चल जाबो राजिम कुम्भ – कहिनी

माघी पुन्नी ले महाशिवरात्रि तक पन्दरा दिन बर हर साल राजिम के तिरवेणी संगम मं कुंभ मेला भरात हे। दुरिहा-दुरिहा के साधु संत ऋषि मुनि मन आए रथे ओकर मन के परवचन म अमरित बरसथे, नदिया के पानी मं नहाय बर कुण्ड बने हे, एमा नहाए ले मन ह पवित्र हो जथे, कहावत हे, के जइसे कौंवा मन के मरे के बेरा आथे त कासी मं जाके मरथे। जेन मनखे ह कोन्हो महानदी मं जाके मर जथे वोहा सीधा बैकुण्ठ लोक मं जाथे।” बिहनचे जुआर पारा के टुरा मन आगी…

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नेता टेकनसिंह कहाय के सऊक

एसो के चुनई म महूं खड़े हावंव अऊ ये गांव के जम्मो वोट हा मोला मिलना चाहिए। ये बुता ल मेंहा आज ले तोला सौंपत हंव। काबर अब वोट डारे बर सिरिफ दस दिन बांचे हाबे। ऐती बर अब्बड़ अकन गांव किंजरे बर घलो हाबे। हो सकत हे कहूं अऊ आय बर नई मिलही। ये कागज पथरा ल धर, मोला फटफटी छाप मिले हाबे, बने सबो घर किंजर-किंजर के बता देबे। माइ पिल्ला गांव भर के मनखे मन इही फटफटी छाप म वोट डारहीं तब बनही जी, तोला काहीं कुछु…

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सलंग गे देवारी

”लइका के पीरा कतेक अऊ कइसे होथे बनवाली ले जादा बहुत कमेच्च जानथे। दूसर बिहाव के चरमुड़िया राग बनवालीच करा तीन साल ले अटके रिहिस लइका आय के होही ते आबे करही। पांच बरस पाछू अपन दाई ल 26 घंटा पीरा खवाके पहलात गुड्डुराजा आईस। रात भर पाछू खांसी म टेटका होगे, कतकोन बेर खांसत सांस छुटे कस हो जाय।” बीते देवारी मं हितेश अपन हात ला फटाका मं जरो डारे रिहिस अऊ दीपेश के गाल, सितेश के माथा मं दाग पर गेय रिहिस। फेर ओमन ला तो अपन तमंचा-टिकली…

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कहिनी – ऊलांडबाटी खेले के जुगाड़

जहां टूरा हर राजनीति म पांव धरही तहां बइठे के, सूते के, ऊलांडबाटी खेले के, सबके जुगाड़ जम जाही। दसवीं पढ़े हे कहिके कोन्हो ला झन बताबे। तहां बिधान सभा अऊ लोकसभा के रस्ता घलो खुल जाही। मोर गुड्डू हर दसमी किलास मा दू बछर फैल का हो गीस, ओकर अनदेखनहा गुरूजी मन ओला डेनिया के इस्कूल ले निकाल दिन। में केहेंव-‘कस गुरूजी हो! अरे लइका हर अपन नेंव मजबूत करना चाहत हे त तुमन काबर ओकर संकल्प के बध करत हव? लइका हर एक किलास मा जतके जादा गियान…

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कहिनी : सिरा गे पईसा

बाबू बिहिनिया ले गांव के मडई म किंजर-किंजर के अपन ददा के अगोरा करत-करत असकटा गे हे. ओखर संगी जवरिहा मन मडई म भजिया-जलेबी धडकत अपन-अपन दाई-ददा संग गिंजरत हें. जे पसरा म बाबू ला जिनिस मन ला बोटोर-बोटोर देखत जंवरिहा मन भेंटत हे तउने मेर ओला पूछत हें – का लेस संगी ?, जलेबी खायेस का मितान ?, … वो पिपर तरी के दुकान ले मुर्रा लाडू खच्चित खा के देखबे भाई, अडबड मिठावत हे. रंग-रंग के खात बिसावत संगी मन मेछरावत हें फेर बाबू कलेचुप. ददा बलउदा गे…

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गांव गंवई के चुनई

चुनई के समे आथे अउ चुनई परचार के संगे संग गांव-गांव, गली-गली, घर-घर म चारी-चुगली, इरषा, दोष, झगरा-लड़ई घला आ जथे। बाजा-गाजा, सभा, जुलुस, नाराबाजी के मारे गली-गली ह सइमो-सइमो करत रथे। जिहां चार झन मइनखे एक संग खडे क़भू देखउल नइ देय, उहां मोटर कार, फटफटी, सायकिल सब ओरी ओर लमिया जथे। देवाल-देवाल म उमेदवार मन के नाव लिखाय, जगा-जगा चुनाव चिनहा के छप्पा छपाय, झंडा, बेनर बंधाय, कोनो मेर पाल परदा तनाय, कोनो मेर सभा मंच बने का पूछत हस, अइसे सजे रथे जइसे बर-बिहाव के समें दुलहा-दुलहिन…

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हाय रे मोर मंगरोहन कहिनी – डॉ. सत्यभामा आड़िल

बीस बछर होगे ये बड़े सहर मं रहत, फेर नौकर-चाकर मिले के अतेक परेसानी कभु नई होईस। रईपुर ह रजधानी का बनिस, काम-बूता के कमती नई। भाव बढ़गे काम करईया मन के। घर के काम बर घलो कोनो नई मिलय। कहूं मिलगे एकाध झन, त सिर ऊपर करके, जबान लड़ाके बराबरी मं बात करथें। उड़िया बस्ती अब्बड़ होगे। रईपुर सहर ह उड़ीसा राज ले सीधा-साधा जुड़े हे। सड़क, रेल, जंगल सबो डहार ले उड़िया मनखे मन आथे अऊ जाथें। सीधा जगन्नाथ भगवान करा पहुंच जथें। उड़ीसा ले बेपारी मन अऊ…

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अंधरी के बेटा – विट्ठलराम साहू ‘निश्छल’

एक झन राजा रिहिस। ओ हा अपन राज म बजार लगवाय। ओखर फरमान रिहिस कि जऊन जिनिस हा सांझ के होवत ले नई बेचाही तौन जिनिस ला राजा के खजाना ले पइसा दे राख लेय जाय। एक झन मूरति बनईया करा राक्छसिन के मूरति बांचगे ओला कोन्हों नई लीन। जान-बूझ के माछी कौन खाय? पइसा दे के राक्छसिन ला कोन ले ही? सांझ किन ओ मूरति ल राजा ल लेय बर परगे। राक्छसिन तो राक्छसिन ये। राक्छसिन हा राजा ला कहिथे, ‘मोला पइसा डार के लेय हस, बने बात ए।…

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नान्हें कहिनी गुरुजी के सीख – राघवेन्द्र अग्रवाल

”बेटा तें ह किसानी म झिन पर गा, ऐमा गुजारा नि होवय, कछेरी म बाबू बन जा त रटाटोर पइसा पाबे अउ हमर हालत सुधर जाही। ओकर बाबू कथे-ददा! ते किसानी ल अपन ढंग ले करत रहे, में ह तो किसानीच्च करिहा। ते देखबे तो कइसे हमर दसा ह नि सुधरही तेला। ए क दिन गुरूजी ह अपन कक्षा के लइकामन सोज पूछिस-”तुमन पढ़ के काय बनना चाहत हो? लइकामन कथें- गुरूजी में डाक्टर बनिहां। गुरूजी में मिस्त्री बनिहां। एक झिन लइका कथे-”गुरूजी मोर घर म किसानी हे मे ह…

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गुरुबाचा कहिनी – किसान दीवान

एक दिन अपन ल संवासे नी सकिस सुखरू। घातेच किलोली करके भतीजा के बिहा में संघरना जरूरी हे, ओखर दई-बाप नइए, अइसे ओखी करके, छुट्टी मा गिस। कन्हैयालाल मानेजर नंगत सुलहारिस, सेधे के लईक उल्था देईस। जल्दी तरक्की देय के वादा करिस। फेर सुखऊ मानबे नी करिस अउ आज दू हफ्ता होगे। नउकरी खोजत किंजरत हे। नउकरी मिले त झन मिले, बीए डिग्री तो पूरा करनाच हे। दही बरा सपेट के पइसा पटईस अऊ चलिस संगी मन सन मिले बर। रसता म एक झन गुरुजी मिलिस बिसनाथ पटेल। देखतेच बलईस,…

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