Tag: Sadanandini Verma

लघु कथा – दरूहा

सुकलू ह तीस बछर के रहिस हे अउ ओकर टुरा मंगलू ह आठ बछर के रहिस हे,सुकलू ह आठ-पन्दरा दिन मं दारू पीयय,मंगलू करन गिलास अउ पानी ल मंगाववय त मंगलू ह झल्ला के काहय कि ददा मोला बिक्कट घुस्सा आथे तोर बर,तय दारू काबर पीथस गो,छोड़ देना।सुकलू ह काहय,दारू पीये ले थकासी ह भागथे रे,तेकर सेती पीथंव,मय ह दरूहा थोेड़े हरंव,कभू-कभू सुर ह लमथे त पी लेथंव,सियान सरीक मना करत हस मोला,जा भाग तय हर भंउरा-बाटी ल खेले बर,मोला पीयन धक।

दिन ह बिसरत गिस अउ मंगलू ह तेरह बछर के होगे रहिस,ददा ल देख-देख के मंगलू ह संगवारी-संगवारी पइसा ल बरार के दारू पीये बर सीखगे अउ ये दारू के लत ह अइसे लगिस कि दिनों-दिन धान कस बाढ़ी बाढ़त गिस,अब मंगलू ह बाइस बछर के होगे अउ दरूहा नम्बर वन तको काहय बर धर लिस काबर कि गांव मं ओकर असन दारू कोनो नइ पीयत रहिस,कोन डबरा,कोन खोचका,काकर दुवारी,काकर बियारा मं पड़े सुते राहय तेकर कोनो पता नइ राहय,सुकलू ह मंगलू ल धर-धर के घर लावय अउ काहय,अतेक काबर पीथस बेटा,होश घलो नइ राहय।मंगलू ह काहय कि तय होथस कोन मोला झन पीये कर कहिके कहने वाला,महूं काहत रहेंव त तय मानत रहेस का।सुकलू करन कोनो जवाब नइ राहय।दारू पीयई के मारे मंगलू के शरीर ह फोकला परगे अउ एक दिन अइसे अइच कि भरे जवानी मं ओकर परान ह निकलगे।

आज सुकलू ह मुड़ ल धर के रोवत हे अउ सोचत हे कि मय ह दारू नइ पीतेंव त मोर बेटा ह दरूहा नइ होतिच,दारू के रस्ता ल बता के ओला मौत के कुआं मं ढकेल देंव,अब पछताय ले का होही,जब तन के पंछी ह उड़गे।

सदानंदनी वर्मा
ग्राम-रिंगनी {सिमगा}
जिला-बलौदाबाजार{छ.ग.}
मोबाइल-7898808253

नान्हें कहिनी : तीजा के लुगरा

सुकलू के एकेच झन बहिनी रहिस सुखिया।तीजा-पोरा आवय त रद्दा जोहत राहय कि मोर भइया ह मोला लेगे बर कब आही,फेर सुखिया के भउजी ह सुकलू ल पोरा के बाद भेजय सुखिया ल लाय बर।भउजी ह थोकिन कपटीन रहिस हे,सुखिया ल तीजा मं लुगरा देवय तेन निच्चट बिहतरा राहय,पहिरत नइ बनय तइसने ल देवय।एको साल बने लुगरा नइ देवत रहिस तभो ले सुखिया ह खुस राहय,कभू कुछु नइ काहत रहिस,खुसी-खुसी लुगरा ल पहिरय अउ बासी खावय।
गरमी के दिन मं सुखिया के ननंद के बिहाव रहिस त सुखिया के भउजी ह सुखिया के घर बिहाव माने बर आय रहिस।सुखिया के सास,काकी सास,बड़ी सास,मामी सास,फूफू सास,कका-बड़ा के ननंद मन सुखिया के भउजी ल अड़बड़ मया करय अउ काहय हमर सुखिया ल अड़बड़ मया करथस, मयारू भउजी हरव,कतेक सुघ्घर तीजा के लुगरा देथव सुखिया ल,तोर मया ह तीजा के लुगरा मं झलकथे।भउजी ह गुनय कि मोला ठेसरा देथे का कहिके काबर कि चेंदरा असन लुगरा ल देवय।फेर सबो झन के आंखी मं मया दिखय कोनो घिनहा नजर से नइ देखय त मने मन मं सोचे बर धरलिस कि का बात हो सकथे।कुरिया मं सुखिया अकेल्ला रहिस त भउजी ह पूछिस,सुखिया तोर ससुराल के मन ल तीजहा लुगरा ल देखाथस का,मोला ठेसरा मारथे का सबो झन।सुखिया ह कहिस,हव भउजी तीजाही लुगरा ल ससुराल के मन अउ हमर पारा के मन देखाय बर कहिथे त देखायच ल परथे,फेर रद्दा मं आवत-आवत मय लुगरा लेथंव तेन ल सबो झन ल देखाथंव काबर कि मइके के सनमान के सवाल हरे ओला माटी मं कइसे मिलाहूं,मइके के लाज रखना तो मोर धरम आय,अपन भउजी के चारी कइसे कराहूं।मोला लुगरा के कोनो लालच नइ हे भउजी,मोला पूछत हस,एक लोटा पानी देवत हस,संगी-जहूंरिया करन भेंट होवत हे उही मोर बर बहुतेच हे।भउजी के आंखी ले आंसू अइसे गिरत रहिस,जइसे मंउहा ह टप-टप टपकथे।
दिन ह बीतत गिस अउ फेर भादो के तीजा-पोरा आगे।भउजी ह पोरा के पहिली सुकलू ल भेज दिस सुखिया ल लाय बर।असो सुखिया ह मइके मं पोरा ल पटकिस अउ तीजा के दिन भउजी ह अड़बड़ सुघ्घर लुगरा दिस।सुखिया ह कहिस,भउजी लुगरा के मोला जरूरत नइ हे,मोर बर मइके के पसिया अमोल हे।भउजी ह कहिस,हव बहिनी ये ह लुगरा नोहय मोर परेम हरे,अतका दिन ले नइ जानत रहेंव परेम करे बर।भउजी के मया ल पाके आज सुखिया ल महतारी के सुरता आगे।तीजा के लुगरा ह लुगरा नोहय महतारी के मया हरे।

सदानंदनी वर्मा
ग्राम-रिंगनी (सिमगा)



दोखही के दुख (लघु कथा)

सुखिया के बिहाव ह जेन दिन लगिस उही दिन ले सुखिया के आंखी मं बिहाव के नेंग-जोंग ह आंखी-आंखी मं झूलत रहिस,कइसे मोर तेल चढ़ही, कइसे माइलोगिन मन सुघ्घर बिहाव गीत गाही, कइसे भांवर परही, कइसे मोर मांग ल मोर सइया ह भरही, तहान जिनगी भर ओकर हो जाहूं अउ ओकरे पाछू ल धर के ससुराल मं पांव ल रखहूं, सास-ससुर, जेठ-जेठानी, देवर- नंनद ह मोर सुवागत करही अउ नान-नान लइका मन ह भउजी, काकी, बड़े दाई, मामी कहिके मोला पुकारही अउ कइसे मोर मयारू ह मोला मया के बंधना मं बांधही।
बिहाव के दिन सुखिया के गांव मं बरात अइस, बरतिया ल परघा के जेवनास घर मं लेगिस।बरतिया परघइया मन ह सुखिया ल कहिस,दुलहा ह अड़बड़ सुघ्घर दिखत हे, तुहर जोड़ी ह श्रीराम अउ सीता कस फबे हे, सुखिया ह सुन के लजाय बर धरलिस। टिकावन-भांवर परे के बाद बिदा के बेरा सुखिया ह बहुतेच रोइस, दाई-ददा ह अपन छाती मं पथरा ल रखके नोनी के बिदा ल करिस। दुलहा-दुलहीन के संग मं सुवासा-सुवासिन मन घलो चारगोड़िया मं बइठिन अउ ससुराल डहार के रस्ता मं गाड़ी ह चले बर धरलिस। गाड़ी चलइया ह दारू ल बिक्कट अकन पिये रहिस, लड़बड़-लड़बड़ गाड़ी चलात रहिस अउ बीच रस्ता मं कार ह टरक मं झपागे अउ तुरते दुलहा ह सरग सिधारगे, दुलहीन ह दूरिहा मं फेंकागे अउ सुवासा-सुवासिन तको अनचेतहा होगे, डराइभर के घलो मुड़ी कुचरागे, फेर ओ हर जियत रहिस।
दुलहा के ठाठ ल लेके घर पहुंचिन तहान रोवा-राही परगे, दुलहा के दाई ह चिरइ कस पढ़-पढ़के रोवत रहिस, दोखही करन तोर बिहाव कर परेंव बाबू, तोर परान चल दिस मोर दुलरवा, मय का जानंव मोर ददा, बहुरिया दोखही निकलही कहिके, मोला छिमा करबे मोर मयारू, मय का-का सपना देखे रहेंव मोर सुरूज, मोर नाती ल मोर कोरा मं खेलाहूं काहत रहेंव ददा, ये दोखही ह मोर बाबू ल खा डरिस दाई,मोर हीरा कस बेटा, मय कंगालिन होंगेव मोर राजा। सबो मनखे ह दुलहीन ल कलजगरी कहे बर धरलिस।
दुलहीन बिचारी ह घलो रोवत रहिस फेर कुछु कहिके नइ रोवत रहिस,कभू अपन बांह भर चूड़ी ल देख के,कभू हाथ के मेंहदी ल देख के त कभू पांव के मांहूर ल देख के रोवत रहिस काबर कि अभी तो ओकर संइया ह ढंग से ओकर सिंगार ल नइ देखे रहिस अउ जिनगी भर बर ये सोहाग के चिनहा ल ओकर ले दूरिहा कर दिस, आंखी ले आंसू ह नदिया कस बोहावत रहिस, फेर कोनो ओला खंधा देवइया नइ रहिस, जेकर खंधा मं अपन मुड़ी ल रखके रो सकतिच।
मोर मन ह गुनत रहिस कि दोस तो गाड़ी चलइया के रहिस, जेन ह दारू के नसा मं गाड़ी ल टरक मं टकरा दिस, फेर दुलहीन ल काबर गुनहगारिन समझत रहिस, का दोखही के दुख ह ककरो आंखी मं नइ दिखत रहिस???

सदानंदनी वर्मा
रिंगनी (सिमगा) बलौदाबाजार
मोबाइल नम्बर-7898808253

छत्‍तीसगढ़ी लघु कथा : दांड़

सुन्ना घर पइस त सुकालू ह सुखिया के हाथ-बांह ल धर दिस। ये गोठ ह आगी सरीक गांव भर मं फइलगे, फेर का गांव मं पंचइत सकलइस, पंचइत मं पंच मन ह दुनों झिन ल पूछिस, अउ दुनों डहार के गोठ ल सुन के कहिस, सुकालू ल सुखिया करन बिहाव करे ल परही, सुकलु तंय हर तियार हस कि नइ बिहाव करे बर। सुकलू ह कहिस, मय तियार हंव। सुखिया ह चिहर के कहिस, मेहां ये दोखहा करन बिहाव नइ करंव जेन ल माईलोगिन के मान अउ सनमान के फिकर नइ हे, ओकर करन मय ह अपन जिनगी ल नइ बिता सकंव। पंचइत ह कहिस, बिहाव तो तोला करे बर परही, नइ करबे त ये गांव ल छोर के तोला जाय ल परही। सुखिया के आंखी ले आंसू ह नदिया कस बोहावत रहिस फेर कोनो ल कुछु फरक नइ परत रहिस।

मोला समझ मं नइ अइस कि पंचइत ह दांड़ सुकलू ल देवत रहिस कि सुखिया ल?

कु.सदानंदनी वर्मा
रिंगनी (सिमगा)
मो.नम्बर-7898808253


छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों में उच्‍चारण भेद के कारण कई अशुद्ध शब्‍द हमें शुद्ध प्रतीत होते हैं। इसको पीछे मुख्‍य कारण छत्‍तीसगढ़ी का मानकीकरण नहीं होना है। प्रस्‍तुत लघु कथा में प्रयुक्‍त शब्‍द ‘दांड़’ के बजाए ‘डांड़’ का प्रयोग ज्‍यादातर गांवों में होता है। छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों के छत्‍तीसगढ़ी करण के कारण ऐसे शब्‍द प्रचलन में आते हैं। प्रचलित छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों के छत्‍तीसगढ़ी करण का कोई औचित्‍य नहीं है, किन्‍तु शब्‍दों को और ठेठ बनाने या अपने आप को लोक के नजदीक ‘ठाढ़े’ रखने के लिए कुछेक लोगों (गांवों) के द्वारा उच्‍चारित ‘दांड़’ के बजाए ‘डांड़’ का प्रयोग किया जाना चाहिए। – संपादक

[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]




काकर लइका होइस – छत्‍तीसगढ़ी लघु कथा

सुखिया ह नवा-नवा बहू बनके आय रहिस। गांव के मन नवा बहूरिया ल देखे बर आवय त काहय,मनटोरा तय हर अपन सास-ससुर के एके झन बहू अउ तोर घलो एके झन टुरा,एक के एक्कइस होवय बहिनी, एक दरजन होवन देबे, झट कुन अपरेसन झन करवाबे। मनटोरा ह कहिस,नइ करवांवव बहिनी, महूं लउहा अपरेसन नइ करवाय हंव, मोर टुरा हर सतवासा हरे, छय झन टुरी के बाद होइस हे।




सुखिया ल सास-ससुर अउ ओकर मनखे हर अड़बड़ मया करय। दु बछर बीतिस तहां ले मया ह कमतियागे, आधा शीशी नइ होवत हे कीके मुँह ल फुलोय बर धरलिस।कोन डॉकटर, कोन बइगा, चारों मुड़ा घुमावय अउ अइसने करत-करत सात बछर ह बीतगे, फेर सुखिया के कोरा ह सुक्खा के सुक्खा।
मनटोरा ह एक झन घर कांके पानी पिये बर गिस त बुधिया ह पूछिस, कस मनटोरा तय हर कब कांके पानी पियाबे दई।मनटोरा कहिस,मोर कहां भाग बहिनी,कांके पानी पियाय के, हमर घर ठगड़ी के अब काय लइका होही।तहां सबो झन कहे बर धरलिस,अइ सिरतोन ताय मनटोरा,अब काय होही बंदवा के।ठगड़ी-बंदवा सुनत-सुनत सुखिया के कान पाक गे रहिस, कुरियां मं चिहर- चिहरके रोवय फेर ओकर आंखी के आंसू पोछइया कोनो नइ रहिस।मनखे घलो करू-करू गोठियावय।
सुखिया ह देवी-देवता करन अपन दुख ल गोहरावय अउ जगा-जगा बदना तको बदय। सूजी-पानी ह लगिस अउ नव बछर बाद मं सुखिया ह अड़बड़ पीरा मं टुरा ल होइस। फटाका फूटिस तहां ले गांव मं गोहार परगे, सुकलू के टुरा होइस हे। सबो झन के जबान ले इही निकलय सुकलू के टुरा होइस, कोनो नइ काहय कि सुखिया के टुरा होइस कीके।
मोर मन ह गुनय लइका नइ होवत रहिस त सुखिया के नाव होवय अउ लइका होइस त सुकलू के नाव होइस।

कु.सदानंदनी वर्मा
रिंगनी {सिमगा}
[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]


मोर मन के पीरा

का दुख ल बतावंव बहिनी,
मेहां बनगेंव गेरवा ओ।
जेने घुंटा मं बांधिस मोला,
उही मं बंधागेंव नेरवा ओ।

पढ़-लिख का करबे किके,
स्कूल मोला नइ भेजिस ओ।
टुरी अच चुल्हा फुंकबे किके,
अंतस ल मोर छेदिस ओ।
किसानी मं मोला रगड़दिस,
बुता मं सुखागे तेरवा ओ।
जेने खुंटा मं बांधिस मोला,
उही मं बंधागेंव नेरवा ओ।

चउदा बछर मं होगे बिहाव,
सास-ससुर के दुख पायेंव।
नइ जानेंव मनखे के मया,
मनखे के दुख ल भोगेंव।
संझा-बिहनिया पीके मारथे,
नोहय मनखे मोर मेड़वा ओ।
जेने खुंटा मं बांधिस मोला,
उही मं बंधागेंव नेरवा ओ।

सोला बछर मं होगेंव राड़ी,
दोखही मेहां कहायेंव ओ।
ससुरार ले निकाल दिस मोला,
मइके मं ठउर नइ पायेंव ओ।
जगा-जगा मं मोरेच निंदा,
जिनगी होगे करूवा ओ।
जेने घुंटा मं बांधिस मोला,
उही मं बंधागेव नेरवा ओ।

जुठा-टठिया मांज के बहिनी,
दू जुअर रोटी पायेंव ओ।
मालिक के नियत खोटहा होगे,
इज्जत मेहां गवायेंव ओ।
अतेक सुघ्घर तन ह मोर,
बनगे बहिनी घुरवा ओ।
पहाड़ असन जिनगी ल दीदी,
कइसे पहाहूं मय नेरवा ओ।

कु. सदानंदनी वर्मा
रिंगनी{सिमगा}
मो.न.-7898808253
[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]


मोर मन के बात

आज फेर तोर संग मुलाकात चाहत हंव,
उही भुइंया अउ उही बात चाहत हंव।
के बछर बाद मं फेर वो बेरा आही,
मोर जीत अउ तोर मात चाहत हंव।

मेहां बनहूं अर्जुन अउ तै हर करन,
तोर-मोर बीच रइही फेर इही परन।
अपन बाण तोला मारहूं या मेहां मरहूं,
छै के काम नइ हे,पांचे बाचही कुरू रन।

भीष्मपिता ल तको भसम मेहां करहूं,
द्रोणाचार्य के घलो आत्मा ल हरहूं।
जयद्रथ ह रतिहा के चंदा नइ देख सकय,
आज सुरूज डूबे के पहिली ओला छरहूं।

एक-एक झन करन में बदला लूहूं।
गिन-गिन के ओकर लहू ल पीहूं।
जेन-जेन चीर हरन के हाबय दोसी,
ओला सोहारी कस में तेल मं तरहूं।

हर जुग मं काबर हिरनी के शिकार,
मरद फिरत हे इहां बनके खुंखार।
दुर्योधन-दुशासन के करहूं संहार,
भीम सरीक गदा धर के होगेंव तियार।

कु. सदानंदनी वर्मा
रिंगनी (सिमगा)
मोबाइल नम्बर-7898808253
[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]


नवा बिहान

नवा बछर के नवा अंजोर,
थोकिन सुन गोठ ल मोर।
उही दिन होही नवा बिहान,
जेन दिन छूटही दारू तोर।

तोला कहिथे सब झन चोर,
कोठी के धान बेचे बर छोर।
उही दिन होही नवा बिहान,
जेन दिन छूटही दारू तोर।

जगा-जगा सुते दांत निपोर,
मांगथस तै चिंगरी के झोर।
उही दिन होही नवा बिहान,
जेन दिन छूटही दारू तोर।

बाई के झन मुड़ी ल फोर,
मया के माटी मं घर ल जोर।
उही दिन होही नवा बिहान,
जेन दिन छूटही दारू तोर।

लइका बर जहर झन घोर,
खेलय सुघ्घर गली-खोर।
उही दिन होही नवा बिहान,
जेन दिन छूटही दारू तोर।

सियान करन झन नाता टोर,
दाई-ददा के तै हाथ अउ गोर।
उही दिन होही नवा बिहान,
जेन दिन छूटही दारू तोर।

कु.सदानंदनी वर्मा
रिंगनी {सिमगा}
मो. न.-7898808253
[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]


छत्तीसगढ़िया कहां गंवागे

कभू-कभू मोर मन मं,
ये सुरता आवत हे।
इडली-दोसा ह संगी,
सबो झन ल मिठावत हे।
चिला-फरा ह काबर,
कोनो ल नइ भावत हे।
छत्तीसगढ़ी बियंजन ह,
छत्तीसगढ़ मं नंदावत हे।
दूसर के रंग मं संगी,
खुद ल रंगावत हे।
बासी-चटनी बोजइया,
पुलाव ल पकावत हे।
पताल के झोझो नंदागे,
मटर-पनीर सुहावत हे।
छत्तीसगढ़ी बियंजन ह,
छत्तीसगढ़ मं नंदावत हे।
अंगाकर के पूछइया,
पिज्जा हट जावत हे।
बोबरा-चौसेला छोर के,
सांभर-बड़ा सोरियावत हे।
भुलागे खीर बनाय बर,
लइका ल मैगी खवावत हे।
छत्तीसगढ़ी बियंजन ह,
छत्तीसगढ़ मं नंदावत हे।
तिहार मं नइये संगी,
ठेठरी-खुरमी खवइया।
आजकल के बहू भइया,
नवा-नवा रोटी बनइया।
अइरसा-पोपची भुला के,
नमकीन-गुजिया बनावत हे।
छत्तीसगढ़ी बियंजन ह,
छत्तीसगढ़ मं नंदावत हे।
अपन भाषा,अपन बोली,
बचावव नारा लगावत हे।
जेने ह नरियावत हे।
तेने ह मिटावत हे।
छोर के हमर भाषा,
अंग्रेजी मं गोठियावत हे।
छत्तीसगढ़ी भाषा ह,
छत्तीसगढ़ मं नंदावत हे।

कु. सदानंदनी वर्मा
रिंगनी{सिमगा}
[responsivevoice_button voice=”Hindi Female” buttontext=”ये रचना ला सुनव”]


महतारी बरोबर भउजी

फेर सब्बो दिन अउ बादर ह एके नइ राहय। एक दिन जमुना के दाई ह भगवान के दुवार म चल दिस अउ दू महिना बाद ददा ह घलो सरग सिधारगे। जमुना ह तीजा-पोरा म अपन भाई के रस्ता ल देखत रहिस कि मोला भाई ह लेगे बर आही, पोरा तिहार ह मनागे फेर भाई ह नइ अइच, जमुना ह अड़बड़ रोईस कि मोला भाई-भउजी मन ह नइ पूछिस, भउजी ह तको महतारी बरोबर हरय मोला अपन बेटी मान के लेग जतिस त का होतिस। अइसने सोचत-सोचत जमुना ल गंगा के सुरता आगे।
गंगा ह अड़बड़ अभागिन रहिस। अपन दाई के कोख म रहिस हे त ददा ह खतम होगे अउ गंगा ह जनम लिस हे त दाई ह भगवान घर रेंग दिस। गंगा अउ गंगू ह अनाथ होगें। गंगू के ददा के दस एकड़ जमीन रहिस हे तेकर लालच मं कका-काकी मन दूनो लइका ल पोसबोन कहिके गांव के सियान मन करा कहिस हे त सियान मन ह दूनो लइका के जिम्मेदारी ल कका-काकी ल सउंप दिन।
गंगा ह पहिली पढ़े बर स्कूल जाय ल लगिस हे त काकी ह बुता तियारे बर धरलिस, बुता ल करके गंगा ह पढ़े बर जाय अउ स्कूल के छुट्टी होवय त फेर घर के काम बुता ल करय। जइसे बुता करय तइसे गंगा ल पेट भर खाय बर नई मिलत रहिस। काकी ह आधा पेट बासी ल गंगा ल देवय। गंगू ह सुत उठ के गोबर कचरा ल करय। भइंसा ल धोवय। खेत मं खातू पहुंचाय बर जावय। तहां ले नहा धो के उत्ता-धुर्रा चार कउंरा बासी खा के स्कूल जावय। दूनो भाई बहिनी कभू संगवारी मन करा खेले बर नइ जानिन। बुता काम म दूनो झन के तन ह लकड़ी कस सुखावत जात रहिस। कका-काकी के दुख ल पा के लइका मन जिनगी ल बितावत रहिन हें।
गंगू ह बारहवीं पढ़े के बाद प्राइवेट कंपनी म काम-बुता करे बर धरलिस तहां ले लइका ह मेहनती हे कहिके बिहाव बर सगा-पहुना आय बर धरलिस। गंगू के खेत के धान के पइसा मं कका-काकी मन गंगू के बिहाव ल करिस हे। गंगू के बाई जमुना ल ससुराल मं आय दू महिना नइ होय रहिस तहां ले हंडिया ह अलग होगे। अब गंगू ल पेट भर भात खाय बर मिले ल धरलिस। फेर गंगा के फुटहा करम ह फुटहा रहिगे। जमुना ह गंगा ल उही दुख ल दे बर धरलिस जेन दुख ल काकी ह देवत रहिस हे। गंगा के स्कूल जवइ ह घलो बंद होगे। अब गंगा ह दूसर खेत मं बनी भूती जाए बर धरलिस।
गंगा ह भउजी के आंखी मं गड़त रहिस। एक दिन पड़ोसी किशन ह बनी के पइसा दे बर आय रहिस अउ गंगा ल पइसा ल देवत रहिस। तहां ले भउजी ह बड़बड़ाय बर धरलिस। देख तोर बहिनी के करनी ल जवान बेटी होके जवान टुरा करन गोठियावत हे। तोला कतको कहिथंव जी कि गंगा के मुख ल टार दे फेर मोर गोठ ल सुनबे नइ करच। एक दिन तोर बहिनी ह हमर नाक ल सुर्पनखा कस कटवाही। तेन दिन तोला पता चलही कि जमुना ह सहिच काहत रहिस। रामू ह कहिस, तोर बहिनी ह गंगा मइया असन पबरीत हे। भैया तंय गंगा ल झन मार, गंगा ह दाई-ददा ल सुरता करके रोईस कि मोर दाई-ददा ह जियत रहितिच त मेंहा अइसन दुख ल नइ पातेंव। भाई-भउजी मन गंगा के बिहाव ल तुलसी बिहाव के दिन करदिस अउ गंगा ह बिदा होके ससुराल चल दिस तहां ले गंगू ह कभू गंगा ल लिहे बर नइ गिस।
तीजा पोरा ह आवय त गंगा ल मइके के सुरता आवय कि जम्मो बेटी माई मन ह मइके म आय होही। फेर मेहा वो अभागिन हरवं जेन ल मइके के कुकुर के दरसन तको नइ होवय। तीजा-पोरा मं जमुना ह हर बछर अपन मइके जावय अउ दाई-ददा के मया ल पावय। फेर सब्बो दिन अउ बादर ह एके नइ राहय। एक दिन जमुना के दाई ह भगवान के दुवार म चल दिस अउ दू महिना बाद ददा ह घलो सरग सिधारगे। जमुना ह तीजा-पोरा म अपन भाई के रस्ता ल देखत रहिस कि मोला भाई ह लेगे बर आही, पोरा तिहार ह मनागे फेर भाई ह नइ अइच, जमुना ह अड़बड़ रोईस कि मोला भाई-भउजी ह नइ पूछिस, भउजी ह तको महतारी बरोबर हरय मोला अपन बेटी मान के लेग जतिस त का होतिस। अइसने सोचत-सोचत जमुना ल गंगा के सुरता आगे। अइसने महूं ह तो गंगा के महतारी बरोबर हरवं फेर गंगा के पीरा ल कभु नइ समझ सकेंव, कभु ओला तीजा-पोरा मं नइ पूछेंव। मेहां गलती करेंव तेकर सजा मोला मिलगे, जमुना ह बस मं गंगा घर चल दिस। गंगा ह भउजी ल देखिस त आंखी ले आंसू बोहागे। भउजी ह तको गंगा ल पोटार के अड़बड़ रोइस अउ कहिस, बेटी मोर से गलती होगे। मोला माफ कर दे, तोला कभु मइके नइ लेगेंव फेर आज तोला लेगे बर आय हंव। गंगा ह भउजी ल कहिस, मोर करन माफी काबर मांगत हच महतारी मेहां ह कभू रिस नइ करेंव। तोला माफी मांगे के कोनो जरूरत नइ हे। गंगा ह भउजी संग मइके आगे। दूनो झन के परेम ल देख के गांव के दूसर भउजी मन के मन ह घलो अपन ननद बर पिघलगे। गंगा-जमुना के परेम के नदी ह गांव-गांव मं बोहाय बर धरलिस अउ भउजी मन ह महतारी बनके अपन ननद ल तीजा-पोरा म लाय बर धरलिस।

सदानंदिनी वर्मा
ग्राम रिंगनी (सिमगा)