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पुस्तक समीक्षा : गाँव के पीरा ‘‘गुड़ी अब सुन्ना होगे‘‘

  • वीरेन्द्र ‘सरल

जिनगी के व्यथा ह मनखे बर कथा होथे। सबरदिन ले कथा-कंथली ह मनखे के जिनगी के हिस्सा आय। मनखे जब बोले-बतियाय ल नइ सिखे रिहिस मतलब जब बोली-भाखा के विकास घला नइ होय रिहिस तभो मनखे अपन जिनगी के अनुभव ला भितिया में रूख-रई, चिरई-चिरगुण, साँप-डेरू, हिरू-बिच्छू के चित्र ला छाप के परगट करत रिहिन काबर कि ओ समे अपन दुख-दरद ला जनवाय के अउ कोन्हो साधन नइ रिहिस। जब बोली-भाखा के विकास होईस तब मनखे अपन बात ला मुँह अखरा एक पीढ़ी ले दूसर पीढ़ी पहुँचाय के उदिम करिस। इही ल लोक साहित्य कहे गिस जउन आज ले चलत हे। कथा-कंथली ह अपन बात ला कहे अउ समझाय के सबले सस्ता अउ बढ़िया माध्यम बनिस। काबर कि येमा अउ काय होही कहिके जाने बर मन ह अघाबे नइ करय। कहिनी म मन ह अतेक रम जथे के बेरा के पता नइ चलय अउ कहिनी ह काय कहना चाहत हे अहू बात ह अन्तस में पहुँच जथे। हमर छत्तीसगढ़ी के लोक साहित्य में नान्हे कहिनी के बात करे जाय तब ‘ढेला अउ पान‘, ‘डोकरी अउ बादर‘, राजा अउ चिरई के नान्हे कहिनी ला कोन भुला सकत हे? आज ले सियान दाई मन लइका भुलियारे बर इही कहिनी ला सुनावत हे।




आज जमाना गजब बदलगे हावे। अपन बात ला बोले बताये बर हमर मेरन गजब अकन किसम-किसम के साधन होगे हावे फेर कहिनी के महत्व ह ज्यों के त्यों बने हावे। नान्हे-नान कहिनी में जिनगी के बड़े-बड़े बात ल कहे के कला सब झन ला नइ आवय। कोन्हो-कोन्हो ला अइसन कला ह मिलथे। बड़े बहिनी डॉ षैल चन्द्रा ह ये कला ला पाय हे। हिन्दी लघु कथा में तो ओखर नाव के षोर ह देष भर म बगरेच हे फेर अब छत्तीसगढ़ी लघु कथा मे घला ओखर नाम ला बड़ सन्मान ले ले जाही। षैल दीदी के पहिली घला कोन्हों छत्तीसगढ़ी लघु कथा संग्रह छपवाय होही ये बात के तो मोला जानकारी नइ हे, अभी-अभी षैल दीदी के लघु कथा संग्रह ‘गुड़ी अब सुन्ना होगे‘ पढ़े के मउका मिलिस तब जानेव ‘गागर मे सागर काला‘ कहे जाथे। पहिली जमाना म गाँव के गुड़ी के ओतकेच महत्व रिहिस जतना आज देष बर संसद भवन के हाबे। गुड़ी ह गाँव के ओ ठउर आय जिहां गाँव भर के मनखे मन दिनभर के काम कमई ले फुरसत पाय के बाद जुरियावय अउ अपन दुख पीरा ला साझा करय। सुन्ता-सुलाहा के गोठ करय। लड़ई-झगड़ा के निपटारा करय अउ गांव के विकास बर नीति-नियम बनावय। आज ओहा सुन्ना पड़े हावय। नान्हे-नान बात बर मनखे आज कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगावत हे। मोबाइल, नेट अउ टी वी म अइसे मगन हे कि पड़ोसी ला तो छोड़ अपने परवार के मनखे के सुख दुख के संषो तक नइ कर सकत हे। घर-परिवार, षिक्षा-संस्कार, संस्कृति-प्रकृति, कथनी-करनी सबो विशय ला षैल दीदी ह ये संग्रह के कहिनी मन म समोय के उदिम करे हावे। षैल दीदी ला गाड़ा-गाड़ा बधाई।

पुस्तक के नाव-‘गुड़ी अब सुन्ना होगे‘ प्रकाषक-आषु प्रकाषन रायपुर, मूल्य-150 रूपया।



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संतान के सुख समृद्धि की कामना का पर्व- हलषष्‍ठी

वीरेन्द्र ‘सरल‘
संसार में हर विवहित महिला के लिए मातृत्व का सुख वह अनमोल दौलत है जिसके लिए वह कुबेर के खजाने को भी लात मारने के लिए सदैव तत्पर रहती है। माँ अर्थात ममता की प्रतिर्मूत, प्रेम का साकार स्वरूप, त्याग और बलिदान की जीवन्त प्रतिमा। माँ षब्द को चाहे जितने उपमान देकर अलंकृत करने का प्रयास किया जाये पर माँ के विराट व्यक्तित्व के सामने सब बौने सिद्ध होते है। माँ सदैव अपने संतान के सुख समृद्धि की कामना करती है इसके लिए उसे चाहे जीवन में कितना भी कश्ट क्यो न उठाना पड़े।
यदि हमारा देष धर्म प्रधान देष है तो हमारी यह छत्‍तीसगढ़ की पावन भूमि धर्म को पूर्णतः आत्मसात करने वाली धरती है। यहाँ एक ओर माताएं जहाँ पति के लम्बी उम्र के लिए हरीतालिका अर्थात तीजा का कठिन व्रत रखती है तो दूसरी ओर संतान के सुख-समृद्धि और लम्बी उम्र के लिए हलश्श्ठी अर्थात कमरछठ का व्रत रखती है। चूंकि यह पुत्र लिए रखा जाता है इसलिए इसे पुत्रेश्ठी व्रत भी कहा जाता है।
माताएं इस व्रत को भादो माह के कृश्ण पक्ष के छठ के दिन रखती है। कथा के अनुसार इसी दिन भगवान बलराम का जन्म हुआ था। उसके षस्त्र के रूप में हल को मान्यता मिली है इसलिए इसे हलश्श्ठी व्रत भी कहा जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार इसी व्रत को रखकर माता गौरी ने कार्तिकेय को पुत्र के रूप में प्राप्त की थी। जिसकी पत्नी का नाम शश्ठी था इसलिए इसे पुत्रेश्ठि व्रत भी कहते है। कहा जाता है कि सतयुग में समुद्र नाम का एक राजा था जिसकी पत्नी का नाम सुवर्णा था। उसका एक हस्ति नाम का पुत्र था जिसकी मृत्यु अल्पायु में ही हो गई थी। जिसके कारण राजा-रानी विलाप करने लगे थे। तब शश्ठी देवी प्रकट होकर भादो माह के कृश्ण पक्ष के छठ को व्रत रखने पर उसके पुत्र को जीवित कर देने की बात कही। रानी ने इसका पालन किया और जिससे उसका पुत्र जीवित हो गया।
शश्ठी देवी को लक्ष्मी स्वरूपा माना जाता है। लक्ष्मी जी की उत्पिŸा सागर से हुई है। इसलिए इस व्रत में सगरी पूजा का विधान है। चूंकि माता गौरी ने यह व्रत सागर किनारे सम्पन्न किया था। इसलिए इस व्रत में पूजा के समय प्रतीकातमक रूप से सगरी के पास पलाष के डंठल, महुआ के फल तथा लाई छिड़कने का भी विधान है। यहां पर षिव और पार्वती जी की भी पूजा की जाती है इसलिए षिव के नाग देवता के लिए दूध और धान की लाई भी चढ़ाया जाता है।
इस व्रत में केवल भैंस दूध का ही उपयोग किया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन देवताओं ने तांत्रिक विधि से भैंस की उत्पिŸा की थी। इसीलिए भैंस दूध और घी का उपयोग इस व्रत के लिए किया जाता है।
इस व्रत को रखने वाली माताओं के लिए हल चले जमीन पर पांव रखना व उससे उत्पन्न किसी भी प्रकार के अनाज का उपयोग करना निशेध है। इसलिए इस दिन बिना हल चले भूमि से उत्पन्न चांवल जिसे स्थानीय भाशा पसहर चाऊंर कहा जाता है तथा छः किस्म की भाजी जिसमें मुनगा भाजी का विषेश महत्व है, का प्रयोग किया जाता है।
इस दिन व्रती माताएं दिन भर व्रत रखने क बाद षाम के समय स्थानीय व्यवस्था के अनुसार निर्मित सगरी के आस-पास इक्ट्ठा होकर विधि-विधान से सगरी पूजा करती है। पुत्रवती माताएं अपने पुत्र की सुख-समृद्धि की कामना करती है मगर जिनको अभी पुत्र की प्राप्ति नही हो पाई है ऐसी माताए कुष को हाथ में लेकर अपने अँगूठे और एक अंगुली के बल पर गांठ बांधती है। ऐसा माना जाता है कि एक पल वह जितना गांठ बांध लेती है उसको उतने ही पुत्र की प्राप्ति होती है। पूजा स्थल से घर लौटने बाद माताएं पीली पोती जिसे षष्‍ठी देवी की ध्वज स्वरूप माना जाता है उसे अपने पुत्र या परिवार के अन्य सदस्यो के पीठ पर मारती है। इसके पीछे मान्यता यह है कि पीठ पर अधर्म का वास होता है जो पीली ध्वज के प्रहार से नश्ट हो जाता है और मनुश्य धर्म के अनुसार आचरण करता है। सगरी पूजा के समय छत्‍तीसगढ़ के गांवो में माताएं जो कमरछठ कथा कहतीं है। वह इस प्रकार है-




कमरछठ कहानी : मालगुजार के पुण्य

-वीरेन्द्र ‘सरल‘
एक गाँव में एक झन मालगुजार रहय। ओहा गाँव के बाहिर एक ठन तरिया खनवाय रहय फेर वह रे तरिया कतको पानी बरसय फेर ओमे एक बूंद पानी नइ माढ़े। रद्दा रेंगईया मन पियास मरे तब तरिया के बड़े जान पार ला देख के तरिया भीतरी जाके देखे। पानी के बुंद नइ दिखय तब सब झन मालगुजार ला करम छड़हा कहिके गारी देवय। मालगुजार के जीव बिट्टागे रहय। मालगुजार इही संसो फिकर में घुरत रहय।
एक दिन ओला तरिया के देवता ह सपना दिस कि तैहा तोर दुधमुँहा नाती ला लानके मोरा कोरा म सौपबे तभे ये तरिया में पानी भरही। मालगुजार धरम संकट में फँसगे एक कोती तो मोर दुलरवा एक झन नाती अउ दूसर कोती पियास में अउ पानी बर तरसत कतको मनखे अउ आने जीव? काय करना चाही? मालगुजार सोचिस-‘‘ एक के जाय ले कोन्हो हजारो के जीव बांचही तब ओहा पाप नही बल्कि पुण्य होही। ओला कतको अकन महापुरूश मन के सुरता आइस जउन मन अपन जीव ला दे के कतको जीव के रक्षा करे रिहन। मालगुजार अपन मन ला कठोर बना के अपन नाती ला तरिया में सौपे के मन बना डारिस।
बिहान दिन कमरछठ के तिहार रहय। ओहा अपन बहू ला ठगत किहिस-अरे तोर ददा के तबियत ह मनमाने खराब हे कहिके संदेषा आय हे बेटी। तिहार बार के काहे ऐसो नहीं ते पउर घला बन जही। फेर दाई-ददा घेरी-बेरी थोड़े मिलथे। जा तैहा तोर ददा ला एक नजर देख के आजा। मैंहा डोला तैयार करके कहार मन ला बोल देथवं। काबर कि काली तिहार में उपवासिन मन ला नांगर जोताय खेत में नइ रेगे के नियम हे। तैहा मुंढरहा ले चल देबे।
बहू भल ला भल जानिस ओहा तैयार होगे। जल्दी तो आना हे कहिके अपन दुधमुँहा लइका ला नइ लेगिस अउ लकर-धकर डोला चढ़के मइके जाय बर निकलगे।
बहू घर ले निकलिस तहन मालगुजार ह तुरते बिहनिया च ले अपन नाती ला लेगे के तरिया के बीच में छोड़ दिस अउ घर में आके रोय लगिस।
लइका तरिया के कोरा में पहुँचिस तहन ओमे सन-सन पानी ओगरे के षुरू होगे। थोड़ेच बेरा में तरिया ह लबालब भरगे। पुरईन पान में छवागे। मेचका मछरी मन तउरे लगिन। चिरई-चिरगुन मन चहचहाय लगिन। अउ बीच तरिया के एक पुरइ्रन पŸा में मालगुजार के नाती ह गदबद खेले लगिस।
मझनिया जब बहू अपन मइके ले लहुटत रिहिस तब तरिया के तीर में ओला कोन्हो लइका के कुलके के आवाज सनई दिस। ओहा तुरते डोला ला रोकवाके तरिया पार में चढ़िस। पुरइन पŸा ह सर-सर-सर-सर तीर में आगे। बहू ह देखथे-ये दई! ये तो मोरेच लइका आय। येला इहां कोन बैरी ह लान के छोड़ दे हावे। ओहा लइका ला अपन हिरदे में लगा लिस अउ घर आगे।
घर आके देखथे तब ओखर ससुर ह मुड़ धरे मनमाने रोवत रहय। बहू ह पूछिस तब मालगुजार ह सब बात ला साफ-साफ बता दिस। बहू किहिस-ददा! कमरछठ भगवान के किरपा ले तरिया में पानी भरगे अउ तुहर नाती घला जियत-जागत हावे। लेव येला अपन कोरा में खेलावव। बहू ह लइका ला अपन ससुर ला पवा दिस। मालगुजार के मन गदगद होगे। जइसे मालगुजार अउ ओखर बहू के दिन बहुरिस वइसने सबके दिन बहुरे। बोलो कमरछठ भगवान की जय।



कमरछठ कहानी : देरानी-जेठानी

वीरेन्द्र ‘सरल‘
एक गाँव में एक देरानी अउ जेठानी रहय। जेठानी के बिहाव तो बहुत पहिलीच के होगे रहय फेर अभी तक ओखर कोरा सुनना रहय। अड़बड़ देखा-सुना इलाज-पानी करवाय फेर भगवान ओला चिन्हबे नइ करय। मइनखे मन ओला बांझ कहिके ताना मारे। जेठानी के जीव ताना सुनई में हलाकान रहय। सास-ससुर अउ ओखर गोसान तक ओला नइ भावय। ओहा निचट निर्दयी घला रहय काखरो लोग लइका ला नइ भाय। सब ला गारी बखाना दे। उहीच घर में जब ओखर देरानी ह बिहा के अइस तब साल भर में ओखर कोरा हरियागे। घर में नान-नान दु झन लइका के किलकारी गुंजे लगिस। देरानी बर सास-ससुर, पारा-मोहल्ला के सब मनखे घातेच मया करय काबर ओहा बहुत सुघ्घर व्यवहार के रहय। ये सब ला देख के जेठानी क जीव में रातदिन ईर्श्या के आगी धधकत रहय। ओहा ये सब के कारण अपन देरानी के लइका मन ला समझय अउ ओमन ला मारे के उदिम करे फेर मउका नइ मिलत रहय।
एक समय के बात आय। कमरछठ के दिन पड़े रहय। देरानी-जेठानी के सास-ससुर अउ घर गोसान मन सबो झन जरूरी काम ले के दूसर गाँव गे रहय। आज घर के सियानी जेठानी के हाथ में रिहिस। ओहा बिहिनया ले अपन देरानी संग फोकटे-फोकट, नान-नान बात के ओखी करके झगड़ा लड़ई करे के षुरू कर दिस अउ लकड़ी लाय बर जंगल जा कहिके मजबूर कर दिस।
देरानी कलप-कलप के किहिस-दीदी! आज कमरछठ के तिहार आय। आज नांगर चले खेत में रेंगे ले अल्हन आथे कहे जाथे। भोरहा में मोर पांव कोन्हो अइसने ठउर में पड़ जही तब अनित हो जाही। आज नहीं, लकड़ी बर काली जंगल चल देहूं। फेर जेठानी मानबे नइ करिस।
काय करे बपरी देरानी ह अछरा में आंसू ला पोछत डोरी धर के घर ले जंगल जाय बर निकलगे। देरानी ह जंगल गिस तहन जेठानी ह ओखर दुनो झन दुधमुहां लइका मन ला आगी में लेस डारिस अउ राख माटी ला बाहर-बटोरके गांव के बाहिर घुरवा में लेगे के फेक दिस।
येती देरानी ह घेरी बेरी-कमरछठ भगवान ला सुमरत अपन लइका मन के रक्षा करे बर गोहार लगावत रिहिस। जब ओहा मझनिया बेरा मुड़ में लकड़ी के बोझा राखे घर लहुटत रिहिस तब घुरवा तीर आके देखथे कि ओखर दुनो झन लइका मन घुरवा के गोबर कचऱा में सनाय मनमाने खेलत रहय। ओहा-हाय दई! मोर लइका मन ला इहां कोन बैरी लान के छोड़ दे हे हावे कहिके दुनो झन ला काबा भर पोटार के अपन हिरदे में लगा लेथे। उहीं मेरन के तरिया में लइका मन ला बने नहा-धोवा के घर लानथे अउ एक मन के आगर कमरछठ भगवान के पूजा पाठ करथे। लइका मन ला जियत जागत देख के जेठानी बक खा जथे। जइसे देरानी के दिन बहुरिस तइसे सबके बहुरय। बोलो कमरछठ भगवान की जय।
chhattisgarhi folk tales

कमरछठ कहानी – सोनबरसा बेटा

-वीरेन्द्र सरल
एक गांव में एक झन गरीब माइलोगन रहय। भले गरीब रिहिस फेर आल औलाद बर बड़ा धनी रिहिस। उहींच मेरन थोड़किन दूरिहा गांव में एक झन गौटनीन रहय। ओखर आधा उमर सिरागे रहय फेर ओहा निपूत रहय। एक झन संतान के बिना ओखर जिनगी निचट अंधियार रहय। ओहा गरीबिन के किस्मत ला सुने तब मने-मन गुनय। जेखर घर खाय पिये बर धान चांउर नहीं तेखर अतेक अकन लोग लइका अउ मोर घर अतेक भरे बोजे हावे तब एक झन संतान के बिना जिनगी अंधियार, वाह भगवान तोरो लीला अपरमपार हे। कोन जनी मोर दुख ला कब टारबे? कब मोर अंगना में एक झन लइका के किलकारी गूंजही?
एक समय के बात आय। गरीबिन घर एक झन मंगन जोगी आइस। ओ समें गरीबिन फेर अम्मल में रिहिस। जोगी किहिस-बेटी! तैहा बड़ा किस्मत वाली अस। ये पइत तो तोर घर सउंहत भगवाने अवतरही। तोर कोख में पलत लइका अउ तोर चेहरा-मोहरा के चमक ला देख के अइसने लागत हे। तोर अवइया बेटा ह घातेच गुणी होही। ओखर आय ले तोर घर अन्न-धन , गउ लक्ष्मी के भंडार भर जही। तोर नाव के षोर ला ओहा देष दुनिया में बगराही। गरीबिन खुष होके जोगी ला अपन षक्ति के मुताबिक दान करके अपन घर ले बिदा करिस।
समय अइस तहन बिचारिन गरीबिन एक झन सुघ्धर अकन बेटा ला जनम दिस अउ बेहोष होगे। ओखर गोसान ह गरीबी के सेती उही लइका ला गौटनीन ला दान कर दिस। जब गरीबिन ला होष आइस तब ये पइत तोर कोरा ले मरे लइका जनम धरिस हे कहिके ठग दिस। रो-रो के गरीबिन के जीव छुटे लगिस। लटपट में ओहा अपन मन ला मढ़ा के राखिस। अइसने -अइसने साल दू साल बितगे।
येती गरीबिन देखथे कि सदा दिन के निपूत गौटनीन के घर उदुप ले लइका के जनम होय हावे। अउ जब ले ओ लइका के जनम होय हे तब ले उखर घर मनमाने धन बाढ़त हे अउ सुख संम्पति के भंडार भरत हावे। गरीबिन ला जोगी बबा के बात सुरता आय। ओहा सोचे कहूं मोरेच लइका ला तो उहां नइ लेग गे होही? ओहा अपन गोसान कर ये बात ला कहय तब ओहा अलकरहा भड़क जाय। येखर ले गरीबिन के षक ह अउ बाढ़ जाय।
एक दिन गरीबिन ह हिम्मत करके गौटनीन घर पहुंचगे अउ लइका ला देखाय के जिद करे लगिस। गरीबिन ला देख के गौटनीन ह अपन लइका ला लुकाय उपर लुकाय परे। अब तो गरीबिन के षक ह अउ पक्का होगे। ओहा गांव भर के सियान मन ला नियाव बर गोहार लगाय लगिस। ये बात के पता चलिस तब गांव भर कटाकट बइठका होइस। लइका ला गरीबिन अपन आय कहाय अउ गौटनिन ह अपन। फैसला करना मुष्कुल होगे। परमाण काखरो मेरन नइ रहय। आखिर में गरीबिन किहिस-‘‘ ददा हो! एक काम करव, भूखाय लइका ला सात ठन लुगरा के घेरा भीतरी बइठार के राखे रहव। गौटनीन अउ मै दुनो झन घेरा के बाहिर ले लइका ला दुध पियाय के उदिम करबो। जेखर छाती के दूध के धार ह लइका के मुंहू तक पहुंचगे तब समझहूं, लइका ओखरे आय। सियान मन तैयार होगे। वइसनेच करे गिस। अब गौटनीन ह तो कोनहो लइका ला जनम नइ दे रिहिस तब ओखर छाती ले दूध कहां ले आतिस? गरीबिन ह कमरछठ भगवान के सुमरन करके अपन छाती ले दूध निथारिस जउन ह सात लुगरा के घेरा ला पार करके सोझे लइका के मुंहू तक पहुंचगे। सियान मन दंग रहिगे। गौटनीन ला पूछिस तब ओहा सब बात ला बफलदिस। ये गरीबिन के गोसान घला मुंहू ओथार के खड़े होगे। सियान मन लइका ला गरीबिन ला सौप दिन। जइसे गरीबिन के दिन बहुरिस तइसे सब के दिन बहुरे। बोलो कमरछठ भगवान की जय।



कमरछठ कहानी – दुखिया के दुःख

-वीरेन्द्र सरल
एक गाँव में दुखिया नाव के एक झन माइलोगन रहय। दुखिया बपरी जनम के दुखियारी। गरीबी में जनम धरिस, गरीब के घर बिहाव होइस अउ गरीबीच में एक लांघन एक फरहर करके जिनगी पोहावत रिहिस। उपरहा में संतान के सुख घला अभी तक नइ मिले रिहिस। जिनगी के आधा उमर सिरावत रहिस फेर आज ले ओखर कोरा सुन्ना रिहिस। कोन जनी भगवान ओला काबर नइ चिन्हत रिहिस। संतान के बिना घर-दुवार, गली-खोर सुन्ना लागे अउ जिनगी अंधियार। गाँव के लइकोरी मन ओला ठाठा कहिके ताना मारे। काय करे बपरी ह सब के ताना ला कले चुप सहि के आँसू ढारत पहाड़ कस जिनगी ला पहावत रहय। ओखर गोसान ओला गजब समझावय फेर ओखर मन माढ़बे नइ करय। गोसइया घर में नइ रहय तब तो दुखिया बर दिन काटना मुष्कुल हो जाय।
एक बेर के बात आय उखर बियारा में एक ठन कुत्तनिन ह पिला जनमे रहय। पिला मन घातेच सुघ्घर दिखत रहय। दुखिया ह उही में के एक ठन पिला ला अपन घर ले आनिस अउ ओला पोसे लगिस। उही पिला ला अपन सुख-दुख के संगवारी मान के ओखर बर गजब मया करे अउ अपन अन्तस के पीरा ला ओखरे संग गोठियाके अपन दुख ला हल्का करय। अइसने-अइसने अड़बड़ दिन होगे।
कोन जनी कुकर के ओ पिला के अइसे काय परताप रिहिस कि ओखर सेवा के फल में दुखिया के सब दुख मेटागे। थोड़ेच दिन में ओखर घर अन्न धन्न, गउ लक्ष्मी के भंडार भरगे। दुखिया अब गौटनीन होगे। भगवान घला ओला चिन्हे लगिस अउ कोख ला हरियर कर दिस। दुखिया ह अम्मल में रहिगे।
कुकुर पिला ह बाढ़िस तब पता चलिस कि उहू कुतन्नीन आय। एक समे के बात आय। एक दिन दुखिया ला महरी पेज खाय के साध लागिस। ओहा अपन कुटिया-पिसिया करके सकेले चार पइसा में मही बिसा के लानिस अउ महरी पेज बना के राखे रिहिस। ओ समे कुतन्नीन घला अम्मल में रहय। अभी दुखिया ह नहाय बर तरिया गे रिहिस। महरी पेज ला ठंडा करे बर ओ अँगना में मढ़ा दे रिहिस। अंगना में महरी पेज ला खुल्ला माढ़े देख के ओखर जीव ललचागे। ओहा सबो महरी पेज ला सपर-सपर पी डारिस। दुखिया ह नहा के आइस तब ये सबला देख के ओखर एड़ी के रिस तरवा में चढ़गे। ओहा कुतन्नीन ला पीढ़ा में फेंक के मार पारिस। पीढ़ा ह कुतन्नीन के पेट ला पड़िस। ओखर पेट के पिला मरगे। कुतन्नीन ह दुखिया ला श्राप दे दिस कि जा रे चंडालिन मोला थोड़किन गलती बर मार के मोर कोख ला सुन्ना करेस तइसने तोरो कोख ह सुन्ना हो जाय अउ कुतन्नीन उहाँ ले कुई-कुई करत भाग गे।
कुतन्नीन के श्राप में दुखिया के गरभ गिरगे। थोड़े-थोड़े दिन में दुखिया अम्मल में तो रहि जाय फेर गरभ ह ठहरबे नइ करय, बेरा के पहिली गिर जाय। कतको डाक्टर, बइद मेरन जा के देखा-सुना करावय फेर कोन्हो के दवा ओसारी काम नइ करय। दुखिया हर साल कमरछठ के उपास रहय अउ षिव जी उपर कतको जल चढ़ावय फेर सब बिरथा हो जावत रिहिस।
एक बेर दुखिया के घर एक झन मंगन जोगी आइस। ओहा दुखिया ला देख के ओखर दुख ला जान डारिस। कुतन्नीन वाला बात ला घला जान डारिस। दुखिया ह ओ बात ला लुकाय के उदिम करिस फेर जोगी ह सब बात ला कहि दिस। दुखिया ओखर पांव में गिरगे अउ किहिस- बबा! टाप मन तो अर्नयामी अव तइसे लागथे। मोर पाप ला सबो ला जानतथव अब ये श्राप ले मुक्ति होय के मोला कहीं उदिम बतावव।
जोगी किहिस बेटी- मैहा तोला अषिश देवत हवं कि ये पइत तोर गरभ ह नइ गिरय। तोर घर बेटा जनम होही। फेर जब ओहा थोड़किन बड़े बाढ़ जही तब जउन चीज के मांग करही तउन ला पूरा करबे तभे ओहा जियत रही नइ ते फेर भगवान घर चल दिही। मांग ला पूरा कर सकबे तब बता नही ते मोला बिदा कर।
दुखिया ह संतान सुख पाये बर सबो के किसम के मांग पूरा करे बर तैयार होगे अउ ओ जोगी ला लइका के मांग ला पूछिस। जोगी किहिस-बेटी! ओहा सावन भादो टेंषू के फूल खेलहूँ कहि, छानी ऊपर होरा भूँजहूँ कहि, चलती डोंगा ऊपर पकाय खीर खाहूँ कहि अउ तीजा के फरहार के दिन चिखला में खेलत-कूदत आके नवा लुगरा पहिरे अपन फुफू के कोरा म बइठहूँ कहि। ये सबला पूरा करहूँ कहिबे तभे तोर लइका ह जिहीं, समझगेस ना? ये साल के कमरछठ में भगवान षिव के तीर अपन अवइया औलाद के ये सब मांग ला पूरा करहूँ कहिके कबूलबे त अवइया कमर छठ तक तोर कोरा हरिया जही बेटी। अतका बता के जोगी ह अपन बिदा मांगिस अउ दुखिया के घर ले निकलगे।
कमरछठ के दिन जोगी के बताय मुताबिक सबो विधि विधान ले पूजा करके दुखिया ह इही सब बात ला षिव जी तीर कबूलिस अउ सिरतोन म अवइया कमरछठ तिहार तक ओखर कोरा हरियागे। लइका ह जइसे-जइसे बाढ़त गिस तइसे-तइसे ओहा ऊटपटांग मांग करत जाय। दुखिया ला जोगी ह पहिली ले बता डारे रहिस। दुखिया अपन बेटा के सब मांग ला पूरा करिस। अब लइका जवान होके बने खइस कमाइस राज करिस। जइसे दुखिया के दिन बहुरिस तइसे सब के दिन बहुरय। बोलो कमरछठ भगवान की जय।

वीरेन्द्र सरल
बोड़रा ( मगरलोड़)
जिला-धमतरी।



कमरछठ कहानी – सातो बहिनी के दिन

-वीरेन्द्र ‘सरल‘
एक गांव में सात भाई अउ एक बहिनी के कुम्हार परिवार रहय। सबो भाई के दुलौरिन बहिनी के नाम रहय सातो। एक समे के बात आय जब आशाढ़ के महिना ह लगिस। पानी बरसात के दिन षुरू होईस तब कुम्हार भाई मन पोरा के चुकी-जांता, नंदिया बइला अउ गणेष भगवान के मूरती बनाय बर माटी डोहारबो कहिके गाड़ी में बइला ला फांदिन अउ गांव के बाहिर खार डहर चले लगिन। उही बेरा में नानकिन बहिनी सातो घला माटी डोहारे बर जाहूँ कहिके जिद करे लगिन। मयारूक भाई-भौजाई मन, तैहा झन जा नोनी बड़े बाढ़बे तब जाबे कहिके ओला अड़बड़ छेकिन फेर सातो ह मानबे नइ करिस। हार खाके भौजाई मन नानकुन टुकना ला ओखर मन मढ़ाय बर ओखर मुड़ में बोहा दिन अउ अपन संग में लेगे लगिन। सातो बने एक मन के आगर अपन नान-नान पांव में बड़े भौजी के अछरा ला धरके ठुबुक-ठुबुक रेंगे लगिस।
गाँव के बाहिर खार में एक ठन तरिया रहय उही तीर के करिया माटी ला कुम्हार भाई मन मूरती बनाय बर डोहारे। सबो झन उहाँ पहुँच के माटी खने लगिन। सातो घला अपन ननची कुदारी में माटी के खने लगिस। नानकुन लइका काय जाने बपरी ह, भोरहा में उहीं मेरन के भुड़ू ला खन पारिस। ओ भुड़ू म नाग-नागिन के बसेरा रहय। अभी उहां नाग-नागिन मन तो नइ रिहिन, चारा चरे बर गे रिहन फेर सातो के कुदारी के मार में ओखर जम्मो पिला मन मरगे। माटी ला गाड़ी बइला अउ टुकना चरिहा में भरके कुम्हार परिवार अपन घर लहुटगे।
येती जब नाग-नागिन मन चारा चरके अपन भुड़ू में लहुटिन तब अपन घर के दषा अउ अपन पिला मन ला मरे देख के उखर आत्मा कलपकगे। ओमन श्राप दे दिन कि जा रे बैरी हो जउन ह मोर पिला मन ला मारे हे तइसने ओखरो पिला ह मर जाय।
अइसने अइसने गजब दिन बीतगे। सातो बने मोटियारी होगे। बने असन सगा देख के सातो के भाई मन बने धूमधाम से ओखर बिहाव कर दिन। सातो ह अपन मइके ले बिदा होके ससुरार आगे। साल भर बीतिस तहन बने अम्मल मे रहिगे। नव ले दस पुरिस तहन बने सुघ्घर असन बेटा ला जनम दिस फेर थोडिक दिन में ही ओखर बेटा ह मरगे। अइसने-अइसने कई बेर ले सातो के लइका मन जनम धरे अउ मर जाय। सातो के जिनगी पहाड़ कस होगे।
सातो के घर गोसान ह एक झन पहुँचे हुए जोगी बबा तीर अपन दुख ला बताइस तब ओहा विचार करके नाग-नागिन के श्राप ला जान डारिस। ओहा एखर कटाव करे बर किहिस- तोर लइका मन सांप के डसे से मर जथे। ये साल के कमरछठ उपवास बर सातो ला कहिबे कि ओहा कमरछठ उपवास के बाद जब घर आही तब कमरछठ भगवान के परसाद लई ला कोन्हो भुडू ले बगरावत अपन घर तक लानही। भुडू तीर जाके नाग-नागिन के पूजा-पाठ करके अपन ननपन के गलती बर क्षिमा मांगही। तब तोर घर में कोन्हो परकार के अल्हन नइ आय अए तोर लोग-लइका मन ऊपर कोन्हो विपत नइ आय।
घर गोसान ह घर पहुँच के सबो बात ला सातो ला बताइस तब ओला अपन ननपन के बात ह सुरता अइस। ओहा कमरछठ के दिन जोगी बबा के बताय मुताबिक कमरछठ भगवान के उपवास रिहिस अउ भिंभोरा तीर जाके नाग-नागिन के पूजा करिस अउ अपन अनजाने गलती बर क्षिमा माँगिस। अवइया साल तक सातो के कोरा फेर हरियाइस अउ कोन्हो परकार के अल्हन नइ आइस। अब ओखर सबो लइका मन जियत-जागत सुख के दिन बिताये लगिन। जइसे सातो के दिन बहुरिस तइसने सबो के दिन बहुरय। बोलो कमरछठ भगवान की जय।



कमरछठ कहानी : बेटा के वापसी

– वीरेन्द्र ‘सरल‘
एक गांव में एक झन मालगुजार रहय। ओखर जवान बेटा ह अदबकाल में मरगे रहय। मालगुजार ह अपन ओ बेटा ला अपन पूर्वज मन के बनाय तरिया जउन ह गांव के बाहिर खार में रहिस उहींचे ओला माटी दे रिहस।
उहीच गांव में एक गरीब पहटिया रहय जउन ह मालगुजार घर के गाय-भंइस ला चराय। जेखर एक झन मोटीयारी बेटी रहय। जउन ह घातेच सुघ्घर रिहिस। फेर काय करे बपरी ह गरीबी के सेती उही तरिया के तीर में रोज गोबर अउ लकड़ी बिने बर जाय।
एक दिन मंझनिया के बेरा निचट सुनसनहा समें मे ओ नोनी ह गोबर बिनत रहिस। तभे ओला कोन्हो नौजवान टुरा ह हांक पारिस, नोनी ह डर्रागे। लहुट के देखिस तब एक झन बड़ा सुघ्घर टुरा ला देख के दंग रहिगें ओ लड़का कहिस-तै डर्रा झन नोनी, मैंहा तुहंर गांव के मालगुजार के बेटा अवं। मोला गजब पियास लागत हे। पानी-कांजी धरे होबे ते थोकिन दे। मालगुजार के बेटा ह मरगे हे कहिके नोनी ह जानत नइ रिहिस। ओहा पानी ला दिस। अब तो रोज के इही बात होगी। दुनो झन एक दूसर के रूप रंग ला देख के मोहागे। ओमन में परेम होगे। मिले बिना उखर मन नइ माढ़े। दिन ते दिन अब रतिहा घला मालगुजार के बेटा के आत्मा ह जियत जागत मनखे अस पहटिया के नोनी के कुरिया म पहुंच जाय। फेर उखर परेम ला कोन्हो जानबे नइ करय। नोनी के छोड़ मालगुजार के बेटा कोनहो ला नइ दिखय।
अइसने-अइसने गजब दिन बीतगे। पहटिया के नोनी अम्मल में रहिगे। जब ये बात के पता गांव वाला मन ला चलिस तब गांव में बइठका होय लगिस। नोनी ला लइका के बाप के नाव पूछे जाय तब ओहा मालगुजार के बेटा के नाव ले। गांव के मनखे मन ओला समझावय कि ओहा तो मरगे हावे फेर नानी ह मानबे नइ करय। गांव वाले मन ओला बही-भूतही समझे लगिन। मालगुजार घला अचरज में पड़गे रहय। गांव वाले मन के ताना के मारे ओ नोनी के जीव हलाकान होगे।
बिहान दिन ओहा जब तरिया तीर मालगुजार के बेटा संग भेंट होईस तब सब बात ला बता के रोय लगिस। मालगुजार के बेटा किहिस-अरे बही! गांव के मन मोला मरगे हे समझथे। मोर देहे ह मरे हावे, आत्मा तो जियत हे। काली कमरछठ के तिहार आय। इहां ले जाके मोर दाई ला कहिबे कि वोहा कमरछठ के उपास रहिके षिव जी के पूजा पाठ करही अउ उहां ले आके पिंवरी पोतनी में मोला मारही तहन मैहा सउंहत जीं जाहूं। पहटनीन नोनी घर आके मालगुजारिन ला सब बात ला बता दिस। कमरछठ के दिन मालगुजारिन ह तरिया पार में खड़े अपन बेटा के कनिहा में पोतनी मारिस। तहन बेटा ह राम राम कहत जींगे। गांव भर में खुषी हमागे। जइसे मालगुजारिन के दिन बहुरिस तइसने सब के बहुरय। बोलो कमरछठ भगवान की जय।



लोक कथा : लेड़गा के कड़ही

– वीरेन्द्र ‘सरल‘
एक गांव म एक झन डोकरी रहय। डोकरी के एक झन बेटा रहय, गांव भर के मनखे ओला लेड़गा कहय। लेड़गा ह काम-बुता कुछु करय नहीं बस गोल्लर कस झड़के अउ गली-गली किंजरय। डोकरी बपरी ह बनी-भूती करके अपन गुजर-बसर करत रहय। एक दिन डोकरी ह किहिस-‘‘ कस रे धरती गरू लेड़गा। अब तो तैहा जवान होगे हस अउ मोर जांगर थकगे हे। कहीं काम-धाम नइ करबे तब हमर गुजारा कइसे होही? तोर देहें पांव भर बाढ़े हे अक्कल-बुध ला घला बढ़ाके कुछु काम करबे तभे तो जिनगी चलही।
फेर लेड़गा ह तो लेड़गा रहय। फकत नाम के नहीं बल्कि पक्का काम के घला। अपन संगी -जहुंरिया मन के बिहाव होवत देखे तब उहू ला अपन बिहाव करे के साध लागे। गांव म जेखर घर बिहाव होवय, उहां लेड़गा ह बिहाव के झरत ले अपन अड्डा जमा देवय। लेड़गा ह बिहाव के नेंग-नता ल बड़ा धियान से देखे तब सगा सोदर मन ओला तहु बिहाव कर ले कही के भड़का देवय।
अइसने दूसर मन के भड़कौनी म आ के लेड़गा ह एक दिन अपन घर म जाके टुटहा खटिया ला बिछा के मुंहू फुलोय सुतगे। ओखर दाई ह रोजी-मंजूरी करके घर अइस तब लेड़गा ल रिसाय देख के पुछिस-‘‘ कस रे गड़उना, आज काय होगे तेमे मुंहू फुलोय रिसाय हस।‘‘
लेड़गा किहिस-‘‘गांव भर के सबो मोर जहुंरिया टुरा मन के बिहाव होगे हे। मोरे भर बांचे हे। गांव भर के मनखे मोला डिड़वा भगत कहिके भड़काथे। अब तैहा मोर बिहाव करबे तभे मेंहा जिंहू नहीं ते अन्न-पानी त्याग के मर जहूं।‘‘




लेड़गा के गोठ ला सुनके, डोकरी के हँसई के मारे पेट फूलगे। डोकरी किहिस-‘‘ अरे लेड़गा तैहा नान-नान बात बर रिसा जथस। अरे, तोर संगवारी मन के बिहाव तो अभी होवत हे मैहा तो तोर बिहाव ला ननपन म कर दे हवं। अब तै सज्ञान होगे हस तब जा अउ बहुरिया ल लेवा के ले आ। डोकरी ह लेड़गा के ससुरार के पता ठिकाना , नाव-गांव सब ला बता दिस। अपन बिहाव के बात सुनके लेड़गा खुश होगे।
बिहान दिन डोकरी ह चुनी-भुंसी के रोटी रांध दिस अउ मोटरी म जोर के लेड़गा ल दे दिस। लेड़गा अपन ससुरार गांव जाय बर घर ले निकलगे।
बिहनिया के रेंगत-रेंगत लेड़गा ह संझाती अपन ससुरार घर म पहुँचिस। दमाद बाबू दुलरू ला आय देख के ओखर सास-ससुर मन घला खुश होगे। रतिहा लेड़गा के सास ह बने बड़ा, भजिया, खीर सोंहारी रांधिस अउ अम्मट म डुबकी-कड़ही के साग बना दिस। लेड़गा बाप पुरखा कडही, डुबकी-बफौरी के साग खाय नइ रिहिस। ओला डुबकी के साग अड़बड़ मिठाइस। लेड़गा ह अपन सास ल साग के नाव अउ एला बनाय के विधि पुछिस अउ मने मन गुनिस घर पहुँच के दाई ल अइसनेच साग रांधे बर कहूं अउ मनमाने झड़कहूं। गोठ-बात करत रतिहा ह बीतगे। बिहान दिन लेड़गा ह गौना के बात करिस तब ओखर सास ससुर मन किहिन-‘‘दमाद बाबू अभी तो हमन बेटी के जोखा-तोरा करे नइ हन। तुमन उदुप ले आय हव। थोड़किन समे अउ देवव। हमन बेटी के जोखा करके तुमन ला संदेश भेजबो तहन ले बर आ जाहू। लेड़गा ह हव कहिके उहां ले घर आय बर निकल गे।
बरसात के समय रहय रतिहा पानी गिरे रहय। रस्ता म चिखला माते रहय फेर लेड़गा के दिमाग म तो खाली कड़ही के साग रहय। ओहा नाव ल झन भुला जावं कहिके कडही-कड़ही कहत रस्ता रेंगत रहय।
एक जगह मेड़ के मुंही पार ल कूद के नहकत लेड़गा बिछ्छल के गिरगे अउ कड़ही के नाव ल भुलागे। लेड़गा ह समझिस साग के नाव ह इही मेरन गंवा हे। ओहा मुही के पानी म उतर के कड़ही के नाव ला खोजे लगिस। लेड़गा ला गजब बेरा ले कुछु खोजत देख के सब खेत के कमइय्या मन सकलागे। एक झन किसान ह पूछिस-‘‘ काय गंवागे हे भैया। अड़बड़ बेर के खोजत हस।‘‘
लेड़गा किहिस-‘‘अरे गोल-गोल ग बबा। पिंयरे-पिंयर रहिथे। उही ह गंवाय हे तउन ल खोजत हव।‘‘
कमइय्या मन सोचिन-‘‘गोल-गोल, पिंयरे-पिंयर कथे बुजा ह। कहूँ सोन के डल्ला ल तो नइ गवांय होही? सोन के डल्ला के लालच म सब कमइय्या मन घला खोजे बर भिड़गे। खोजत-खोजत ऊवत के बुड़त होगे। संझा होइस अउ सब झन थकगे तब एक झन सियनहीन दाई कहिस-‘‘ ये मेरन के चिखला ह खोजई के मारे दही के मही कड़ही होगे ओ फेर काय गंवाय हे तउन ह मिलबे नइ करिस।
कड़ही के नाव सुन के लेड़गा खुश होके नाचे लगिस अउ मिलगे-मिलगे कही के पल्ला भागिस। सब कमइय्या मन सोन के डल्ला ल झटकबो कहिके लेड़गा ल अउ़बड़ कुदाइस फेर अमराबे नइ करिन। लेड़गा ह कड़ही-कड़ही कहत भागगे।



लोक कथा : लेड़गा मंडल

– वीरेन्द्र ‘सरल‘
एक गांव म एक झ लेड़गा रहय। काम बुता कुछ नइ करय। ओखर दाई ओला अड़बड़ खिसयावय। लेड़गा के दाई जब सियान होगे अउ लेड़गा जवान, तब रिस के मोर डोकरी ओला अड़बड़ गारी-बखाना दिस। लेड़गा हाथ जोड़के किहिस-‘‘ले दाई अब जादा झन खिसया। काली ले महुं कुछु बुता काम करके चार पैसा कमा के तोर हाथ में दुहूं। डोकरी खुश होगे अउ बिहान दिन आज मोर बेटा ह कमाय बर जाही कहिके लेड़गा बर सात ठन मुठिया रोटी रांध के मोटरी म जोर दिस। लेड़गा रोटी ल धरके कमाय बर जावत हवं कहिके घर ले निकल गे। फेर जनम के अलाल अउ कोढ़िया, कहीं काम बूता ला तो जानय तको नहीं। ओखर आदत बेवहार ला जान के कोन्हों ओला अपन संग काम म लेगबे नइ करिन। लेड़गा के मन म दाई के डर समागे। ओहा दूसर गांव डहर रेगें लगिस अउ उहां के खार के एक तरिया पार म पीपर रूख के छइहां म बइठगे।
मंझनिया के बेरा रहय। निचट सुनसान। न चिरई-चींव करे न कौआ कांव। लेड़गा ल भूख लागिस तब ओहा दाई के जोरे मोटरी के रोटी ला निकालिस अउ लालच के मारे रोटी ल गिन-गिन के चिचिया के कहय-‘‘एक ला खांव के कि सातो ल खांव। एक ला खांव कि सातो ल खांव। एक ला —-।‘‘




लेड़गा ह जउन पीपर के छइहां म बइठे रहय। ओमें सतबहिनी रहय। लेड़गा के गोठ ला सुनके सतबहिनी मन डर्रागे। ओमन लेड़गा ला कोनहो बइगा-गुनिया समझिन। एक झन सत बहिनी ह परगट होके किहिस-‘‘कस भैया, हमन तोर काय बिगाड़े हन जउन तुमन घेर-बेरी एक ला खावं कि सातो ला खांव कहत हव। हमन ला झन खा भैया, येदे मैं तुमा देवत हवं तेला रख ले। येमें हीरा मोती , पन्ना-पुखराज, सोना-चाँदी के दाना भराय हे। येला ले जा, तोर सबो गरीबी ह दूरिहा जाही अउ तैहा मंडल हो जबे।‘‘
लेड़गा ह तुमा ला धर के अपन गांव डहर रेंगिस। अउ खुशी के मारे सबले पहिली अपन मितान घर जाके सतबहिनी मन के कहे बात ला बता दिस। ओखर मितान-मितानिन मन लालच म आगे। सतबहिनी मन के दे तुमा ला लुकादिन अउ दूसरा तुमा ला लेड़गा के आघू म काट के देखावत किहिन-‘‘ ‘‘देखे, येमे तो कुछ नइ हे। सतबहिनी मन तोला ठग दिन, समझे?‘‘ लेड़गा सतबहिनी मन ला गारी देवत अपन घर पहुंचिस। लेड़गा के जाय के बाद ओखर मितान-मितानिन मन तुमा ला काट के देखिन तब बक खागे। सिरतोन म ओमे हीरा-मोती, पन्ना-पुखराज, सोना-चांदी के दाना भराय रहय।
येती लेड़गा फेर बिहान दिन अपन दाई ला सात ठन मुठिया बनाय बर किहिस अउ ओला धरके सोझे उही तरिया पार के पीपर पेड़ के छइंहा म जाके बइठगे। अउ एक ला खांव कि सबो ला खांव कहिके के चिचियाय लगिस।
फेर एक झन सतबहिनी ह परगट होके पुछिस-‘‘अब काय होगे। काली तुमा दे रहेन तेहा कहां हे?‘‘ लेड़गा अपन मितान घर के सब बात ला सफा-सफा बता दिस। ये बखत ओ सतबहिनी ह लेड़गा ला एक ठन बोकरा देवत किहिस-‘‘ ये दे, येला ले जा। ये बोकरा ला गुदगुदाबे तहन बोकरा ह सोने-सोन के मोहर ला उछरही। सब ला सकेल ले बे तहन तोर गरीबी दूर हो जही।‘‘
लेड़गा ह बोकरा ला धर के अपन घर आवत रिहिस। ये बखत ओखर मितान ह पहिलीच ले लेड़गा के अगोरा करत अपन घर के मोहटी म खड़े रहय। लेड़गा ला बोकरा धर के आवत देख के ओहा खुश होके जय-जोहार करिस अउ लेड़गा ला अपन घर ले आनिस। मितान जान के लेड़गा ह सब बात ला बता दिस। मितान ह लेड़गा ल चाहा गुड लाने बर दुकान भेज दिस अउ सतबिहनी मन के दे बोकरा ला लुका के वइसनेच दूसरा बोकरा ल ला के बांध दिस। लेड़गा दुकान ले लहुटिस। तहन बोकरा ला गुदगुदाय। अब नकली बोकरा ह कहां ले सोन के मोहर उछरय। मितान किहिस-‘‘सतबहिनी मन फेर तोला ठग दिन।‘‘
अब लेड़गा के जीव बगियागे। एड़ी के रिस तरवा म चढ़गें। ओहा सतबहिनी मन ला गारी देवत बिहान दिन फेर सरी मंझनिया सात ठन मुठिया धरके उही पीपर पेड़ मेरन पहुँचिस अउ चिचिया के किहिस-‘‘आज तो एको झन ल नइ बचावंव, सातो के सातो ल खाहूँ।‘‘
डर के मारे सातो बहिनी मन परगट होके हाथ जोड़के खड़े होके किहिस-‘‘अब काय कम पड़गे?‘‘
लेड़गा किहिस-‘‘तुमन जउन बता के देथव ओमन सबो नकली आय न तुमा म हीरा-मोती भराय हे अउ न बोकरा ह सोन के मोहर उछरय।
बड़े सतबहिनी ह जान डारिस ये सब एखर मितान के करस्तानी आय। असली जिनिस ल लुका देथे अउ येला नकली ल धरा देथे। ये बखत ओहा एक ठन नानकुन डिबिया ल देके किहिस-‘‘आज सबले पहिली अपन मितान घर जाबे अउ बताब, येमे संसार के सबले कीमती जिनिस हे।‘‘
लेड़गा ओ डिबिया ल धरके लहुटगे। अउ सबले पहिली अपन मितान घर पहुँच के सब बात ला सफा-सफा बता दिस। ललचाहा मितान ओ डिबिया ल तुरते अपन कुरिया म ले जा के खोलिस। डिबिया खुलते साठ ओमे भराय केवास ह उड़ा के मितान-मितानिन के देहें म चटकगे अउ मनमाने खजवाना शुरू करिस। अड़बड़ दवई -पानी लगाइस फेर खजरी माढ़बे नइ करिस। मितान-मितानिन मन जान डारिन ये देवतहा केवास आय। जब तक लेड़गा के असली तुमा अउ बोकरा ल नइ लहुटाबो तब तक ये खजरी माढ़ने वाला नइ हे। ओमन लेड़गा के गोड़ म घोलंड के माफी मांगिन अउ ओखर असली जिनिस ल लहुटाइन तभे उखर खजरी माढ़िस।
लेड़गा ह असली तुमा अउ बोकरा ल लेके अपन घर पहुँचगे। तुमा ला काट के देखिस तब सिरतोन म ओमें हीरा-मोती, पन्ना-पुखराज अउ सोना-चांदी भराय रहय। थोडेच दिन म लेड़गा ह मंडल होगे अउ अतराप भर म लेड़गा मंडल के नाव म प्रसिद्ध होगे।