अँखियन मोती मन के धन ला छीन पराइस टूटिस पलक के सीप उझरगे पसरा ओकर बाँचे हे दू चार कि अँखियन मोती ले लो । आस बुतागे आज दिया सपना दिखत हे सुन्ना परगे राज जीव अंगरा सेंकत हे सुख के ननपन में समान दुख पागे हावै काजर कंगलू हर करियाइस जम चौदस के रात। बारिस इरखा आगी में बेचै राख सिंगार सहज सुरहोती ले लो कि अँखियन मोती ले लो ।। – नारायणलाल परमार
Read MoreYear: 2016
साहित्यिक पुरखा मन के सुरता : द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र
तिरिया- (कुण्डलिया छन्द) तिरिया ऐसी ब्याहिये, लड़ै रोज दस बेर घुड़की भूल कभी दिए, देखै आँख लड़ेर देखै आँख लड़ेर, नागिन सी फुन्नावै कलह रात दिन करै, बात बोलत भन्नावै जीना करै हराम, विप्र बाबा की किरिया मरने का क्या काम, ब्याह लो ऐसी तिरिया । गैया – गैया ऐसी पालिये कि खासी हरही होय पर धन् खा घर लौटिहै, लीजै दूध निचोय लीजै दूध निचोय-मुफ्त का माल उड़ाओ पारा बस्ती शहर भरे की गाली खाओ पहुंचे काछी द्वार, करै फिर दैया मैया शहर बसो तो विप्र, पाल लो हरही…
Read Moreपितर पाख मा पुरखा मन के सुरता : हरि ठाकुर
व्हाट्स एप ग्रुप साहित्यकार में श्री अरूण कुमार निगम भईया ह पितर पाख मा पुरखा मन के सुरता कड़ी म श्री हरि ठाकुर के कविता प्रस्तुत करे रहिन हे जेला गुरतुर गोठ के पाठक मन बर सादर प्रस्तुत करत हन – दिया बाती के तिहार होगे घर उजियार गोरी, अँचरा के जोत ल जगाये रहिबे । दूध भरे भरे धान होगे अब तो जवान परौं लछमी के पाँव निक बादर के छाँव सुवा रंग खेतखार, बन दूबी मेढ़ पार गोई, फरिका पलक के लगाये रहिबे । जूड़ होगे अब घाम…
Read Moreरोवा डारिन रियो म
31 वाँ ओलम्पिक खेल अपन सतरंगी छटा बिखेर के खतम होगे। ब्राजील के रियो डी. जेनेरियो साहर के मराकाना स्टेडियम म ए खेल के आयोजन बड़ धूमधाम से होइसे। एकर समापन के घोसना अंतरास्ट्रीय ओलम्पिक समिति के अध्यक्ष थामस चाक हँ करिस हे। ए खेल हँ 5 अगस्त से 21 अगस्त तक 16 दिन ले चलिस हे। जेमा 42 खेल सामिल रिहिसे। एमा 205 देस के अंदाजन 11000 खेलाड़ी मन अपन भागीदारी निभइन हे। अब 32 वाँ ओलम्पिक खेल सन 2020 म जापान के टोक्यो साहर म होही। पुराना जमाना…
Read Moreतीजा के अगोरा
बेटी माई मनके आरूग तिहार ताय तीजा । मईके के मया अऊ दुलार ताय तीजा । पाख लगे हे सपना मा जईसन उड़ान ताय तीजा । संगी जहुरियां सखी सहेली के मिलान ताय तीजा । करू भात अऊ करेला के सुग्हर साग ताय तीजा । फेर निरजला उपास के घलो नाव ताय तीजा । मईके के फरिया के तको मान ताय तीजा । गाँव के आबो हवा में घुले एक मिठास ताय तीजा । ससुरार के सुख दुख ल छाँव मा बिसरायके गोठ ताय तीजा । दाई के देहरी अऊ…
Read Moreदोहा
सुकवि श्री बुधराम यादव जी के नवा छत्तीसगढ़ी सतसई दोहा संग्रह “चकमक चिनगारी भरे “ से साभार – ——————————————————————————————————– पहुना कस बेटी भले – मइके बर दिन चार । पर मइके ससुरार के – मरजादा रखवार ॥ सिरतो बेटी सिरज के – रोथे सिरजनहार । मया पुतरिया के कदर – बिसरत हे संसार ॥ जेकर हिरदे नित भरे – सतगुन सुघर बिचार । जानव दियना ते धरे – करत रथे उजियार ॥ बिन किताब के घर लगय – जनव झरोखा हीन । सुद्ध पवन सत ज्ञान बिन – लगंय रहइया दीन ॥ …
Read Moreकमरछठ कहानी (1) – दुखिया के दुःख
वीरेन्द्र सरल एक गाँव में दुखिया नाव के एक झन गरीब माइलोगन रहय। जिनगी के आधा उमर सिरावत रहिस फेर आज ले ओखर कोरा सुन्ना रिहिस। गाँव के लइकोरी मन ओला ठाठा कहिके ताना मारे। काय करे बपरी ह सब के ताना ला कले चुप सहि के आँसू ढारत पहाड़ कस जिनगी ला पहावत रहय। एक बेर उखर बियारा में कुत्तनिन ह पिला जनमे रहय। दुखिया ह उही में के एक ठन पिला ला अपन घर ले आनिस पोसे लगिस। कोन जनी कुकर के ओ पिला के अइसे काय परताप…
Read Moreकमरछठ कहानी (2) – सातो बहिनी के दिन
वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गांव में सात भाई अउ एक बहिनी के कुम्हार परिवार रहय। बहिनी के नाम रहय सातो। एक समे के बात आय जब आशाढ़ के महिना ह लगिस। पानी बरसात के दिन षुरू होईस तब कुम्हार भाई मन पोरा के चुकी-जांता, नंदिया बइला अउ गणेष भगवान के मूरती बनाय बर माटी डोहारबो कहिके गाड़ी में बइला ला फांदिन अउ गांव के बाहिर खार डहर चले लगिन। उही बेरा में नानकिन बहिनी सातो घला माटी डोहारे बर जाहूँ कहिके जिद करे लगिन। मयारूक भाई-भौजाई मन, तैहा झन जा नोनी…
Read Moreकमरछठ कहानी (3) – मालगुजार के पुण्य
वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गाँव में एक झन मालगुजार रहय। ओहा गाँव के बाहिर एक ठन तरिया खनवाय रहय फेर वह रे तरिया कतको पानी बरसय फेर ओमे एक बूंद पानी नइ माढ़े। सुख्खा तरिया ला देख के देखइया मन मालगुजार ला करम छड़हा कहिके गारी देवय। मालगुजार के जीव बिट्टागे रहय। मालगुजार इही संसो फिकर में घुरत रहय। एक दिन ओला तरिया के देवता ह सपना दिस कि तैहा तोर दुधमुँहा नाती ला लानके मोरा कोरा म सौपबे तभे ये तरिया में पानी भरही। मालगुजार धरम संकट में फँसगे एक…
Read Moreकमरछठ कहानी(4) – देरानी -जेठानी
वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गाँव में एक देरानी अउ जेठानी रहय। जेठानी के बिहाव तो बहुत पहिलीच के होगे रहय फेर अभी तक ओखर कोरा सुनना रहय। अड़बड़ देखा-सुना इलाज-पानी करवाय फेर भगवान ओला चिन्हबे नइ करय। मइनखे मन ओला बांझ कहिके ताना मारे। जेठानी के जीव ताना सुनई में हलाकान रहय। सास-ससुर अउ ओखर गोसान तक ओला नइ भावय। ओहा निचट निर्दयी घला रहय काखरो लोग लइका ला नइ भाय। सब ला गारी बखाना दे। उहीच घर में जब ओखर देरानी ह बिहा के अइस तब साल भर में ओखर…
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