घर म नाग देव भिंभोरा पूजे ल जाय : नान्‍हे कहिनी

पीरा म गोहार पारत सुशीला अपन बेटा ल कथे, रूपेश मोला पन्दराही होगे कनिहा पीरा म मरत-मरत। फेर आज उदूक ले जादा बाड़ गे तइसे लागत हे। मोर देह के जम्मो हाड़ा ह एके जगा अरहजगे तइसे लागथे बेटा, बने असन डॉक्टर ल देखा देते कथो- पीरा म कलपत अपन दाई ल देख नई सकिस अऊ ओतकीच बेर अपन होण्डा म बइठार के सहर डाहर लेग के बड़े असन डॉक्टर ल देखाईस डॉक्टर ह एक कोरी गोली ल धरा दिस, देखते-देखत महिना सिरागे फेर कुछू नई होईस, फेर वोकर ले…

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छत्तीसगढ़ ‘वर्णमाला अउ नांव’ एक बहस

‘ये पाती कई झन साहित्यकार करा पहुंचे हावय। दिनेश चौहान ह एक विचार सब ला सोचे बर देय हावय। स्वर, व्यंजन के सही उपयोग करना हे, पहिली वर्णमाला तय करव ओखर बाद अक्छर के उपयोग करे जाय। अक्छर अइसना होवय जेन ह आज ले सौ साल पहिली ले उपयोग म आवत हावय। ये पाती के उत्तर तो मिलबे करही, सब सोचही अउ एक सही रूप झटकुन आ जही।’ अभी तक नांव लिखे म हिन्दी के प्रभाव चलत हे। काबर के पढ़े-लिखे के भासा अभी तक हिन्दीच बने हवे। हमला पता…

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संस्कार अउ संस्कृति : गोठ बात

जब काकरो सन गुठियावन त हम का बोलतहन तेकर ऊपर धियान रहय वो हमर कर्म बनथे। अपन करनी ल जांचन वो ह हमर आदत बनथे। अपन आदत ल परखना चाही वो हमर चरित्र के निरमान करथे। आज के समे म ये देखे बर मिलत हे, के हमार विचार म आधुनिकता समाधन हे अउ हमर संस्कार अउ संस्कृति ह भागत जात हे। अइसन म नवा पीढ़ी ल अपन करतब के गियान कइसे होवय? बिचार करे म अइसे लागथे के आज के पढ़ई-लिखई सदाचरन या अइसे कहन के संस्कारी बनाय म उपयुक्त…

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जनम भूमि : कहिनी

किसमत कभू धीरे-धीरे बदलथे, कभू उदुपले। ऊंकरों गांव ले लाने मोटरा म सुख के जोरन जोराय लगिस। ऊंकर गुत्तुर-गुत्तुर छत्तीसढ़िया बोली अउ मीठ-मीठ चहा-पानी म अइसन आनंद आय के एक बेर जे पी डरे ते लहुटती म चार गिराहिक अउ जोरे। जिनगी के खींचतान, पेट बर पेज-पसिया के संसो मनखे ल कहां ले कहां पटक देथे। वाह रे! सन् पैंसठ-छैंसठ के दुकाल दाना-दाना बर लुलवागे मनखे अउ चारा-पानी बर तरसगे गाय गरूवा। गांव के गांव उसलगे। का किसान, का बसुंदरा, अपन नोनी-बाबू के मुंहू म चारा डारे बर घर म…

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मोर छइंहा भुइहां छत्तीसगढ़ी रंगीन फिलिम के बोहनी

मैं सोचथंव के उनला अपन फिलिम म खराब फूहड़ दिरिस्य अउ गीत के निर्माण करके छत्तीसगढ़िया मन के आदत बिगाड़े के प्रयास करना एक सवाल खड़ा करथे। बने फिलिम अउ गीत हमेशा सफल होय हे। ये बात ल सुरता राखना एक फिलिमकार बर बड़ जरूरी हे। कोनो भी काम ल शुरुआत करे बर कोनो न कोनो ल अपन सोच के चिरई ल अगास म उड़े बर अजाद करे ला लागथे अउ वोहा जिहां तक ले उड़थे उहां तक के सपना ल सिरजाये खातिर रात-दिन ल एक माने ल लागथे। फिलिम…

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धरोहर ले निकले अनमोल रतन छत्तीसगढ़ी वियाकरन

छत्तीसगढ़ राज बनिस, तब बाहिर के मन ‘छत्तीसगढ़ी’ बोली आय के भासा एखर ऊपर प्रस्न खड़ा कर दिन। हल्ला होय ले लगगे के ‘वियाकरन कहां हे?’ कुछ सिक्छाविद् अउ साहित्यकार मन ये बात ल सामने लइन के बियाकरन के रचना तो हीरालाल काव्योपाध्याय ह 1885 म करे रहिन हे। ये वियाकरन के अंग्रेजी अनुवाद मि. ग्रियर्सन ह करीस अउ ओखर परकासन एसियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (खण्ड एलआईएक्स-खण्ड 1 और 2) म घलो होय रहिस हे। ये वियाकरन के परकासन 225 पेज म होय रहिस हे। एखर हिन्दी पाण्डुलिपि गंवागे। ओखर…

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अक्षय तृतीया

(बैसाख अंजोरी पाख तीज) भविष्य पुराण म लिखे हे के आज के दिन त्रेतायुग प्रारंभ होय रहिस हे। आजे के दिन भगवान परसुराम के घला अवतार होय रहिस हे। तेखरे सेती अक्ति के दिन ल अबूझ मुहुरत माने गे हे अउ एमा बर बिहाव मंगल कारज ल बिन मुहुरूत देखे करथें। बैसाख अंजोरी पाख के तीज के दिन ये तिहार ल मनाय जाथे। अक्ती तिहार ह बसंत ऋतु अउ ग्रीष्म ऋतु के संधिकाल आय। नारद पुराण, भविष्य पुराण म एकर बिसद विवरन पढ़े बर मिलथे। आज के दिन करे दान…

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अक्ती परब सीता ल बिहावय राजा राम – परब तिहार

हमर छत्तीसगढ़ के हर परब-तिहार के अलगे महत्तम हे। इहां के जम्मो मनखे मन म भारतीयता के संस्कार ह कूट-कूट ले भराय हे। वइसे तो साल भर के भीतर रंग-रंग के परब अउ तिहार ल मानथन हमन ह, फेर ये तिहार ह हमर छत्तीसगढ़िया किसान मन बर अलगेच महत्तम राखथे। गांव के छोटकुन लइका मन पुतरी-पुतरा के बिहाव खातिर, किसान ह खेती के पहिली बऊग खातिर त सज्ञान नोनी-बाबू के दाई-ददा मन अपन घर म दू बीजा चाऊंर टीके के आस म इही ‘अक्ती’ तिहार के रद्दा देखत रथे। भारतीय…

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फिलिम समीच्छा : गुँरावट छत्तीसगढ़ीया मन के हिरदे म खुसरही

छत्तीसगढ राज बने के बाद सबो डहर ले राज हा अधवावत हे चौतरफा विकास के धजा लहरावत हे भले पेड़ कटावत हे फेर बिल्डिंग अउ सड़क हा राज ला समरिद्धी के खिपहसार देवत हे ये विकास के नाव म सेखी बघरइया तथा विकास के पुजेरी मन बर सथाल हे। सवाल म अउ कई ठीन सवाल हे ओमा संस्कृति के सवाल हे अब संस्कृति के सवाल म एक ठीन जबर सवाल ये हे कि कला संगीत अउ परंपरा के गढ कहां है? बीते बच्छर मा कला संस्कृति संगीत म राज हा…

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गुड़ी के गोठ : आयोग ल अधिकार देवयं

छत्तीसगढ़ी भाखा-संस्कृति के हितु-पिरितु मन के मन म 14 अगस्त 2008 के छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के गठन के साथ जेन उमंग अउ उछाह जागे रिहीसे, वे ह वोकर दू बछर के पुरती बेरा म थोर-थोर लरघियाए ले धर ले हवय। अउ एकर असल कारन हे ‘मनसा भरम’ के टूटना। राजभाषा आयोग म जे मन ल बइठारे गे हवय वो मन ल एकदम से हुदरना-कोचकना या निंदा-चारी करना अभी बने नोहय काबर ते कोनो भी आयोग के जेन बुता होथे वोकर मुताबिक वोकर काम ठउका चलत हे। आयोग के काम सरकार…

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