सुखदेव सिंह अहिलेश्वर”अँजोर” के छंद

मदिरा सवैय्या छंद

सुग्घर शब्द विचार परोसव हाँथ धरे हव नेट बने।
ज्ञान बतावव गा सच के सब ला सँघरा सरमेट बने।
झूठ दगा भ्रम भेद सबे झन के मुँह ला मुरकेट बने।
मानस मा करतव्य जगै अधिकार मिलै भर पेट बने।

दुर्मिल सवैय्या छंद

सुनले बरखा झन तो तरसा बिन तोर कहाँ मन हा हरषे।
जल के थल के घर के बन के बरखा बिन जीव सबो तरसे।
नदिया तरिया नल बोरिंग मा भरही जल कोन बिना बरसे।
जिनगी कइसे चलही सबके अब आस सुखावत हे जर से।

मत्तगयंद सवैय्या छंद

तीज तिहार लगे मनभावन जे बड़ पावन रीत धरे हे।
द्वार सुहावन लागत हे जस आज नता जग जीत डरे हे।
गाँव गली मुसकावत हे बहिनी मन के शुभ पाँव परे हे।
आज सबे हिरदे खुश हे बिटिया बर सुग्घर भाव भरे हे।

सुखदेव सिंह अहिलेश्वर “अँजोर”
गोरखपुर, कवर्धा

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