अपन दाई के सुमिरन कर अपन मन म कतको परसन मन ला सोचत हे। दाई के जाय के पाछू जम्मो परिवार का छितिर-बितर हो जाथे। ओला पोटारे बर अब कोन हे जेन हा ओ मन ला संभालत राहय, अपन मया के अंचरा मा गठिया के रखय, ते हा अब कहां है कोन कोती चले गे, काबर गिस, का फेर लहुट के आही। आज अशोक हा बिन दाई के लइका होगे हे। ओकर संगे संग ओकर जम्मो दू भाई अउ दू बहिनी मन हा घलो बिन दाई के होगे। बड़ दु:ख…
Read MoreYear: 2010
चरगोड़िया
भूख नई देखय जूठा भात, प्यार (मया) नई देखय जात-कुजात॥ समय-समय के बात, समय हर देही वोला परही लेना कभू दोहनी भर घी मिलही, कभू नई मिलही चना-फुटेना। राजा अउ भिखारी सबला, इही समय हर नाच नचाथे, राजमहल के रानी तक ला, थोपे बर पर जाही छेना॥ बेटी के बर बिहाव, टीका सगाई मोलभाव, लेन-देन होवत हे भाई। कइसे बिहाव करय बेटी के बाप, येती बर कुंआ हे, वोती बर खाई॥ मां होगे मम्मी अउ बाप होगे डैड लइका अंगरेजी के पीछू हे मैड। भासा अउ संस्कृति के दुरगुन तो…
Read Moreसांस म जीव लेवा धुंगिया
आज मौसम परिवर्तन के मार झेलत मनखे अचरज खा गे जब बसंत रितु म जाड़ ह अपन डेरा जमाय हावय। बरसात म गर्मी झेलत मनखे मौसम के पीरा ल सहत हावय। मौसम खुदे अचरज म हावय के मोर दिसा कइसे बदल गे हावय। इही सुग्घर साफ पर्यावरन ल करिया करत हमर विकास के रद्दा मलेगइया ये कल कारखाना बर कुछु सोचना चाही। ये हमर आज विस्व ल सोचे बर मजबूत कर दे हावय। काय हमन ल अपन खूबसूरत प्रकृति ल नस्ट करके विकास चाही? राजधानी रायपुर के परछिन अगास म…
Read Moreरहचुली
मेला म लगे हे रहचुली तरी ऊपर घूमत सहेजे रहचुली चेंवचेंव चेंव नरियावत हे रहचुली बाबू, नोनी सबो ल बलावत हे रहचुली पईसा म झूले बर बइठाए म रहचुली आ रे टुरा झूल ले, कहिथे ये रहचुली मीत-मयारू के मया ठउर ये रहचुली आमा के ममहावत मऊर ये रहचुली जिनगी के संसो-पीरा मेटाथे ये रहचुली अंजरी भर खुसी बगराथे ये रहचुली जिनगी घलो हावय एक ठन हमर रहचुली मया, पीरा, लाली ओंठ देखाथे ये रहचुली बिछरे संगी जंहुरिया मिलाथे ये रहचुली गीत अऊ किलकारी सुनाथे ये रहचुली आंखी के भाखा…
Read Moreकहिनी : पिड़हा
न वा जमाना आय के बाद जुन्ना कतको चीज नंदावत जात हे। एमा सिल लोड़िहा, पिड़हा, जांता, झउंहा अउ कतको जिनिस सामिल हवय। जांता तो आज कल बिलकुले नंदा गे हे। गांव में घलो खोजबे तो मिलना मुसकिल हे। वइसने मिक्सी के आय ले पढ़े-लिखे माइ लोगन मन सिल लोड़िहा ल हिरक के नइ निहारय। पिलास्टिक के धमेला आय ले झउंहा नंदा गे अउ डाइनिंग टेबल अउ कुरसी आय के बाद पिड़हा घलो नंदाना सुरू हो गे हे। कभू सगा सोदर आय तो ऊंच आसन बर पिड़हा देना मुहावरा रिहिस।…
Read Moreबखत के घोड़ा
खावत हे, पियत हे रातदिन मारा-मारी जियत हे बिन लगाम दउड़त हे बखत के घोड़ा। रात हर दिन हो जाथे दिन हर रात हो जाथे बिन काम होय आराम लागथे मनखे ल हराम आज ये डहर काल ओ डहर ये शरीर बन जाथे कोदो कस गरू बोरा बखत के घोड़ा। चलगे जेकर पांव के टापू मुड़ के नई देखय पाछू येहर अपन मंजिल पा लेथे अपन जीवन म सुख के गीत गा लेथे ये समय के फेर ये ककरो बीच म कोई बनथे रोड़ा बखत के घोड़ा। मनखे हर मनखे…
Read Moreछत्तीसगढि़या संगी मन संग जरूरी गुपचुप बात
हिन्दी ब्लॉग के जम्मो संगी मन ला जय जोहार. संगी हो आपमन अभी के ब्लाग जगत में होत धरी के धरा झूमा झटकी ला देखत होहू. हमर कई झिन भाई मन अपन-अपन गुट के नेता के संग देहे के खातिर पोस्ट और टिप्पणी ले ससन भर भर के बान मारत हें. राजकुमार सोनी भाई, ललित शर्मा भाई, पाबला भाई मन उडनतश्तरी वाले समीर लाल के तरफदारी बने फरियार के करत हे त संजीत त्रिपाठी भाई ह अनूप सुकूल कोती खडे टिपनी सिपनी करत दिखत हे. बाकी छत्तीसगढि़या भाई मन ला…
Read Moreछत्तीसगढि़या संगी मन संग जरूरी गुपचुप बात
हिन्दी ब्लॉग के जम्मो संगी मन ला जय जोहार. संगी हो आपमन अभी के ब्लाग जगत में होत धरी के धरा झूमा झटकी ला देखत होहू. हमर कई झिन भाई मन अपन-अपन गुट के नेता के संग देहे के खातिर पोस्ट और टिप्पणी ले ससन भर भर के बान मारत हें. राजकुमार सोनी भाई, ललित शर्मा भाई, पाबला भाई मन उडनतश्तरी वाले समीर लाल के तरफदारी बने फरियार के करत हे त संजीत त्रिपाठी भाई ह अनूप सुकूल कोती खडे टिपनी सिपनी करत दिखत हे. बाकी छत्तीसगढि़या भाई मन ला…
Read Moreखेती म हावय सब सुख – कहिनी
सीताराम हर एक दिन शहर गीस घूमे बर, शहर के हालचाल जाने बर सीताराम शहर पहुंचगे। बढ़िया-बढ़िया घर-कुरिया, पांच तल्ला छै तल्ला। सब ल देखिस घूमत-घूमत सीताराम ल भूख लागिस खोजत-खोजत एक ठन बढ़िया होटल म गिस पेट भर रोटी-भात खाइस। होटल वाला ल पूछथे, कस गा भइया, के रुपया होइस? होटल वाला सेठ कइथे, तोर एक सौ पचास रुपया होइस बबा। सीताराम अकबका गीस अउ कहीस कस मालिक मैं तो अतेक कन खाय नइयों, फेर अतका पइसा कइसे होइच। होटल मालिक कईथे- देख बबा, आजकल खाए-पीए के भाव नइए।…
Read Moreछत्तीसगढ़ी हायकू
बिन पानी के। सावन-भादो! जेठ। मन उदास। x ठग-ठग के। तैं बिलवा बादर। कांहां बुलबे? x बिगन पानी। कइसे होही खेती। संसो लागथे। x बिचारे हस? निरदई बादर। मन के पीरा। x पीरा ओनहा। पीरा दसना पी-ले। खा ले पीरा ल। विट्ठल राम साहू ‘निश्छल’ मौंवहारी भाठा महासमुन्द
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