घाट घटवँधा, गली खोर परछी चौंरा, जउन लँग कोलबिल कइय्या गलबजार कस माते रथे तिहां जमों जान डारथें के ये लंग अवस के रतनपुरहिन सियानिन होबेच करही। डहर चलती लइकनमन जउने लंग देखतिन तिहां दउंड़ के तिर मं आके गोहनाये लगतिन- ये बुढ़ीदाई ! एको ठन किस्सा कहानी कहि देना ओ ! ये डोकरी ये ममादाई ! आंय ओ ! एक ठन नान मुन कुछ कौह न ओ ! कभू तो डोकरी हांस भरय अउ कभू कभू कऊवा के भंसेड़ तिस-भडुवा भेट्टा होवा बेरा चिन्हें न कुबेरा जउने लंग पाथे…
Read MoreTag: Shyam Lal Chaturvedi
परमेश्वर के आसन
गांव-गांव पंचइती, खुलगे बांचे खुल जाही। अइसन सबे गांव हर ओकर, भीतर झटकुन आही।। गांव-गांव पंच चुनाही, भले आदमी चुनिहा। जेहर सबला एक इमान से, थाम्हे घर कस थुनिहा।। गांव के बढ़ती खातिर अब, लंजावर कमती होही। ओतके मिलही सफा बात ये, जउन हर जतका बोंही।। जतके गुर ततके मिठास कस, जउन काम जुरहीं। मिल के काम सबो छुछिंद हो, एक मती हो कुरहीं।। बनही, बात, बतंगड़ कमती- धीरे-धीरे होही। अलग चिन्हाऊ हो जाही जे, फोकट कोनो ला बिटोही।। पंच के पदवी पबरित हे, ये परमेश्वर के आसन। जे पद…
Read Moreलगथे आजेच उन आहीं : श्यामलाल चतुर्वेदी के कविता
डेरी आँखी फर कत हे लगथे आजेच जानत हौं उनकर सुभाव जानत हौ आतेच टू री ला पाहीं दू महीना कहिन गइन तौ गय चार, पाँच अधियांगे रोजहा के डहर देखाई मा आँखी मोर चेंधियागे निरदयी मयाला टोरिस रोजमारे जरय सिरावै ओमा का नफा धरे हे छोडे़ घर दुरिहा जावै मोर रिसही के रिस देख लिही जब उनला तभे पराहीं डेरी आँखी फरकत हे लगथे आजेच उन आहीं का कहौ सुहावन तोला तोरसो का बात लुकावंव एको छिन नई देखँव तब अगुन छगुन हो जावौं बिन देखे पंच पंच महिना…
Read Moreकहिनी : बाढ़ै पूत पिता के धरम
सनेही महराज सब नौकरी के दिन पूरा करके गांव म जाके खेती-पाती करे लागिस। ये महाराज ले ओकर महराजिन हर चार आंगुर आघू रहिस। बिहनिया कहूं चाह पियत म राउत आ जातिस। तब अपन चाह पिआई ल छोड़के ओकर बर चाह बनाके दे लेतिस तब फेर अपन पितिस। अइसने घर भंड़वा करइय्या रउताइन के चेत राखतिस। कुछ खाय-पिये के रोटी- पीठा बनातिस तेमा समझ जावो सब कमिया पोंड़हार के बांटा रहिबे करतिस। पारा परोंस के मन कोनो अथान, कोनो मही, कोनो साग सालन मांगे बर आये रहितिन। सबला मया करके…
Read More