मोला जब ले ये बात के जानबा होइस के इहां भगवान भोलेनाथ ह माता पार्वती संग सोला साल तक रहिके अपन जेठ बेटा कार्तिकेय ल वापस कैलाश लेगे खातिर डेरा डार के बइठे रिहीसे, तब ले मोर मन म एक गुनान चालू होगे के त फेर आज हमन ल छत्तीसगढ़ के जेन इतिहास देखाए जावत हे, वोहर आधा-अधूरा अउ बौना हे, जेला फेर नवा सिरा ले लिखे के जरूरत हे। अभी तक इहां बगरे किताब मन के माध्यम ले सिरिफ अतके ज्ञान पाये रेहेन के छत्तीसगढ़ के इतिहास ह रमाएन…
Read MoreYear: 2010
धरती म समावय निस्तारी के पानी – गुड़ी के गोठ
बरखा के पानी ल भुइयां के गरभ म उतारे खातिर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के गोठ आज-काल बहुत करे जावत हे। ये अच्छा बात आय के लोगन अब दिन के दिन कमतियावत पानी खातिर सोचे-गुने लागे हें, वोकर व्यवस्था खातिर नवा-नवा उदिम करत हें। फेर मोला लागथे के सिरिफ बरखा भर के पानी ल नहीं भलुक जतका भी पानी बिरथा बोहा के नरवा-ढोडग़ा ले होवत समुंदर म चले जाथे, वो जम्मो ल छेंक-छाक के धरती के गरभ म उतारना चाही। गांव-गंवई के बात तो अइसे हे के उहां नहाये-धोये अउ निस्तारी…
Read More‘रखवार’ समिति बनना चाही – गुड़ी के गोठ
कोनो भी भाखा, संस्कृति अउ वो क्षेत्र के अस्मिता के विकास अउ संवर्धन-संरक्षण म उहां के कला अउ साहित्य ले जुड़े मनखे मनके सबले बड़का योगदान होथे। ए मनला भाखा अउ संस्कृति के संवाहक घलो कहे जा सकथे। फेर अइसने मनखे मनके सेती जब कहूं के भाखा अउ संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन ह मुसकुल हो जाय त एला वो क्षेत्र के दुर्भाग्य अउ ओकर सपूत मनके बंटवारी कहे जाही। छत्तीसगढ़ी के नांव म आज जतका फिलिम अउ वीडियो एलबम बनत हे वोमन ल देख सुनके प्रचार तंत्र के ए सबले बड़का…
Read Moreअजब नियाव – गुड़ी के गोठ
ये जुग के सबले बड़े औद्योगिक त्रासदी के नियाव होते हमर पारा के बइठांगुर के मति छरियागे। मोला कथे भाई-एकरे सेती मैं कानून-फानून, नियाव-फियाव कुछू ल नइ मानंव। अइसन पहिली बेर नइ होए हे, जब पद, पइसा अउ पावर के आगू नियाव हार गे हे। तइहा जुग ले अइसन होवत आवत हे, अत्याचारी मन के हाथ म हमर कानून अउ नियाव ह धंधाय परे हवय। मैं वोला थोक पुचकारत कहेंव-त का होगे तेमा अतेक तलमलावत हस? -अरे कइसे का नइ होगे, तैं जानत हस आज ले 25 बछर पहिली जेन…
Read Moreडबरी झन बनय डबरा – गुड़ी के गोठ
आधुनिकता के चकाचौंध म चौंधियाये हमन जेन गति ले अपन परम्परा, संस्कृति अउ जीवन जीए के ढंग ल बिसरावत जावत हवन, उही गति ले कई किसम के समस्या घलोक हमर मन के आगू म अभरत जावत हवय। चाहे वो विकास के बात होवय ते सुख- समृद्घि के जम्मो म एकर पाछू विनास अउ पीरा के आरो मिल जाथे। आधुनिकता के नाव म जबले हमन अंध औद्योगीकरण ल बढ़ावा दिए हवन तबले खेती-किसानी, जंगल-झाड़ी, डोंगर-पहार अउ तरिया-नंदिया मन के दुरगत मातगे हवय। हमर जानती म छत्तीसगढ़ म 60 ले 70 इंच…
Read Moreसोरिहा बादर – गुड़ी के गोठ
तइहा के बात आने रिहीसे जब ठउका लगते असाढ़ के बादर उमडय़ अउ कालिदास के बिरहा भोगत यक्ष ह वोला सोरिहा बना के अपन सुवारी तीर पठो देवय। अब वो जुग बदले के संगे-संग बादर के अवई-जवई के बेरा घलो बदले बर धर लिए हे, अइसे म बिरहा भोगत यक्ष कइसे करय, वो अपन सुवारी ल कइसे बतावय के वोकर ‘राज निकाला’ के एक बछर पूरगे अब खंचित वो अपन सुवारी करा आही अउ असाढ़ के जउंहर बरसा कस वोकरो हिरदय म बरसही, वोला हरियाही। वइसे मौसम विज्ञानी मन के…
Read Moreसंस्कृति बिन अधूरा हे भाखा के रद्दा
भाखा के मापदण्ड म राज गठन के प्रक्रिया चालू होए के साथ सन् 1956 ले चालू होय छत्तीसगढ़ी भाखा ल संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल करे के मांग आज तक सिरिफ मांग बनके रहिगे हवय। अउ लगथे के ए हर तब तक सिरिफ मांगेच बने रइही, जब तक राजनीतिक सत्ता म सवार दल वाला मन के कथनी अउ करनी एक नइ हो जाही। काबर ते ए बात ल अब तक हर पढ़े-लिखे मनखे समझगे हवय के छत्तीसगढ़ी स्वतंत्र रूप ले एक समृध्द भाषा आय, जेकर शब्दकोश हे, व्याकरण हे,…
Read Moreनइए भरोसा संगवारी-रागी
नइए भरोसा संगवारी-रागी हवा पानी अउ आगी। नइए भरोसा संगवारी रागी॥ दाई बहनी सबके खाथे किरिया। नइए लाज शरम पिरिया॥ न दाई ल, दाई जानत हे। न बहिनी ल, बहनी मानत हे॥ सबके ऐके ठन राज आय। धन-दौलत अउ काज आय॥ मोर खेत कइके बताथे लबरा। देखे जाबे त दीखत हे डबरा॥ लबरा के मुंह बड़े होथे। जेकर पाही म दूसर रोथे॥ पाव पलगी कुछु नई जानय। पारा-परोस नाता नई मानय॥ घन घोर कलयुग आगे। किरिया म ईमान बेचागे॥ छानही म होरा भुंजत हे सियान। भटगे इकर मन के धियान॥…
Read Moreआंजत-आंजत कानी होगे!
‘जिहां तक नाक के सोझ म देखे के बात हे त इहां के मनखे तो वइसे घलोक नाक के सोझ म नई देख सकय। काबर ते इहां जम्मो चिक्कन-चांदन सड़क मन म कोन मेर जझरंगा भरका होही, गङ्ढा होही तेकर तो ठिकानच नइ राहय त भला बपरा ह अंधमुंदा या सोझ देखत कइसे रेंग सकथे? फेर ये बात बड़ा तााुब लागथे के इहां के सड़क मन नवा बने के चारेच दिन बाद एकेदरी कइसे खदखदा जाथे ते।’ पहिली ए बात समझ म नई आ पावत रहिसे के कोनों सुग्घर नारी…
Read Moreमोर लीलावती के लीला
कहां बोचक के जाबे तें। डोंगरी-पहाड़, अलीन-गलीन, जिहां हाबे, तिहां ले खोज के निकालिहौं। सात तरिया में बांस डारूंगा। केकंरा और मुसुवा के बिला मं हाथ डारहूं। अइसे काहत बइहाय गदहा कस किंजरे लगेंव। हुरहा पोस्टमेन हर, भकाड़ूराम चऊंक मा, अभरा तो गे। मैं आंखी छटकावत बिजली कस लउकेंव- ‘कस रे बईमान। तोर माथा मा फोरा परय। ते मनीआर्डर के पइसा ला कहां करथस, सच-सच बता।’ ओ दिन मोर संगवारी संजीव तिवारी संग भेंट होगे। देख के मैं अचरित रहिगेंव। मे केहेंव- ‘कइसे तिवारी जी! आजकल कइसे फुन्नाय-फुन्नाय, हरियर-हरियर दिखत…
Read More