बियंग : रचना आमंतरित हे

ए खभर ल सुनके कतको अनदेखना इरखाहा मन के छाती फटइया हे। हमन बड़ गरब गुमान से सूचित करत हावन के साहित जगत म जबरन थोपे-थापे, लदाए-चढ़े साहितिक संसथा ‘धरती के बोझ’ हॅं अपन नवा किताब ‘‘बेसरम के फूल’’ के परकासन करके अतिसीघरा साहित जगत म अति करइया हे। जेन हॅं तुहर घुनावत टेबुल म दिंयार चरत माढ़े फोकट फालतू किताब मन संग धुरियावत दांत निपोरत साहित के नाक ल काटे म कोनो किसिम ले कसर नइ छोड़य। पढ़इया के मन म घलो फुसका असर नइ छोड़य। जानबा रहय के…

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परोसी के भरोसा लइका उपजारना

बुधारू घर के बहू के पाँव भारी होइस, बुधारू के दाई ह गजब खुस होईस। फेर बिचारी ह नाती के सुख नइ भोग पाईस। बहू के हरूण-गरू होय के पंदरा दिन पहिलिच् वोकर भगवान घर के बुलव्वा आ गे। बुधारू के बहू ह सुंदर अकन नोनी ल जनम दिस, सियान मन किहिन “डोकरी मरे छोकरी होय, तीन के तीन।” बहू के दाई ह महीना भर ले जच्चा.बच्चा के सेवा जतन करिस। दाईच् आय त का होईस, कतका दिन ले अपन घर-दुवार ल छोड़ के पर घर म जुटाही नापतिस, दू…

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छत्‍तीसगढ़ी लोक कथा : घंमडी मंत्री

–वीरेन्द्र सरल एक राज मे एक राजा राज करय। वो राज म अन्न धन, गौ लक्ष्मी कुटुंब परिवार के सब भरपूर भंडार रहय, सब परजा मन सुखी रहय। सबो कोती बने सुख संपत्ति रहय। कोन्हो ला कोन्हो किसम के दुख पीड़ा नई सतावय। एक समे के बात आय। राजा के मंत्री मन ला बहुत घंमड होगे कि वो राज मे उंखर ले जादा बुद्धिमान जीव कोन्हो नइ हे। ओमन सब परजा ला मूरख समझे अउ सोचय कि राज के सुख शांति सब हमरे भरोसा म हावे। मंत्री मन के हाव…

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छत्‍तीसगढ़ी लोक कथा : जइतमाल के ठेंगा

वीरेन्‍द्र सरल बहुत जुन्ना बात आय। एक गांव म एक गरीब महराज महराजिन रहय। महराज गांव गांव किंजर के भिक्षा मांगे। भिक्षा मे जउन मिले तिही मे दुनो पराणी के गुजर बसर होवय। महराज महराजिन मन के एको झन लोग लइका नइ रिहिस। भिक्षा मे बहुत कम धन मिले। मंहगाई मनमाने बाढ़ गे रिहिस। ओमन ला ना तो तन भर कपडा मिले अउ ना पेट भर जेवन। अच्छा खाना तो सपना होगे रिहिस। चटनी बासी, पेज पसिया पीके दिन पोहावत रिहिस। गरीबी म दिन बितत रहय। एक बेर गरीबी के…

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