बसंती ह अपन गोसइन बुधारू ल समझात रहिथे के – तेंहा रात दिन दारू के नशा में बुड़े रहिथस।लोग लइका घर दुवार के थोरको चिंता नइ करस ।अइसने में घर ह कइसे चलही ।दारू ल छोड़ नइ सकस ? बुधारू ह मजाक में कहिथे – मेंहा तो आज दारू ल छोड़ देंव वो। बसंती चिल्लाथे — कब छोड़े हस, कब छोड़े हस ? फोकट के छोड़ देंव कहिथस । बुधारू – अरे आज होटल में बइठे रेहेंव न,आधा बाटल दारू ल उही जगा छोड़ देंव । बसंती — हाँ तेंहा…
Read MoreYear: 2017
होली आवत हे
आगे बसंत संगी,आमा मऊरावत हे बाजत हे नंगाड़ा अब,होली ह आवत हे । कुहू कुहू कोयली ह,बगीचा में कुहकत हे। फूले हे सुघ्घर फूल, भंवरा रस चुहकत हे। आनी बानी के फूल मन,अब्बड़ ममहावत हे। बाजत हे नंगाड़ा अब,होली ह आवत हे। लइका मन जुर मिल के, छेना लकड़ी लावत हे। अंडा के डांग ल,होली में गड़ियावत हे। नाचत हे मगन होके, फाग गीत गावत हे। बाजत हे नंगाड़ा अब,होली ह आवत हे। डोरी ल लमाके सबो, रसता ल छेंकत हे। कोन आवत जावत तेला, सपट के देखत हे। भुलक…
Read Moreचलती के नाम गाड़ी, बिगड़ गे त…
बहुत साल पहिली किसोर कुमार, असोक कुमार अउ अनूप कुमार तीनों भाई के एक ठन फिलिम आय रहिस हे- चलती के नाम गाड़ी। फेर वोखर बाद के लाईन ल कोनो नई बतावय। मैं बतावत हों चलती के नाम गाड़ी बिगड़ गे त खटारा। टेटकू बैसाखू ल कार में घूमत देख के एक दिन महूं सोंचेव कि का मैं उंखरों बरोबर नइ हौं? तब मोर सुभिमान ह अपन आंखी खोलिस अउ सपना ले झकना के डर्राय लइका बरोबर जाग गेंव। मोर सुभिमान हा मोला धिक्कारिस, अरे सेकण्ड किलास आफिसर होय के…
Read Moreदान लीला के अंश : पं. सुन्दरलाल शर्मा
पं. सुन्दरलाल शर्मा ल छत्तीसगढी़ पद्य के प्रवर्तक माने जाथे। सबले पहिली इमन छत्तीसगढी़ मं ग्रंथ-रचना करिन अउ छत्तीसगढी़ जइसे ग्रामीण बोली (अब भाषा) मं घलोक साहित्य रचना संभव हो सकथे ए धारणा ल सत्य प्रमाणित करे गीस। इंखर ‘दान लीला’ ह छत्तीसगढ मं हलचल मचा दे रहिस हे। ओ समें कुछ साहित्यकार मन इंखर पुस्तक के स्वागत करिन अउ कुछ मन विरोध तको करिन। मध्यप्रदेश के ख्याति प्राप्त साहित्यकार पण्डित रघुवरप्रसाद द्विवेदी ह ओ समें के ‘हितकारिणी पत्रिका’ मं ए पुस्तक के अड़बड़ करू आलोचना करिन। तेखर बाद भी…
Read Moreसावन सरल सारदा मैया : जगन्नाथ प्रसाद भानु
आप बिलासपुर के निवासी रहेव। आप मध्यप्रदेश शासन म उच्च अधिकारी रहेव। आपला मातृभाषा हिन्दी उपर बडा़ अनुराग रहिस। इंखर अधिकांश समय साहित्य-सेवा म बीतय। काव्य उपर इंखर अड़बड़ प्रेम रहिस अउ आप काव्य शास्त्र के बड़े ज्ञाता घलव रहेव। ‘छन्द प्रभाकर’ अउ ‘काव्य प्रभाकर’ इंखर काव्यशास्त्र संबंधी प्रसिद्ध ग्रंथ आए। उर्दू म इंमन ‘फैंज’ उपनाम ले कविता घलव लिखें हें। छत्तीसगढी़ म इंमन माता जस/सेवा गीत लिखें हें जउन ह ‘श्री मातेश्वरी सेवा के गुटका’ नाम के संग्रह म उपलब्ध हे। इंखर माता जस/सेवा गीत के उदाहरण प्रस्तुत हे-…
Read Moreतुम करहु जैसे जौन : प्राचीन कवि प्रहलाद दुबे
प्रहलाद दुबे सारंगढ के रहईया रहिन। सत्रहवीं शताब्दी के आखरी म इमन ‘जय चन्दिका’ लिखे रहिन। एमा संबलपुर के राज-वंश के वर्णन हावय। इखंर भाषा म व्रज, बसवाडी अउ छत्तीसगढी़ के मेल हे। इंखर कविता के एक उदाहरण देखव- तुम करहु जैसे जौन, हम हवें सामिल तौन। महापात्र मन मंह अन्दाजे, हम ही हैं सम्बलपुर राजे।। राजकुमार हिये अन्ताजेव, सोमला मन्दिर जाई बिराजेव। एको निसर जान नई पैहे मूढ़ में गड़रगप्प ह्वै जैहे । क्या जानी क्या होय, बौहों काहे सिर बद्दी। (परिचय डॉ.दयाशंकर शुक्ल : छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का अध्ययन…
Read Moreहिरदे जुडा ले आजा मोर गांव रे : डॉ. विनय कुमार पाठक के गीत
जिहाँ जाबे पाबे, बिपत के छांव रे। हिरदे जुडा ले आजा मोर गांव रे॥ खेत म बसे हावै करा के तान। झुमरत हावै रे ठाढे-ठाढे धान॥ हिरदे ल चीरथे रे मया के बान। जिनगी के आस हे रामे भगवान॥ पीपर कस सुख के परथे छांव रे। हिरदे जुडा ले, आजा मोर गाँव रे ॥ इहाँ के मनखे मन करथें बड़ बूता। दाई मन दगदग ले पहिरे हें सूता॥ किसान अउ गौटिया, हावैं रे पोठ। घी-दही-दूध-पावत, सब्बे रें रोठ॥ लेवना ल खांव के ओमा नहाँव रे। हिरदे जुडा ले, आजा मोर…
Read Moreत्रिवेणी संगम म शाही स्नान के साथ राजिम महाकुंभ कल्प के होय समापन
बिहनिया साधु-संत मन के निकली भव्य शोभा यात्रा धर्मस्व मंत्री श्री अग्रवाल ह संगम म लगाईस डुबकी साधु-संत मन संग शोभा यात्रा मं होइस सामिल रायपुर, 25 फरवरी 2017। छत्तीसगढ़ के प्रयागराज राजिम मं महानदी, पैरी अऊ सोंढूर नदिया मन के पवित्र संगम मं चलत राजिम महाकुंभ कल्प के कल महाशिवरात्रि पर्व म साधु-संत मन के शाही स्नान के अनुष्ठान के संग ही समापन हो गइस। नागा साधु मन अऊ आन साधु-संत मन सहित हजारों श्रद्धालु मन हर आज महाशिवरात्रि पर्व म संगम के शाही स्नान कुंड मं पावन स्नान…
Read Moreहोरी हे रिंगी चिंगी
रंग मया के डारव संगी फागुन के महिना रिंगी चिंगी रंगरेलहा अउ बेलबेलहा बरोबर हमर जिनगी मा समाथे। जिनगी के सुख्खा और कोचराय परे रंग मा होरी हा मया-पिरीत,दया-दुलार,ठोली-बोली,हाँसी-ठिठोली के सतरंगी रंग ला भरथे। बसंत रितु हा सरदी के बिदा करे बर महर-महर ममहावत-गमकत गरमी ला संगवारी बनाके फागुन के परघनी करथे। फागुन के आये ले परकीति मा चारों खूँट आनी-बानी के रिंगी-चिंगी रंग बगर जाथे। गहूँ के हरियर रंग,सरसों के पिंयर रंग,आमा मँउर के सोनहा रंग,परसा के आगी बरन लाली रंग,जवाँ,अरसी फूल अउ अँगना मा गोंदा, गुलाब,किसिम-किसिम के फूल…
Read Moreकहानी : अंधविसवास
असाढ के महिना में घनघोर बादर छाय राहे ।ठंडा ठंडा हावा भी चलत राहे ।अइसने मौसम में लइका मन ल खेले में अब्बड़ मजा आथे। संझा के बेरा मैदान में सोनू, सुनील, संतोष, सरवन, देव,ललित अमन सबो संगवारी मन गेंद खेलत रिहिसे। खेलत खेलत गेंद ह जोर से फेंका जथे अऊ गडढा डाहर चल देथे । सोनू ह भागत भागत जाथे अऊ गडढा में उतर जथे ।ओ गडढा में एक ठन बड़े जान सांप रथे अऊ सोनू ल चाब देथे ।सोनू ह जोर जोर से अब्बड़ रोथे अऊ रोवत रोवत…
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