Tag: Rashmi Rameshwar Gupta

दुसर के दुख ला देख : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा ! दुसर के दुख ला देख रे! फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। काबर उमन कहय के दुसर के दुख ला देख। संगवारी हो ये दुनिया में भांति-भांति के मनखे हे। कोनो मन दुसर के दुख ला नई देखे सकय त कोनो मन दुसर के सुख ला नई देखे सकय यहू हर अड़बड़ सोचे के बात हरय।

तइहा के मनखे मन के मन में जम्मों जीव-जन्तु बर दया-मया राहय काबर कि उमन एक बात ला गठिया के धरे राहय कि जइसे हम करम करबो तेखर वइसे फल हमन ला खच्चित मिलही अउ एखरे सेती उमन दूसर के जीव ला सुख पहुॅचाय के उदिम करय जेखर से अपनो आत्मा ला सुख मिलय।

तइहा के मनखे मन धरम करम ला घलाव जिनगी के एक अहम हिस्सा मान के चलय। जघा-जघा रामायन अउ गीता, भागवत जइसे धरम ग्रन्थ के पाठ होते राहय जउन हर मनखे ला सोझ रद्दा में रेंगे के सीख देवय।

आखिर अब अइसे का हो गे कि हमन ला ये सुने बर मिलथे कि अब के मनखे न पाप ला डेरावय न पुन ला। संगवारी हो ये बात हर कोनो छोटे बात नो हय। हमन ला एखर उपर गंभीरता से विचार करना चाही के आखिर आज के मनखे अतेक निडर काबर हो गे कि वो हर पाप अउ पुन दुनो ल नई डेरावय अउ एखरे सेती आज के दुनिया में कोनो मनखे अपन आप ला सुरक्षित महसूस नई करय काबर कि वो हर जानत रहिथे कि कब काखर भीतर के शैतान जाग जाय अउ कब कोन कुकर्मी हो जाय तेकर कोनो भरोसा नई हे।

अब न कोनो लइका सुरक्षित हे, न जवान अउ न सियान। एक जमाना रहिस हे जब मनखे हर जंगल के जीव ला डेरावय। अब मनखे हर मनखे ला डेराथे यहू हर बड़ सोचे के बात हरय।

एक जमाना रहिस हावय जब हमर देस म दूध अउ दही के नदिया बोहावय। अब हमर राज म खाली नसा के नदिया बोहाथे। जउन चीज ला तइहा के मनखे बस्ती ले दुरिहा राखय तउन हर आज हमर बीच बजार म घर कर ले हावय। मंदिर ले जादा भीड़ अब हमन ला नसा के दुकान म देखे बर मिलथे। दुख तब होथे जब छोटे-छोटे उमर के लइकन मन ला ये दुकान में बेधड़क खड़े देखथन। आखिर हमर भविष्य के का होही तेखर पता नई हे। हमन अपन ऑखी ले अपने लइकन मन ला के भविष्य ला बरबाद होवत देखत हावन।

पहिली हमन रूख-राई के विनास करेन, अब रूख-राई लगावत हावन। पहिली हमन तरिया-नदिया ला पाट डारेन अब ओला जियाये खातिर ओखर सफाई में लगे हावन। पहिली हमन चिरइ-चुरगुन ला मार डारेन ओखर धियान नई करेन अब उमन ला बचाए खातिर भिड़े हावन। पहिली हमन गउ माता के घलाव धियान नई रखेन अब नकली दूध के जहर पिये बर हमन ला परत हावय। अतका होय के बावजूद आज हमन अपने ऑखी में छोटे-छोटे लइकन मन ला नसा के रद़दा में रेगत देखत हावन बीच बजार में नसा के दुकान ला चमकत देखत हावन। जब हमरे जनमाय लइकन मन हमरे बर टंगिया उबाही तब हमन ला कोन बचाही एखर चिंता अभी हमन ला नई घेरे हावय। कभू-कभू लगथे के दुनिया हर आगे जावत हे कि पीछू तेखर पता नई हे या फेर हमन जान-बूझ के अनजान बने के कोशिश करथन।

आजकल हमन ला दुसर के दुख-पीरा हर कमती जनाथे तभे तो हमन देरी ले जागथन। गोस्वामी तुलसी दास हर रामायण में लिखे हावय-
का वर्षा तब कृषि सुखानी। समय चूक पुनि का पछतानी।।

हमन अपन भाखा म कहिथन के पूरा आय ले पार बांधे के कोनो मतलब नई होवय। समय रहिते हमन ला जागे बर परही नही तो जइसे हमन करबो तेखर फल ला तो भोगे बर परबेच करही एखरे सेती हमन ला दुसर के दुख ला देख के ओला दुरिहा करे के प्रयास करना चाही जेखर से हमर जीवन सुखी हो सकय। जब तक कोनो एक जीव हमर आगू म दुखी हावय हमन ला संपूर्ण सुख नई मिल सकय। सियान बिना धियान नई होवय। तभे तो उॅखर सीख ला गठिया के धरे म ही भलाई हावय। सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हावय।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता
बिलासपुर

आगे चुनई तिहार

तैं मोला वोट भर दे दे,
मैं तोला सब देहुँ..
एक माँगबे, चार देहुँ,
साल में बहत्तर हजार देहुँ,
खाये बर चाउर देहु,
पिये बर दारू देहुँ,
चौबीस घंटा बिजली देहुँ,
फूल माँगबे तितली देहुँ
तैं मोला वोट भर दे दे,
मैं तोला सब देहुँ,
रेंगे बर सड़क देहुँ,
जेला कहिबे,हड़क देहुँ,
रहे बर घर- दुवारी देहुँ,
नरवा,गरूवा,घुरुवा,बारी देहुँ,
बोए बर बीजा देहुँ,
बिन पढ़े नतीजा देहुँ,
भाई अउ भतीजा देहुँ,
सारा अउ जीजा देहुँ,
तै मोला वोट भर दे दे,
मैं तोला सब देहुँ….
धीरज भर धरे रहिबे,
पांच साल खड़े रहिबे,
मांगत मोर दुआरी मा,
पाँच साल बाद आबे,
बाबू तै चिन्हारी मा,
रोटी माँगबे, जेल देहुँ,
जघा हेल मेल देहुँ,
तै मोला वोट भर दे दे,
मैं तोला सब देहुँ…….

रश्मि रामेश्वर गुप्ता
बिलासपुर

नवा चाउर के चीला अउ पताल के चटनी

सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा ? नवा चाउर के चीला अउ पताल के चटनी अबड़ मिठाथे रे। फेर हमन नई मानन। संगवारी हो हमर छत्तीसगढ़ राज ला बने 18 बछर हो गे। ए 18 बछर में हमर छत्तीसगढ़ हर बहुत आगू बढ़िस। हमर छत्तीगढ़ में नवा-नवा उद्योग-धंधा खुल गे, नवा-नवा सड़क बनगे, बिजली के उत्पादन में हमन अगुवा गेन, हमर लोक कला अउ संस्कृति घलाव अगुवाइस फेर हमर छत्तीसगढ़ी पकवान हर खुल के हमर छत्तीसगढ़ के बजार म नई आइस ए हर हमर बर अड़बड़ सोचे के बात हरय।
हमन पूस पुन्नी के दिन छेरछेरा तिहार मनाथन। ए दिन हमन अपन कोठी म आए नवा धान के उमंग अउ उछाह के संग पहिली दान करथन तेखर बाद ए धान के उपयोग अपन घर म खाए बर करथन।

जइसे हमर छत्तीसगढ़ के बजार में नवा चाउर उतरथे वइसने घरों-घर चीला अउ पताल के चटनी के दौर शुरू होथे। चीला के बनत ले चुल्हा के तीर म बइठ के आगी तापे के घलाव अलगे आनंद हावै अउ चीला में अतेक भारी गुन हावै के कतको खावव अउ खाएच के मन चलथे। खवइया हर तो कूद-कूद के खाथे फेर बनइया हर बना-बना के असकिटिया जाथे। फेर दूसर दिन घलाव बिहनिया होते साथ चीला के मांग शूरू होय ले पूरा करे बर परबेच करथे काबर के स्वाद के चलते मन नई मानय। हमन जब नान्हे नान्हे रहेन तब हमर महतारी हर कहय। ए चीला बनाए बर बइठबे तहॉ मांग बढ़ते जाथे कभू खतम नई होवय। अतेक मिठाथे चीला अउ पताल के चटनी।
हमर मन म सोंच आथे के काश हमर छत्तीसगढ़ के भाई बहिनी मन डोसा बनाए के जघा म चीला बना के बेचय तब हमू मन ला जघा-जघा चीला के मजा उड़ाय बर मिल जातिस अउ बाहिर ले आए मनखे मन घलाव चीला के महत्तम ला जान लेतिन फेर उमन अपन राज में जा के घलाव चीला के दुकान खोल लेतिन।

अगर हमर सोच हर बजार म उतर जातिस तब कतका अच्छा होतिस। वो दृश्य हर हमर ऑखी म घुमरत हावय के हमर छत्तीसगढ़ में जघा-जघा चीला अउ पताल के चटनी बेचावत हवय अउ जम्मों मनखे मन स्वाद ले के खावत अउ सहिरावत हवय।
अइसे बात नई हे कि नवा चाउर के केवल चीला भर बनथे। फरा अउ पताल के चटनी, तिलगुझिया अउ पताल के चटनी, पीठिया अउ पताल के चटनी, चौसेला अउ पताल के चटनी, चनौरी अउ पताल के चटनी, धुस्का अउ पताल के चटनी…… का पूछना हे फेर। मीठा बनाना हे लो गुलगुला अउ पताल के चटनी फेर एक बात हे कि पताल के चटनी बिना मजा नई आवय। अगर पताल के चटनी नई लेना हे तब अथान अउ नुनचरा ले काम चलाए जा सकथे अउ मजा उड़ाए जा सकथे। तब छत्तीसगढ़ के जम्मों भाई अउ बहिनी मन भिड़ जावव नवा चाउर के चीला अउ पताल के चटनी बनाए बर खाए बर अउ खवाय बर। अउ वहू म चिरपोटी पताल के अगर चटनी होगे तब तो अउ का कहना, का पूछना।
गढ कलेवा के नाम से हमर भाई बहिनी मन छत्तीसगढ के पकवान ला बजार म लाए के जउन प्रयास करे हावय वो हर बहुत ही सराहनीय हावय अउ उॅखर हमन ला सम्मान करके छत्तीसगढी पकवान के आनंद लेना चाही।
सियान बिना धियान नई होवय तभे तो उॅखर सीख ला गठिया के धरे म ही भलाई हावय। सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हावय।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता

सियान मन के सीख : ए जिनगी के का भरोसा

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। तइहा के सियान मन कहय-बेटा! ए जिनगी के का भरोसा रे। फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। लइकई उमर से ले के सियानी अवस्था तक मनखे के रूप रंग हर अतेक बदलथे जेखर कल्पना नई करे जा सकय। केवल रूप रंग भर बदलथे अइसे नई हे समय हर घलाव बदलत रहिथे अउ समय के अनुसार हमर बानी बिचार हर घलाव बदलत रहिथे।
अइसे मा कहे जा सकथे के समय के घलाव कोनो भरोसा नई हे। फेर हमर सियान मन कहिथे जिनगी के का भरोसा उॅखर कहना सही हरय काबर के समय तो अपन गति ले चलते रही फेर हमन समय के संगे-संग चले सकबो के नहीं तेखर कोनो भरोसा नई हे। जब लइकई उमर रहिथे तब समझ नई रहय, जब खून गरम रहिथे तब होश नई रहय अउ जब सियानी अवस्था आथे तब शरीर में ताकत नई रहय यहू हर अड़बड़ सोचे के बात हरय।
जउन घड़ी म हमर तन म सोंच, समझ अउ ताकत तीनो रइथे तउन घड़ी के हमन ला सदुपयोग कर लेना चाही काबर के मानुष तन अनमोल हावय अउ ए अवसर हमन ला बार-बार मिलय अइसे घलाव जरूरी नई हे। बेरा हर कोनो ला नई अगोरय। हमीं मन ला बेरा ला अगोरे बर पर परथे।
आज हमर तिर जतेक ताकत हावय तेखर उपयोग हम आजे कर सकत हन। अगर आज हम ए ताकत के उपयोग नई करबो तब ए हर बेकार हो जाही अउ ए ताकत के उपयोग हम कल नई करे सकन यहू हर अड़बड़ सोचे के बात हरय। बीते समय फेर लहुट के नई आवय यहू हर खच्चित बात आय तब हमन ला अपन जिनगी के हर एक पल के सहीं उपयोग कर लेना चाही जब तक हमर हाथ-गोड़ चलत हे तब तक।
हमन अपन शरीर के कतको जतन करन फेर एक न एक दिन ए तन हर अपन ताकत ला खो दिही। सब दिन जांगर एक बरोबर नई चलय। देखते-देखत उमर पहा जाथे, पते नई चलय के कब सियानी अवस्था आ गे। अब तो मनखे के उमर घलाव घटत जात हवै। तइहा के सियान मन 100 बछर तक सुखी जीवन जी लेवत रहिन हे। अब तो चालीस पार करे के बाद सोचे ला परत हे के हमन स्वस्थ हावन के नहीं। ए जम्मों बात के एके अर्थ होथे के जिनगी के कोनो भरोसा नई हे। एखरे सेती हमन ला जियत भर अपन जिनगी ला भरपूर जिये के प्रयास करना चाही। सियान बिना धियान नई होवय। तभे तो उॅखर सीख ला गठिया के धरे म ही भलाई हे। सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता

दुसरो के बाढ़ ला देखना चाही : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे।संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा! परेवा कस केवल अपनेच बाढ़ ला नई देखना चाही रे दुसरो के बाढ़ ला देख के खुश होना चाही। फेर हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। ए दुनिया में अइसे बहुत कम मनखे हावय जउन मन ला दूसर के तरक्की बर्दाश्त होथे। देखे जाय तो हमन सहीं मनखे के अउ सहीं काम के जतका विरोध करथन ओतके विरोध कहूं गलत मनखे के अउ गलत काम के करन तब तो ये धरती स्वर्ग बन जाय फेर गलत काम के विरोध करे के ताकत हर आदमी में नई होवय अउ अच्छा काम करना अतेक सरल घलाव नई होवय।
अगर हमर मन में अइसे विचार हावय कि मैं देश अउ दुनिया बर कुछ बढ़िया काम करंव तब हमन ला हर विरोध के सामना करे बर अपन आप ला सहर्ष तैयार कर लेना चाही अउ फेर हमर रद्दा मे कतको बाधा आवय हमन ला कभू हार मान के पाछू नई हटना चाही। हमर भारत देश के अनमोल रतन भूतपूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न, प्रखरवक्ता, राजनीति के अजातशत्रु, लोकप्रिय जननायक, महाकवि, विद्वान, विराट व्यक्तित्व, राजनीति के पुरोधा, भारतमाता के दुलरवा बेटा माननीय अटल बिहारी बाजपेयी के जीवन हर हमन ला बहुत बडे़ सीख देथे के जिनगी हर खाली आगू बढे़ बर नई मिले हे बल्कि खुद आगू बढ़के लोगन ला आगू बढ़ाए बर मिले हे। जइसे नींद में लीन मनखे हर कोनो दूसर ला नई जगा सकय।
दूसर ला जगाय के पहिली हमन ला खुद जागे बर परथे। वइसने हमन ला दूसर ला आगू बढ़ाए खातिर आगू बढ़के आए ला परही तभे हमर जिनगी हर सार्थक होही अउह मन भारतमाता के संतान कहे के असली हकदार होबोन। अपन जिनगी में हर अच्छाई के सम्मान करना अउ हरेक बुराई के त्याग करना सबके बस के बात नई होवय। मॉ भारती के सेवा में अपन जिनगी के हर पल समर्पित कर देना सबके बस के बात नई होवय। दुनिया में सबले कठिन काम होथे सेवा करना अउ हमन काखर सेवा करतहन यहू बात हर हमर जिनगी ला बनाथे घलाव अउ बिगाड़थे घलाव।
हमर देश अउ दुनिया ला नवा आयाम देवइया, हमर छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण करइया, हमर छत्तीसगढ़ राज्य में एनटीपीसी सीपत, कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता वि.वि., सुन्दरलाल शर्मा ओपन युनिवर्सिटी, बिलासपुर से अंबिकापुर तक रेल लाईन, रायपुर के बूढ़ातलाब में स्वामी विवेकानंद के प्रतिमा के अनावरण, अउ अपन मन वचन अउ कर्म से देश सेवा अउ देश प्रेम के संदेश देवइया जन-जन के लोकप्रिय व्यक्तित्व के धनी, माननीय अटल बिहारी बाजपेयी के नाम अउ काम जेखर विरोधी घलाव नतमस्तक होवय अपन यही स्वभाव के कारन अजर-अमर होगे काबर कि जिनगी भर उमन केवल अपने बाढ़ ला नई देखिन बल्कि सदा देश अउ दुनिया के विकास के सपना देखिन अउ वो सपना ला साकार करे खातिर अपन तन मन धन सबकुछ अरपन कर दिहिन। भारत माता के अइसे महान सपूत ला संपुर्ण भारतदेश के भावपूर्ण श्रद्धांजली अउ कोटि-कोटि नमन।
-<strong>रश्मि रामेश्वर गुप्ता</strong>
बिलासपुर

सियान मन के सीख: कथा आवय ना कंथली

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन अपन घर अउ पारा परोस के जम्मों लइकन मन ला एक जघा सकेल लेवय अउ जहॉ संझा होवय तहॉ कथा कहानी के दौर शुरू हो जावत रहिस हावय फेर शुरूवात कतका सरल तरीका ले होवय यहू हर अड़बड़ सोचे के बात हरै। घर में रांधे-पसाय के बुता घर के बहुरिया मन करय अउ दार-भात के चुरत ले कथा-कहानी कहे के बुता घर के बूढ़ी दाई, बबा नई तो फुफू दाई के राहय। कहानी के शुरूवात होवय-का बतावंव बेटा! कथा आवय न कंथली। जरै पेट के अंथली।। फेर धीरे ले कहानी के आरंभ होवय-“एक समय के बात रहिस हावय।“
जइसे ये लाइन हर कान में जावय जम्मों लइकन मन के संग में जम्मों सुनइया मन के कान हर खडे़ हो जावत रहिस हावय अउ धीरे-धीरे कहानी म अइसे रम जावत रहिन हावय के कब जेवन बन जावय अउ कब कहानी खतम हो जावय तेखर गम नई मिलय। कहानी के अंत होवय-“दार-भात चुरगे। मोर किस्सा पुर गे“ ले। अतका सुन के जम्मों लइकन मन खाय-पिये बर दउड़य। अउ खाय-पिये के बाद दसना में परे के बाद शुरू होवय सुने कहानी ला गुने के दौर। सुने कहानी के बारे में सोंचत-सोंचत कब नींद आ जावय पते नई चलय अउ नींद तब खुलय जब बिहनिया कुकरा बासय।
कतेक सुग्धर दिन रहिस हावय अउ कतेक सुग्धर रात। न कोनो चिंता न फिकर। लइकन मन ला नवा-नवा बात सिखाए के कतेक सुग्घर मनोवैज्ञानिक तरीका। फेर संगवारी हो आज घलाव सियान मन के बोली-बात हर अंतस म बसे हावय। अतेक दिन होगे विज्ञान हर अतेक तरक्की कर डारिस फेर सियान मन के कोनो बात हर गलत साबित नई होय हावय। अंत में हमन ला उॅखरे बात में लहुट के आयेच बर परथे। 31 जुलाई के दिन हमर देश के महान कहानी साहित्य के कल्पतरू अउ उपन्यास साहित्य के सम्राट मुंशी प्रेमचंद के जयंती के अवसर में उनला कोटि-कोटि नमन हावय जिंखर कहानी हर आज घलाव हमर मन के किताब में अंकित हावय। उॅखर कहानी में वो जादू हावय कि जउन एक बार मन लगाके पढ़ लिस या सुन लिय वो हर कभू भूला नई पावय।




सन् 1880 में काशी के जिला के लमही गॉव में जनमें मुशी प्रेमचंद के असली नाम धनपतराय रहिस हावय जउन कि उर्दु में नवाबराय अउ हिन्दी में प्रेमचंद के नाम से लिखत रहिन हावय। उॅखर लगभग 300 कहानी मानसरोवर नाम से आठ भाग में प्रकाशित होय रहिस हावय। बड़े भाई साहब, नमक का दरोगा, पूस की रात, पंच परमेश्वर जइसे कहानी आज घलाव हमर मन में समाय हावय। मुंशी प्रेमचंद के आरंभिक शिक्षा कांशी म होय रहिस हावय। मेट्रिक पास करे के बाद स्कूल में अध्यापक के पद में कार्यरत रहिन हावय फेर इलाहाबाद ले ट्रेनिंग ले के बाद सबइंस्पेक्टर के पद में रहिन हावय।
सन् 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ले प्रभावित होके सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिहिन अउ आजीवन स्वतंत्र लेखन करे लगिन। मुंशी प्रेमचंद के भाषा सहज सरल अउ सुबोध होय के सेती हमर अंतस मा समा जाथे। लोक जन-जीवन के दुख अउ पीरा ला उकेरे बर वो दुख अउ पीरा ला महसूस करे बर परथे। अपन पीरा ला तो सबे समझथे फेर जउन मन दूसर के पीरा ला समझथे अउ वो पीरा ला दुरिहा करे के उधिम करथे वास्तव में वही महामानव होथे। मात्र 56 बछर के उमर में सन् 1936 में महामना मुंशी प्रेमचंद महान कथाकार के स्वर्गवास होगे। आज उमन तो हमर बीच नई हे फेर उॅखर कथा कहानी उॅखर महामानव होय के आज घलाव सुरता देवाथे। उॅखर जयंती के अवसर में उनला शत् शत् नमन।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता
बिलासपुर

रमजान अउ पुरूषोत्तम के महीना : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने म ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन कहय-बेटा ! अधिक मास के हमर जिनगी म भारी महत्तम हावय रे ! फेर संगवारी हो हमन उॅखर बात ला बने ढंग ले समझ नई पाएन। हमन नानपन ले सुनत आवत हन-“हिन्दु मुस्लिम सिख इसाई, आपस में सब भाई-भाई।” हमर भारत देस के यही विशेषता हवय कि इंहा अनेकता में एकता के वास हावय। इंहा भांति-भांति के धर्म, रीति-रिवाज अउ संस्कृति के मेल हावय एखरे सेती हमर भारत जइसे देस पूरा विश्व मे अउ कोनो दूसर नई हे। इहां मंदिर हे ,मस्जिद हे, गुरूद्वारा हे अउ गिरिजाघर हे। इहां गंगा, यमुना, कृष्णा अउ कावेरी जइसे नदिया हावय त हिमालय जइसे पर्वत घलाव हावय जउन हर हमर भारत भुइंया के रक्षा करथे। इंहा के मनखे जतके नरम अउ सरल हृदय के हावय ,बैरी अउ दुश्मन मन बर ओतके कठोर घलाव हावय। हमर भारत भुइंया में जनम लेहे बर देवता मन घलाव तरसथे अइसे पावन भुइयां के हम रहवासी आन। बेरा-बेरा में दुनिया के मनखे मन हमर एकता अउ अखंडता ला परखे के कोशिस करथें फेर हमन उमन ला देखा देथन के हमर एकता अउ अखंडता रूई के गोला नोहय जउन हर फूंके म उड़ा जाही।
पूरा सीख ल भास्‍कर म इहां ले पढ़व

रश्मि रामेश्वर गुप्ता, बिलासपुर

नंदावत हे रूख-राई : सियान मन के सीख

सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हे। संगवारी हो तइहा के सियान मन बने-बने स्वादिश्ट फल के बीजा ला जतन के धरे राहय। उॅखर पेटी या संदूक ला खोले ले रिकिम-रिकिम के बीजा मिल जावत रहिस हे। जब हमन छोटे-छोटे रहेन तब हमर दाई-बबा के संदूक ले कागज के पुड़िया में रखे कोहड़ा, रखिया, तुमा, छीताफल अउ कई परकार के बीजा मिल जावत रहिस हे। देख के बड़ अचरज होवय के दाई-बबा मन बीजा ला अतेक सम्हाल के काबर धरे हावय। पूछन तब बतावय। कहय-बेटी! जब पानी गिरही ना तब एला बो देबो। बने-बने बीजा मन ला सम्हाल के रखना चाही। उॅखर रूख-राई के प्रति समर्पण अतका राहय के जब बर-बिहाव के सीजन आवय तब उमन रूख-राई के घलाव बिहाव करै। हमर बबा के जब बिहाव होइस तब घर ले अड़बड़ दुरिहा में आन कोनो के ब्यारा में हमर आजा बबा के हाॅथ के लगाए आमा के रूख के बिहाव करे गै रहिस हावय। पाछू फेर एक ठन नियम आइस के जेखर जमीन रही रूख हर ओखरे कहे जाही। तभो ले वो ब्यारा वाले हर टुकना भर आमा हर साल हमर घर मा अमरा देवत रहिस हावय।




नान्हे राहन तब हर साल आमा बगइचा घूमे बर जावन अउ अपन आखी के सामने रखवार करा आमा तोड़वा के टुकना-टुकना आमा घर लावत रहेन अउ अचार बनवावत रहेन। हमर महतारी हर पहली फर आय कहिके पारा-मुहल्ला के जम्मों घर में पहली बांट लय तेखर पाछू अपन उपयोग में लावय। तइहा के सियान मन के बगइचा राहय। हमर घर ले अड़बड़ दुरिहा में हमर छीता बगइचा घलाव रहिस हावय। जब तक हमर दाई-बबा रहिस हावय तब तक ओखर देख-रेख होइस ओखर बाद जम्मों रूख-राई मन रखवार के होगे। नौकरी-चाकरी में बाहिर निकरे के बाद कोनो ला बगइचा डाहर जायके फुरसत नई मिलिस अउ जरूरत घलाव महसूस नई होइस। तइहा के मनखे मन रूख-राई ला अपन घर के सदस्य बरोबर मान देवय। अब तो कई ठन रूख-राई के पते नई चलय। जब हमन छोटे-छोटे राहन तब दोना में शहतूत बेचावय तेला भूसा कीरा आय कहिके डेरावन फेर ओखर स्वाद ला पाए के बाद आज तक नई भुला पाएन फेर हमर लइकन मन तो शहतूत का होथे तेला जानय घलाव नही। तेंदू, चार मन तो अब अमरा मोल पिपरा जरी हो गे हावय।




रामफल अब तो कभू-कभू देखे बर अउ खाय बर मिलथे। अब मन में विचार आथे कि हमन काबर इंखर बीजा ला सहेज के नई्र धरेन। कमरस के फल अब नोहर होगे। आलू बुखारा घलाव बजार में कम देखे बर मिलथे। किन्नी, फालसा, कोइया, मकोइया, डूमर, कदम, बनबोइर, गंगा अमली, कैथा श्री आवला, चिरइजाम ए जम्मों फल में कखरो तो दरसने नई होवय त कखरो बहुत कम दरसन होथे। आनी-बानी के इंजेक्शन वाले फल-फूल तो बजार में अड़बड़ मिलथे जइसे बिना बीजा वाले अंगूर, पपीता, फेर हमर देसी फल-फूल मन कहां चल दिस तेखर पता हमनला लगाए बर परही। जइसे हमरे गांव, हमरे घर, हमरे देस ला सफा राखे बर सफाई अभियान चलाए बर परत हे वइसने का रूख-राई के प्रजाती ला बचाए बर घलाव हमनला कोनो अभियान चलाए के जरूरत हावय के नही यहू हर हमर बर अड़बड़ सोचे के बात हरै। सियान बिना धियान नई होवय। तभे तो उॅखर सीख ला गठिया के धरे मा ही भलाई हावै। सियान मन के सीख ला माने मा ही भलाई हावै।

रश्मि रामेश्वर गुप्ता



किताब कोठी : सियान मन के सीख

भूमिका

रश्मि रामेश्वर गुप्ता के “सियान मन के सीख” म हमर लोकज्ञान संघराए हे। ऋषि-मुनि के परंपरा वेद आए अउ ओखर पहिली अउ संगे-संग चलइया ग्यान के गोठ-बात सियान मन के सीख आए। हमर लोकसाहित्य अउ लोकसंस्कृति म ए गोठ समाए हे। कबीरदास जी लिखे हें- तुम कहियत हौ कागद लेखि, मैं कहियत हों ऑखिन देखि। “सियान मन के सीख” कागद लेखि ले जादा ऑखिन देखि बात आए। जिनगी के पोथी आए “सियान मन के सीख” कमिया-किसान मन के गीता आए “सियान मन के सीख”।
रश्मि रामेश्वर गुप्ता घर-परिवार अउ समाज के सियानी गोठ ल सुनके अउ ओला सीखे के रूप मा गुन के जउन लेखनी चलाए हे, ओहर हमर संस्कृति के ढंग अउ जिनगी के रंग आए। आज नवा पीढी ल एखर जादा जरूरत हे। नीति अठ धरम के गोठ-बात तभे बने लागथे जब ओखर जरी ह भुइयाँ ले जुडे रहिथे। रश्मि रामेश्वर गुप्ता ह ए लोकज्ञान ल साहित्यिक सरूप दे के सहराए के लटक काज करे हे।
मैं रश्मि के लिखाई-पढाई अउ ओखर छत्तीसगढी बेटी के रूप मा सेवा-साधना ल देखत दैनिक भास्कर मा उनकर छत्तीसगढी लेख छपते रहिथे। ओमा आगू बढे़ के जउन गुन हावै, ओहर अउ उजराही अउ छत्तीसगढी साहित्य ल पोठ करही, मोला लागथे। हर वो नवा पीढी ल जउन छत्तीसगढी ल ‘फैशन’ के रूप मा नई, ‘संभावना’ देख के नई, भलुक अपन अंतस के धुन सुन के लिखे के उदिम करथें, मोर पूरा सहयोग उनकर बर रइही। जय जोहार, जय छत्तीसगढ़।

विनय कुमार पाठक
सी-62, अज्ञेय नगर, बिलासपुर (छ.ग.)




जम्मों संगवारी मन ला राम-राम!
जय-जोहार !

संगवारी हो ए किताब “सियान मन के सीख” जउन ला मैं आप मन के सामने अपन लेखनी के माध्यम से रखत एखर एक-एक आखर मा मैं अपन अंतस के मया अउ पिरीत ला संजोय । एखर एक-एक आखर मा सहयोग हावय मोर बिंदी अउ सिंदूर श्री रामेश्वर प्रसाद गुप्ता के जिंखर बिना मोर लेखनी अधूरा हावय। एखर संगे-संग मोर करेजा के टुका राजर्षि कान्तम् गुप्ता अउ ऋषिका गुप्ता के घलाव भरपूर सहयोग हवै । इन तीनों के अगर मोला सहयोग नई मिलतिस तब ए सियान मन के सीख हर मोर मन मा उपजबे नई करतिस एखर संगे–संग मैं अपन पूज्यनीय ससुरजी स्व. श्री कामता प्रसाद गुप्ता अउ पूज्यनीया सासू मॉ श्री मती पुनिया गुप्ता के चरन-कमल मा कोटि-कोटि नमन करके अपन श्रद्धा-सुमन अरपित करत काबर के एक बेटी के जिनगी मा जतका महत्तम दाई-ददा के होथे ओतके महत्तम सास अउ ससुर के घलाव होथे। मोर जबर बड़ भाग आय के मोला दाई-ददा के मया मा अउ सास.ससुर के मया मा थोरको फरक नई जनाइस | संगवारी हो सियान मन के हमर जिनगी मा अड़बड महत्तम होथे। इंखर गोठ–बात हर हमर जिनगी ला संवार देथे। जिखर जिनगी हर सियान मन के आसीरबाद के छइंहा मा फरथे-फूलथे उमन अड्बडड भागमानी होथे। संगवारी हो मैं हर ए किताब ला समर्पित करत मोर बुढा बबा स्व. श्री चंद्र साहेब गुप्ता अउ बूढी दाई स्व. श्रीमती बिंन्दा गुप्ता के संगे–संग मोर जनम देवइया दाई-ददा देवी स्वरूपा स्व. श्रीमती प्रकाशा गुप्ता अउ देव स्वरूप स्व. श्री उद्धभव साहेब गुप्ता के चरन-कमल मा काबर के इंखरे आसीरबाद से तो मैं ए दुनिया मा आए नई तो न मोला ए जिनगी मिलतिस न अपन अंतस के गोठ-बात ला लिखे बर बुद्धि अउ कलम। एखर संगे-संग मोर जिनगी में अवइया जम्मों सियान मन के चरन-कमल के मैं वंदना करत जिखर गोठ-बात ला मैं अपन लेखनी मा उतारे भगवान गणेश माता पारवती अउ पिता महादेव के संगे-संग मैं ए किताब के पढड्या जम्मों छोटे-बडे भाई-बहिनी मन से मैं विनती करत हँव के मोर छोटे-बडे भूल-चूक ला माफ करके मोला अपन स्नेह अउ आसीरबाद जरूर प्रदान करिहौ…

आप सब के स्नेहाकांक्षी

रश्मि रामेश्वर गुप्ता

अनुक्रमणिका




1. रूख-राई ला काटे ले अड्बड पाप होथे 27. घुरूवा के दिन घलाव बहुरथे
2. कुँआ-तरिया मा जलदेवती माता के निवास होथे 28. जम्मो जीव के दुख एक बरोबर होथे
3. धर-बाँध के भक्ति नइ होवय 29. पानी पियय छान के,गुरू बनावै जानके
4. जभे पेट भरथे तभे पुरखा तरथे 30. भगवान हर दीन–दुखी के रूप मा आथे
5. जंवारा बोए ले अन-धन बाढथे 31. दूर के सोच
6. हमर घर मा लक्ष्मी आही 32. दुनिया हर मेला तो आय
7. तुलसी के बिरवा मा अड्बड गुन 33. आगू दुख सहिले
8. भिनसरहा उठे मा हावय भलाई 34. चुप बरोबर सुख नहीं
9. दाई ददा के सेवा करे ले भगवान मिलथे 35. जिहाँ सब सियान तिहाँ मरे बिहान
10. अपन मरे बिना सरग नई दिखय 36. चोला माटी के हे राम
11. जइडसन बोबे तइसन तो लुबे 37. एक ठन दूबी के ताकत
12. जिनगी मा मया के रंग 38. बेटी बहू घर के लछमी होथे
13. मनखे के चिन्हारी दुख मा होथे 39. सुख-दुख के साथी मोर परसा पान
14. का जमाना आगे ? 40. दुब्बर बर दू अषाढ
15. पुन ला जोर-जोर के रखना चाही 41. दया-मया हर बजार मा नई मिलय
16. मेहनती मनखे ले बीमारी घलाव डेराथे 42. महादेव के महिमा अपरंपार हे
17. धीर मा खीर हे 43. पसहर चाउर के तिहार
18. मानुस तन अनमोल हे 44. महतारी अ महतारी भाखा
19. दुख अउ सच्चाई के भट्ठी मा तपथे मनखे 45. जियत मा मारे डंडा, मरे मा पहुँचाए गंगा
20. अक्कल बिना परान दुख 46. भुतवा हर दन्दोरथे भर, कुछु करय नही
21. रूख-राई मन हमार पुरखा आय 47. दाई अउ ददा बिसाए मा नई मिलय
22. बेटी माई मन के तिहार के महीना 48. रखिया बरी के अड्बड गुन
23. तीजा तप के तिहार आय 49. मकर संक्रान्ति के अड्बड महत्तम
24. आगे पूण्य कमाए के पितर पाख 50. करम हमर हाथ मा हावय
25. दाई महामाया के अवतार होथे 51. विचार के लहर
26. परबुधिया नई होना चाही





छत्तीसगढ़ी भाषा : समस्या अउ संभावना

छत्तीसगढ़ी भाषा के अपन अलग महत्तम हवय जइसे कि हर भाषा के होथे। छत्तीसगढ़ी भाषा में गोठियाय ले हमन ला अड़बड़ आनंद के अनुभव होथे काबर कि ये हर हमर माई भाखा आय। जब ले जनमें हावन ये भाखा हर तब ले हमर कान में घर कर ले हावय। अपन दाई-बबा के अउ महतारी-बाप के गोठ-बात ला हमन यही भाखा में सुने हावन। अपन अंतस के सुख अउ दुख ला हमन यही भाखा में बताथन तभे हमर जीव ला संतोष मिलथे फेर जइसे-जइसे हमन तरक्की करत जावत हावन हमन अपने भाखा ला नंदावत घलाव देखत हावन अउ कतको झन ला एखर प्रचार-प्रसार में लगे घलाव देखत हावन कुल मिलाके अइसे लागथे कि ए भाखा के नवा जनम होवत हावय। हमन अपन लइकन मन ला इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेज के अइसे लगथे कि अपने बोली भाखा ले दुरिहा कर डारेन का ? कोनो दूसर बोली-भाखा ला बोले में, सीखे में कोनो बुराई नई हे फेर अपन बोली-भाखा ला बिसराए ले अड़बड़ नुकसान उठाए बर परथे ये बात हर खच्चित आय। अइसे लागथे के हमर छत्तीसगढ़ी भाषा हर संक्रमण काल ले गुजरत हावय। एक डाहर हमर बोली-भाखा के रद्दा में अड़बड़ अकन समस्या हावय तो दूसर डाहर हमर भाखा के विकास ले हमर बर आगू बढे़ के अड़बड़ अकन संभावना घलाव हावय। ए दूनो के बारे में बिचार करना हमन ला बहुॅत जरूरी हावय-

समस्याः-हमर विचारक मन एखर उपर अड़बड़ विचार करथें कि छत्तीसगढ़ी भाषा के मानक रूप का होना चाही ? काबर कि छत्तीसगढ़ी भाषा के रूप हर लगभग हर जिला में अलग-अलग देखे बर मिलथे। ए बात हर जम्मों झन ला भरम में डार देहे हावय जबकि एमा समस्या वाले कोनो बात ही नई हे। ये तो छत्तीसगढ़ी भाषा के विशेषता होना चाही। एखर वर्ण ला लेके घलाव भरमाए मनखे मन कतको शब्द के रूप ला बदल के लिख देथे जइसे ज्ञान ला कोनो मन ग्यान तो कोनो मन गियान लिखथें जबकि अइसे होना नई चाही। हमन ला हिन्दी के जम्मों वर्णमाला में काट-छांट करके आदिकाल से चले आ रहे समृद्ध छत्तीसगढ़ी भाखा ला कुरूप बनाए के प्रयास नई करना चाही। छत्तीसगढ़ी भाषा हर तो आदिकाल से ही समृद्ध भाषा आय तभे तो एला आधार मानके हमर छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना करे गै हावय। दुनिया के अइसे कोन से भाषा हावय जेखर अनुवाद हमन छत्तीसगढ़ी भाषा में नई करे सकन यहू हर अड़बड़ सोंचे के बात हरै। अइसे कोन से भाषा हावय जेमा अउ कोनो दूसर भाषा के एको ठन शब्द नई समाय हे यहू हर हमर बर जबर विचार करे के बात आय।

संभावनाः- छत्तीसगढ़ी राज भाषा आयोग के गठन के मूल उद्देश्य हरै छत्तीसगढ़ी भाषा ला आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाना अउ एखर बर छत्तीसगढ़ी राज भाषा आयोग अड़बड़ अकन काम घलाव करत हावय फेर जउन दिन ए काम में हमन ला सफलता मिल जाही ओ दिन हमर छत्तीसगढ़ी भाषा के असली रंग-रूप हर देस अउ दुनिया के मानस पटल में अपन आन बान अउ शान से अंकित होही। हमर छत्तीसगढ़ के संपूर्ण विकास तभे संभव होही। भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रसिद्ध कविता मातृभाषा के प्रति में एक ठन दोहा हावय- निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत ना हिय को सूल।।

हमर छत्तीसगढ़ी लोक कला, संस्कृति, लोक व्यवहार,राज-काज अउ रोजगार, व्यापार, व्यंजन, खेल, रीति-रिवाज ला तभे पूरा सम्मान मिलही जब हमन अपन भाषा ला ओखर पूरा मान-सम्मान ला देवाबो नई तो अधकचरा ज्ञान के कोनो मेर सम्मान कभू नई होवय। हमर छत्तीसगढ़ के मनखे के मान अउ प्रतिष्ठा सबके लिये जरूरी हावय के हम अपन भाषा ला ओखर पूरा मान सम्मान देवावन नई तो जब तक हमन ए बुता ला नई करबो हमन आन कोनो के ऑखी ले देखबो अउ आन कोनो के कान ले सुनबो हमर माई भाखा के विकास हर सीधा हमर छत्तीसगढ़ के मूल निवासी जनता के आर्थिक, मानसिक अउ शारीरिक विकास ले जुडे़ हावय। हमर छत्तीसगढ़ के सर्वांगीण विकास तभे होही जब हमर माई भाखा ला आठवीं अनुसूची में स्थान मिलही अउ ओखर पूरा मान-सम्मान मिलही। ए सब बात ला देखते हुए हमर छत्तीसगढ़ के अनवरत विकास के संभावना हमर छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास ले सीधा जुडे़ हावय यही एक बात हर सोला आना सहीं साबित होथे। अपन भाखा से ही उन्नति संभव हे काबर के यही सकल उन्नति के आधार आय।

जय हिंन्द जय भारत जय छत्तीसगढ़

रश्मि रामेश्वर गुप्ता
बिलासपुर, छत्तीसगढ़