सिरिफ केन्द्र के राजधानी दिल्ली, प्रांत मन के राजधानी अउ जिला मन के राजमार्ग भर म हरेक साल भारी-भरकम के जुलुस निकाले भरले जनतंत्र नइ कहावय। या हरेक पांच साल म वोट डारे के तिहार मनाय ले गणतंत्र सुफल नइ होवय। जउन दिन हरेक जनता ल रोटी, कपड़ा, मकान, दवाई अउ सिक्छा के ठौरेटी मिल जाहय, जउन दिन आम जनता के मन भावना जागही के भारत देश हमार आय। सिरिफ अधिकारी, कर्मचारी, बेपारी साहूकार, पद लोलुप नेता मन के नेतागिरी चलाय भर बर जनतंत्र नोहय ये जागरूक जनता म आही।…
Read MoreYear: 2010
भगत के बस म भगवान – लोककथा
गजब दिन के बात आय। महानदी, पैरी अऊ सोंढूर के सुघ्घर संगम के तीर म एक ठन नानकुन गांव रिहिस हे। नदिया के तीर म बसे गांव ह निरमल पानी धार म धोवाके छलछल ले सुघ्घर दिखय। गांव के गली-खोर ह घलो गउ के गोबर म लिपाय मार दगदग ले दिखत राहय। कोन्हो मेर काकरो घर- दुवार के भुलकी ले मतलहा बसउना पानी नइ निकलय। चौंरा मन घलो बर लाम चाकर लिपाय-पोताय दिखत राहय। भरे मंझनिया लाहकत कोन्हो काकरो चांवरा, परछी म ढलंग जावय त पट ले सुघ्घर नींद पर…
Read Moreभाग ल अजमावत हावय
दिन-रात पोंगा ल, वजावत हावयं घर-घर म जाके, रिरियावत हावंय अईसन छाये हे, चुनावी मऊसम चारो खूंट मनखे, बगरावत हावंय कोन्हों कुछु करंय त झन करंय फेर, लोगन ल आसरा देवावत हावय नान-नान लईका, जंवरिहा, सियान दारू पीरे बन गेहें मितान ‘नल’, ‘जांता’ अऊ ‘पत्ती’ छापा सब्बो ‘खुरसी’ बर ललचावत हावंय परचार करय बर पियत हावंय घरा म कलहा मतावत हावयं गांव ल आदर्श बनाबों कहिथें नशा-बांट-बांट वोट मांगत हावयं दारू, मुर्गा, अऊ पईसा हा चुनथे नेता मतदाता के नाव ह बोहावत हावंय अपन गियान के खिड़की ल खोले रखहू…
Read Moreगुड़ी के गोठ – संस्कृति बिन अधूरा हे भाखा के रद्दा
भाखा के मापदण्ड म राज गठन के प्रक्रिया चालू होए के साथ सन् 1956 ले चालू होय छत्तीसगढ़ी भाखा ल संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल करे के मांग आज तक सिरिफ मांग बनके रहिगे हवय। अउ लगथे के ए हर तब तक सिरिफ मांगेच बने रइही, जब तक राजनीतिक सत्ता म सवार दल वाला मन के कथनी अउ करनी एक नइ हो जाही। काबर ते ए बात ल अब तक हर पढ़े-लिखे मनखे समझगे हवय के छत्तीसगढ़ी स्वतंत्र रूप ले एक समृध्द भाषा आय, जेकर शब्दकोश हे, व्याकरण हे,…
Read Moreगुड़ी के गोठ – आरूग चोला पहिरावयं
जब कभू संस्कृति के बात होथे त लोगन सिरिफ नाचा-गम्मत, खेल-कूद या फेर जे मन ल सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत मंच आदि म प्रस्तुत करे जा सकथे, वोकरे मन के चरचा करथें। मोला लागथे के ए हर संस्कृति के मानक रूप नोहय। एला हम कला के अंतर्गत मान सकथन, फेर जिहां तक संस्कृति के बात आथे त एमा हम सिरिफ वो जिनीस ला शामिल कर सकथन जेला हम संस्कार या धर्म आधारित परब-तिहार के रूप म जीथन, मानथन अउ अपन अवइया पीढ़ी ल सौंपे खातिर संरक्षित राखे के उदिम करथन।…
Read Moreआदि परब के अद्भुत रंग – सुशील भोले
गुड़ी के गोठ बसंत ऋतु संग बलदे मौसम के नजारा संग कला-जगत के घलो रंग बदलत देख के मन गदगद होगे। छत्तीसगढ़ी कला-संस्कृति के नांव म इने-गिने गीत-नृत्य मन के प्रस्तुति देख-देख के असकटाये आंखी ल आदि परब के रूप में मनमोहनी देखनी मिलगे। एला देखे के बाद मन म ए बात के प्रश्न घलोक किंजरे लागिस के जब छत्तीसगढ़ के मूल आदि संस्कृति म कला के अइसन अद्भुत संसार रचे-बसे हे, त फेर छत्तीसगढ़ ले बाहिर छत्तीसगढ़ी के नांव म जेन कला-मंडली भेजे जाथे वोमा ए मन के समावेश…
Read Moreधान बेचई के करलई
किसान के पीरा ह जग हँसई होगे। मंडी म धान के बेचई करलई होगे॥ अधरतिहा ढिलाइस बईला-गाड़ी। जुड़ म चंगुरगे हाथ-गोड़ माड़ी॥ झन पूछ भूख, पियास नींद के हाल। चोंगी, माखुर तको जइसे, होगे बेहाल॥ होटल के गरम वोहा दवई होगे। मंडी म धान के बेचई, करलई होगे॥ लोग हे मंडी म धान के ढेरी। खचित हे हमर पर होही गा देरी॥ नोनी के दई ह बने त केहे रिहिस। दू ठन चाउर के चीला, चटनी संग जोरे रिहिस॥ ऊहू गठरी कती गिरिस, मोर रोवई होगे। मंडी म धान के…
Read Moreसरग निसैनी म चघ लइका हांसत हे, बादर ले चंदा झांकत हे
पुस्तक समीक्छा सरग निसैनी (लइका गीत) डॉ. पीसी लाल यादव प्रकाशक- दूधमोंगरा, गण्डई, जिला राजनांदगांव मूल्य-10 रुपए ‘सरग निसैनी’ म लइका गीत के पंक्ति हावय। एक-एक गीत ऊपर गोड़ मड़ावत लइका बुध्दिमानी के सरग तक पहुंच जही। निसैनी के हर पंक्ति लइका के पसंद के हावय। अमली गीत लइका के दिल के गीत आय। झोफ्फा-झोफ्फा अमली ल देख के लइका के हाथ म गोटा आ जथे। लइका त लइका, कोकवा अमली ल देखके सियान के मुंह पंछा जथे। ‘पानी बरसे’ गीत म रूख-राई झूमत हावय, मेचका, टेटका, चिरई, चिरगुन विधुन…
Read Moreछत्तीसगढ़ी लोक कला के धुरी ‘नाचा’
‘जुन्ना समय अउ अब के नाचा म अब्बड़ फरक होगे हे। जुन्ना नाचा कलाकार मन रुपिया-पइसा के जगह मान सम्मान बर नाचयं गावयं। गरीबी लाचारी के पीरा भुलाके कला साधना म लगे राहयं, कला के संग जिययं अऊ मरयं। आज काल में नाचा म दिखावा जादा होथे कला साधना कमतियागे। फिलिम के गाना संग भद्दापन के चलन बाढ़गे। येकरे सेती शिक्षित लोगन मन नाचा ल हीन भावना ले देखे ले धरलिन। गांव म सहर के रिवाज परेतिन असन पिछिया गे हे। गांव के अपन रीति रिवाज, संस्कार, वेशभूषा सब बदले-बदले…
Read Moreप्रकृति के नवा सिंगार अउ नवा बछर
सुशील भोले भईया ला सुनव यूट्यूब मा – विडियो साभार – http://www.youtube.com/user/webmediablog भारतीय नव वर्ष माने चैत महीना के अंजोरी पाख के पहिली तिथि। मोला लगथे हमर ऋषि-मुनि मन प्रकृति के नवा सिंगार ल आधार मानके ए तिथि ल जोंगिन होहीं तइसे लागथे। काबर ते इही बखत प्रकृति ह पतझड़ के बाद नवा सिंगार करथे। जम्मो रूख-राई म नवा-नवा कोंवर पान बड़ मयारूक दिखथे। हरर-हरर झांझ के बड़ोरा चारों खुंट नाचे ले धरले रहिथे। तभो ले उल्हवा पान के छांव जम्मो जीव-जंत मनला अपन कोरा बिसराम देथे, दुलार करथे,…
Read More