जगमग दियना बरय सबर दिन घर-घर होवय देवारी. अन-धन सुख सम्पत बाढ़य झड़कय दूध बियारी.. देवारी तिहार के गाड़ा-गाड़ा बधई. बुधराम यादव वरिष्ठ संपादक गुरतुर गोठ डाट काम
Read MoreYear: 2010
राज्योत्सव मेला
अँधा लंगड़ा बड़े मितानी सुने हो हौ तुम कहानी कहूँ जनम के दुनो संगवारी हो है लाग मानी भीख मांग के करे गुजारा उमन दुनो परानी इक दुसर संग मेला घुमात काट दईंन जिनगानी लंगड़ा के रहे नाम बंशी अँधा के गंगा राम धरम धाम के नाम ला लेके कर आइन चारो धाम राजिम जाके राजीव लोचन कर आइन परनाम रायपुर तीर मा डारिन डेरा कारन लगिन अराम वही बखत राज्योत्सव मेला के चले रहे बड नाम मेला घुमे के सउक मा बंशी के होगे नींद हराम लंगड़ा कहे राज्योत्सव…
Read Moreजनकवि कोदूराम ”दलित” की पुत्र वधु श्रीमती सपना निगम के नान्हे कहिनी
अड़हा टूरा के कहिनी हमर गाँव मा एक झन जुंवर्रा टूरा रहिस हे. मूड ला अडबड खजुवाय औ लडर-बडर गोठियावय. ओखर मूड मा बहुत अकन ले जुंवा अउ लीख भरे राहय. एक झन मितान हा ओला बताइस – ”आज-काल जुंवा-लीख ला मारे बर नवा सेम्पू आय हे. एको बेर लगा लेते, तोर समस्या हा हल हो जाही. बने साफ-सुथरा रहे कर भाई ! मितान हा ओला सरीर के साफ-सफाई के महत्व बताइस. जुवर्रा टूरा हा तरिया मा नहाय ला जात रहिस. ओला मितान के बात सुरता आइस.जात-जात सोचिस – आज…
Read Moreचरगोड़िया : रघुबीर अग्रवाल ‘पथिक’
चारों खुंट अंधेर अघात। पापी मन पनपै दिन रात। भरय तिजौरी भ्रस्टाचार आरुग मन बर सुक्खा भात॥ रिसवत लेवत पकड़ागे तौ रिसवत देके छूट। किसम-किसम के इहां घोटाला, बगरे चारों खूंट। कुरसी हे अऊ अक्कल हे, अउ हावय नीयत चोर बगरे हवै खजाना, जतका लूट सकत हस लूट॥ कांटा गड़िस नहरनी म हेर। जम्मो दुरगुन ले मुंह फेर। झन कर अतलंग अउ अंधेर करनी दिखही मरनी के बेर॥ कहूं गरीबी भगा जही तौ, कोन ओढ़ही कथरी ला? मगर मन खोजत रही जाही, नान्हे-नान्हे मछरी ला। चार धाम के तिरिथ करे…
Read Moreढ़ूंढ़ी रक्सिन: छत्तीसगढ़ी लोककथा – 1
कोलिहा अउ बेंदरा दूनों मितान बदिन। जउन काम करैं दूनों सोंच-सोंच के जउन फ़ल गवैं दूनों बांट-बांट खांवैं। ढूंढ़ी रक्सिन एक दिन नदिया नहाय गिस तौ कोलिहा सो बेंदरा ह कहिस-” जा मितान! ओखर घर मा घुसर के सुघ्घर-सुघ्घर बने जिनिस ला खाबे, तेखर पाछू मंय जाहूं।” कोलिहा ढूंढ़ी रक्सिन के घर हबर के खावत-मेछरावत रहिस के थोरके बेर पाछू ढूंढ़ी रक्सिन आइस्। ओही डहार ले लगे संकरी ल देख के कहिस -” मोर मंडुरिया म कोन रे?” कुछु आवाज़ नई पाये के पाछू ढूंढ़ी रक्सिन तरिया पार जाके बइठे…
Read Moreमिट्ठू मदरसा : रविन्द्रनाथ टैगोर के कहिनी के छत्तीसगढ़ी अनुवाद
एक ठिक मिट्ठू राहय। पटभोकवा, गावय मं बने राहय। फेर बेद नई पढ़य। डांहकय, कूदय, उड़ियाय, फेर कायदा-कानहून का होथे, नई जानय। राजा कथे ‘अइसने मिट्ठू का काम के’ कोनो फायदा तो नी हे, घाटा जरूर हे। जंगल के जमें फर मन ला थोथम डारथे। ताहन राजा-मंडी म फर फरहरी के तंगी हो जाथे। मंतरी ला बलाके किहिस- ये मिट्ठू ला गियान बिदिया सिखोवव- ‘राजा के भांचा ला सिखोय-पढ़ोय के ठेका देय गीस। गुनी धियानी मन के बइसका होइस। बिचार करिन मिट्ठू म अबुजहापना काके सेती हावे। बनेच गंसियाहा भंजाय…
Read Moreबरीवाला के कहिनी : बंटवारा
‘मोर बंटवारा के कमती जमीन हे। बंटवारा में मिले घर-दुवार ह टूटत-फुटत हे। बड़े भइया सदाराम जेठासी काबर देबो। दूनों बरोबर-बरोबर बांटबो। मोर बंटवारा नीरस हे। सदाराम के बंटवारा सरस हे। बंटवारा दुवारा होना चाही। सरपंच ह कहिस कस खेदूराम, तुंहर बंटवारा होय सात आठ बरस बीतगे। ये सब बात ल बंटवारा के दिन गोठियाना रिहिस। अब पछताय का होत हे जब चिड़िया चुगगे खेत।’ तइहा के गोठ ल बइहा लेग गे।’ बंटवारा सुनके सब के जी हर कांपे बर धर ले थे। बंटवारा दु:खद पल आय। बंटवारा मं, एक…
Read Moreमन डोले रे मांग फगुनवा …. बादर के दिन म फागुन लावत हें भाई लक्ष्मण मस्तुरिहा
छत्तीसगढ़ के नामी कबि गीतकार साहित्यकार लक्षमण मस्तुरिहा कवि सम्मेलन म – आरंभ मा पढव : – साथियों मिलते हैं एक ब्रेक के बाद
Read Moreआंखीं म गड़ जाए रे चढ़ती जवानी
छत्तीसगढ़ के नामी कबि गीतकार साहित्यकार लक्षमण मस्तुरिहा कवि सम्मेलन म – आरंभ मा पढव : – साथियों मिलते हैं एक ब्रेक के बाद
Read Moreपलायन (कहिनी)
हमर छेत्र म बियासी होय के बाद विधाता ह रिसागे तइसे लागथे। बरसा के अगोरा म हमर आंखी पथरागे, बरस बे नई करीस। सब्बो धान-पान ह मरगे। गांव के जम्मो किसान बनिहार -भूतिहार मन रोजी-रोटी के तलास म गांव ले पलायन करगे। सब आने-आने सहर डाहर चल दिन हे। तुंहर समधी घर के मन घलो माई पीला चल दे हंवय। जगतू ह सहरिया जिनगी के दंऊड़-धूप, रात-दिन के हाय-हाय म अपन आधा जिनगी ल पहा डरिस। सहर ले ओकर मन उचटगे। तहांले अपन गांव जामटोला आ के फेर बस गे।…
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