विचार ले भटकगे धारा : गुड़ी के गोठ

लोकतंत्र के नांव म जबले वोट के राजनीति शुरू होय हे, तबले कोनो भी नियम-कायदा या कहिन के विचारधारा ह जम्मो राजनीतिक पारटी मन ले तिरियावत जात हे। एकरे सेती अब कोनो भी पारटी ह अपन एजेण्डा ऊपर ईमानदार नइ दिखय। कहूं न कहूं वोमा लीपापोती या तिरिक-तीरा के चिनहा अवस कर के दिखथे। आम जनता के अधिकार अउ दु:ख पीरा के मापदण्ड म चालू होय नक्सल आंदोलन आज के समय म ए बात के सबले बड़े उदाहरण आय। ए बात सही हे के जब एकर शुरूआत होइस त हुदराय-चुहकाय…

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माटी माथा के चंदन

मोर गांव के करंव बंदन, माटी माथा के चंदन। सपना सुग्घर दूनो नयनन, आड़ी-पूंजी जिनगी धन॥ हरियर-हरियर खेती-खार लीपे-पोते घर-दुवार॥ गंगा कस नरवा के पानी, अन धन ले भरे कोठार॥ सेवा के सोंहारी बेलय, पिरित के धरे पईरथन। करमा, ददरिया, पंडवानी गली खोर म गीता बानी। घर-घर तुलसी रमायेन, राम सीता दूनो परानी॥ सुरूज संझा लाली लिए, बिहनिया बुके बंदन। जगमग सुरहुत्ती देवारी, फागुन के लाली-गुलाली। हरेली तीजा पोरा राखी मया बांटे माली-माली॥ उपजे-बाढ़े जेखर कोरा, तेखरे कोरा म मिले तन॥ डॉ. पीसीलाल यादव साहित्य कुटीर गंडई-पंडरिया राजनांदगांव

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मितानी के गांठ – कहिनी

दाई-दाई! मेंहा काली सलमा दीदी घर रहूं। दीदी ह मोला काली रूके खातिर बड़ किलोली करत रीहीस हे। बड़े बाबू ह घलोक रूके बर मनावत रीहीसे। ममता ह अपन दाई ल चिरौरी करत कहिथे। त दाई ह कथे- तेहां मोला झिन पूछ बेटी, तोर ददा ल जाके बता। ममता ह गांव के पंच कातिक के नोनी हरे अउ सलमा ह रमजान सेठ के नोनी हरे। दूनों ननपन के सहेली आयं। दूनों के जनम ह एके दिन के अरक-फरक म होय रीहीस। जब दूनों लइका के जनम होइस त दूनों घर…

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बसंत ‘नाचीज’ के छत्तीसगढी गजल

बिना, गत बानी के  घर, नाना नानी के डोकरी, डोकरा बिन, दवई पानी के आय डोली, काकर ढेला रानी के लगत कइसन हो होरा छानी के ऊंचा है दाम काहे कानी के बतावथस अइसन देबे लानी के दिखथे करेजा कस तरबुज चानी के बके आंय बांय बेइमानी करके कर दान, पुन ऊना नि कभू दानी के मरगे खा पुड़िया देव किसानी के। बसंत ‘नाचीज’ सौगात जोन-1 सड़क-2-ए न्यू आदर्श नगर, दुर्ग

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जब पवन दीवान दऊड़ म अव्वल अइस

सुरता राजिम तीर के कोमा गांव म साहित्य म रुचि रखइया के कमी नइ हे। इही गांव काबर आसपास के बहुत अकन गांव म घलो साहित्यकार अउ कवि मन के अइसे छाप पड़े हे के लोगन अपन लइका के नाव घलो कवि मन के नाव जइसे धराय-धराय हवे। वइसे तो राजिम क्षेत्र के जम्मो भुंइया साहित्यकार मन बर बड़ उर्वर हे। राजिम जिहां पवन दीवान, पुरुषोत्तम अनासक्त, कृष्ण रंजन, छबिलाल अशांत, विशाल राही जइसे साहित्यिक सपूत मन जनम लिस। वइसने मगरलोड, किरवई अउ कोमा में घलो बड़े-बड़े साहित्यकार मन पैदा…

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छत्तीसगढ़ी व्याकरण के 125 बछर

जे मन आज घलोक छत्तीसगढ़ी ल संवैधानिक रूप ले भाखा के दरजा पाए के रद्दा म खंचका-डिपरा बनावत रहिथें, उंकर जानकारी खातिर ये बताना जरूरी होगे हवय के ए बछर ह छत्तीसगढ़ी व्याकरण बने के 125 वां बछर आय। आज ले ठउका 125 बछर पहिली हीरालाल चन्द्रनाहू “काव्योपाध्याय” ह सन् 1885 म छत्तीसगढ़ी ब्याकरण ल लिखित रूप म एक किताब के रूप दिए रिहीसे, जेला सन् 1890 म अंगरेजी भाखा के बड़का व्याकरणाचार्य सर जार्ज ग्रियर्सन ह अंगरेजी अनुवाद कर के छत्तीसगढ़ी-अंगरेजी के शमिलहा छपवाए रिहीसे। हीरालाल चन्द्रनाहू जी ल…

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कुकुर मड़ई माने डॉग शो अउ डॉग ब्‍यूटी कान्टेस्ट – गुड़ी के गोठ

नवा जमाना संग नवा-नवा चरित्‍तर सुने ले मिलथे। पहिली तीज-तिहार, मेला-मड़ई के नांव सुनते मन कुलके अउ हुलके ले धर लेवय। काबर ते एकर ले अपन गौरवशाली परम्परा अउ संस्कृति के चिन्हारी मिलय। फेर अब अइसे-अइसे आयोजन होथे, ते वोकर नांव ल सुनके तरूवा भनभना जथे। अभी हाले के बात आय राजधानी रायपुर म ‘कुकर मड़ई’ होइस। अंगरेजी म एला डॉग शो अउ डॉग ब्‍यूटी कान्टेस्ट घलोक कहिथें। वइसे तो पश्चिमी देश मन म अइसन किसम के आयोजन ह कहूं न कहूं होतेच रहिथे। एकरे सेती उहां के जीवन शैली…

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कुकुर मड़ई माने डॉग शो अउ डॉग ब्‍यूटी कान्टेस्ट – गुड़ी के गोठ

नवा जमाना संग नवा-नवा चरित्‍तर सुने ले मिलथे। पहिली तीज-तिहार, मेला-मड़ई के नांव सुनते मन कुलके अउ हुलके ले धर लेवय। काबर ते एकर ले अपन गौरवशाली परम्परा अउ संस्कृति के चिन्हारी मिलय। फेर अब अइसे-अइसे आयोजन होथे, ते वोकर नांव ल सुनके तरूवा भनभना जथे। अभी हाले के बात आय राजधानी रायपुर म ‘कुकर मड़ई’ होइस। अंगरेजी म एला डॉग शो अउ डॉग ब्‍यूटी कान्टेस्ट घलोक कहिथें। वइसे तो पश्चिमी देश मन म अइसन किसम के आयोजन ह कहूं न कहूं होतेच रहिथे। एकरे सेती उहां के जीवन शैली…

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खजरी असनान – गुड़ी के गोठ

असनान तो वइसे कई किसम के होथे जइसे घुरघुरहा असनान, पानी छींचे असनान, साबुन असनान, झुक्खा असनान, गंगा असनान, शाही असनान, कुंभ असनान, चिभोरा असनान फेर अब ए सबले अलग हट के एक नावा असनान घलोक हमर इहां संचरगे हे, जेकर नांव हे- खजरी असनान। खजरी असनान बड़ा अलकरहा प्रजाति के होथे। ए असनान म अइसे होथे के जे मनखे ह बने पानी म चिभोरा मार के नहाथे, वोला खजर-खजर वाले खजरी ह बने कबिया के धर लेथे। तहांले मनखे वोला छोड़ाय खातिर चारों मुड़ा ले खजर-खजर खजुवात रहिथे। एकरे…

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झांझ के गुर्रई संग बासी के सुरता – गुड़ी के गोठ

मंझनिया के घाम ह अब जनाए ले धर लिए हे। एकरे संग अवइया बेरा के लकलकावत घाम के सुरता संग हरर-हरर के अवई-जवई अउ झांझ-बड़ोरा के गुर्रई के सुरता मन म समाए बर धर लिए हे। फेर संग म करसी-मरकी के जुड़ पानी अउ गोंदली संग बोरे-बासी के सेवाद घलोक मुंह म जनाए बर धर लिए हे। तेकरे सेती तांडव करत गरमी संग जूझे के हिम्मत बंधे रहिथे नइते सरकार अउ समाज के मुखिया मन के मारे तो कोनो मौसम के मार ल सहे के शक्ति न देंह म राहय,…

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