सुन्ना कपार – उतरगे सिंगार

”मास्टरिन के बात ल सुन के मैं ह खुस होगेंव के देखव तो अब इंकर मन म जागे के चिनगारी उठत हे। जेन माइलोगिन निंदा-चारी के परवाह नई करके समाज अउ परिवार संग जुझथे वो ह अवइया कतेक माइलोगिन मन बर रद्दा बना देथे। कतको सिक्छित माइलोगिन मन ल कपार ल जुच्छा नि राखंय अउ बिंदी टीका लगाथे।” मे-ह अंध बिसवास ले दुरिहा रथौं। अउ जेन मोर करा अपन दु:ख ले उबरे के उपाय पूछे बर आथे तेन मन ल घला मे-ह ये समाज के दकियानूसी दुरिहा रहे के सलाह…

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शिवरीनारायण के मेला

इहां एक शिवलिंग हावय। ऐसे कहे जाथे के ये शिवलिंग म सवा लाख छिद्र हावय। येमा सिक्का डाले ले सिक्का के आवाज तो आथे फेर वो हर कहां जाथे ये रहस्य हावे। इहां माघ पूर्णिमा ले महाशविरात्रि तक मेला भरथे। शिवरीनारायण नाम में ही भक्त अउ भगवान के मिलन के बात हे, त एखर पौराणिक महत्व अउ इतिहास भी बहुत हेवय शवरीन दाई अउ ओखर भगवान राम के कहिनी कथे शवरीनारायण हर, इही जघा म तो शवरीन दाई जेन हर संवरा जाति के रसहि, अपन गुरुदेव मतंग मुनि के आसरम…

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हमर होरी – कहिनी

काय करबे बिधाता के आघु मा काकरो थोरे चलना हे। जिनगी के मरम ला निभाना हे। तब रोवत होय ते हासत जिये बर परही। अइसने जेकर करम हा फुटहा रिथे तेहर होस संभाले तहाने जियत भर ले मुड़ धरके रोवत राह। कतको कमा ले पईसा-कौड़ी भरे-भरे परवार के रहात ले घलो जिनगी मा कोनो न कोनो भुगता ले उबरना नी होवय। अइसने कोनजनी बिचारा अतुल। येकर भाग में काय लिखाय हावे ते। अपन दाई-ददा अउ भाई-बहिनी सबो ल अपन आघु मा गंवात देखिस फेर काय कर सकत रिहिस। वोतका ला…

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जुन्ना सोच लहुटगे हमर रंग बहुरगे

सर्दी के मौसम के जाती अउ गरमी के आती के बेरा एक संधिकाल आय। ये संधिकाल के मौसम के ‘काय कहना?’ ठंड के सिकुड़े देह मौसम के गर्माहट म हाथ गोड़ फैलाए ले लग जथे। खेती के काम निपट जथे। चार महीना बरसात अउ चार महीना ठंड म असकटाए मनखे, खेती के काम ले थके मनखे निखरे घाम म बाहिर आथे त बदलत मौसम म पेड़ पौधा के अटियई ल देखके झूमे ले लग जथे। मौसम के मस्ती के बाते अलग रहिथे। बसंत के बासंती रंग ओढ़े प्रकृति नाचत रहिथे।…

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कबिता : होरी के उमंग नोनी……

होरी के उमंग नोनीमाते हावय चारों कोतीहोरी के उमंग नोनीरंग अउ गुलाल देखउत्ताधुर्रा मातत हे।खुसी अमरावत हावयघर-घर, गली-गलीलइका अउ सियान सबफाग गीत गावत हे।रंगगे होरी ह सिरतोहोरी के उछाह म वोमया-मया मया-मयाडहर पहर बगरत हे।तरिया सुहावत हावयअमरइया ममहावत हावयकोइली हा गुरतुर-गुरतुरराग ल अलापत हे।झूमत हावय रुखराईकरत हावय अगुवाईहोरी म गोरी हा कइसेजोड़ी सोरियावत हे।जुड़-जुड़ पानी बिहनासंझा के जुड़ हावाभइगे संगी सबे बेराबासी हा सुहावत हे।आवव जम्मों जुरमिलमना लेवन संग होरीहोरी हा बइरी ल घलोमितान बनावत हे। चम्पेश्वर गोस्वामीभटगांव, अभनपुर

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कबिता : होली के रंग म

लइका सियान जम्मो नर नारीउड़ाए गुलाल पिचकय पिचकारीसंगी साथी सबो कोन्हों संग मरंगे हाबे ग होली के रंग म। बजावत हे नंगाड़ा गावत हे गानादही ले ले मही ले ले गुवालिन के रागपहिरे हावे फुंदरा बाला नवा ढंग मरंगे हाबे ग होली के रंग म। बैरी भाव ल छोड़ के बिना मीत मितानहोलिका माई ल माथ नवाए किसानमाते हावे खुशी के भंग मरंगे हाबे ग होली के रंग म। कोन्हों बने राधा त कोन्हों किशनश्याम रंग म रंगत हे मदन मोहनझूमे नाचे गाये मस्ती के तरंग मरंगे हाबे ग होली…

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जानबा

ये दिन हा कतका धन्य हे के 14 फरवरी 2010 दिन इतवार म महावर धरमसाला धमतरी के बडक़ा ठउर म छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति रायपुर (छत्तीसगढ़) के सवजन ले 14वां वार्षिक साहित्य सम्मेलन 2010 के आयोजन करे गिस। ये सम्मेलन के रद्दा सबो साहित्यकार जुन्ना अउ नवा सन देखत रहिथे। एक बछर पाछू अइसन समागम बने महत्तम के होथे। ये दिन जम्मो छतीसगढ़ी राज ले डेढ़ सौ साहित्यकार मन एक ठउर म सकला के अपन-अपन गरिमामय उपस्थिति के संग अइसे लागत राहय जइसन हमर साहित अगास म चंदैनी मन जग-जग, झग-झग…

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भासा के लड़ाई कहां तक

आज देस के एक राय अपन भासा ल सबके मुड़ ऊपर लादे बर खड़े होगे हावय। मुड़ म जादा वजन लादे मा दू बात हो सकथे। एक तो जादा वजन ल मनखेच्च गिर जही। दूसर, वो ह बोझा ल पटक दिही। ऊंहा अइसने होने वाला है। सब बोझा ल, बने अउ गिनहा रासनपानी, गोबर कचरा, फूलपान, कचरा-काड़ी ल एक जगह सकेले जाये अउ मौसम के मार एक साल ले खाय के बाद ओखर रूप ल देखे जाय त फेकइया मनखे घलो नई सोच सकय के ये ह काय बनगे हावय।…

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नौ बछर के छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ राय जब तक गर्भ म रहिस हे तब तक ओ ह छटपटावत बहुत रहिस हे। कमजोर महतारी ह ओखर ऊपर, धियान कम दिस। छत्तीसगढ़ के हुकारू ह दिल्ली तक पहुंचीस, ओखर दु:ख पीरा ल सुनके दिल्ली ह ओखर इलाज करीस। सन् 2000 म छत्तीसगढ़ के जनम होईस। बहुत दु:ख पीरा के संग-संग घर के अंगना म खुसी जब बहुत विलंब ले आथे तब खुसी के रंग बदले रहिथे। छत्तीसगढ़ संग घलो अइसने होईस। खुसी ल महतारी अपन अंचरा म, ददा ह अपन गमछा म रखे नई सकिस। दू लइका…

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मया बर हर दिन ‘वेलेन्टाइन डे’ होथे

अपन मया ल देखाय बर एक तिहार मनाये जाथे। जेन ल ‘वेलेन्टाइन डे’ कहे जाथे। येला आज जम्मो दुनिया के मन मनाथे। आज मया खतम होगे हावय। तभे तो ओखर बर एक तिहार मनाये बर दिन निश्चित करे हावंय। 14 फरवरी के दिन वेलेन्टाइन नांव के संत पैदा होय रहिस हे। ओ ह परेम के जोत जलइस। सही म आज ये जोत के जरूरत हावय। फेर येखर रूप ह बदल गे हावय। ये जोत ह सत के आगू म नई जलत हे, ये ह आज असत के आगू म बरत…

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