Tag: Ramesh Kumar Chouhan

किसानी के पीरा

खेत पार मा कुंदरा, चैतू रखे बनाय ।
चौबीसो घंटा अपन, वो हर इहें खपाय ।।

हरियर हरियर चना ह गहिदे । जेमा गाँव के गरूवा पइधे
हट-हट हइरे-हइरे हाँके । दउड़-दउड़ के चैतू बाँके

गरूवा हाकत लहुटत देखय । दल के दल बेंदरा सरेखय
आनी-बानी गारी देवय । अपने मुँह के लाहो लेवय

हाँफत-हाँफत चैतू बइठे । अपने अपन गजब के अइठे
बड़बड़ाय वो बइहा जइसे । रोक-छेक अब होही कइसे

दू इक्कड़ के खेती हमरे । कइसे के अब जावय समरे
कोनो बांधय न गाय-गरूवा । सबके होगे हरही-हरहा

खूब बेंदरा लाहो लेवय । रउन्द-रउन्द खेत ल खेवय
कइसे पाबो बिजहा-भतहा । खेती-पाती लागय रटहा

ओही बेरा पहटिया, आइस चैतू तीर ।
राम-राम दूनों कहिन, बइठे एके तीर ।।1।।

चैतू गुस्सा देख पहटिया । सोचय काबर बरे रहटिया
पूछत हवय पहटिया ओला । का होगा हे आजे तोला

कइसे आने तैं हा लागत । काबर तैं बने नई भाखत
तब चैतू हर तो बोलय । अपने मन के भड़ास खोलय

भोगत हन हम तुहर पाप ला । अउ गरूवा के लगे श्राप ला
गरूवा ला तुमन छेकव नही । खेती-पाती ल देखव नही

देखव देखव हमर हाल ला । गाय-गरूवा के ये चाल ला
अपन प्राण कस राखे म घला । कतका बाचे हे देख भला

गुजर-बसर अब कइसे होही । अइसन खेती कोने बोही
कहूं बनी-भूती ला करबो । कइसनो होय पेटे भरबो

करब कहूं आने बुता, खेती-पाती छोड़ ?
धान-पान आही इहां, बादर छप्पर तोड़ ??2??

सुनत पहटिया चैतू गोठे । अंतस भीतर घाते सोचे
फेर धीर धरके ओ बोलय । अपने अंतस ला तो खोलय

कका सुनव गा गोठे मोर । सिरतुन हे बाते तोरे
फेर तुमन अब देखव गुन के । सही-गलत मा एके चुन के

कोने मेरा परिया-चरिया । बाचे हे का एको हरिया
कती गाय-गरूवा ल चराबों । घूम फीर के केती जाबो

हमन हाथ मा घाव करे हन । लालच कोठी हमन भरे हन
अब ये पीरा कोने सहिही । अपने दुख काखर ले कहिही

आनी-बानी मशीन आये । कोने अब गरूवा ला भाये
बइला ला तो टेक्टर खागे । पाकिट मा अब दूध ह आगे

बेटा तोरे गोठ हा, नो हय झूठ लबार ।
फेर सबो सुविधा इहां, खेती बिन बेकार ।।3।।

चैतू बोलय धीरज धर के । अपने भीतर साँसे भर के
मशीन चाउर-दार बनाही । जेमा हमर पेट भर जाही

सोच पहटिया कइसे होही । धान-पान बिन दुनिया रोही
चल बेटा मंत्री कर जाबो । अपने मन के हाल सुनाबो

रोक-छेक गरूवा मा होवय । बेंदरा घला बड़ बिट्टोवय
चरिया-परिया जेने छेके । अब तो ओमन घुटना टेके

संग पहटिया चैतू जावय । ओती ले एक पंच आवय
बीच डगर मा तीनों जुरथे । जय जोहार सबोझन करथे

आत कहां ले हव दूनोंझन । जात कहां हव गा अपने मन
पंच ठाड़ होके पूछय जब । चैतू अघुवा के बोलय तब

धान-पान पइली पसर, होइस ना ये साल ।
गाय चना ला हे चरत, का कहि अपने हाल ।।4।।

दिन-दुकाल मा धान लेसागे । हमर भाग ले ओल ह आगे
तेहू मा गरूवा-गाय पदोवय । संग बेंदरा बड़ बिट्टोवय

चिंता झन कर कका अभे तैं । पंच कहय अब बात कहँव मैं
दिन दुकाल के पइसा मिलही । सरकार खजाना ला ढिलही

सूखा राहत हमन ह पाबो । अब नुकासानी अपन भुलाबो
करजा-बोड़ी माफी करही । सरकारे हा पीरा हरही

सुनत गोठ ये चैतू सोचय । अपने मन ला अपने नोचय
बईमान अब हमन कहाबो । बिना मेहनत पइसा पाबो

छोटे ला दू पइसा देही । अपने कोठी खुद भर लेही
अही छूट हा लूट कहाथे । तभे देश गड्ढ़ा मा जाथे

फोकट मा कुछ बांटना, होवय नही निदान ।
बिपत मिटय जड़-मूल ले, अइसे कुछ सिरजान ।।5।।

कहय पंच ले चैतू खुल्ला । गरूवा काबर रहिथे ढिल्ला
सूखा राहत का सिरजाही । रोक-छेक का अब हो जाही

ये राहत के सुख चरदिनया । फेर ओही संझा-बिहनिया
करजा-बोड़ी फेरे लेबो । इही हाल मा कइसे देबो

बड़ दुकाल हर साल परत हे । तेमा गरूवा-गाय चरत हे
का हमला सरकार पोसही । खेती-पाती कहां बोजही

खेत-खार बिन काम चलय ना । फोकट मा ये पेट भरय ना
खेत-खार जब रहिथे चंगा । तभे कठौती दिखथे गंगा

खातू-माटी पानी चाही । तभे किसानी हाही-माही
सबले भारी हे रखवारी । सुन लौ गा पंच संगवारी

चलव करब मिलके हमन, कोनो एक उपाय ।
खेती हा होवय बने, पीरा सबो सिराय ।।6।।

रूख-राई ला काटे मनखे । महल बनाये घाते तनके
चरिया-परिया ला छांट-छांट के । बसे आदमी बांट-बांट के

छेद-छेद के धरती छाती । सब़ अलहन करे आत्मघाती
दिन-बा-दिन दुकाल अब परथे । धरती के छाती हा जरथे

पल्लो बर तो पानी चाही । पानी-कांजी कइसे आही
बोर भरोसा होय ना खेती । धरती सूख्खा तेखर सेती

पानी अउ रखवारी चाही । तभे इहां तो सुराज आही
अइसे कोनो उपाय करबो । अउ दुनिया के पेटे भरबो

चैतू अइसे कहत रहय जब । अउ किसानगन संघरगे तब
मने लगा के गोठ सुनत हे । अपने भीतर सबो गुनत हे

मोहन मंडल हा कहय, सुग्घर तोरे गोठ ।
चैतू तोरे सोच हा, मोला लागे पोठ ।।7।।

सिरतुन के ये बात तोर हे । आजे रतिहा काल भोर हे
कइसे होही पोठ किसानी । कहव-कहव गा गोठ सियानी

राम-राम कहि चैतू बोलय । अपन सोच के परदा खोलय
मोहन मंडल, मोला लगथे । सरकार सबो हमला ठगथे

फोकट मा तो बांट-बांट के । जात-पात मा छांट-छांट के
हमला तो अलाल करथे । स्वाभिमान ला हमरे हरथे

काम-बुता तो हमला चाही । जेखर ले दू पइसा आही
होही हमरे पोठ किसानी । येमा का के हे हैरानी

सरकार हमर ठेका लेवय । खेती बर तो पानी देवय
चरिया-परिया खाली छोड़य । वोट-बैंक के मोहे तोड़य

मोहन मंडल पूछथे, कइसे बाबू पंच ।
चैतू के ये गोठ हा, हे का सिरतुन रंच ।।8।।

पंच कहय ये गोठ बने हे । आज कका हा बने तने हे
अभी समस्या हे रखवारी । पाछू पानी के हे बारी

चरिया-परिया के छोड़े मा । बरदि-पहट के तो जोरे मा
गाये-गरूवा हा छेकाही । तब खेती हमरे बच जाही

कइसे पहटिया खोरबहरा । बरदी मा देबे ना पहरा
चरिया-परिया हमला चाही । जिहां पहट-बरदी हा जाही

तब हमला का के दुख होही । ऐखर ले खेती उलहोही
कहय खोरबहरा हा हँस के । खेती काबर रहिही फँस के

गोठ सबोझन ला जचगे तब । सोचत हे हम का करबो अब
सबो कसम खाइन जुरमिल के । हम खेती करबो हिलमिल के

हम छोड़ब-छोड़ाब अब, बेजाकब्जा गाँव ।
चरिया-परिया छोड़बो, छोड़ब रूखवा छाँव ।।9।।

जुरमिल के सब हामी देइन । मिलके सरपंच करा गेइन
गोठ बतावय ओला जम्मा । कइसे किसान होत निकम्मा

बेजाकब्जा जभे सिराही । तभे गाँव मा सुराज आही
होय गाँव मा अब पाबंदी । अइसे तो करव लामबंदी

चरिया-परिया हम छोड़ाबो । बने-बने तब खेत कमाबो
बरदी मा गरूवा मन चरही । छंदाही सब हरहा हरही

एक बुता अउ करतेन हमन । खेती बर पानी के होय जतन
पानी-कांजी अउ रखवारी । खेती बर होय संगवारी

कइसे करबो कइसे होही । ये विचार ला कोन समोही
विचार कइसे पूरा होही । हमरे डोंगा कोने खोही

पूछथ हावे सरपंच हा, कइसे करब निदान ।
सुझ-बुझ देखावव अपन, संगी हमर मितान ।।10।।

जुरमिल मंत्री करा चलव सब । हमरे निदान हा होही तब
मोहन मंडल अउ चैतू कहिथे । जब सबझन मन सोचत रहिथे

मंत्री मेरा सबझन गेइन । अपन बात आघू रख देइन
तब मंत्री पूछय ऊंखर ले । कहत रहँय जी तेखर ले

कोने उपाय हम सिरजाई । अपन किसानी पोठ बनाई
कइसे पानी के लइ गारंटी । खन-खन बोलय हमरे अंटी

सोच समझ के चैतू कहिथे । जे पीरा ला सहिते रहिथे
दूइ बात हे हमर किसानी । जेखर ले करना हे मितानी

रखवारी के झंझट टूटय । अउ पानी के भुलका फूटय
बेजाकब्जा ला छोड़े मा । गाँवे ले नाता जोड़े मा

होवय हमरे पोठ किसानी । काम-बुता तब होय सियानी
एक बुता हम अइसे करबो । जुरमिल के सब पीरा हरबो

मनरेगा के काम ले, बनातेन हम बांध ।
गाँव-गाँव हर खार ला, नहर-नहर ले छांद ।।11।।

छोटे-छोटे बांध बनाके । छोटे-छोटे नहर खनाके
गाँव-गाँव मा पानी भरबो । खेत-खार के पीरा हरबो

बरसा के पानी बांधे रोकब । बोर खनब ला सबझन टोकब
कुॅवा बावली तरिया भरही । तभे खेत हा हमरे भरही

नदिया-नरवा चाकर करबो । बरसा पानी जेमा भरबो
जे परिया हा उतारू लागय । जिहां-जिहां ले पानी भागय

ओमा सुग्घर बांध बनाबो । नदिया-नरवा बांध मिलाबो
गाँच-गाँव मा होवय पानी । जइसे टोटा होवय बानी

खार-खार मा पेड़ लगाबो । बरखा ला तो हमन रिझाबो
गाँव-गाँव मा बांध बनाबो । बरसा पानी जेमा पाबो

संग प्रकृति के हम रहब, तब होही सब काम ।
खेती-पाती लगही बने, लगही सुग्घर धाम ।।12।।

रमेशकुमार सिंह चौहान
मिश्रापारा, नवागढ़
जिला-बेमेतरा (छ.ग.)

छंद चालीसा – छत्तीसगढी छंद के कोठी

छंद चालीसा
“छत्तीसगढी छंद के कोठी”
रमेशकुमार सिंह चौहान

प्रकाशक
आशु प्रकाशन
पता- प्लाट नं. 509 मिलेनियम चौक
सुंदर नगर, रायपुर (छग)
मोबाईल : 09302179153

छत्तीसगढ राजभाषा आयोग के सहयोग से प्रकाशित

आवरण चित्र : प्रकाश सिंह प्रकाश
आवरण सज्जा : लोकेश सिंह चौहान
प्रथम संस्करण : 2017
मूल्य : 200 रुपये मात्र
कॉपी राइट : लेखकाधीन



भूमिका

गद्य विधा मा जउन महत्व व्याकरण के होथे, पद्य विधा मा उही महत्व छन्द के होथे। छन्द सीखे बर व्याकरण के ज्ञान जरूरी होथे अउ इही व्याकरण हर कोनो भाखा ला समृद्ध करथे। व्याकरण हर भाखा ला अनुशासित रखथे। प्रकृति घलो एक अनुशासन मा चलथे। रुखराई मन के फूले अउ फरे के समय निश्चित होथे। पृथ्वी, सुराज, चंदा, तारा, सितारा तको मन एक नियम मा चलत हें। पूरा ब्रह्माण्ड अनुशासन मा चलत हे। काव्य विधा ला अनुशासित रखे बर छन्द के ज्ञान जरूरी होथे । बिना लय के कविता, हिरदे ला नइई मोहे। लय वाले कविता, मन ला मोहे के संगेसंग सुनैया ला याद घलो हो जाथे। इही कारण हमर पुरखा कवि मन के कविता कई बछर बीते के बाद घलो हमन ला याद हवयं। कबीर, तुलसी, सूर, केशव, घनानंद, विद्यपति, बिहारी, सेनापति, सुंदरलाल शर्मा, नरसिंह दास, शुकलाल पांडेय, कोदूराम “दलित” ये सब हमर पुरखा कवि आय कविता मा गेयता हे। ये सब कवि मन छंदबद्ध कविता लिखिन हें तेपाय के इंकर कविता मा गेयता हे, प्रवाह है, लय हे। इंकर कविता मन अमर होगिन हें। इही लय हर कविता के आत्मा होथे। छन्द के ज्ञान रहे ले कविता मा लय आ जाथे। कई झन घलो कवि हें जउन मन छन्द के जानकारी नड्ट रखें तभो उंकर कविता मा सुग्घर लय होथे। इंकर कविता ला बारीकी ले देखे जाय त कोनो न कोनो छन्द के उपस्थिति जरूर मिलही जेखर कारण इंकर कविता मा लय आइस हे।
आज शहरीकरण बाढत हे। सब झन नवा पीढी ला इंग्लिश मीडियम के स्कूल मा भरती करत हें। एला देख के छत्तीसगढ के साहित्यकार अङ विद्वान मन घलो छत्तीसगढी भाखा नंदाये झन, सोच के चिन्ता करत हें। पाठ्यक्रम मा शामिल करे के मांग घलो जोरदार उठत हे। विज्ञान के कारण देश मा विकास होवत हे। विकास के कारण नवा नवा मशीन मन आवत हें। परंपरागत बहुत अकन जुन्ना मशीन अउ समान घलो चलन के बाहिर होवत हे। एखर बुरा प्रभाव भाखा ऊपर पड्त हे। बटकी, होंला, ढेंकी, जाँता, जइसे कतकोन समान चलन के बाहिर का होइस, ये शब्द मन घलो नंदावत हें। अट्टसन शब्द अउ परम्परा ला जिन्दा रखे बर इंकर प्रयोग साहित्य मा करना पडही । मोबाइल, कम्पयूटर, कार, डाटा जइसन नवा शब्द ला ला छत्तीसगढी मा वइसने के वइसने स्वीकार करना पडही तब हमर भाखा के शब्दकोश बाढही । ये काम चौहान जी करत हें। छन्द चालिसा मा मूसर, पटाव, पिट्ठल, तफर्रा, जडसन जुन्ना शब्द के प्रयोग घलो होये हे त कलेक्टर, इंजीनियर, बोरडिंग, दोसा, इडली, सहिष्णुता, नोट बंदी, नवा शब्द के प्रयोग घलो बिना संकोच के होये हे।
छत्तीसगढ मा दू तीन बछर पहिली ले छन्द विधा मा सुग्घर काम होवत हे। रमेश कुमार सिंह चौहान, एक अइसने नाम आय जङउन हर छत्तीसगढी भाखा मा कई किसम के छन्द लिखत हें। इंकर विषयवस्तु के चयन बेजोड हे। विज्ञान, धर्म, रीति रिवाज, तिहार, मौसम, राष्ट्रप्रेम, खेतखार, फसल, भूगोल, इतिहास, नीतिशास्त्र, गाँव के पीरा, गहिना गूँठा जडसन कई विषय मा छन्द रचिन हें। छन्द ला स्थायी अउ अंतरा मा सजा के गीत के रूप मा घलो ढालिन हे, कहूँ दोहा मा जनउला के प्रयोग करिन हें त कहूँ लोक गायिका पद्मश्री ममता चंद्राकर ला विषय वस्तु बना डारिन हें।
चौहान जी के दूसर किताब के अलावा छन्द के संग्रह घलो प्रकाशित होय हे। दोहा के रंग मा दोहा अउ दोहा के कई किसम के संग्रह हे। आँखी रहिके अंधरा, किताब मा उंकर कुण्डलिया छन्द के संग्रह हे। छन्द चालिसा नाम के ये किताब मा चालिस किसम के संग्रह हे। ये किताब हर कई मायने मा विशेष बन गेहे। एमा चालीसों किसम के छन्द के विधान संबंधित छन्द मा दिए गए हे। येहर अपनआप मा बहुते कठिन काम आय। सिरिफ पंडित जगन्नाथ प्रसाद भानु के छन्द प्रभाकर मा हर छन्द के विधान, संबंधित छन्द मा देखे मा आये हे। ये किताब के एक अउ विशेषता हे कि एमा छन्द सीखे अउ लिखे बर जरूरी व्याकरण के जानकारी विस्तारपूर्वक दिए गए हे। ये दुन्नों विशेषता ये किताब ला धरोहर बना दिही । मोला पूरा भरोसा हे कि रमेश कुमार सिंह चौहान जी के छन्द चालिसा, छत्तीसगढ के साहित्य ला समृद्ध करे बर मील के पथरा साबित होही। छन्द चालिसा बर चौहान जी ला गाडा गाडा बधाई ।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ
मोबाइल – 8319915168, 9907174334



दू आखर मन के बात
सम्माननीय पाठक मन ला
सादर जयजोहार

बाबा तुलसीदास के रामचरित मानस पढत-पढत बीच-बीच मा छंद मन के नाम देख के ये छंद का होथे ? जाने के ललक होइस । हिन्दी साहित्य के स्वर्ण युग के मनीषीमन के छंदबद्ध रचना मन ले मन हा प्रभावित होबे करथे । छंद जाने के ललक मा स्कूली पाठ्यकम मा दे छंद वर्णन पढेंव फेर अधूरा लगिस । हमर छत्तीसगढ के छंदविद आचार्य जगन्नाथ प्रसाद भानु के “छंद प्रभाकर’ पढ-पढ के छंद सिखे के कोशिश करते हंव । अपन ललक अठ सनक मा इंटरनेट के ‘ओपन बुक्स आनलाइन’ साइट मा पहुँचेंव जिहां सीखे-सिखाये के अच्छा उदिम चलत हे इहां आदरणीय सौरभ पाण्डे के मार्गदर्शन अठउ हमर छत्तीसगढ के छंदविद श्री अरूण निगम के संगत मा छंद जाने समझे के प्रयास करेंव । छंद ज्ञान अपन–आप मा कोनो सागर ले कम नई हे । ये सागर के एकाक बूँद सकेल के छंद मा लिखे के कोशिश करत हंव । येही कोशिश करत कुण्डलियां छंद संग्रह आँखी रहिके अंधरा’ अउ दोहा छंद के संग्रह ‘दोहा के रंग’ आप मन तक पहुँचाय हंव । आप मन के मया-दुलार अउ सुझाव ला धरत एक ले जादा छंद के एक किताब प्रकाशित करे के विचार ला ‘छंद चालिसा’ के रूप मा आप मन ला सउपत हंव । “छंद चालिसा मा चालिस प्रकार के छंद के संग्रह हे । हर छंद मा पहिली छंद के नियम-धरम ला स्पष्ट करे के कोशिश करेंव हंव । अपन लइका बुद्धि के ये प्रयास ला आप मन ला साझा करत मन मा खुशी होथ हे ।

अपन समालोचना रूपी आशीर्वाद देहूँ, आशा अउ विश्वास हे…

रमेशकुमार सिंह चौहान
मिश्रापारा, नवागढ
जिला-बेमेतरा (छ.ग.)
पिन-491337
मो.–9977069545, 8839024871








कोन मेरा का विवरण
जानव अपन छंद ला 25.4 झूमत नाचत बसंत आये
1. सुगती छंद 25.5 दरत हवय छाती मा कोदो,
1.1 गणेश वंदना होके हमरे भाई
1.2 मया करले 25.6 होरी हे होरी हे होरी
2. छबि छंद 25.7 जय हो जय हो भारत माता
2.1 जय जय किसान 25.8 लहर-लहर लहराये मइया, तोरे जोत-प्रैवारा
3. गंग छंद 25.9 जग ला मोहे, तोर
3.1 हे काम पूजा 25.10 कुँवा.जन्न ,अद्र पार मा मोर मयारू,
4. दीप छंद देखे रहेंव तोला, कुँवा पार मा
4.1 मोर छत्तीसगढ (सार छंद मा गीत)
5. अहीर छंद 25.11 मैं पगला तैं पगली होगे (गीत)
5.1 मनखेपन 25.12 ये नोनी के दाई सुन तो
6. तोमर छंद 25.13 पैरी चुप हे साटी चुप हे, मुक्का हे कऱ्धनिया
6.1 भाखा तैं बने बोल 25.14 छोड नशा पानी के चक्कर
6.2 भौतिकवाद के फेर 25.15 बरस बरस ओ बरखा रानी
7. चंडिका छंद 25.16 हरेली तिहार
7.1 नोनी बाबू एक हे 25.17 मोर ग्रैव हे सुख्खा
8. उल्लाला छंद 25.18 खोर-गली बिन ठगङडी लागय
8.1 काठी के नेवता 25.19 चारो कोती ले मरना हे
8.2 धन धन तुलसी दास ला 25.20 छत्तीसगढी भाखा रोवय
8.3 जगन्नाथ भगवान के रथ यात्रा 26. छन्न पकैया
8.4 जनम दिन के बधाई 26.1 आज हरेली हाबे
8.5 गीत-जीबो मरबो देश बर 26.2 नारी नो हय अबला
8.6 गीत-गोदवांय हँव गोदना 27. चवपैया छंद
9. कज्जल छंद 2.1 प्रभु ला हस बिसराये
9.1 कंचन काया हवय तोर 27.2 देवारी
9.2 जइसे मन मा सोच होय 27.3 हमर देश
10. मधुमालती छंद 2.4 छत्तीसगढी
10.1 ये गाँव ए 28. कुकुभ छंद
11. सखी छंद 28.1 भरे मइल मन मा कतका
11.1 नोटबंदी 28.2 संस्कारी बीजा बो दा
12. विजाती छंद 29. आल्हा छंद
12.1 मया के महिमा 29.1 जगमग जगमग जोत करत हे
13. मनमोहन छंद 29.2 जागव जागव अब बस्तरिहा
13.1 मनखे के हे, एक धरम 29.3 अमर कथा सुन लौ बाबा के
14. चौबोला 29.4 छत्तीसगढ महतारी के गोहार
14.1 देश-भक्ति हा, बड नेक हे 29.5 आतंकी सोच ल मार गिराव
15. चौपई छंद 29.6 जय हो जय हो मइया तोरे
15.1 तीजा 297 जागव जागव भारतवासी
16. चौपाई 29.8 कब तक हम सब झेलत रहिबो
16.1 मोर छत्तीसगढ के नारी 29.9 जात पात हा होगे एक ?
16.2 अटकन बटकन दही चटाका 30. त्रिभंगी छंद
16.3 जय जय मइया आदि भवानी 30.1 जय जय गुरूदेवा
16.4 चल चिरईया नवा बसेरा 30.2 थोकिन गुनले, बेटा मोरे
16.5 तोर करेजा पथरा होगे (चौपाई गीत) 30.3 हे जग कल्याणी, आदि भवानी
17. रोला छंद 30.4 आये देवारी
17.1 देवारी 30.5 गणतंत्र परब
17.2 काम हे तोर लफंगी 30.6 बैरी ला मारव
17.3 वाह रे पढई लिखई 30.7 मनखे होगे, जस भट्टसा
17.4 मनखेपन 30.8 ये मनखे चोला, सुन रे भोला
17.5 जोत-जवारा 30.9 भौजी के रांधे
17.6 यशोदा के ओ लाला 30.10 सुन बरखा दाई, करव सहाई
17.7 खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे 31. बरवै छंद (नंदा दोहा)
17.8 हे गुरू घासीदास 32. दोहा
17.9 जबर गोहार लगाबो दोहा-जनउला
17.10मोर गवा गे गाँव 33. छप्पय छंद
17.11 रोला मुक्तक 33.1 राम नाम जप ले
18. सिंहिका (शोभान) छंद 33.2 कहय शहिद के बेटवा
18.1 देश ला मत बाँट 33.3 एक रहव
18.2 तोर गुस्सा 33.4 काम-बुता करव
19. रूपमाला छंद 33.5 तोर पहिचान
19.1 पढे काबर चार आखर 34. कुण्डलियां
19.2 हमर सैनिक हमर धरती, हमर ये पहिचान 34.1 मुखिया
20. विष्णुपद छंद 34.2 गुरू घासीदास के संदेश
20.1 जात-पात 34.3 छत्तीसगढ के लता-ममता चंद्रकार
21. कामरूप छंद 34.4 सुख्खा होगे बोर
21.1 ए गोरी 34.5 दिखय ना पानी बादर
22. गीतिका छंद 34.6 आंगा-भारू लागथे
22.1 छेरछेरा के परब 34.7 लंबा लबरा जीभ
22.2 तफर्रा घाम 34.8 पहा जथे हर रात
22.3 तै निराशा मेट दे 34.9 कइसे मैं हर करव, बेटी के ग बिहाव
224 हे महामाई दया कर 34.10 करम बडे के भाग
225 काम ये खेती किसानी 35. मत्तगयंद सवैया
22.6 ये हमर तो देश संगी 35.1 झूमत नाचत फागुन आगे
23. सरसी छंद 35.2 पूस
23.1 जय जय महादेव 35.3 शक्ति उही हर मातु कहाये
23.2 दारू (जोगीरा स रा र रा) 35.4 गाँव जिहां लटका सब खेलय
23.3 होली हे होली हे होली ( जोगीरा स रा र रा) 35.5 नाचत गात मनावत होरी
234 मन के अंधियारी मेट ले (गीत) 35.6 गाँव बसे हमरे दिल मा
24. हरिगीतिका 36. मदिरा सवैया
241 जय माँ भवनी आदि माता 36.1 घाम करे अतका अब
24.2 छत्तीसगढ महतारी 36.2 ईश्वर एक हे
24.3 मनखे 37. दुर्मिल सवैया
244 जय हो भारत देश के 37.1 बिटिया, तैं करबे बड नाम उहां
245 अपने डहर मा रेंग तैं 37.2 झन झूमव शान गुमान म रे
25. सार छंद 38. सुमुखी सवैया
25.1 हम छत्तीसगढिया आन रे 38.1 गियां
25.2 बादर कस चुन्दी बगराये, चमकत रेंगय टूरी 39. सुन्दरी सवैया
25.3 आतंकी बैरी 39.1 गुण-दोष ल जाँचव पढई लिखई के
40. कहमुकरिया

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छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण बर

भाषा ह नाना प्रकार के व्यवहार बोल-चाल, पढ़ई-लिखई, बाजार, मनोरंजन आदि म मन के बात, संवेदना व्यक्त करे के माध्यम होथे। शासन अउ व्यक्तिगत चिठ्ठी-पतरी के माध्यम होथे। कोनो भाषा तभे पोठ होथे जब ओ भाषा हा, ओ भाषा के बोलईया मन के संगे-संग दूसर भाषा के बोलईया मन बर घला आदर्श होवय। कोनो भी बोली पहिली भाषा बनथे फेर एक मानक भाषा के रूप लेके व्यापक रूप मा प्रचारित हो जथे। हमर छत्तीसगढ़ी बोली हा भाषा के रूप ला पागे हे अब येखर मानक भाषा बने के यात्रा शुरू होगे हे।

मनकीकरण के संदर्भ म हमर विद्वान मन के दू प्रकार के विचार देखे ल मलिथे एक विचार धारा के अनुसार- ‘‘मानक भाषा अपन बनावट ले अपन भाषा के नाना प्रकार के रूप ले कोनो एक रूप या एक बोली ऊपर आधारित होथे। येखर मानक बने ले येखर बोलीगत गुण खतम होय लगथे अउ वो क्षेत्रीय ले अक्षेत्रीय हो जाथे। येखर कोनो तय सीमा क्षेत्र नई होवय अउ न ही ये कोनो भाषा-भाषी समुदाय के मातृबोली होवय।‘‘ दूसर विचार के अनुसार- ‘‘मानक रूप के मतलब एक अइसन रूप ले हे जउन भाषा के प्रकृति ला समझत अउ ओखर बहाव ला देखत येला सरल करे जाये ना कि दूसर भाषा के प्रकृति के आधार मा मानकीकरण के चक्कर मा भाषा के प्रवाह ला, प्रकृति ला रोक दे जाये। मानकीकरण के आधार भाषा के मूल रूप मा होनी चाही।‘‘ दूनों विचार के सार एके हे मानक भाषा सरल होवय, अपन प्रकृति म रहत जन-व्यापक होवय।




मानक भाषा के प्रमुख तत्व ऐतिहासिकता, मौलिकता, केन्द्रीयकरण, सहजता, एकरूपता अउ व्याकरण संमत होथे। ये तत्वमन मन मा भाषा के मानकीकरण करत बखत ध्यान दे ल परथे। भाषा के मानकीकरण बर ये दू काम धारन बरोबर होथे – पहिली ओ भाषा के प्रचलित नाना प्रकार के बोली म कोनो एक बोली ला आधार मान के या सांझर-मिंझर भाषा बर शब्द के गठन करे जाये। अउ दूसर ओखर लिखे के लिपी अउ वर्तनी म एक रूपता लाये जाये।

कोनो भी भाषा ला ओखर बोलीमन ओला मजबूत करथे, फेर कोनो भी बोली ओ भाषा ऊपर अपन अधिकार नई जतावय न अपन ल ओखर ले अलग समझय। छत्तीसगढ़ी के खलटाही, कमारी, सरगुजिया, सदरी-कोरबा, रायपुरी, बिलासपुरी, कांकेरी, बस्तरिया, लरिया, बिंझवारी जइसे नाना बोली प्रचलित हे। ये सबो बोली म जेन बोली ल छत्तीसगढ़ के जादा ले जादा मनखे अपन दिनचर्या म उपयोग करथे ओही ल आधार बनाना चाही। ये खोज के विषय हो सकत हे के छत्तीसगढ़ी के कोन बोली ह बोल-चाल म जादा ले जादा उपयोग होवत हे। फेर जेन छत्तीसगढ़ी ल धनी धरम दास, गुरू घासीदास, पं. सुंदरलाल शर्मा, शुकलाल पाण्ड़े, कोदूराम दलित, नारायण लाल परमार जइसे साहित्यकार मन अपनाइन, जेन छत्तीसगढ़ी ला अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर म हबीब तनवीर, तीजन बाई, देवादास, डॉ. सुरेन्द्र दुबे मन जइसे कलाकार मन जेन रूप म बगरायें हें, चंदैनी-गोंदा जइसे संस्था छत्तीसगढ़ी के जेन रूप ला दुनियाभर म बगरायें हें, जेन रूप म आकाशवाणी अपन स्थापना के बखत ले आज तक छत्तीसगढ़ी ला पालत-पोषत हे ओही रूप ल मानकीकरण के आधार चुने जा सकत हे काबर छत्तीसगढ़ी के ये रूप ले जादा ले जादा मनखे मन परिचित हे ओखर उपयोग छत्तीसगढ़िया मन के संगे-संग दूसर भाषा-भाषाई मन घला करत हें। आज छत्तीसगढ़ी मा लिखईया साहित्यकार मन, फिल्मकार मन, कलाकार मन घला येही रूप ला चलावंत हे।




मानकीकरण के दूसर धारन लिपी अउ वर्तनी हे। छत्तीसगढ़ी ह देवनागरी लिपी ल अपना चुके हे लिपी के चयन के कोनो समस्या नई हे। अब एके बात बाचथे जेमा विचार करे के जरूरत हे ओ हे- ‘वर्तनी‘। भाषा के वर्तनी के अर्थ हे- ‘‘भाषा मा शब्द मन ला वर्ण आखर ले व्यक्त करना। कई ठन भाषा, जइसे अंग्रेजी उर्दू मा सालों-साल ले वर्तनी (अंग्रेज़ीके स्पेलिंग, उर्दू के हिज्जा) ला रटावये जाथे। हम नान-नान मा अंग्रेजी के बहुत स्पेलिंग रटे हन। ये अभ्यास आज घलो चलत हे। फेर छत्तीसगढ़ी म अभी तक वर्तनी के महत्ता ल परखे नई गे हे। छत्तीसगढ़ी भाषा के पहिली अउ सबले बड़े गुण ‘ध्वन्यात्मकता‘ हे। छत्तीसगढ़ी ल देवनागरी लिपी म लिखे जाथे। देवनागरी लिपी के सबले बढ़िया बात हे- ‘जइसे बोले जाथे वइसने लिखे जाथे।‘‘ बोले गेय ध्वनि ला व्यक्त करना बहुत सरल हे। फेर ये हा कठिन हो जाथे शब्द ला अलग-अलग ढंग ले बोले मा। क्षेत्र अंतर होय मा, बोली के अंतर होय मा षब्द के उच्चारण म अंतर होथे, दूसर भाषा के आये शब्द के उच्चारण ल घला अलग-अलग ढंग ले करे म वर्तनी एक ठन समस्या के रूप म हमर बीच खड़े हे।

छत्तीसगढ़ी के मूल शब्द के मानकीकरण म कोनो बड़े समस्या नई हे। छत्तीसगढ़ी के केन्द्रीय बोली के चयन होत्ते येखर निदान हो जही। सबले बड़े समस्या जउन आज दिखत हे ओ हे- हिन्दी शब्द के छत्तीसगढ़ी म प्रयोग। अभी तक छत्तीसगढ़ी ह हमर मातृबोली अउ हिन्दी ह मातृभाषा रहिस हे। येखर सेती बासी म नून कस हिन्दी ह छत्तीसगढ़ी म घुर गे हे। जेन ल निकालना अब कठिन हे। हां, हमला येखर प्रयोग के ढंग म चिंतन करना चाही। छत्तीसगढ़ी म हिन्दी के प्रयोग अइसे होवय के छत्तीसगढ़ी के अपन खुद के मौलिकता बने रहय। अइसन करत बखत हमला येहू देखना चाही के हिन्दी शब्द के उच्चारण छत्तीसगढ़ी म करत बखत ओ शब्द के ओइसने उच्चारण होवय जेन ओही अर्थ दे सकय जेखर बर येखर प्रयोग करे जात हे। अर्थ के अनर्थ नई होना चाही।




हिन्दी शब्द के छत्तीसगढ़ी अपभ्रंश ल स्वीकार करना चाही के हिन्दी के मूल रूप म। येही हा सोचे के विषय हे। येमा कुछु निर्णय ले के पहिली कुछ जरूरी बात म जरूर सोचना चाही। हिन्दी के छत्तीसगढ़ी अपभ्रंश कइसे बनिस। कइसन शब्द के अपभ्रंश प्रचलित होइस अउ कइसन शब्द ह अपन हिन्दी के मूल रूप म चलत हें। जइसे हिन्दी के घर, छाता, जहाज, कागज जइसे बहुत अकन शब्द ह जस के तस छत्तीसगढ़ी मा प्रयोग होत हे। जेन शब्द के अपभ्रंश रूप चलत हे ओला देखे म मोटा-मोटी दू प्रकार दिखथे ‘आधा वर्ण‘ वाले शब्द अउ ‘संयुक्त वर्ण‘ वाले शब्द। सबले जादा ‘र‘ के पहिली कोनो आधा वर्ण आथे त अउ ‘आधा र‘ आथे त जइसे प्रसन्न-परसन, प्रदेश-परदेश, प्रसार-परसार, प्राथमिक-पराथमिक अर्घ-अरघ, फर्श-फरस आदि। संयुक्त वर्ण म शिक्षा-सिक्छा, श्री-सिरी, विज्ञान-बिग्यान, वैज्ञानिक-बिगयानिक या बइग्यानिक श्राप-सराप, त्रिशूल-तिरसूल आदि। अपभ्रंश रूप तभे स्वीकारे जाये जब येखर अर्थ ह ओही होय जेखर बर येखर प्रयोग करे गे। हिन्दी के प्रदेश, जेखर अर्थ अपन प्रांत, अपन राज्य होथे ओही मेरा येखर अपभ्रंश परदेश ह आन के देश, आन के राज्य के बोध कराथे जेखर प्रयोग उचित नई कहे जा सकय। ‘श्री‘ जेन संस्कृत ले हिन्दी म चलत हे ल ‘सिरी‘ कहे मा ओ अर्थ नई होवय जउन श्री कहे मा होथे। ये मेरन ध्यान दे के बात हे ‘श्री‘ के ध्वनि ला अंग्रेजी म ज्यों के त्यों Shri प्रयोग करे जाथे। फेर छत्तीसगढ़ी म जेखर लिपी ओही हिन्दी के देवनागरी हे तेमा ‘सिरी‘ काबर ? स, ष, श के प्रयोग बर घला सोचे चाही ये सही हे के मूल छत्तीसगढ़ी म केवल ‘स‘ के प्रयोग होथे फेर हिन्दी ले आये शब्द के श अउ ष ल घला स कहिना कहा तक सही हे ? व्याकरण के दृष्टिकोण ले व्यक्ति वाचक संज्ञा भाषा बदले म नई बदलय त कोखरो नाम संतोष ल संतोस, रमेश ल रमेस कहिना कहां तक उचित हे ?




कोनो भाषा के मानकीकरण ले ओ भाषा के प्राण हा बाचे रहय, ओखर प्रकृति लहजा, मिठास हा बाचे रहय। ये चिंता जायज हे के हिन्दी के धडल्ले ले प्रयोग ला सही कहिना छत्तीसगढ़ी ल प्राणहीन कर सकत हे। ये चिंता जतके बड़े हे ओतके बड़े चिंता येहू हे के हिन्दी के अपभ्रंश छत्तीसगढ़ी ले अर्थ के अनर्थ मत होवय। ये दूनों चिंता ला मिला के येखर हल खोजे के उदीम करे जाये। सबले पहिली जेन अर्थ बर छत्तीसगढ़ी शब्द पहिली ले हवय ओखर बर हिन्दी शब्द के प्रयोग कतई नई करना चाही। जेन अर्थ म छत्तीसगढ़ी आसानी से नई मिलय ओ अर्थ म हिन्दी के शब्द ल मूल रूप म स्वीकार करे चाही। काबर के मानक भाषा के रूप सर्वग्राही-सर्वव्यापी होना चाही। येखर बर भाषा म कुछ लचीलापन घला होना चाही। जुन्ना-जुन्ना साहित्यकार मन, कलाकार मन छत्तीसगढ़ी के जुन्ना शब्द जउन नंदावत हे ओला सहेज के नवा मनखे ल देंवय, नवा लइका मन घला छत्तीसगढ़ी लिख-पढ़ सकय येखर बर देवनागरी स्वर, व्यंजन, आधा वर्ण, संयुक्त वर्ण ला महत्ता देवंय। जेन शब्द मूल छत्तीसगढ़ी के हे तेमा आधा वर्ण या संयुक्त वर्ण, ष, श के उपयोग या बिल्कुल नई हे या नही के बराबर हे। ये सबो लफड़ा हिन्दी ले छत्तीसगढ़ी म अपभ्रंश के रूप म प्रयोग करब म होत हे। जब छत्‍तीसगढ़ी म अंग्रेजी के शब्द डॉक्टर, मास्टर, हॉफपेंट, रेल, जइसे शब्द ल बिना अपभ्रंश करे जेंव के तेंव स्वीकार कर ले गे त हिन्दी के शब्द ल मूल रूप म ग्रहण करे बर अतेक न नुकुर काबर।

रमेश कुमार सिंह चौहान

चार बेटा राम के कौडी के ना काम के

Ramesh Chouhanछोहीहा नरवा के  दुनो कोती दु ठन पारा नरवरगढ़ के । बुड़ती म जुन्ना पारा अउ उत्ती मा नवा पारा । जुन्नापारा मा गांव के जुन्ना बासिंदा मन के डेरा अऊ नवापारा मा पर गांव ले आये नवा मनखे मन के कुरिया । गांव के दुनो कोती मंदिर देवालय के ष्संख घंटा के सुघ्घर ध्वनि संझा बिहनिया मन ला सुकुन देवय ।  गांव के चारो कोती हरीयर हरीयर रूख राई, भरे भरे तरीया अउ लहलावत धनहा डोली, जिहां छेड़े ददरिया निंदत धान संगी अउ जहुरिया । जम्मो प्राणी अपन अपन काम ले संतुस्ट, लइका मन बाटी भवरा, गिल्ली डंडा, चर्रा कबड्डी नोनी मा फुग्गड़ी खेलय ।  अइसे लगय जइसे सरग हा इहें उतर गेय हे ।
इही गांव मा तोप नाम के एक किसान रहय, जेखर दषरथ कस चार झन छोरा हीरा, हरूवा, झड़ी अऊ झडुवा । तोप हा ददा दाई के दस पंद्रा इकड़ खेत मा तनमन ले खेती करय अउ अपन लइका बच्चा के भरण पोसण करय।  अपन जमाना मा तोप हा अंग्रेज मन के स्कूल ले चैथी पास रहय । ओ जमाना चैथी पढे मन ला मास्टरी, पटवारी, बाबू के नौकरी बिना मांगे मिल जय ।  घर बइठे नौकरी के आर्डर ।  आज कस मारा मारी नई रहय ।  फेर ओखर ददा हा ओला नौकरी मा नई भेजीस  कहे लगीस-‘‘उत्तम खेती, मध्यम व्यपार अउ नीच नौकरी, छाती तान कमा बाबू अउ लात दे के सुत‘‘ तै मोर एके झन बेटा तोर बर अतका खेती खार पूरय के बाचय । ओ बखत के आदमी मन संस्कारी रहय, अपन दाई ददा के बात ला नइ पेले सकय । आजकाल के लइका मन कस मुडपेल्ली काम नइ करे पात रहिन ।  अपन ददा के बात मान अपन गांव मा अपन खेती अउ परिवार मा मगन तोप रमे रहिगे । अपन ददा के संस्कार ला हीरा, हरूवा, झड़ी अउ झडुवा मा पेड़ के जर मा पानी रिकोये कस रिकोय लगिस ।  बेरा जात नई लगय देखते देखत लइका मन पढ़ लिख के तइयार होगे ।  तोप अपन चारो लइका ला षिक्षा, संस्कार के संगे संग काम करे के कूबत घला पैदा करिस । एही कारण ओखर चारो लइका सहर मा बने बने नौकरी चाकरी करे लगिन । चारो लइका के बर बिहाव करके तोप गंगा नहा लिहीस ।
चारो बेटा बहू सहर मा अउ ठोकरा ठोकरी गांव मा । घर कुरिया भांय-भांय करय । तोप गांव बस्ती मा घूमे फिरे ला निकल जय, त ठोकरी कुवंरिया निच्चट अकेल्ला घर कुरिया के भिथिया ला देखय फेर अंगना ला देखय ।  देखय- हीरा ठुमुक-ठुमुक दउड़त हे, पांव के घुंघरूं वाले साटी छन-छन बोलत हे, अपन हा दुनो हाथ लमाय ओ बेटा मोर हीरा कहत पाछू कोती उल्टा पाव आवत हे । ऐही बख्त फोन के घंटी बाजे लगिस । कुवंरिया झकना के फोन ला उठाइस –
‘दाई पा लगी‘ का करत हस ओ ददा कहां हे ? दूसर कोती ले हीरेच ह बोलत   रहय । कुवंरिया के आंखी डहर ले आंसू छलके लगिस – ‘खुष रह बेटा खुष रह रे‘ अउ का हाल चाल बाबू ।
ओम का करत हे गा ?
स्कूल गे हे दाई ।
अब का पढ़त हे ओम हा ?
क्लास फोर
अच्छा अच्छा, अउ बहू गीता कहां हे गा ?
ऐ…………….दे  बात अधूरा रहय के फोन हर कटगे । दाई के अंतस हा भुखायेच   रहिगे । का करेबे फोन उठाय भर ला आथे फोन लगाय लय तो आवय नही । चुरमुरा के रहिगे बिचारी कुवंरिया हर ।
ओती बर गीता हा हीरा के हाथ ले फोन झटकत कहत हे -‘आई डोंट लाइक टाकिंग युवर मदर‘ आपके मम्मी फिर गांव आने को कहेगी मुझे वहां जाना पसंद नही ।  ओम वहां जाकर गंदा गंदा गाली गालोच देना सीख जाता है, गंदे स्थान पर खेलता है ।
‘‘ ओही गांव के हीरा ह तोर हीरा होय हे गोइ‘‘-मन मा हीरा बुदबुदावत कहे लगिस-‘‘तो क्या हम अपने मम्मी पापा को यूं ही छोड दे अकेले‘
वहां सब कुछ तो है ना जमीन जयदाद, ऊपर से तू हर महिना पैसा भेजते हो और क्या चाहिये उन्हे‘‘ गीता हर झंुझलात कहिस ।  दुनो झन मा अइसने तकरार आय दिन होत रहय । फेर हीरा एको घा अपन दाई ददा मेर जायके हिम्मत नइ कर पायिस । हां हर महिना जउन बनतिस रूपया पइसा जरूर भेज दय ।
हरूवा हर एक ठन बड़ेक जन कंपनी के मनेजर साहब बनगे रहय ।  ओखर गोसाइन घला एकठन कम्प्यूटर कंपनी मा इंजिनियर रहय ।  सुत उठ के आफिस अउ आफिस ले आके बिस्तर ऊंखर दिन अइसने निकलत रहय काम बूता छोड़ अपने बर सोचे के फुरर्सत नइ रहय त दाई ददा ला का सुरता करतिन ।
झड़ी सरकारी आफिस के बाबू रात दिन टेबिल के बूता अउ ओखर खालहे ले कमई ।  लालच बुरी बलाई अउ अउ के फेर मा घर डहर के चिंता हरागे ।  रात दिन कूद-कूद के कमई अउ डौकी लइका संग गुलछर्रा उठई ओखर जिंदगी होगे रहय ।
झडुवा एक ठन कंपनी के सेल्स मेन रहय । ये सहर ले ओ सहर समान के आर्डर ले बूता करय । ओखर मन तो गांव जाय के होवय फेर वाह रे बूता छुटटीच नइ मिलय अइसे फतके रहय अपन काम म ।
कुवंरिया फोन ला धरे अवाक खडे रहय सोचत-का अच्छा दिन रहिस ओ दिन हा-
लइका मन सुघ्घर खेलय पढ़य अउ लड़य दाई दाई गोहरावत रहंय बूता तक नइ करन देत रहिन –
‘दाई-दाई मझला भइया मोरा मारथे संग मा नइ खेलावन कहिके, महू खेल हूं दाई‘ छोटे लइका झडुवा हा अपन दाई ला गोहरावत रहय । ‘अरे बेटा झड़ी आतो ऐती-‘ कुंवरिया मुॅह ले बोल डरिस ओतके बेरा तोप हा घूम फिर के दुवारी मा घुसरत रहय । कुवंरिया के भाखा सुन के ओखर मुह मा चमक आगे के झड़ी सहर ले आय हे कहिके । ऐती ओती देखिस झड़ी कहां हे ?  लइका मन कहां हे ? चारो कोती देखीस नइ पाइस कोनो ला । तोप समझगे कुवंरिया हा लइका मन के सुरता मा सुर्रात हे कहिके । तोप हा मन मा ठानिस के दू चार दिन बर कुवंरिया ला सहर लइका मन देखा के ला हूॅ कहिके । ओ हर कुवंरिया ले कहिस -‘ऐजी सुनत हस काली हीरा मन मेर जाबो रोटी पिठा बना ले । कुवंरिया के उखड़त सांस मा फेर सांस आगे सिरतुन हीरा के ददा ।  का कहे जी फेर एक बार कहि तो । ह हो हीरा मेर सहर जाबो रोटी पिठा बना डर ।
कुवंरिया कुलकत ठेठरी खुरमी बरे लगिस । घीव के मोवन डार के कुसली घला सेकीस ।  सोवत ले ओ हर लइकामन बर तइयारी करीस ।  लइकामन मेर जाये के साध मा निंद घला नइ आवत रहय ।  खुषी मा कुलकत मुंदधरहा ले उठ के नहा धो के तइयार   होगे ।  गांव के पहिली गाड़ी मा दुनो झन सहर बर निकल गे । दिन भर के रददा मा मुंदधियार के सहर पहूंचिन । घर पहुचिन त ओतके बेर हीरा मन डायनिंग टेबल मा खाय बर बइठे रहंय । हीरा दाई ददा ला देख बड़ खुष होगे उठ के सुघ्घर दाई ददा के पांव छू के पैयलगी करीस ।  गीता घला लाजे काने दुनो झन के पांव छुईस । कुवंरिया झटटे ओम ला गोदी मा लेके चूमे लागीस । लइका ला पाय पाय हीरा के मुॅंहे मुॅह ल देखय अउ लइका ला दुलारय । खाय पिये के बाद कुवंरिया हीरा संग बतियाय लगिस कब आधा रात होगे गम नइ पाइन । बिहनिया ले नहा धो के ओम स्कूल त हीरा अपन आफिस चल दिहीस ।  गीता घला आज काल के नारी घर मा फोकट थोरे बइठे रहितिस उहू हा प्रायवेट स्कूल मा बढ़ाय बर चल दिहीस । तोप घला सम्हर ओढ़ के सहर घूमे बर निकल गे । कुवंरिया अक्केला के अक्केला । एकाक घंटा मा तोप घुम फिर के आईस । कुवंरिया, तोप ला लोटा मा पानी कहिथे –
कहां गे रहेवजी
कहां जाबे भइगे सड़क कोती भिड़-भाड़ देख के आगेंव ।
बने करेव जल्दी आके अकेल्ला मन बने नइ लगय । लइकामन ला देख के बने लगीस जी । फेर सोचथंव – का जमाना आगेजी सब अपने मा मगन काम-काम अउ काम । घर मा जम्मो जिनीस हवय नइये काही त मनखे । अइसे गोठ-बात करत संझा होगे जम्मो प्राणी अपन-अपन काम ले घर आईन खाइन-पिइन अउ सुतगे । ऐही रकम दुनो ऊंहा हफ्ता भर रहिके गांव आगे ।
गांव आये दुये चार हफ्ता होय रहय के कुंवरिया बीमार परगे अउ दुये चार दिन मा अतका कमजोर होगे गे खटिया ले उठे बइठे नइ सकीस । तोप फोन करके जम्मो लइका ला घर आये बर कहिस । चारो लइका अपन-अपन बूता ले छुट्टी ले के घर आईन । लईका मन देख के ठोकरी कुंवरिया के मन हा हरियागे । चारो बेटा-बहू ले घर भरे-भरे लगय । अंगना मा नान्हे-नान्हे लइका मन खेल ले फेर एक बार कुवंरिया मन अउ अंगना भर गे दुयेच दिन मा । ओखर सख अब खटिया ले उठे के होगे ।
चारो बेटा-बहू दू दिन के छुट्टी ले के आये रहिन । काम के चिंता मा ओमन दाई ला बने होवत देख अपन- अपन काम चल देइन ।
कुछे दिन मा ठोकरी फेर पर गे । ऐ दरी अइसे परीस के उठे नइ सकिस । गांव के मन ठोकरी के अंतिम दरसन करे बर आय रहय ते मन गोठियात रहंय – ठोकरी के जीव लइका मन बर लग गे ।  आखरी बेरा मा कोनो संग नइ दे पाइन । का करबे -चार बेटा राम के कौड़ी के ना काम के ।

-रमेशकुमार सिंह चौहान

दोहावली

1. चार चरण दू डांड़ के, होथे दोहा छंद ।
तेरा ग्यारा होय यति, रच ले तै मतिमंद ।।1।।

विसम चरण के अंत मा, रगण नगण तो होय ।
तुक बंदी सम चरण रख, अंत गुरू लघु होय ।।2।।

2. दुखवा के जर मोह हे, माया थांघा जान ।
दुनिया माया मोह के, फांदा कस तै मान।।

3. जीवन मा दिन रात कस, सुख दुख हा तो आय ।
दृढ़ आसा विस्वास हा, बिगड़े काम बनाय ।।

4. सज्जन मनखे होत हे, जइसे होथे रूख ।
फूलय फरय ग दूसर बर, चाहे जावय सूख ।।

5. महर महर चंदन करय, अपने बदन गलाय ।
मनखे तन ल कोन कहय, देव माथे चढ़ाय ।।

6. गुरतुर बोली सब सुनय, करकस बर चिल्लाय ।
दोस्त एक हर देत हे, दूसर बैरी बनाय ।।

7. कुछु कर लय मनखे बड़े, नई दे सकन दोस ।
छोटे ऊही ल करय त, उतार देबो रोस ।।

8. एकलव्य अभ्यास कस, साध लक्ष्य ला रोज ।
अर्जुन जइसे देख ले, मंजिल पाबे खोज ।।

9. जलन करे के रोग हा, घुना किरा तो आय।
काया ला लकड़ी असन, छेद छेद के खाय।।

10. जोगी बाना ओढ़ के, सोचय मिलही शांति ।
जेखर अंतस भीतरी, मचे हवय गा क्रांति ।।

11. हॅस गा लव संगी तुमन, जीवन के दिन चार ।
मनखे मनखे मीत बन, दिखा तै सदाचार।।

12. गुरतुर गुरतुर बोल तै, जस कोयल के बोल ।
सब के दिल मधुरस घुलय, अपन हृदय ला खोल ।।

13. आमा रस कस प्रेम हे, गोही कस हे बैर ।
गोही तै हर फेक दे, होही मनखे के खैर ।।

14. लालच अइसन हे बला, जेन परे पछताय ।
फसके मछरी गरी मा, अपन जाने गवाय ।।

15. अपन करम गति भोग बे, भोगे हे भगवान ।
बिंदा के ओ श्राप ले, बनगे सालिक राम ।।

16. करम बड़े के भाग हा, जोरव ऐखर ताग ।
नगदी पइसा कस करम, कोठी जोरे भाग ।।

17. लाश जरत तै देख के, का सोचे इंसान ।
ऐखर बारी हे आज गा, काली अपने जान ।।

18. हा हा कार मचे इहां, पानी बर बेहाल ।
बावत सावन मा करे, आसो परे दुकाल ।।

19. सावन महिना लोग सब, पूजय शिव भगवान ।
सीधा सादा सीधवा, भोला जेखर नाम ।।

20. हरियर हरियर खेत ला, देख मन गद गदाय ।
सावन भादो बरसात हा, नवा जिंनगी बनाय ।।

21. बदल गे जमाना कहय, गांव के सबो सियान ।
अटल नियम बदलाव के, धरे कहां हे ध्यान ।।

22. डिलवा डबरा होय हे, काली के हा आज ।
गांव आज के हो जही, काली कोनो राज ।। Continue reading

अनुवाद

1.
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय
(मूल रचना – ‘‘कोशिश करने वालो की हार नही होती‘‘
मूल रचनाकार-श्री हरिवंशराय बच्चन )

लहरा ले डरराये  म डोंगा पार नई होवय,
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय ।
नान्हे नान्हे चिटीमन जब दाना लेके चलते,
एक बार ल कोन कहिस घेरी घेरी गिरते तभो सम्हलते ।
मन चंगा त कठौती म गंगा, मन के जिते जित हे मन के हारे हार,
मन कहू हरियर हे तौ का गिरना अऊ का चढना कोन करथे परवाह ।

कइसनो होय ओखर मेहनत बेकार नई होवय,
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय ।

डुबकी समुददर म  गोताखोर ह लगाथे,
फेर फेर डुबथे फेर फेर खोजथ खालीच हाथ आथे ।
अतका सहज कहां हे मोती खोजना  गहरा पानी म,
बढथे तभो ले उत्साह ह दुगुना दुगुना ऐही हरानी म ।

मुठठी हरबार ओखर खाली नई होवय,
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय ।

नकामी घला एक चुनौती हे ऐला तै मान,
का कमी रहिगे, का गलती होगे तेनला तै जान ।
जब तक न होबो सफल आराम हराम हे,
संघर्ष ले झन भागव ऐही चारो धाम हे ।
कुछु करे बिना कभू जय जयकार नई होवय,
कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय ।

2.
संझा
(मूल रचना – ‘‘संध्या सुंदरी‘‘
मूल रचनाकार-श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘)

बेरा ऐती न ओती बेरा बुडत रहीस,
करिया रंग बादर ले सुघ्घर उतरत रहिस,
संझा वो संझा, सुघ्घर परी असन,
धीरे धीरे धीरे……………
बुड़ती म, चुलबुलाहट के अता पता नईये
ओखर दुनो होट ले टपकत हे मधुरस,
फेर कतका हे गंभीर …. न हसी न ठिठोली,
हंसत  हे त एकेठन तारा,
करीया करीया चूंददी मा,
गुथाय फूलगजरा असन
मनमोहनी के रूप संवारत
सुस्ती के नार
वो तो नाजुक कली
चुपचाप सीधवा के गर मा बहिया डारे
बादर रस्ता ले आवत छांव असन
नई बाजत हे हाथ मा कोनो वीणा
न कोई मया के राग न अलाप
मुक्का हे साटी के घुंघरू घला
एक्के भाखा हे
ओहू बोले नई जा सकय
चुप चुप एकदम चुप
ऐही हा गुंजत हे
बदर मा, धरती मा
सोवत तरीया मा, मुंदावत कमल फूल मा
रूप के घमंड़ी नदिया के फइले छाती मा
धीर गंभीर पहाड़ मा, हिमालय के कोरा मा
इतरावत मेछरावत समुद्दर के लहरा मा
धरती आकास मा, हवा पानी आगी मा
एक्के भाखा हे
ओहू बोले नई जा सकय
चुप चुप एकदम चुप
ऐही हा गुंजत हे
अऊ का हे, कुछु नइये
नशा धरे आवत हे
दारू के नदिया लावत हे
थके मांदे सबो जीव ला
एक एक कप पीयावत हे
सेवावत अपन गोदी
मीठ मीठ सपना
ओ हा तो देखावत हे ।
आधा रात के जब ओ हा
निश्चलता मा समा जाथे
तब कवि के मया जाग
राग विरह ला गाथे
अपने अपन निकल जाथे
हिरदय के पीरा

-रमेशकुमार सिंह चौहान

मोर मयारू गणेश

दोहा
जऊन भक्त शरण पड़े, ले श्रद्धा विश्वास ।
श्रीगणेश पूरन करे, ऊखर जम्मो आस ।।

चैपाई
हे गौरा गौरी के लाला । हे प्रभू तू दीन दयाला । ।
सबले पहिली तोला सुमरव । तोरे गुण गा के मै झुमरव ।।1।।

तही तो बुद्धि के देवइया । तही प्रभू दुख के हरइया
वेद पुराण तोरे गुण गाय। तोर महिमा ल भारी बताय ।।2।।

दाई धरती ददा ह अकास । ऐ बात कहेव तू मन खास
तोर बात ले गदगद महेष । बना दिहीस ग तोला गणेश ।।3।।

शुरू करय जऊन ह अपन काम । हे प्रभू ले के तोर नाम
जम्मो के काम होवय सफल । कोनो विघ्न झन देवय दखल ।।4।।

जइसन लम्बा सूड़ ह तोरे । लम्बा कर दव ज्ञान ल मोरे
जइसन भारी पेट ह तोरे । गहरा कर दव सोच ल मोरे ।।5।।

गौरी दुलार भाथे तोला । ओइसने दुलार दव मोला
जस मिठ मोदक भाये तोला । मिठ मिठ भाखा दे दव मोला ।।6।।

हे एकदन्त एक किरपा करहु । मोर बुद्धि ल कभ्भू झन हरहु
संझा बिहनिया लेवंव नाम । पूरा कर दव अब जम्मो काम ।।7।।

हे मोर आखर के देवता । गाड़ा गाड़ा तोला न्योता
हे देव कुमति के नाश करव । प्रभू सुमति मोर भाल भरव ।।8।।

अपन पुरखा अऊ माटी के । अपन जंगल अऊ घाटी के
करवं मै निशदिन परनाम । सदा बने रहय ईखर मान ।।9।।

यशगान गावय सारद शेष । तोर शरण म आये ग ‘रमेश‘।
हे रिद्धी सिद्धी के दाता । अब दुख मेटव भाग्य विधाता ।।10।।

जब जब भक्त शरण परय, मेटय सकल कलेष ।
सुख देवय पिरा लेवय, मोर मयारू गणेश ।।

Ramesh Chouhanरमेशकुमार सिह चौहान
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