Tag: Dr. Jaybharati Chandrakar

रूख तरी आवव

रूख तरी आवव,
झुलवा झुलव,थोरकुन बइठव, सुसता लेवव,
रूख तरी आवव……

घाम गम घरी आगे रुख तरी छइया पावव, जिनगी के आधार रूख तरी आसरा पावव.
रूख तरी आवव……

चिरिया-चिरगुन,पंछी-परेवा बर रूख सुघ्घर ठीहा हवय,
चलत पुरवइया पवन ले ,जम्मो तन मन ल जुड़ावव.
रूख तरी आवव…….

चारो अंग कटगे जंगल झारी नागिन रददा रेंगत हवय,
बगरगे मकान बहुमंजिला,बड़का कारखाना उठत, धुंगिया ले बचावव.
रूख तरी आवव…….

झन काटव रूख राई ल ,ग्लोबल वार्मिंग होवत हवय,
परियावरन ल जुरमिर, धरती ल नास ले बचावव.
रूख तरी आवव……….

सीख ले मनखे एक ठन काटय रूख,दस ठन पौधा रोपय,
पाना,डारा,फूल ,फर देवइया,रूख के महिमा ल बगरावव.
रूख तरी आवव…..

पहार,रूख-राई ,हमर पुरखा पुरोधा संस्कृति हवय,
देवता धामी औसधि मिले बरदान ले जिनगी सुघ्घर बितावव.
रूख तरी आवव….
झुलवा झुलव ……रूख तरी आवव.

डॉ. जय भारती चंद्राकर
प्राचार्य
सिविल लाइन गरियाबंद, जिला गरियाबंद. छत्तीसगढ़
मोबाइल नंबर 9424234098

झिरिया के पानी

मयं झिरिया के पानी अवं,
भुंइया तरी ले पझरत हवव,  मयं झिरिया के पानी अवं,
मयं झिरिया के पानी…….

अभे घाम घरी आगे,
नदिया नरवा तरिया अटागे,
नल कूप अउ कुआं सुखागे,
खेत खार, जंगल झारी कुम्हलागे,
तपत भुईया के छाती नदागे.
पाताल भुंइया ले पझरत हवं,मयं झिरिया के पानी अवं,
मयं झिरिया के पानी …………

गांव गवई, भीतरी राज के,
परान ल बचाय के मोर उदिम हे,
करसा ,हवला ,बांगा धरे,
आवत जम्मो मोर तीर हे,
अमरित हवय मोर पानी रे,
कभू नइ सुखावव,मयं झिरिया के पानी अवं,
मयं झिरिया के पानी ………..

फेर मोरो पानी सुखावत,नदावत हे,
जंगल-झारी-पहार जम्मो कटत हे,
परियावर म फहिरे प्रदूसन हे,
चारो अंग पानी बर हाहाकार हे,
कइसे जीही जीव पानी के अकाल हे,
रूख-राई-पहार बचा लव,मयं झिरिया के पानी अवं,
मयं झिरिया के पानी…………

खरोड़त थोर थोर पानी ले,
बूंद-बूंद म करसा हर भरथे,
पानी के अमोल मोल हे,
पियासे के पियास बुझावत हे,
जुड़ावत हिदय के पीरा हे
जिनगी देवइया मयं झिरिया के पानी अवं,
मयं झिरिया के पानी ………..

कवयित्री
डॉ.  जयभारती चन्द्राकर
प्राचार्य
सिविल लाईन गरियाबंद
जिला गरियाबंद छ. ग.
मोबाइल न. 9424234098

छत्तीसगढ़ी भासा के महत्तम

छत्तीसगढ़ी भासा अब्बड़ मीठ ,गुरतुर बोली आय,
आमा के रूख मा कोइली मीठ ,बोली अस आय.

छत्तीसगढ़ी भासा अब्बड़ मीठ…..
हिदय के खलबलावत भाव ल उही रूप म लाय,
फूरफूंदी अस उड़त मन के ,गीत ल गाय.

छत्तीसगढ़ी भासा अब्बड़ मीठ…..
जइसन बोलबे तइसन लिखबे ,भासा गुन आय,
जै जोहार अउ जै जवहरिया,सब्द भासा के आय.

छत्तीसगढ़ी भासा अब्बड़ मीठ……
अपन भासा म गोठियावव,सरम का के आय,
छत्तीसगढ़ी भासा हमर राज के भासा आय .

छत्तीसगढ़ी भासा अब्बड़ मीठ…..
हमर भासा बर रूख पीपर ,करेजा म ठंडक देवय,
लोक गाथा अउ लोक गीत हर ,सबके पीरा हरय.

छत्तीसगढ़ी भासा अब्बड़ मीठ…..
अपन भासा म पढ़व लिखव, गोठियावव इही गोठ,
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया,देस म हे चिन्हार.

छत्तीसगढ़ी भासा अब्बड़ मीठ…..
अपन भासा के बढ़ोतरी बर ,जुरमिर अलख जगाबों,
अब्बड़ सुघ्घर भासा के सुवास ल फहराबों.
छत्तीसगढ़ी भासा अब्बड़ मीठ……..

डॉ. जयभारती चन्द्राकर
गरियाबंद (छ.ग.)

सुवा कहि देबे संदेस

समारू हर ऐ बखत अपन दु एकड़ खेत म चना बोय रिहिस. बने ऊंच -ऊंच हरियर-हरियर चना के झार म अब्बड़ रोठ-रोठ मिठ दाना चना के फरे रिहिस. अइसन चनाबूट के दाना ल देख के समारू हर अब्बड़ खुस होगे रहाय. इही पइत के चना हर अब्बड़ सुघ्घर होय हवय, बने पचास बोरी ले जादा चना होही. अइसना बिचार म अब्ड़े खुस रिहिस समारू हर. अपन घरवाली संग संझा बिहिनिया चना के खेत के रखवारी करत रहाय.
फेर चना हर पाके ल धरिस त एक दिन बिहिनिया समारू अउ ओखर घरवाली दुनों झिन खेत कोती गिन.का देखथे के बक खागे, के हरियर चना के बूट म हरियर सुवा के झुन हर झुमे रहाय .एक सैकड़ा के संख्या म इही सुवा मन हर रिहिन. ओखर चना के डारा म झुमे रिहिन. अउ खा डरिन चना ल. चना के बूट म चना फरे कस दिखत हवय फेर ओहर फोकला हवय. जम्मो चना ल सुवा मन खा डरिन. समारू हर दउड़ के सुवा मन ल भगाय लगिस अउ सुवा मन उड़ियागे.फेर चना के झाड़ ल देखिस त देखतिस रहियगे. जम्मो चना के बूट म फरे चना हरियर चना हर फोकला होगे रहाय. अइसना चना के हालत ल देख के समारू अपन मुंडी म हाथ धरके खेत के मेड़ म बइठगे अउ ओखर आंखी ले आसु बोहाय लगिस. मन म गुने लहिस के मोर जिनगी के आधार इही चना हर आज फोकला होगे. एको बछर अइसना नइ होय रिहिस.मनखे हर खातिस, छेरी, गइया, भइंसी हर खातिस त समझ म आतीस. इही सफ्फा चना ल त सुवा हर फोकला कर दे हवय. हाय मोर भाग.
खेत के दुरदसा ल देख के समारू हर मुंड धर के खेत म बइठगे. ओला देख के समारू के घरवाली हर किहिस-“अभे हमर का होही, हमर जम्मो दु एकड़ खेत म बोयाय चना हर त फोकला होगे हवय. मेंहर त पहिली ले कहात रेंहव, चना ल झन बोवव जी, फेर मोर गोठ ल नइ मानेव. चना के रथिया बिहिनिया राखवारी करेल परथे, त आप मन नइ मानेव. अब त मनखे, गइया, भइंसा, छेरी ले बचाय हवन त सुवा हर हमर चना फसल ल बरबाद कर दीस. भइगे अब इही बछर फेर मजूरी करे ल परही. अब भइगे राखवारी होगे. इही चना भाजी ल उखान डार थन. चारा बर बेचे के काम आही. बने पोटठाय चना के बूट के चेराय भाजी तको मनखे के कोनो खाय के नो हरे.” समारू अपन घरवाली के गोठ ल सुन के थोरकुन थिरगे, अउ किहिस-“सिरतोन बने कहत हस सुकारो अब इही चना भाजी ल चारा बर बेच के थोरकुन पइसा पा जाबो.” अइसना कहिके दुनों झन चना बूट ल उखाने लगिन.
हरियर- हरियर चना बूट म फोकला बीजा अइसन लागत हवय के ओमा चना फरे हवय. फेर धन फूटहा भाग. इही मन म गुनत सुकारो हर चना बूट के झार ल उखाने लगिस. उही बेरा एक ठन सुवा हर चना के झार म लटके अपन पांख ल फर फरावत रिहिस. ओहर उड़िया नइ सकत रिहिस. सुकारो हर ओला देख डरिस अउ अपन अंचरा म राख लिस. खेत के मेड़ तीर म ओला पानी पियाइस,त ओहर बने आंखी ल खोलिस.सुकारो हर सुवा ल अपन अंचरा के ओली म लुका के राख लिस.समारू हर उही बेरा कहावत रिहिस -“सिरतोन मोला एको ठन सुवा ले भेंट होतिस त मेंहर ओखर बोटी-बोटी कर देतेव. फेर का करबे सुवा मन त उड़ियागे हवय.” समारू के गोठ ल सुन के सुकारो हर सुवा ल अउ लुका डरिस अंचरा म. चना के झार के चरिया बना के अपन मुंडी म बोहे दुनों झिन कलपत मन ले चना खेत ले रेंगे लगिस.
सुकारो के अंचरा म लुकाय सुवा हर बेर बेर फरफरावत रहाय, त ले कले चुप सुकारो सुवा ल लुकाय रहाय.खेत के मेड़ म रेंगत, अपन खेत के चना फसल के दुख ल भुलाय, सुवा बर बिचारत वोहर अपन घर अंगना म पहुंचगे. चना बूट के चरिया ल अंगना म पटके कुरिया म नींगगे.
सबले पहिले कुरिया म नींगके सुवा ल टुकना म लुका के एक ठन साफी ल ओखर ऊपर तोप दिस अउ लकर -लकर चूल्हा म आंगी बार के भात रांधे बर,अंधना चघाके चूल्हा के दूसर अंग दार ल चघा दिस. हरियर कोवंर -कोवंर चना भाजी ल उरर के भांटा संग म ऊसन के लहसुन अउ लाल मिरचा म बघार दिस. अंधना आईस त चाउर ल डेचकी म डार के झारा ले खोइस अउ चाउर पकगे त चाउर ल पसा दिस.चाउर ल पसो के डेचकी के ढकना म अंगरा ल राख दिस.उही बेरा समारू तरिया ले नहा के आगे.
समारू ल ताते-तात खाना परोस दिस. समारू भर पेट ताते-तात दार-भात अउ चना भाजी ल खाइस अउ अपन थकान ल मिटाय बर चटई म ढलंगे. उही बेरा सुवा हर चिं-चिं करत रिहिस. समारू हर कहे लगिस-“घर कुरिया म तको सुवा के बोली हर सुनाई देवत हवय. मोर खेत ल त उजार दिस. अब घर कुरिया ल उजारे बर सुवा के बोली हर सुनावत हवय तइसने लागत हावय.सुकारो अओ सुकारो देख त कहां ले सुवा के बोली सुनावत हवय?का घर तको ल फोकला करे के ठान ले हवय का सुवा हर. रथिया बिहिनिया मंझनिया जम्मो बेर सुवा के सपना दिखही तइसने लागत हवय.” सुकारो हर किहिस-“आपमन थोरकुन सुत जावव. इहा कहां ले सुवा हर आही.” अइसना कहिके सुकारो हर थोरकुन दार-भात ल माली म सान के टुकना म लुकाय सुवा ल निकार के ओखर चोच म खवाय लगिस.माली म पानी लान के पियाइस. सुवा थोरकुन बने होगे.ओला लुकाय अंचरा म बारी कोती ले गिस.मन म गुनिस के सुवा ल बारी म उड़िया दुहुं. बारी म जा के सुवा ले किहिस-“सुवा तेंहर उड़िया जा. फेर सुवा हर बारी म येती ओती किंदरे लगिस. वोहर उड़िया नइ सकिस.
सुकारो मन म गुनिस के समारू ल इही सुवा के बारे म पता चलहि त ओहर अब्बड़े रिसा जाही, फेर का करव, इही सुवा हर मोर जीव के काल होवत हवय. उड़ियावत नइये, काय करव.सुवा ल पोसे के गोठ ल गोठियाहुं त मोला मारे डारहि. काबर जेन सुवा हर हमर बछर भरके फसल ल चौपट करे हवय,तेही ल पोसबों. का सरकार हर इही गोठ ल पतियाही के सुवा हर जम्मों चना फसल ल चौपट करे हवय.
सुकारो ल दु दिन होगे. सुवा ल टुकना म लुकाय, साफी पटका म तोपे लाली मिरचा,बिही ल ओखर बर बारी ले तोर के लान के खवावत गिस.सिरतोन सुकारो ल मया होगे सुवा बर.ओला कहिचों अकेला छोरे बर डरावय. काबर कुकुर-बिलई ओला हबक झन देवय.सुवा के परान बचाय के उदिम करे लगिस.
पंछी-परेवा त हमर इही परकिती के देन हवय. सुघ्घर रंग बिरंगी इखर संसार त हमन ल सुख देथे.फेर आज हमर खेत के गोठ हर अंतस ल पीरा देवत हवय.जा रे सुवा तेहर उड़िया जा, अपन संगी संगवारी करा उड़िया जा.तेंहर उड़िया जा कहिके सुकारो हर चना के खेत म लुकाय सुवा ल ढ़िल दिस.सुकारो कहे लगिस-” कहि देबे संदेस, ओ सुवना,आगू बछर झन आबे मोर खेत ओ सुवना,रे सुवना मोर दुख पीरा ल दूर करबे ओ सुवना.”

डॉ.जयभारती चन्द्राकर
प्राचार्य
सिविल लाईन गरियाबंद, जिला गरियाबंद(छ.ग.)
मोबाइल न. 9424234098

आज नारी हर महान होगे

बेटी बचाव, बेटी पढ़ाव के नारा हर, सिरतोन होगे,
आज नारी हर महान होगे.
आज नारी हर महान होगे…….

मुधरहा ले भिनसरहा, भिनसरहा ले अंजोर होगे,
हमर छत्तीसगढ़िया बहनी मन, सबले बढ़िया होगे.

आज नारी हर महान होगे…

घर, गंवई -गांव म नवा अंजोर होगे,
पढ़ई-लिखई म बहु-बेटी मन सबले आगू होगे.

आज नारी हर महान होगे…..

नारी-परानी के कलम हर, आज हथियार होगे,
शिक्षा के हथियार ले, सही नियाव होगे.

आज नारी हर महान होगे….

इही जुग अब नारी सशस्क्तिकरन के होगे,
घर, समाज अउ देस म, आज नारी हर महान होगे.

आज नारी हर महान होगे….

दुनिया बदल जाही आज, नारी सशक्त होगे,
डंका बजा जाही, प्रेम, तियागअउ बलिदान के.

आज नारी हर महान होगे….

अत्याचारी मटिया मेट हो जाही, दुर्गा काली के अवतार ले,
मंगल कामना ले भर जाही, जन-जन के हिदय म.

आज नारी हर महान होगे ,
बेटी बचाव, बेटी पढ़व के नारा हर सिरतोन होगे ,
आज नारी हर महान होगे…..

डॉ. जयभारती चन्द्राकर
प्राचार्य
सिविल लाईन गरियाबंद छ.ग.
मोबाइल न. 9424234098

छत्तीसगढी़ कहानी संग्रह : शहीद के गाँव

परंपरा की खुशबू है इन कहानियों में

छत्तीसगढी-साहित्य में निरंतर अनुसंधान तथा अन्य विधाओं में सक्रिय लेखनरत डॉ.जयभारती चंद्राकर का यह प्रथम छत्तीसगढी़ कहानी संग्रह है। ‘शहीद के गाँव’ शीर्षक से संकलित इन कथाओं में छत्तीसगढ़ का यथार्थ स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। पहली कहानी ‘शहीद के गाँव’ एक सच्ची कहानी है, जो देश के लिए मर मिटने वाले युवा के अदम्य साहस की कथा कहती है, जिसकी शहादत पर समूचा गाँव गर्व करता है। संग्रह की तेइस कहानियों में ग्रामीण नजीवन, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, सुख-दुख, त्याग-बलिदान, घर-किसान, अंधविश्वास के प्रति चेतना और परंपरा की खुशबू है।
ये कहानियाँ सत्य घटनाओं और अपने आसपास के परिवेश को देखते-परखरते संघर्ष के साथ जीते-मरते पात्रों के माध्यम से छत्तीसगढ की सामाजिक संस्कृति और सरलता का बखान करती हैं। छत्तीसगढी़ में आगत शब्दों को यथावत रखने का प्रयास उसके अर्थ-सामर्थ्य और संप्रेषणीयता को सहज ही संरक्षित करता है। एक संवेदनशील स्त्री की आंखों से देखा-परखा सच इन कथाओं के केंद्र में है।
छत्तीसगढ की अस्मिता के विविध रंगों से परिचित कराने वाली ये कहानियाँ पठनीय हैं और संग्रहणीय भी।
डॉ. सुधीर शर्मा

शहीद के गांव
(छत्तीसगढी कहिनी संकलन)
डॉ. जयभारती चन्दाकर

प्रकाशक : वैभव प्रकाशन, रायपुर ( छ.ग. )
ISBN-978—81-936634-5-5

आवरण सज्जा : कन्हैया साहू
प्रथम संस्करण : 2018
मूल्य : 275.00 रुपये
कापी राइट : लेखिकाधीन

समर्पण
माँ- स्व. श्रीमती स्नेह लता चन्दा, बाबू जी- स्व. श्री एस. एल. चन्दा, पति देव-स्व. श्री के. के. चन्दाकर
आपमन ले मिले मया-दुलार के सुरता के चंदन ले.

नवा पीढी ल रददा दिखावत बिचार

छत्तीसगढी म किस्सा-कहिनी गढे अउ वोला सुनाय के परम्परा बड जुन्ना हे। आज हमर आगू म लोक कथा के जेन ढाबा-कोठी उछलत अउ छलकक ले देखे बर मिलथे, वो सब वोकरे परसादे आय। ए बात अलग हे, के वो कहिनी गढइया मन के नांव पता ल हम नई जान पाए हन, तेकर सेती वोमन ल लोक कथा कहि देथन फेर ए तो जरूर हे, कोनो न कोनो उनला लिखे जरूर हें, तभे आज घलो उन सब हमर आगू म जगजग ले अंजोर बगरावत, मन अंतस के बात कहत खडे हें।
जिहां तक प्रकासित रूप म अपन लिखइया के नांव के चिन्हारी करावत कहिनी मिले के हे, त एला उन्नीसवीं सदी ले मान सकथन । छापाखाना के रूप म प्रिन्टिंग व्यवसाय के संग लोगन अपन मन अंतस के गोठ ल कागद म उतार के वोला प्रकासित रूप म लोगन के आगू म रखे लागिन । आज छत्तीसगढी कहिनी के संसार म एक ले बड के एक नांव अउ उंखर रचना देखे बर मिलथे। जिहां तक महिला लिखइया मन के बात हे, त एमा कछु अंगरी म गिने के ही लाइक नांव हे, जेला पोठ अउ चिंतनशील कहिनी लिखइया के रूप म गिन सकथन, वोमा के एक मयारूक नांव हे- डॉ. जयभारती चन्द्राकर।
डॉ. जयभारती चन्द्राकर मूल रूप ले शिक्षिका हे। जेन जंगल छेतर म रहिथे, अउ इस्कूल म पढाथे, एकरे सेती डंकर कहिनी म एक शिक्षिका के दृष्टिकोण, संवेदना, भासा-शैली अउ विचार देखे बर मिलथे। संग म जंगल-झाडी म रहवइया जीव-जन्तु के अंतस ल टमडे के उदिम। ” शहीद के गांव” नांव के उकर ए कहिनी संकलन म कुल तेइस ठन कहिनी हे, जेला हम तीन अलग-अलग रूप म देख सकथन । पहला वो जेमा उन अपन तीर तखार म घटित सत्य घटना मनला कहिनी के रूप देवत दिखथें। दूसर वो जंगल झाडी के जीव उंकर संवेदना जिहां वो रहिथे, बसथे अउ तीसर वो लोककथा के रूप जेला अपन महतारी के कोरा म बइठे, डंकर गोरस पीयत सुते अउ गुने हें।
संकलन के शीर्षक ” शहीद के गांव” एक सत्य करमभूमि गरियाबंद जिला के गांव म घटे हे। गांव के सपूत भृगुनंदन चौधरी के शहादत
के मार्मिक चित्रण अउ वोकर ले आगर उंकर महतारी सुशीला देवी चौधरी के मार्मिक अउ नवा पीढी ल रद्दा देखावत बिचार ।




डॉ. जयभारती चन्द्राकर एक संघर्षशील नारी आय। जेन जिनगी के विसंगति ल झेलत सफलता के मुकाम ल आज छूवत हें। उंकर ए सब छापा हर लगभग जम्मो कहिनी मन म देखब म आथे। ” एंहवाती” जिहा विधवा पुनर्विवाह के संदेस देथे, उहें ” डांड” म विजातीय विवाह के सामाजिक द्वंद् ल अपन दृष्टिकोण देथे, डंकर समाधान के आरो कराथे।
”ददा के मरनी” दू सग भाई के आपसी वैमनस्य ल उजागर करथे। ”बर सावितरी” देव-वरत के अंतर्गत नकस्ली हमला, उंकर आतंक के
रूप ल चिन्हाथे। छत्तीसगढ अभी कुन नकस्ली आतंक ले भारी जूझत हे, अइसन म हर चिंतनशील लेखन म बोकर विविध रूप अउ कार्यकलाप देखब म आथे। वोकर समाधान के आरो कराथे।
महिला लेखिका मन के लेखन म नारीगत विषय के बाहुल्यता दिखथे। चाहे उंकर संरक्षण के बात होय, अधिकार के बात होय या समानता, शिक्षा अउ संस्कार के बात होय म फेर शोषण अउ आने विडंबना जइसन बात होय। डॉ. जयभारती के कहिनी ” आसा अउ किरन” बेटी बचाओ अउ परियावन, ले प्रेरित हे, त निसयनी शिक्षा के महत्व ल प्रतिपादित करथे। अंचरा के आंसू म बेटी ल बेटा के भूमिका निभावत दाह संस्कार जइसे बुता ल पूरा करे के रददा देखाथे। डोरी राखी के, मया के भरम. सुवा कहि देबे संदेस, कोईली बसंती, वैसनवी, तुलसी चंडरा अउ फूलबती, सांवा बाई, लछमी बहू, ए सब नारी जीवम के विभिन्न रूप ल देखाथें।
भलुआ ल चकमा, किसान के पीरा, करजा, झोला वाला बबा, अन्नदाता, बिसाय गोठ, आदि । कहानी मन अपन शीर्षक के नांव अउ चरित्र ल उजागर करथें।
डॉ. जयभारती चन्द्राकर के भाखा गुरतुर हे। शैली रोचक अठ प्रवाहमान हे, जेला पढे, गुने अउ समझे म आसानी होथे । एकरे सेती ए भरोसा होवत हे, के छत्तीसगढी के जम्मो हितवा मन एला पढही अउ लेखिका ल अपन मया, आसीस अउ सुभकामना देहीं ।
सुभकामना अउ मया आसीस मोरो डहर ले।
सुशील भोले
54/191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर रायपुर, (छ.ग.)
मो. 9826992811




लेखिका की अन्‍य कृतियां –

वृक्षारोपण के गोठ

आज बड़ बिहिनिया ले नर्सरी म जम्मो फूल अउ बड़का रूख के नान्हे-नान्हे पौधा मन म खुसी के लहर ड़़उंड़त हवय, काबर आज वृक्षारोपण कार्यकरम म जम्मो नर्सरी के फूल अउ बड़का रूख मन के नान्हे-नान्हे पौधा ल लेहे बर बड़का जनिक ट्ररक हर नर्सरी म आये हवय.
गोंदा, मोंगरा, गुलाब फूल अउ चंदन के नानकुन पौधा मन आपस म गोठियावत रिहिन. गोंदा हर गोठियावत रिहिस-” अवो बहिनि मन इही वृक्षारोपण का हरे, मेहर कभू नइ देखे हववं, इही नर्सरी ले बाहिर के दुनियां ल देखेबर अब्बड़ बेचेन हवँ. “ओखर गोठ ल सुन के गुलाब हर किहिस-” वृक्षारोपण म हमन ल इही नर्सरी ले दूसर ठउर म लेंज के अउ हमन ल उंहा कियारी नइ त मइदा म बड़का गड्डा खोद के जगाय जाही. अब्बड़ मनखे मन के भीड़ हर सकलाय रहिथे. का नेता, का वी.आई.पी., का गरीब का अमीर, इस्कूल के लइका पिचका, टीचर जम्मो सकलाय रहिथे. बड़ मजा आही, बाहिर के दुनियां ल देखे बर आँखी हर तरसगे हवय. “उही बेरा चंदन रूख के नानकुन पौधा हर मुंच-मुंचावत किहिस- ” अब्बड़ मजा आही इही वृक्षारोपण के कार्यकरम म.”

जम्मो नान्हे फूल अउ नान्हे रूख के पौधा मन के गोठ ल सुन के आंवरा रूख के नान्हे पौधा हर किहिस-” अवो फूल के नानकुन रोपे पौधा अउ चंदन रूख क नान्हे पौधा, तुमन जानथव के वृक्षारोपण का हरे ? भइगे सैकड़ा-सैकड़ा म फूल अउ बड़का रूख के पौधा मन हर बछर वृक्षारोपण के नांव म ठगा जावत हवय.काबर हर बछर बड़का -बड़का वृक्षारोपण कार्यकरम के आयोजन होथे, फेर बड़का नेता, वी.आई.पी. मन के हाथ ले तोर रोपन होगे त बने बनही,तोर पूरा देख भाल पानी, सुरक्षा जम्मो होही. नइ त अउ फेर कोनो आम लोगन मन के हाथ ले रोपेगे, त भइगे एके दिन म अइला जाबे अउ दूसरइया दिन तोर मरे बिहान होही. तंय हर मर जाबे….एँखर ले त हमन इही नर्सरी म अब्बड़े खुस हवन. इंहा पानी, खाद जम्मो सुरक्षा हमर जतन के इन्तजाम हवय. इंहा हमन अब्बड़े खुस हवन, अब्बड़े सुघ्घर दिखत हवन. भगवान झन करे हमन ले कोनो पौधा ल वृक्षारोपण बर चुनई करय. नइ त हमर जम्मो झन के मरे बिहान हो जाही.

डॉ.जयभारती चंद्राकर
प्राचार्य
सिविल लाइन गरियाबंद ,
जिला गरियाबंद छ.ग.
मोबाइल न. 9424234098