कहिनी : कोंदी केंवटिन

‘केंवटिन ह राम मंदिर बनवाए के सोचिस। महानदी के तीर एक राम मंदिर बनवाए के इच्छा ल अपन घर म बताइस त तियार तो सबे होगे। बात आइस पइसा-कौड़ी के। रात के अपन लोहा के पेटी ल सबके आगू कोंदी ह खोलिस त पेटी भर रुपिया पइसा देखके पूरा परिवार अकचकागे।’ ‘अना, उर्रा, आडू ले ला’ समान बेचवइया के अवाज ल सुनके सबे ल अटकरे बर परय कि येहा कोन ए, अउ का जिनिस बेचत हे। अतका जरूर पता चल जाए कि ऐहा कोई माई लोगन आय। घर ले बाहिर…

Read More

भाव के भूखे भगवान – नान्हे कहिनी

एक समे के बात आय, एक झन नानकुन लइका पेड़ तरी बइठे रहय अउ का जानी काय-काय बड़बड़ावत रहय। उही करा एक झन महराज रद्दा रेंगत पहुंचगे। वो ह देखिस वो लइका ह कुछु-कुछु अपने अपन बड़बड़ावत हे। वो ह पूछिस- कस बाबू तैं अकेल्ला बइठे काय बड़बड़ावत हस? वो लइका कथे महाराज! मोर दाई ह मोला कहे जे जब ते ह अकेल्ला रहस त भगवान सोज बात करे कर। वो काहना ल मान के ये ह भगवान कर गुठियावत रहेंव। लइका के बात ल सुनके महाराज ह कथे- सुन…

Read More

कहिनी – खिरकी के संध

भागो लाड़-दुलार म बाढ़े रहिस हे। ओखर दू झन भाई रहिस हे। ददा किसानी करय अउ दाई ह धूम-धूम के गांव के हर घर म कुछु न कुछु काम करय। अपन घर के कुआं, बारी म बहुत साग-भाजी लगाय रहिस हे। कांदा भाजी, कोचई पान, अम्मारी, पटवा, चेंच, खेड़हा, खीरा, चिरपोटी पताल अउ अंग्रेजी मिर्चा। छै एकड़ खेत रहिस हे तेला भागो के ददा गनपत ह कमावय। एक दिन बारी के बोहार के रुख म चघ के बोहार भाजी तोड़त-तोड़त भगवंतिन ह गिरगे। उही बेरा म ओखर परान छूटगे। बारह…

Read More

नान्हे कहिनी : सिसटाचार

गियारह बजे के बेरा आय। मिथलेस अपन संगवारी मनसन गोठियात जात राहे, त परकास कथे-कइसे रे मिथलेस ! तेंहा अड़बड़ दिन बाद कॉलेज आय हाबस। आजकल तोर दरसन दुरलभ होगे हाबे। कहां जाथस दिखस निही। त मिथलेस कथे- बहुत बियस्त होगे हाबों यार, सबो डाहर ल देखे ल पड़थे घर डाहर घलो अड़बड़ बूता रथे। सबो झन पढ़इया लइका मन अपन-अपन किलास म जात रथे। ओतकीच बेर कॉलेज के प्रिंसपल ह आ जथे, अउ मिथलेस ल देखके कथे- ‘आप मेरे आफिस में आइए।’ मिथलेस ह कोन ल काहत हे कहिके…

Read More

नान्हे कहिनी : लबारी

‘रामलाल कथे भाई मेहा दसमी पास होगेंव, ये ले मोर अंकसूची कहिके देखाय बर धरथे त देखथे पेपर ह ओकर ले गायब हो जाय रथे। वोला पेपर पढ़इया मन धरके लेग जाय रथे। रामलाल ल अड़बड़ दु:ख होथे। बिचारा के पीरा पहाड़ कस हो जथे।’ रामलाल बहुत खुश रिहिस अपन अंकसूची ल देखके वोला जतन के पेपर म तोप के अपन दुकान म लइस अपन बड़े भाई ल देखाये बर, भाई दुकान म नई राहे। अपन भाई के रद्दा जोहत-जोहत अंकसूची ल टेबुल म मड़ा दिस। ओखर भाई ह आ…

Read More

कहिनी : चटकन

‘ओ खाली परिया जमीन म न मंदिर बनाए जाय न मस्जिद बनाए जाय। ओमा एक अइसे आसरम बनाए जाए जेमा बेसहारा डोकरा, डोकरी, बइहा कस किंजरइया मनखे, अनाथ लोग लइका राहय। संग म गांव के अइसे मनखे जेखर गुंजाइस के लइक ठउर-ठिकाना नइ हे तउने मन ए आसरम म रहि सकंय। हिन्दू भाई अउ मुसलमान भाई आप मन मंदिर अउ मस्जिद बनवाए बर जउन चंदा सकेले हव तेला आसरम बनवाए बर लगा दव।’ सड़क तीर मा पीपर खाल्हे खाली परिया में जब बनही ते बजरंग बलीच के मंदिर बनही। ए…

Read More

नान्हे कहिनी : जिनगी के मजा

पुजारी जी अउ समझाईस बेटा दाई के मालिक के दया तो पहिली ले हे, तभे तो ये मनखे जोनी पाये हन, अतेक सुग्घर संसार म आय हन। अब ओखर संसार म आके, अपन घर-परिवार, अपन जिम्मेदारी ले भागना, बल्कि ओ मालिक के अपमान होथे, अउ फेर तें का समझथस। नवरात्रि के परब चल राहय। चहुं ओर जगमगावत राहय माता के जोत ले घोर निरासा म अपार आसा भरइया, दुख-दरद ल दूर करइया, भूले- भटके ल रद्दा देखइया माता के जोत ले। लगय जइसे जम्मो चांद-सितारा, सरग आगे हें धरती म…

Read More

नवा अंजोर कहिनी

नोनी मैं तो आन धर के छईहां नई खुंदे रहें, बुता करई तो जानते नई रहें। फेर मोर आदमी के बीते म जीनगी के ताना नना होगे। घर चलाय बर गहना गूंठा तक बेचागे। माय मइके मैं दिन के चार दिन बने राखही तहां…। नानमुन गोठ ह हूल मारे कस लागथे। एही पाय के मैं मिस्टरी बबा अउ रउतईन दाई संग-संग रांधे करे के काम करे लागे। कोनो काम छोटे बड़े नई होवै। काम करे म का के लाज। गांव के सियान मन कहिथें- परवार के बड़े अउ छोटे ल…

Read More

बाल कहिनी : अइसे धरिन चोर गोहड़ी

बाल कहिनी सबो चोरी ओतके बेर होथे, जतका बेर मनखे घर ले बाहिर रथे। ओहर घातेच बिचारिस त सुध आईस, जमे चोरी मं कोनो अवइया-जवइया नइते अइसे मनखे के हात हे, जेहर घर वाला मन के अवई-जवई ला जानथे। तहांले राहुल हर अपन जहुंरिया रमेश अउ वीरेश ल संघेरिस अउ किहिस हमला चोरहा मनके चिन्हारी करके, कुछु उदीम करना हे। वहू दूनो झक चोरी चपटी ले बगियाय राहंय। डॉ. राउत संझा कुन अपन सुवारी सन किंजरे बर निकलिन। घंटा भर मं लहुटिन ते खोर मुहांटी के तारा टूटे राहय। देख…

Read More

रूख लगाय के डाढ़ – कहिनी

एक झन पुराना बाबू कहिस रूख के बदला हमन ला रूख लगा के दिही। अब तुंहर काय विचार हे अब तुमन बतावव। गांव के पंच, सरपंच, मिलजुल के कहे लागिस। तुमन अपन अपन हाथ म बीस-बीस पेड़ तरिया के जात ले लगाहू, जेमा गांव हर पेड़ पौधा ले भरे-भरे लागय, रूख लगाय के डाढ़ हर तुहर मन के डांढ ये जान डरव। पुराना सियान मन के भाखा हर संत बानी कस होथे। इकर मन के कहे हर कभू बेकार नई होवय। कोई मनखे ल कुछु कही त सोच समझ के…

Read More