडेच़ महत्तम रखथे। माघी पून्नी ले जम्मों छत्तीसगढ़ म मेला भराये के सुरू हो जाथे। चाहे वोह राजीम के मेला हो, चाहे शिवरीनारायन के मेला, चाहे कोरबा के कंनकी मेला, चाहे कौड़िया (सीपत) के मेला, चाहे पीथमपुर (चांपा), चाहे सिवनी (नैला) जांजगीर के संतोषी मेला होवय।
मेला के मतलब मोर अनुसार मेला-मिलाप एक माध्यम हावय। काबर के मेला बर गांव के छोटे से छोटे किसान से ले के बड़का किसान मन तक अपन बेटी मन ल, अपन सगे-संबंधी मन ल मेला बर लेहे-नेवते जाथे। अउ एक तरह से मेला ह छोटे-बड़े के भेद-भाव घलो ल मिटाय के सुघ्घर माघ्यम हाबय। मेला एक बछर म एकेच बार लगथे। एकर कारन एकर आउ जादा महत्तम हाबय। छत्तीसगढ़ म मेला उहे लगथे जहां भगवान के प्रति विशेष महत्तम अस्थान हाबय। यानि के जिहां देवता विराजित है उहां बने भक्ति-भाव से चाहे ओ हा तीन दिन के मेला होवय, चाहे पांच दिन के, चाहे नव दिन के। जेतका दिन के मेला ओ गांव के लोगन मन निश्चित करे हाबय तकता दिन तक मेला ह भराथे। ये सब मेला म सिवनी(नैला) के संतोषी मेला के अलगेच अस्थान हाबय अउ शायद पूरा छत्तीसगढ़ म ये मेला ह अपन अलग रूप म पहिचाने जाथे काबर के ए मेला ह चैत नवरात्रि से सुरू हो के नवमीं तक रईथे। अउ माता संतोषी के विधि-विधान से पूजा पाठ करे जाथे। साथ ही मेला भराथे जेमा लोगन मन माता के दर्शन के बाद घूमे जाथे अउ अपन-अपन जरूरत के हिसाब से समान घलो लेथे। लोगन मन सादी-बिहाव के खरीददारी घलो इहां ले करथे। आनी-बानी के खाये के जिनीस जेमा छत्तीसगढ़ के परसिध उखरा-चना के संगे-संग चना चरपटी खाय के अगलेच मजा हावय। एखसंग झूला अउ टूरिंग टाकिज घलों मनोरंजन के साधन रईथे।
जिला मुख्यालय जांजगीर-चांपा ले मात्र 6 कि.मी. दुरिहा म नैला-बलउदा रद्दा के बीच म पड़़ते मॉं संतोषी के धाम सिवनी (नैला) मोर ममा दाई के गांव। जहां विराजे हे मॉं संतोषी। हिंदू नव बछर चैइत नवरात्रि म मोर जानत म छत्तीसगढ़ भर म केवल इहे के संतोषी मंदिर म नव दिन तक जोत जलथे अउ मेला भी भराथे अउ कुआंर नवरात्रि घलो म जोत जलथे। मॉं संतोषी के परति मनखेमन के मन म अपार आस्था हाबय। तभे तो इहां दूरिहा-दूरिहा ले मनखे मन अपन मनो कामना ले के आथे अउ ओमन के मनोकामना मॉं ह जरूर पूरा करथे मॉं संतोषी ह। भक्त मन भूईयां नापत इहां पहुंचते। पिछू पैतालीस बछर ले इहां मेला भरात आवथे। मंदिर के भीतर म मर्ॉ संतोषी के मूरती हावय अऊ ओखर चारो मुड़ा म नव दुर्गा के मूरती भी अस्थापित हाबय। मंदिर के दुआरी म बजरंग बली के मूरती हे अउ मंदिर के सामने म बिसालकाय कालभैरव जी के मूरती हावय।

प्रदीप कुमार राठौर ’अटल’
ब्लाक कालोनी जांजगीर
जिला-जांजगीर चांपा
(छत्तीसगढ़)