जइसे खाय अन्न वइसे बनही मन

अहार के मनसे के जिनगी म परभाव परथे। ईमानदारी ले कमई करके बिसाय धन ले बनाय खाय के अलगे असर परथे। ये असर हमला दिखय नहीं, फेर जेखर जिनगी तप के परभाव ले सुग्घर हो गे हे उंकर म एक परभाव तुरते दिखथे। एला समझे खातिर वृन्दावन के एक ठन किस्सा बतावत हंव बिचार करिहा। उहां के मंदिर म एक झन महात्मा रहत रहंय। एक रात के उन सुते रहिन। एकाएक उंकर मन म भगवान के गहना-गूठा ल चोराय के बिचार उठे लागिस। फेर का कथस मन के कहना ल…

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ननपन के सुरता : बाल भारती

स्‍कूल खुले के दिन एक जुलाई अउ तईहा के दिदन के बाल भारती के सुरता। जब  राहुल भईया ह अपन ब्‍लॉग सिंहावलोकन म ए बाबत छापिस त मेकराजाला के हमर भाखा बोलईया जम्‍मो संगवारी के मन भंवरा नाचें लागिस। राहुल भईया के बाल भारती ला पढ़ के, अपन ननपन के पढ़ई के बीते दिन ला सुरता करत, हमर मयारू हेमंत भाई हा हमला गुरतुर गोठ बर ये कबिता भेजे हे, आपो मन पढ़व अउ अपन असीस देवव – ननपन के सुरता बाल भारती, गणित, पट्टी कलमघनघोठहा चुमढ़ी के झोला झिल्लीके…

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जइसे खाय अन्न वइसे बनही मन

अहार के मनसे के जिनगी म परभाव परथे। ईमानदारी ले कमई करके बिसाय धन ले बनाय खाय के अलगे असर परथे। ये असर हमला दिखय नहीं, फेर जेखर जिनगी तप के परभाव ले सुग्घर हो गे हे उंकर म एक परभाव तुरते दिखथे। एला समझे खातिर वृन्दावन के एक ठन किस्सा बतावत हंव बिचार करिहा। उहां के मंदिर म एक झन महात्मा रहत रहंय। एक रात के उन सुते रहिन। एकाएक उंकर मन म भगवान के गहना-गूठा ल चोराय के बिचार उठे लागिस। फेर का कथस मन के कहना ल…

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बित्ता भर भुइयां

मे ह एक बीता भुइयां बर मरत हावव का, मे ह काबर अइसे करवाहूं भई जावा उही ल पूछ मे हा तो काही नइ केहे अवं। कइसे के विष्णु तोर मालिक ह काय काहत हे, सुनत हावच न, अरे ददा हो। मालिक के केहे बिना मेहा कइसे कर देहूं गा। विष्णु तोला मेहा कब दर्रा ल ढेलवानी बर केहे हव के, वा हे नइ केहेच त तोर टुरा ह तो चार दिन पहिली मोला ले बता के आय रिहिस हावय। मैं ह तभे तो कहे हावंव गा। बिहारी बेटा ये…

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नान्हे कहिनी : डेहरी के दिया

रमेसर ल लगते नइहे, मोर बाबू नइ हे कहिके। वोकर दमांद मन ससुर ल ददा ले बढ़के मानय। अपन गोतियार मन ला देखथे त कोनो बहू हा सास ल तंग करथे, त काकरो बहू हा ससुर ल खाय-पिए ल नी देवय। कोनो के लईका मन दाई-ददा ल माने गौने नहीं। सब परवार के मन रमेसर के परवार ल देखथे त अपन लइका मन ला कोसथें। गांव भर मा नरायन बबा हा अपन दु पुरखा ल देख डरे हे। अइसन जस आज कोनो ल नइ मिलय। पहिली के मन तो दु…

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तईहा के गोठ ल बईहा लेगे – कबिता

तईहा के गोठ ल भईया, बईहा लेगे ग। मनखे ल हर के मनखे के छईंहा लेगे ग॥ एक मंजला दू मंजला होगे, दू मंजला ह तीन मंजला। नांगर जोतइया, बांहा बजइया, होवत हे निच्चट कंगला॥ जम्मो सुख-सुभिता बाबू, भईया लेगे गे। तईहा के गोठ ल भईया, बईहा लेगे ग॥ खुरसी खातिर जात बांटय, बांटय धरम-ईमान। बोट खातिर मनखे बांटय, बांटय ग भगवान॥ रावन हर लोकतंत्र के सीता, मईया लेगे। तईहा के गोठ ल भईया, बईहा लेगे ग॥ घुघवा बइठे सिंहासन म, ठोंकत हांवय इहां ताल। गांधी जी के टोपी पहिरे,…

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बइगा के चक्कर – नान्हे कहिनी

तैंहा बतावत हस त मोला लागथे कि तोर लइका ल मलेरिया बुखार धरे हे, अउ सुन तैं काहत हस न कि मोर माइलोगन ल भूत धर ले रिहीस हे। तब वोला भूत-ऊत नई धरे रिहिस हे वोहा ज्यादा घामे-घाम म किंजर दिस तेकरे सेती अकचकासी लाग गे रिहिस होही। कइसे सुरेश का बात आय अब्बड़ दिन म दिखे हस कोन्हों कांही होगे हे का, तोर लोग लइका मन तो बने-बने हे न, अऊ तेहा काम-बुता म घलो बहुते कम जावथस, का तोर माई लोगन के तबियत बढ़िया नइए का, फेर…

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कबिता : मनखे के इमान

कती भुलागे आज मनखे सम्मान ला लालच मा आके बेचत हे ईमान ल। जन जन मा भल मानुस कहात रिहिन देखव कइसे दाग लगा दिन सान ल। छल कपट के होगे हावे इहां रददा भाई हा भाई के लेवत हे परान ल। दुख पीरा सुनैया जम्मों पीरहार मन गाहना कस धर देहें अपन कान ला। चोंगी माखुर के निसा मा कतको फोकटे अइसने गंवात हे जान ला। पाप-पुन धरम-करम हा खोवागे दिंयार कस खावत हे ईमान ला। कुंभलाल वर्मा

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मंदू

जज सहेब हर बंधेज करे हे, हमला छै महीना बर कट्टो जुवाचित्ती, दारू-फारू, चोरी-चपाटी नई करना हे कहिके। छै महीना कटिस ताहन उम्मर भर लूटमार, चोरी अउ छोरी सप्लई बर तो कानूनी पट्टा मिल जाही। जेलर सहेब के आघू म रजऊ ठेठवार अउ सुधु आके ठाड़ होगे। त लेजर हा तरी ले ऊपर निटोर के देखथे- ‘दू महीना आघू छोड़त हंव। वो चौरे उकील अउ परु ठेकादार तुंहर जबानत लीन हावे। चेत राहय दू महीना के भीतर तू मन ला ये साहर छोड़ देना हे।’ सिगरेट ला दू दम मारके…

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समय मांगथे सुधार – गुड़ी के गोठ

कोनो भी मनखे ह अपन अंतस के भाव ल कोनो दूसर मनखे ल समझाय खातिर जेन बोली के उपयोग करथे, उही ल हम भाषा कहिथन। अउ जब उहीच भाषा ल माध्यम बना के बहुत झन मनखे अपन भाव ल परगट करथें त फेर वोला एक निश्चित रूप दे खातिर लिपि के, वोकर मानक रूप से अउ आने जम्मो जरूरी जिनीस मन के बेवस्था करथन। छत्‍तीसगढ़ी खातिर घलोक अइसन किसम के बुता कतकों बछर ले चलते हे। जिहां तक व्याकरण अउ लिपि के बात हे त एमा तो सबो एकमत दिखथें,…

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