एक गाँव में एक झन बुधारू नाम के मनखे राहे ।वोहा बचपन से अलाल रहे।ओकर दाई ददा ह ओला इस्कूल जाय बर अब्बड़ जोजियाय ।त बुधारू ह अपन बस्ता ल धर के निकल जाय,अऊ चरवाहा टूरा मन संग बांटी भंवरा खेलत राहय।छुट्टी होय के बेरा में फेर बस्ता ल धरके अपन घर आ जाय । बुधारू ह जइसे – जइसे बाढ़त रिहिस ओकर आदत ह बिगड़त जात रिहिस ।वोहा अपन संगवारी मन संग लुका – लुका के बिड़ी अऊ गांजा पीये ।तम्बाकू अऊ गुटखा घलो खाय।कोई कोई लइका मन ह…
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छत्तीसगढ थापना परब अउ बुचुआ के सुरता
सोला साल के राज्य के स्थापना दिवस बर एक जुन्ना कहानी- बुचुआ के गांव म एक अलगे धाक अउ इमेज हे, वो हर सन 68 के दूसरी कक्षा पढे हे तेखरे सेती पारा मोहल्ला म ओखर डंका बाजथे । गांव के दाउ मन अउ नवां नवां पढईया लईका मन संग बराबर के गोठ बात करईया बुचुआ के बतउती वो हर सन 77 ले छत्तीसगढ राज के सपना संजोवत हे तउन ह जाके 2000 म पूरा होये हे । सन 1977 म मनतरी धरमपाल गुप्ता के झोला मोटरा ल धरईया बुचुआ…
Read Moreलोक कथा चन्दन के पेड़
एक राज में एक राजा राज करय। राजा के आधा उमर होगे रहय फेर एको झन सन्तान नइ रहय। संतान के बिना राजा-रानी मन ला अपन जिनगी बिरथा लागय। रात-दिन के संसो-फिकर में उखर चेहरा कुम्हलागे रहय। एक दिन राजमहल में एक झन साधू अइस। राजमहल ला निचट सुन्ना देखके अउ रानी के चेहरा देख के ओहा रानी के दुख ला जान डारिस। साधु ह रानी ला किहिस-‘‘बेटी! तैहा जादा संसो झन कर। तोर भाग में संतान सुख लिखाय हावे। मैहा तोला एक ठउर के पता बतावत हवं, उहाँ आमा…
Read Moreलोक कथा : घंमडी मंत्री
एक राज में एक राजा राज करय। वो राज म अन्न-धन, गौ-लक्ष्मी, कुटुंब-परिवार के भरपूर भंडार रहय, सब परजा मन सुखी रहय। सबो कोती बने सुख संपत्ति रहय। कोन्हों ला कोन्हों किसम के दुख-पीड़ा नई सतावय। एक समे के बात आय। राजा के मंत्री मन ला बहुत घंमड होगे कि वो राज मे उंखर ले जादा बुद्धिमान जीव कोन्हों नइ हे। ओमन सब परजा ला मूरख समझे अउ सोचय कि राज के सुख षांति सब हमरे भरोसा म हावे। मंत्री मन के हाव-भाव ला देख के राजा जान डारिस कि…
Read Moreलोक कथा : कोपरी के महल
एक राज में एक राजा राज करय। राजा के छै झन रानी रहय फेर एको झन के लइका नइ रहय। एक झन संतान के बिना राजा ला राजपाट, धन-दोगानी, महल-अटारी सब बिरथा लागे। रातदिन राजा ह संसो में पडे रहय कि मोर बाद ये राजपाट के काय होही। संसो के सेती राजा के मुँहु करियावत रहय अउ काया ह लकड़ी कस सुखावत रहय। राजा के अइसन दसा ला देख के एक दिन मरदनिया ह किहिस-‘‘राजा साहेब! जादा संसो झन करव। एक बिहाव अउ कर लेव, हो सकथे करम में कहूँ…
Read Moreलोक कथा : जलदेवती मैया के वरदान
एक गाँव में एक साहूकार रहय। साहूकार के सोला साल के सज्ञान बेटी रहय। साहूकार के पूरा परिवार र्धािर्मक रहय। साहूकार के दुवारी में आय कोन्हों मंगन जोगी कभुदुच्छा हाथ नइ जावय। भूखन ला भोजन देना, पियासे ला पानी पिलाना अउ भटके ला रद्दा बताना साहूकार के परिवार ह सबले बड़े धरम समझे। साहूकार के बेटी निसदिन अपन कुल देवता के पूजा पाठ करके दान-पुण्य करय। कुछ दिन के बाद लड़की के बिहाव दूसर राज के साहूकार के बेटा संग होगे। ससुरार जाय के पहिली लड़की ह बने मन लगा…
Read Moreकमरछठ कहानी (1) – दुखिया के दुःख
वीरेन्द्र सरल एक गाँव में दुखिया नाव के एक झन गरीब माइलोगन रहय। जिनगी के आधा उमर सिरावत रहिस फेर आज ले ओखर कोरा सुन्ना रिहिस। गाँव के लइकोरी मन ओला ठाठा कहिके ताना मारे। काय करे बपरी ह सब के ताना ला कले चुप सहि के आँसू ढारत पहाड़ कस जिनगी ला पहावत रहय। एक बेर उखर बियारा में कुत्तनिन ह पिला जनमे रहय। दुखिया ह उही में के एक ठन पिला ला अपन घर ले आनिस पोसे लगिस। कोन जनी कुकर के ओ पिला के अइसे काय परताप…
Read Moreकमरछठ कहानी (2) – सातो बहिनी के दिन
वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गांव में सात भाई अउ एक बहिनी के कुम्हार परिवार रहय। बहिनी के नाम रहय सातो। एक समे के बात आय जब आशाढ़ के महिना ह लगिस। पानी बरसात के दिन षुरू होईस तब कुम्हार भाई मन पोरा के चुकी-जांता, नंदिया बइला अउ गणेष भगवान के मूरती बनाय बर माटी डोहारबो कहिके गाड़ी में बइला ला फांदिन अउ गांव के बाहिर खार डहर चले लगिन। उही बेरा में नानकिन बहिनी सातो घला माटी डोहारे बर जाहूँ कहिके जिद करे लगिन। मयारूक भाई-भौजाई मन, तैहा झन जा नोनी…
Read Moreकमरछठ कहानी (3) – मालगुजार के पुण्य
वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गाँव में एक झन मालगुजार रहय। ओहा गाँव के बाहिर एक ठन तरिया खनवाय रहय फेर वह रे तरिया कतको पानी बरसय फेर ओमे एक बूंद पानी नइ माढ़े। सुख्खा तरिया ला देख के देखइया मन मालगुजार ला करम छड़हा कहिके गारी देवय। मालगुजार के जीव बिट्टागे रहय। मालगुजार इही संसो फिकर में घुरत रहय। एक दिन ओला तरिया के देवता ह सपना दिस कि तैहा तोर दुधमुँहा नाती ला लानके मोरा कोरा म सौपबे तभे ये तरिया में पानी भरही। मालगुजार धरम संकट में फँसगे एक…
Read Moreकमरछठ कहानी(4) – देरानी -जेठानी
वीरेन्द्र ‘सरल‘ एक गाँव में एक देरानी अउ जेठानी रहय। जेठानी के बिहाव तो बहुत पहिलीच के होगे रहय फेर अभी तक ओखर कोरा सुनना रहय। अड़बड़ देखा-सुना इलाज-पानी करवाय फेर भगवान ओला चिन्हबे नइ करय। मइनखे मन ओला बांझ कहिके ताना मारे। जेठानी के जीव ताना सुनई में हलाकान रहय। सास-ससुर अउ ओखर गोसान तक ओला नइ भावय। ओहा निचट निर्दयी घला रहय काखरो लोग लइका ला नइ भाय। सब ला गारी बखाना दे। उहीच घर में जब ओखर देरानी ह बिहा के अइस तब साल भर में ओखर…
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